०८

अष्टममाह्निकम्

  • विवेक * जयकीर्तिरयं जयताज्जगदम्भोजं विभक्तभुवनदलम् । रविरिव विकासयति यश्चिदेकनालाश्रयत्वेन ।। इदानीं द्वितीयार्धेन देशाध्वन: स्वरूपं संगिरितुमुपक्रमते देशाध्वनोऽप्यथ समासविकासयोगा त्सङ्गीयते विधिरयं शिवशास्त्रदृष्टः ॥ १ ॥ नन्ववान्तराणां प्रमेयाणामनन्तानां प्रतिपाद्यत्वेऽपि कथमिह अस्यैव निर्देश:, इत्याशङ्कयाह विचारितोऽयं कालाध्वा क्रियाशक्तिमयः प्रभोः । मूर्तिवैचित्र्यजस्तज्जो देशाध्वाऽथ निरूप्यते ॥ २ ॥
  • ज्ञानवती* जो चित्पी एक नाल के आधार पर विभक्त भुवनदल वाले विश्वरूपी कमल को सूर्य की भाँति विकसित करते हैं वे जयकीर्ति (= शिव) सबसे उत्कृष्ट हैं । अब (श्लोक के) द्वितीय अर्ध के द्वारा देशाध्वा का स्वरूप बतलाने के लिए उपक्रम करते हैं अब संक्षेप और विस्तार के साथ शैवागमसम्मत यह देशाध्वा की विधि कही जा रही है ।। १ ।। प्रश्न-अवान्तर (= म)ध्यवर्ती तथा अनन्त दूसरे प्रमेयों के प्रतिपाद्य होने पर भी यहाँ इसी का निर्देश क्यों किया जा रहा है ?-यह शङ्का कर कहते हैं परमेश्वर की क्रियाशक्ति से युक्त कालाध्वा का विचार किया जा चुका HARRAREERPAHELIANAWES श्रीतन्त्रालोकः HINCHHETRANSISTARRAHARHAARTI ‘अथ’ इत्यानन्तर्ये । तत् पदमन्त्रवर्णात्मना त्रिप्रकार: कालाध्वा विचारित: इति तदानन्तर्येण युक्तं देशाध्वनोऽप्यत्र निरूपणम्,–इत्यतएव क्रमेण भुवनतत्त्व कलाप्रतिपादकं वक्ष्यमाणमाह्रिकचतष्टयम । ‘तज्जः’ इति तस्मात प्रभोरेव जात:, स एव तथा तथा बहि:स्फुरित-इत्यर्थः । यदाहुः ‘आश्यानं चिद्रसस्यौघं साकारत्वमुपागतम् । जगद्रूपतया वन्दे प्रत्यक्षं भैरवं वपुः ॥ इति ॥ २ ॥ ननु यद्येवं, षड्विधोऽपि अयमध्वा किं चिदेकरूपात् तस्मादतिरिक्तो न वा? इत्याशङ्कयाह अध्वा समस्त एवायं चिन्मात्रे संप्रतिष्ठितः। यत्तत्र नहि विश्रान्तं तन्नभःकुसुमायते ॥ ३ ॥ ‘संप्रतिष्ठितः’ इति तदनतिरिक्त:-इत्यर्थः । अत्र व्यतिरेकमुखेन द्वितीयाधु हेतु: । ‘नभ:कुसुमायते’ इति न किञ्चित् स्यादिति यावत् ॥ ३ ॥ ननु यदि नाम संविदनतिरिक्त एवायमध्वा, तत् कथं सर्वत्र बर्हि देन भायात् ? – इत्याशङ्क्याह LATEST है। अब उससे उत्पन्न मूर्त्तिवैचित्र्यवाले देशाध्वा का निरूपण किया जा रहा है ।। २ ।। ‘अथ’ (पद) आनन्तर्य (अर्थ) में है । पद मन्त्र एवं वर्ण रूप से तीन प्रकार के काल-अध्वा का विचार किया गया । अब उसके बाद यहाँ देशाध्वा का निरूपण उचित है, इसीलिए वक्ष्यमाण चार आह्निक क्रम से भुवन, तत्त्व और कला के प्रतिपादक हैं। तज्जः = उस प्रभु से ही उत्पन्न । वही (= प्रभु ही) भिन्न-भिन्न रूपों में बाहर स्फुरित होता है । जैसा कहते हैं “संकुचित, चिदाह्लाद के समूहरूप, जगद्प में साकारता को प्राप्त प्रत्यक्ष भैरव शरीर को (मैं) प्रणाम करता हूँ ॥ २ ॥ __ प्रश्न-यदि ऐसा है तो यह छहों प्रकार का अध्वा उस एक रूप से कुछ भिन्न है या नहीं? – यह शङ्का कर कहते हैं यह समस्त अध्वा केवल चित् में प्रतिष्ठित है । जो उसमें प्रतिष्ठित नहीं है वह आकाशकुसुम के समान (= तुच्छ) है ॥ ३ ॥ प्रतिष्ठित = उससे अभिन्न है । यहाँ विपरीत दृष्टि से (श्लोक का) उत्तरार्ध (पूर्वार्द्ध का) हेत् है । आकाशपुष्प जैसा है = कुछ नहीं है ॥ ३ ॥ प्रश्न-यदि यह अध्वा संविद् से अतिरिक्त नहीं है तो सर्वत्र बाहर भिन्नरूप में कैसे आभासित होता है ?-यह शङ्का कर कहते हैं अष्टममाह्निकम् संविद्द्वारेण तत्सृष्टे शून्ये धियि मरुत्सु च। नाडीचक्रानुचक्रेषु बहिर्देहेऽध्वसंस्थितिः ॥ ४ ॥ संविदेव हि स्वस्वातन्त्र्यात् स्वं स्वरूपं गोपयित्वा स्वसमुल्लासिते शून्यप्राण बुद्धिदेहात्मनि प्रमातरि, बहि:प्रमेये च अनतिरिक्तत्वेऽप्यतिरिक्तमिव षड्विधमपि अध्वानमवभासयति,—इत्युक्तं ‘संविद्द्वारेण तत्सृष्टे शून्यादावध्वसंस्थितिः’ इति । ‘नाडीचक्रानुचक्रेषु’ इति मरुत्सामानाधिकरण्येन योज्यम् ॥ ४ ॥ ननु यद्येवं तदस्तु, को दोषस्तन्निरूपणेन पुनः कोऽर्थः? इत्याशङ्कयाह तत्राध्वैवं निरूप्योऽयं यतस्तत्प्रक्रियाक्रमम्। अनुसन्दधदेव द्राग् योगी भैरवतां व्रजेत् ॥ ५ ॥ ‘प्रक्रियाक्रमम्’ इति कालाग्न्यादेरनाश्रितपर्यन्तं तथातथाऽनुपूर्येण अव स्थानम्। ‘अनुसन्दधत्’ इति ‘सर्वमहम्’ इति विमर्शनेन स्वात्मविश्रान्तिमयतामा पादयन् योगी शीघ्रमेव परसंविदैकात्म्यमियात् ।। ५ ।। नचैतदस्मदुपज्ञमेव, इत्याह संविद् के द्वारा शून्य, बुद्धि, नाड़ीचक्रानुचक्र वाले प्राण तथा शरीर की सृष्टि करने पर बाह्यरूप में अध्वा की स्थिति होती है ॥ ४ ॥ संविद् ही अपने स्वातन्त्र्य से अपने रूप को छिपाकर अपने में (अपने द्वारा) शून्य, प्राण, बुद्धि, देह रूप प्रमाता एवं बाह्य प्रमेय को समुल्लासित कर अभिन्न होते हये भी भिन्न के समान छ: प्रकार के अध्वाओं को आभासित करती है इसलिए कहा गया— “संविदद्वारेण… संस्थिति:’ ‘नाड़ी चक्रान्चकेषु’ इसे मरुत के साथ सामानाधिकरण्यरूप में जोड़ना चाहिए अर्थात् संवित् के साथ प्राणवायु भी सञ्चारित होता है ॥ ४ ॥ ___प्रश्न-यदि ऐसा है तो हो, क्या दोष है (= कोई दोष नहीं है) किन्तु उसका निरूपण करने से क्या लाभ? यह शङ्का कर कहते हैं ____ यह अध्वा (इसलिए) उस प्रकार निरूपण के योग्य है क्योंकि उसके प्रक्रियाक्रम का अनुसन्धान करने वाला योगी तुरन्त ही भैरव दशा को प्राप्त हो जाता है ।। ५ ॥ प्रक्रियाक्रम = कालाग्नि (भुवन जो कि सबसे नीचे है वहाँ) से लेकर अनाश्रित (शिव) पर्यन्त उस-उस रूप में क्रमश: स्थिति । अनुसन्धान करने वाला = ‘मैं सब हूँ’ इस विमर्श के द्वारा आत्मविश्रान्तिमयता को प्राप्त करने वाला, योगी शीघ्र ही पर संविद् के साथ एकात्मता को प्राप्त कर लेता है ॥ ५ ॥ यह हमारी बुद्धि से प्रसूत नहीं है-यह कहते हैं श्रीतन्त्रालोकः दिदृक्षयैव सर्वार्थान् यदा व्याप्यावतिष्ठते । तदा किं बहुनोक्तेन इत्युक्तं स्पन्दशासने ॥ ६ ॥ यथा दिदृक्षावसरे स्वसाक्षितयैव अर्थस्तथा स्फुरति, तथैव योगी धरादि शिवान्ततत्त्वान्त विनः सर्वानर्थान् यदा ‘सर्वमहम्’ इत्यनुसंधानपूर्वं स्वात्मनि क्रोडीकृत्यावतिष्ठते तदा नि:शेषवेद्यविगलनेन परभैरवदशावेशचमत्काररूपं यत् फलम्, तत् स्वसंविदेवानुभविष्यति—इत्यत्र बहुनोक्तेन किम्? न कश्चिदर्थ इत्यर्थः । ‘स्वयमेवावभोत्स्यते’ इति चात्र तुर्यः पादः ॥ ६ ॥ ननु अध्वप्रक्रियाज्ञानमात्रादेव किमेवं भवेत्?–इत्याशङ्क्याह ज्ञात्वा समस्तमध्वानं तदीशेषु विलापयेत् । तान् देहप्राणधीचक्र पूर्ववद् गालयेत्क्रमात् ॥ ७ ॥ तत्समस्तं स्वसवित्तौ सा संविद्भरितात्मिका। उपास्यमाना संसारसागरप्रलयानलः ॥ ८ ॥ ‘तदीशेषु’ इति ब्रह्मादिषु । ‘तान्’ तदीशानपि देहबुद्धिप्राणशून्यात्मनि जब (योगी) देखने की इच्छा से समस्त पदार्थों को व्याप्त करके स्थित होता है तब अधिक कहने से क्या लाभ? ऐसा स्पन्दकारिका में कहा गया जैसे दिदृक्षा के समय अपने साक्षी के रूप में विषय उसी प्रकार (= अपने यथार्थ रूप में) स्फुरित होता है उसी प्रकार योगी जब पृथ्वी से लेकर शिव पर्यन्त तत्त्व के अन्दर रहने वाले सभी विषयों को यह सब मैं हूँ’ इस प्रकार अनुसन्धानपूर्वक अपने अन्दर समाहित कर स्थित होता है तब समस्तवेद्य के विगलित हो जाने से परभैरवदशासमावेशचमत्काररूप जो फल है उसका अपनी ही संवित् अनुभव करेगी—इस विषय में अधिक कहने से क्या लाभ? अर्थात् कोई लाभ नहीं । स्वयमेवावभोत्स्यते यह (स्पन्दकारिका का) चौथा पाद है जिसका अर्थ है = स्वयं ही जान लिया जाता है ॥ ६ ॥ प्रश्न-क्या केवल अध्वप्रक्रिया के जान लेने से ही ऐसा हो जाता है? – यह शङ्का कर कहते हैं ___ इस प्रकार ज्ञान प्राप्त कर समस्त अध्वा को उनके स्वामियों में लीन कर देना चाहिए । उन (= स्वामियों) को पूर्व की भाँति क्रमश: देह प्राण और बुद्धि नामक चक्रों में लीन कर देना चाहिए । उन समस्त (चक्रों) को आत्मसंवित् में (लीन कर देने चाहिए)। आपूरित वह संवित् उपास्यमान होती हुई संसारसागर के लिए प्रलयाग्नि हो जाती है ।। ७-८ ॥ उनके स्वामियों में = ब्रह्मा इत्यादि में । उनको = उनके स्वामियों को, भी अष्टममाह्निकम् कल्पिते रूपे ‘पूर्ववत्’ कालाध्वनिरूपितनीत्या ‘गालयेत्’ देहादारभ्य यथोत्तरं विश्रमयेत्, यावत् ‘क्रमात्’ प्राप्तावसरं ‘तत् समस्तम्’ देहादि स्वसंवित्सात्कुर्यात्, येनास्य सा संविदशेषवेद्यग्रासीकारेण पूर्णा सती ‘उपास्यमाना’ भूयोभूयस्तथा परिशील्यमाना द्वयाद्यवभासतिरस्कारेण परमाद्वयमयतया प्रस्फुरदित्यर्थः ॥ ८ ॥ ननु ‘अथ कालाग्निरुद्राध: कटाहः संव्यवस्थितः । कोटियोजनबाहुल्यस्तस्योर्चे भुवनानि तु ॥ नवनवतिकोट्यश्चाप्यण्डानां तु सहस्रकम् । कोटीनां सप्ततिं लक्षाण्ययुतानां सहस्रकम् ।। अर्बुदान्यथ वृन्दानि खर्वाणि च तथैव च । पद्मानि चाप्यसंख्यानीत्येवमादीन्यनेकशः ।। (स्व० १०।४) इत्याधुक्त्या भुवनानामानन्त्ये तदधीशानामपि आनन्त्यम्, इति तेषां प्रत्येक मेवमनुसंधाने जन्मसहस्रैरपि न कश्चित् पारं यायात्-इत्येतदशक्यानुष्ठानम् इत्याशङ्कयाह ___ श्रीमद्दीक्षोत्तरे चैतानध्वेशान् गुरुरब्रवीत् । ‘गुरुः’ इत्याद्यः श्रीकण्ठनाथ: । अब्रवीदिति नैयत्येन ॥ देह बुद्धि प्राण शून्यात्मक कल्पितरूपों में । पूर्ववत् = देह से लेकर उत्तरोत्तर विश्राम कराना चाहिए । जबतक क्रम से अवसरप्राप्ति के अनुसार वह समस्त देह आदि अपने संवित्रूप में न हो जाए जिससे इसकी वह संवित् समस्त वेद्य को निगल जाने के कारण पूर्ण होती हुई उपासित होती हुई = बार-बार परिशीलित होती हुई द्वित्व आदि अवभास के तिरस्कारपूर्वक परमाद्वय के रूप में स्फुरित होती है । ७-८ ॥ प्रश्न—“कालाग्निरुद्र के नीचे एक करोड़ योजन विस्तृत कराह है । उसके ऊपर ९९ करोड़ भुवन हैं । अण्डों की संख्या हजार, ७० करोड़, दशहजार लाख, हजार, अरब, वृन्द, खर्व, पद्म, और इस प्रकार अनेक प्रकार से असंख्य है।” (स्व० तं० १०।४) इत्यादि उक्ति के द्वारा भुवनों के अनन्त होने पर उनके अधिष्ठाता भी अनन्त हैं । फिर उनमें से प्रत्येक का इस प्रकार अनुसन्धान करने पर हजारों जन्म में भी कोई पार नहीं पा सकता-इस प्रकार इसका अनुष्ठान अशक्य है?-यह शङ्का कर कहते हैं दीक्षोत्तर तन्त्र में गुरु ने इन अध्वा-स्वामियों को बतलाया है ॥ ९ ॥ गुरु = प्रथम (गुरु) श्रीकण्ठनाथ । बतलाया है-निश्चित रूप से ॥ ८ ॥ श्रीतन्त्रालोकः तत्रत्यमेव ग्रन्थं पठति ब्रह्मानन्तात्प्रधानान्तं विष्णुः पुंसः कलान्तगम् ॥ ९ ॥ रुद्रो ग्रन्थौ च मायायामीशः सादाख्यगोचरे । अनाश्रितः शिवस्तस्माद्व्याप्ता तद्व्यापकः परः ॥ १० ॥ ब्रह्माण्डकर्परिकाधोवर्तिनोऽनन्तात्प्रभृति प्रधानान्तं ब्रह्मा व्याप्ता-इति संबन्धः । एवमुत्तरत्रापि योजनीयम् । ग्रन्थौ चेति, चशब्देन तद्गतरूपायामपि मायायां रुद्रो व्याप्तेत्यर्थः । ‘ईश:’ इतीश्वरः । ‘सादाख्यगोचरः’ इति शुद्ध विद्यादितत्त्वत्रयानि । ‘तस्मात्’ इति सादाख्यगोचरात् अर्थादूर्ध्वं शक्तितत्त्वस्थाने तु ‘तद्व्यापकः’ इति तेषां ब्रह्माद्यनाश्रितान्तानां पञ्चानामपि कारणानां व्यापक: पर: शिवः-इत्यर्थः । अतश्च नियतत्वात्तदीशानां प्रत्युतैतत् सुखोपायम्, इत्यत: परमन्यज्ज्ञानं नास्तीत्युक्तप्रायम् ॥ १० ॥ यदभिप्रायेणैव श्रीस्वच्छन्दशास्त्रमप्येवमाह एवं शिवत्वमापन्नमिति मत्वा न्यरूप्यत । 7 प्रक्रियापरं ज्ञानमिति स्वच्छन्दशासने ॥ ११ ॥ यदुक्तं तत्र वहीं का ग्रन्थ पढ़ते हैं अनन्त से लेकर प्रधान तक ब्रह्मा, पुरुष से लेकर कला तत्त्व तक विष्णु, मायाग्रन्थि में रुद्र, सदाशिव तत्त्व में ईश्वर, उससे ऊपर (शक्ति तत्त्व) में सर्वत्र व्याप्त रहने वाले अनाश्रित शिव व्याप्त रहने वाले है ।। -९-१० ॥ ब्रह्माण्डकटाह के नीचे वर्तमान अनन्त से लेकर प्रधान (तत्त्व) तक ब्रह्मा व्यापी है-इस प्रकार सम्बन्ध है । इसी प्रकार आगे भी जोड़ लेना चाहिए । ‘और ग्रन्थि’ में यहाँ ‘और’ शब्द से उस रूपवाली माया में भी रुद्र व्यापक है । ईश = ईश्वरः । सादाख्यतत्त्व, शुद्धविद्या आदि (= ईश्वर और सदाशिव) तीन तत्त्व में व्याप्त है । उससे = सादाख्यविषय से ऊपर शक्तितत्त्व स्थान में । तद्व्यापक = उन ब्रह्मा से लेकर अनाश्रित शिव तक पाँचों कारणों का व्यापक परमशिव । इसलिए उनके स्वामियों के नियत होने के कारण यह सुखोपाय है । इस प्रकार इससे बढ़कर दूसरा कोई ज्ञान नहीं है-यह भी कहा गया ॥ ९-१० ॥ जिस अभिप्राय से ही स्वच्छन्दशास्त्र भी ऐसा कहता है इस प्रकार शिवत्व की प्राप्ति होती है— ऐसा मानकर स्वच्छन्दतन्त्र में कहा गया कि प्रक्रिया से बढ़कर कोई ज्ञान नहीं है ॥ ११ ॥ जैसा कि वहाँ कहा गया हैअष्टममाह्निकम् ‘नास्ति दीक्षासमो मोक्षो न विद्या मातृकापरा । न प्रक्रियापरं ज्ञानं नास्ति योगस्त्वलक्षकः ।।’ (११।१९८) इति ॥ ११ ॥ नन्वेवमध्वनोऽनुसंधाने कथं बोधस्य साक्षात्कारो भवेत्?–इत्याशङ्कयाह त्रिशिरःशासने बोधो मूलमध्याग्रकल्पितः । षट्त्रिंशत्तत्त्वसंरम्भः स्मृतिर्भेदविकल्पना ॥ १२ ॥ अव्याहतविभागोऽस्मिभावो मूलं तु बोधगम् । समस्ततत्त्वभावोऽयं स्वात्मन्येवाविभागकः ॥ १३ ॥ बोधमध्यं भवेत्किंचिदाधाराधेयलक्षणम् । तत्त्वभेदविभागेन स्वभावस्थितिलक्षणम् ॥ १४ ॥ बोधाग्रं तत्तु चिद्बोधं निस्तरङ्ग बृहत्सुखम् । श्रीत्रिशिरोभैरवे हि बोध एव मूलमध्याग्रकल्पितः सन् षत्रिंशत्तत्त्व संरम्भस्तथोल्लसित:,—इत्यर्थादुक्तम्, येन तदनुसंधानाद्बोधसाक्षात्कार: स्यात् । तदेवार्थद्वारेण पठति—‘स्मृतिः’ इत्यादि । इह खलु यो नाम ‘अस्मिभाव:’ ‘बुद्ध्यस्मितासुसंरूढो गुणान्पूर्वं विभेद्य च। दीक्षा के समान मोक्ष, मातृका से बढ़कर विद्या, प्रक्रिया से बढ़कर ज्ञान और बिना लक्ष्य (= विश्रान्ति धाम) के कोई योग नहीं है ॥ ११ ॥ (स्व० तं० १११९८) प्रश्न-इस प्रकार अध्वा का अनुसन्धान होने पर बोध का साक्षात्कार कैसे होता है? यह शङ्का कर कहते हैं त्रिशिरोभैरव में बोध मूल मध्य और अग्र (तीन भाग में) कल्पित होकर ३६ तत्त्वों में उल्लखित है । स्मृति, भेदज्ञान, स्पष्ट विभाग वाला अस्मिभाव (ये) बोध के मल हैं। अपने आत्मा में ही बिना विभाग के समस्त तत्त्वों की भावना बोध का मध्य होता है (जिसमें) थोड़ा-थोड़ा आधार-आधेय भाव होता है । तत्त्वों के भेद के अपसारण के द्वारा स्वभाव में स्थित होना बोध का अग्र (रूप) हैं और वह चिद्बोधरूप तरङ्गहीन महासुख है ॥ १२-१५- ॥ त्रिशिरोभैरव में बोध ही मूल मध्य और अग्र (तीन) रूपों में कल्पित होकर, छत्तीस तत्त्व के संरम्भवाला = उस रूप में उल्लखित होने वाला है-यह अर्थात् कहा गया । जिससे उसका अनुसन्धान होने से बोध का साक्षात्कार होता है । उसी को अर्थ के द्वारा कहते हैं-स्मृति इत्यादि यहाँ जो अस्मिभाव है श्रीतन्त्रालोक: विचारयेद्भूतधर्मान् पृथिव्यादिक्रमेण तु ।’ इत्यादितत्रत्योक्त्या अनात्मरूपबुद्ध्यादिनिष्ठाहंभावः संकुचितः प्रमाता स स्मृतिर्भेदविकल्पना च तत्स्वभाव-इत्यर्थः । स हि ‘इदमहं जानामि’ इति भेदेनैव विश्वं विकल्पयेत् । न केवलं सद्रूपमेवार्थमेवं विकल्पयेत्, यावद्दग्ध पित्रादिविषये स्मृतिविकल्पादावसदपि,-इत्युक्तं स्मृतिः’ इति । अत एवेदन्तायाः प्राधान्यादव्याहतविभागः सुस्फुटभेदात्मक-इत्यर्थः । तच्च बोधगं मूलं बोधस्य परां कोटि प्राप्तं स्थौल्यमुच्यते,—इत्यर्थः । तथा अयं भेदेनोल्लसित: ‘समस्त तत्त्वभावो’ भतभावादि: ‘इदमहम’ इति न्यायेन बोधरूपे ‘स्वात्मन्येव’ विश्रान्तोऽत एव ‘अविभागको’ विगलितभेदो बोधमध्यं भवेत् नतु बोधाग्रम्; यतस्तदहन्ते दन्तयोः सामानाधिकरण्यात् आमुखे भेदप्रतिभासात् ‘किंचिदाधाराधेयलक्षणम्’ किंचित्पदेन बोधमूलवन्न भेदप्रधानं नापि बोधाग्रवदभेदप्रधानम्, इति प्रकाशितम्; अत एव अन्तरालवर्तित्वात् ‘मध्यम्’–इत्युक्तम् । तथा तत्त्वानां भेदस्य ‘विभागेन’ मूलत एव शातनेन यत् ‘अहम्’ इत्यामर्शरूपे स्वात्मन्येवावस्थानं तत् ‘बोधाग्रम्’ सकलभावाविभागस्वभावः, परां काष्ठां प्राप्तो बोधः-इत्यर्थः । अत एव तच्चिद्बोधरूपं न तु अणुबोधरूपम्, निस्तरङ्गं न तु क्षुब्धम्, ‘बृहत् सुखम्’ “बुद्धि की अस्मिता मे सम्यक् आरूढ़ हुआ (साधक), पहले गुणों का भेदन करे (फिर) पृथिव्यादि के क्रम से भूतों के धर्म का विचार करे ।’ ___इत्यादि वहीं की उक्ति से अनात्मरूप बुद्धि आदि में लगा हुआ अहंभाव ही संकुचित प्रमाता है । वह स्मृति और भेद विकल्पना अर्थात् उसी के स्वभाववाला है । वह (= संकुचित प्रमाता) ‘मैं इसे जानता हूँ’ इस प्रकार भेदपूर्वक विश्व की कल्पना करता है । वह केवल सद्प ही अर्थ की ऐसी (= भेदमयी) कल्पना नहीं करता बल्कि दग्धपित आदि के विषय वाले स्मृतिविकल्प आदि असत् में भी (उसके द्वारा कल्पना की जाती है)-इसलिए कहा गया-स्मृति: । इसीलिए इदन्ता की प्रधानता के कारण (यह बोध) अव्याहत विभाग वाला = भली भाँति स्फुट भेदवाला, है । वह बोध का मूल = बोध की अन्तिम स्थिति को प्राप्त स्थूलता, कही जाती है-यह अर्थ है । तथा यह भेदपूर्वक उल्लखित समस्त तत्त्वभाव = भूतभाव आदि ‘यह मैं हूँ’ इस न्याय से बोधरूप अपनी आत्मा में ही विश्रान्त है इसीलिए ‘अविभागक’ = भेदहीन, बोध का मध्य है न कि बोध का अग्र क्योंकि तत्ता और इदन्ता का सामानाधिकरण्य होने से प्रारम्भ में भेद का आभास होने के कारण यह कुछ आधाराधेय रूप है । “किञ्चित्’ पद से बोधमूल के समान न भेद-प्रधान और न ही बोधान के समान अभेद-प्रधान है-यह प्रकाशित किया गया। इसी कारण बीच में रहने से ‘मध्य’ कहा गया । तत्त्वों के भेद के विभाग के द्वारा = मूल से ही काट देने से जो ‘अहम्’ इस प्रकार के आदर्शरूप आत्मा में ही स्थिति होती है वह = बोधान = समस्तभावों का अविभाग = अन्तिम सीमा को प्राप्त बोध है । इसीलिए वह अष्टममाह्निकम् जगदानन्दरूपं न तु अनानन्दादिरूपमित्यर्थः । यदुक्तं तत्र ‘षट्त्रिंशत्तत्त्वविषये यद्भेदेन विकल्पना । स्मृतिः सुस्फुटभेदात्मा मितमाता तदुच्यते ॥ प्रान्तावस्थितिविज्ञानं स्थौल्यं बोधस्य भैरवि । समस्ततत्त्वभावोऽयं नावलोक्यो विभागशः ।। स्वात्मनि संस्थितं विन्द्याद् बोधमध्यं तदुच्यते । आधाराधेयभावोऽयमुभयावस्थितस्य च ।। तत्त्वभेदविभागेन स्वभावस्थितिलक्षणम् । तत्पदस्थो न विन्देत चिद्व्योमान्तरवर्तिनः ।। तदतीतं विजानीयान्मध्यमं प्राप्त्यवस्थितम् । प्रान्तावस्थितिविज्ञेयं बोधाग्रं तदिहोच्यते ।। शक्तिज्ञानं विजानीयात्परमानन्दलक्षणम् । नित्योदितं सुखं विद्धि निस्तरङ्गं तु कथ्यते।। बृहत्सुखेति कथितं चिद्बोधं तु निगद्यते ।’ इति ।। १४ ॥ एवं षड्विधेऽप्यध्वनि संविदैकात्म्यं परिशीलयतो योगिनो भैरवीभाव एव भवेत्-इत्याह संविदेकात्मतानीतभूतभावपुरादिकः ॥१५ ॥ अव्यवच्छिन्नसंवित्तिभैरवः परमेश्वरः । चिद्बोधरूप है न कि अणुबोधरूप, निस्तरङ्ग है न कि क्षुब्ध, बृहद् सुख = जगदानन्द रूप है न कि अनानन्द आदि रूप । जैसा कि वहाँ कहा गया है “छत्तीस तत्त्वों के विषय में जो भेदपूर्वक विकल्पना, स्मृति है स्पष्ट भेद वाली वह मितप्रमाता कही जाती है । हे भैरवि ! प्रान्त में जिसकी स्थिति का ज्ञान होता है ऐसी बोध की स्थूलता (जहाँ) यह समस्त तत्त्व भाव अलग-अलग न दिखाई पड़ता हो (प्रत्युत) अपने में स्थित प्रतीत होता हो उसे बोधमध्य कहा जाता है । यह दोनों रूपों में स्थित का आधाराधेय भाव है । तत्त्वभेद के अपसारण के साथ, उस पद में स्थित, स्वभावस्थिति वाले, चिदाकाश में वर्तमान लोगों को आभास नहीं करते । उससे परे को प्राप्ति में स्थित मध्यम बोध जानना चाहिये । (चिदाकाश) के प्रान्त में स्थिति के द्वारा विज्ञेय को यहाँ बोधान कहा जाता है । शक्तिज्ञान को परमानन्द रूप जानना चाहिये । उसे नित्योदित निस्तरङ्ग सुख बृहत्सुख चिद्बोध कहा जाता है ॥ १४ ॥ इस प्रकार छहों अध्वाओं में संविद् की एकात्मता का परिशीलन करने वाले योगी को भैरवीभाव प्राप्त हो जाता है—यह कहते हैं संविद् के साथ एकात्मता के द्वारा जिसका भूतभाव पुरा आदि समाप्त श्रीतन्त्रालोकः न केवलमेतदवोक्तं यावदन्यत्रापि,—इत्याह श्रीदेव्यायामले चोक्तं षट्त्रिंशत्तत्त्वसुन्दरम् ॥ १६ ॥ अध्वानं षड्विधं ध्यायन्सद्यः शिवमयो भवेत् । ‘ध्यायन्’ इति स्वसंविदभेदेन परामशन्नित्यर्थः । यदुक्तं तत्र ‘अध्वानं निखिलं देवि तत्त्वषट्त्रिंशदुज्ज्वलम् । चिन्तयन् सद्य आप्नोति पदं शाश्वतमुत्तमम् ।।’ इति ॥ १६ ॥ नन् यदि नाम बोधात्मैव षड्विधोऽपि अयमध्वा, तद्वोधस्य देशाद्य नवच्छिन्नत्वात् कथमस्यो/दिव्यवस्था स्यात् ?–इत्याशङ्कयाह यद्यप्यमुष्य नाथस्य संवित्त्यनतिरेकिणः ॥ १७ ॥ पूर्णस्यो दिमध्यान्तव्यवस्था नास्ति वास्तवी । तथापि प्रतिपत्तॄणां प्रतिपादयितुस्तथा ॥ १८ ॥ स्वस्वरूपानुसारेण मध्यादित्वादिकल्पनाः । प्रतिपत्रादयो हि संकुचितरूपत्वात् गृहीतदेहाद्यभिमाना:- इति तदनुसारेणो कर दिया गया है, अनवच्छिन्न संवित् वाला (वह) भैरव परमेश्वर हो जाता है ॥ -१५-१६- ॥ यह केवल यहीं नहीं कहा गया किन्तु अन्यत्र भी-यह कहते हैं श्रीदेवीयामल में कहा गया है कि ३६ तत्त्वों से सुन्दर छ प्रकार के अध्वा का ध्यान करने वाला (योगी) उसी दिन (= तत्काल) शिवमय हो जाता है ।। -१६-१७- ।। ध्यान करता हुआ = अपने को संविद् से अभिन्न रूप में परामर्श करता हुआ। जैसा कि वहाँ कहा गया है ___“हे देवि । छत्तीस तत्त्वों से उज्ज्वल (= प्रकाशमान) उस समस्त अध्वा का चिन्तन करता हुआ योगी तत्काल शाश्वत उत्तम पद को प्राप्त करता है” || १६ ॥ प्रश्न- यदि यह छ प्रकार का भी अध्वा बोधस्वरूप ही है तो बोध के देश आदि (= काल) से अनवच्छिन्न होने के कारण इसकी ऊर्ध्व आदि व्यवस्था कैसे होती है ?-यह शङ्का कर कहते हैं यद्यपि संविद् से अभिन्न, पूर्ण इस परमेश्वर की ऊर्ध्व से लेकर मध्य तक की व्यवस्था वास्तविक नहीं है तो भी ज्ञाता और प्रतिपादक के अपने-अपने रूप के अनुसार मध्य आदि की कल्पना होती ही है ।। -१७-१९- ।। ज्ञाता आदि संकुचितरूप होने के कारण देह आदि के अभिमानी होते हैं अष्टममाह्निकम् भंदिव्यवस्थां कल्पयेयुः, न तु वस्तुत: सा संभवेत्। अत एवोर्ध्वमप्यन्यापेक्षयाधः स्यात् । तस्मात् प्रतिपत्राद्यपेक्षयैवेयं व्यवस्था– यत् पृथिवीतत्त्वं सर्वतत्त्वान्तर्वर्ति तत्त्वान्तराणि च तद्बहिरिति ॥ १८ ॥ तदाह ततः प्रमातृसङ्कल्पनियमात् पार्थिवं विदुः ॥ १९ ॥ तत्त्वं सर्वान्तरालस्थं यत्सर्वावरणैर्वृतम् । पृथिवीतत्त्वमेव च स्थौल्यस्य परा कोटिः, इति तदुपक्रमं सुखेनावबोधात् तत्रैव प्रथमं भुवनस्थितिरुच्यते,—इत्याह तदत्र पार्थिवे तत्त्वे कथ्यते भुवनस्थितिः ॥ २० ॥ तामेवाह नेता कटाहरुद्राणामनन्त: कामसेविनाम् । पोतारूढो जलस्यान्तर्मद्यपानविघूर्णितः ॥ २१ ॥ स देवं भैरवं ध्यायन् नागैश्च परिवारितः ॥ जलस्यान्तरित्यर्थात् तदुपरि संस्थितः । यदुक्तम् इसलिए उसके अनुसार ऊर्ध्व आदि की व्यवस्था की कल्पना करते हैं किन्तु वह वस्तुतः सम्भव नहीं है । इसलिए ऊर्ध्व भी दूसरे की अपेक्षा अध: हो जाता है । इसलिए ज्ञाता आदि की अपेक्षा से ही यह व्यवस्था होती है कि पृथ्वी तत्त्व सब तत्त्वों के अन्दर रहने वाला है और दूसरे तत्त्व उसके बाहर हैं ॥ १८ ॥ वही कहते हैं इसलिए प्रमाता के सङ्कल्प के नियम से पार्थिव तत्त्व को सभी के अन्तराल में स्थित माना गया है जो कि सब आवरणों से आच्छादित है । -१९-२०- ।। पृथिवी तत्त्व ही स्थूलता की अन्तिम सीमा है इसलिए उसका उपक्रम आसानी से जाना जा सकता है (फलत:) पहले उसी में भुवनों की स्थिति कही जा रही है-यह कहते हैं तो इस पार्थिव तत्त्व में भुवनों की स्थिति कही जा रही है ।। -२० ।। उसी को कहते हैं कामसेवी कटाहरुद्रों के नेता अनन्त भगवान् जल के भीतर नाव पर आरुढ, मद्यपान से मत्त (नाविक के समान संसार का सञ्चालन करते) हैं। वे नागों से घिरे हुये भैरव देव (= परमेश्वर) का ध्यान करते रहते हैं ।। २१-२२- ।। श्रीतन्त्रालोकः ‘संस्थितः सोऽम्भसां मूर्ध्नि शक्तयाधारस्तु हूहुकः।’ इति । अत एव चास्य अप्तत्त्वसंनिकर्षेण कटाहस्याधो बहिर्देशेऽवस्थानं न त्वन्तः,-इति सिद्धम् । यदुक्तं श्रीनन्दिशाखायाम् ‘कोटियोजनतः स्थौल्यं ब्रह्माण्डस्य कटाहके। तथैवोज़ स्थितं ज्ञेयमन्तरं कथ्यते प्रिये ॥ अष्टानवतिकोटीभिब्रह्माण्ड समुदाहृतम ।’ इत्युपक्रम्य ‘कटाहाध: स्थितं देवि ह्हुकं भुवनेश्वरम् । शक्तयाधारं तु जानीयादनन्तं वरवर्णिनि ।।’ इति । श्रीत्रिशिरोभैरवेऽपि ‘ब्रह्माण्डबाह्यतोऽनन्तो विश्वाधारस्तु कथ्यते ।’ इति । अन्तरवस्थाने चास्य ‘दशकोटिमितं तत्तु पोतैः सर्वत्र तत्समम् । ऊर्ध्वं तस्य सुरेशानि कोटिमात्रं तमः परम् ।।’ इत्याधुक्तं भुवनादिमानं वक्ष्यमाणब्रह्माण्डान्तर्वर्तिभुवनमानसंख्यातोऽतिरिच्येत, जल के भीतर अर्थात् उसके ऊपर, स्थित है । जैसा कि कहा गया है “शक्ति के आधारभूत हुहूक जल के ऊपर स्थित है ।” इसीलिए जलतत्त्व के सन्निकर्ष के कारण कटाह के नीचे बाहर इनकी स्थिति है न कि भीतर—यह सिद्ध हो गया । जैसा कि नन्दिशिखा में कहा गया है “हे प्रिये ! ब्रह्माण्ड कटाह में स्थूलता का विस्तार एक करोड़ योजन है । उसी प्रकार इसे ऊपर भी स्थित समझना चाहिये अब अन्तर कहा जा रहा है । ब्रह्माण्ड ९८ करोड़ योजन विस्तार वाला हैं ।” इस प्रकार प्रारम्भ कर “हे देवि ! ब्रह्माण्ड कटाह के नीचे हक (नामक) भुवनेश्वर स्थित हैं । हे वरवर्णिनी ! उन्हें शक्ति का आधार अनन्तनाथ समझना चाहिए ।” त्रिशिरोभैरव में भी “ब्रह्माण्ड के बाहर अनन्त भगवान् हैं जो विश्वाधार कहे जाते हैं ।’’ भीतर स्थित होने पर इनकी “वह दश करोड़ (संख्या) वाले पोतों से सर्वत्र युक्त है । हे सुरेशानि ! उसके ऊपर एक करोड़ (योजन) अन्धकार है ।” अष्टममाह्निकम्
  • इति तत्संख्याया आसमञ्जस्यं स्यात् । ननु यद्येवं तदनन्तस्य ‘ब्रह्माण्डमण्डपस्यान्तर्भुवनानि विशोधयेत् । आदावनन्तभुवनं कौष्माण्डं हाटकेश्वरम् ।। अनन्तभुवनस्यानु कालाग्निभुवनं महत् । शार्वं ब्राह्मं वैष्णवं च रौद्रं भुवनमुत्तमम् ।। ब्रह्माण्डोदरमध्ये तु अष्टावेते प्रकीर्तिताः ।’ इत्यादीनामन्त:स्थितिविधायकानां वाक्यानां कोऽर्थः स्यात् । किञ्च ‘ब्रह्मणोऽण्डस्य शकलं कोटिमात्रं प्रमाणत: । तदूर्ध्वं कालरुद्रस्तुदशेशानसमन्वितः ।। कोटिमात्रं पुरं तस्य तज्ज्वाला दशकोटयः । अनन्तोऽध: पद्म ऊचे अन्ये तु क्रमशः स्थिताः ।।’ इति । तथा ‘अध: कालान्तगो रुद्रो दशेशस्थानमध्यगः । पद्मश्चोर्ध्वमधोऽनन्तस्तथान्ये क्रमवर्तिनः ।।’ इत्याद्युक्त्या कालाग्निभुवनान्तरेव अस्य भुवनं न तु पृथक्-इति वक्ष्य माणाया भुवनसंख्याया अपि न किंचिदासमञ्जस्यम् । इह च अनन्तस्य इत्यादि के द्वारा उक्त भुवन आदि का परिमाण, वक्ष्यमाण ब्रह्माण्ड के भीतर वर्तमान भुवनमान की संख्या से भिन्न हो जाएगा इस कारण उसकी संख्या का आसमञ्जस्य (= असमीचीनता) हो जाएगा । प्रश्न- यदि ऐसा है तो “ब्रह्माण्डमण्डप के भीतर (वर्तमान) भुवनों का शोधन करना चाहिए । पहले अनन्तभुवन पुन: कौष्माण्ड, हाटकेश्वर, अनन्तभुवन के बाद महान् कालाग्नि (फिर) शार्व, ब्रह्म, वैष्णव और भुवनों में उत्तम रौद्र, ब्रह्माण्डोदर के बीच ये आठ (भुवन) कहे गए हैं ।” इत्यादि अनन्त की अन्त:स्थिति के विधायक वाक्यों का क्या मतलब होगा? और “ब्रह्माण्ड के टुकड़े एक करोड़ परिमाण वाला है । उसके ऊपर काल रुद्र दश ईशानों से युक्त है । उसका पुर एक करोड संख्या वाला है । उसकी ज्वालायें दश करोड़ योजन तक फैली हैं । नीचे अनन्त ऊपर पद्म उसके ऊपर क्रमश: अन्य पद्म स्थित हैं ।’’ तथा-“नीचे कालान्तरुद्र, मध्य में दश ईशान, पद्म ऊपर और उसके नीचे अनन्त इसी प्रकार क्रमश: रहने वाले दूसरे भी हैं ।” इत्यादि उक्ति के द्वारा कालाग्नि भुवन के भीतर ही इस (अनन्त) का भुवन है ALLAHARIHANTERACTERI श्रीतन्त्रालोकः श्रीसिद्धातन्त्रोक्तं भुवनमानं न ग्राह्यमेव, ‘क्रियादिभेदभेदेन तन्त्रभेदो यतः स्मृतः । तस्माद्यत्र यदेवोक्तं तत्कार्यं नान्यतन्त्रतः ॥ इत्याधुक्तया तत्प्रक्रियाया भिन्नत्वात् । तथा च इह नरकाणां द्वात्रिंशत्कोटयो मानं तत्रैकविंशतिः । यदुक्तम् ‘तस्योर्ध्वं नरका घोरा एकविंशतिकोटयः ।’ इति । इहापि ‘अण्डस्यान्तरनन्त:… ….. ।’ (८।३९३) इति, ‘अष्टावन्त: साकं शर्वेण…………….. ।’ (८।३९७) इति च वक्ष्यमाणं व्याहन्येत-इति किमत्र प्रतिपत्तव्यम्? इदमत्र प्रतिपत्तव्यं यदनन्तस्य बहिरवस्थानमिति । तथाहि-श्रीतन्त्रराजभट्टारके ‘ब्रह्माण्डमण्डपान्तर. इत्यादिकमनन्तस्य नान्त:स्थितेर्विधायकम्, किन्त्वेवं शुद्धिक्रमस्य तदवस्थिते: पूर्वमुक्तत्वात्, एतावन्मात्रस्यैवात्र विवक्षितत्वात् । यदुक्तं तत्र न कि उससे पृथक् । इसलिए वक्ष्यमाण भुवनसंख्या का भी कोई अनौचित्य नहीं है। यहाँ सिद्धा (= मालिनीविजय) तन्त्र में कहा गया भूवनमान नहीं लेना चाहिए क्योंकि-चूंकि क्रिया आदि की भिन्नता के भेद से तन्त्रभेद माना गया है इस कारण जहाँ जो कहा गया (वहाँ) उसी को करना चाहिए न कि दूसरे तन्त्र के अनुसार ।” इत्यादि उक्ति के कारण उसकी प्रक्रिया भिन्न है । उसी प्रकार यहाँ नरकों की संख्या ३२ करोड़ है वहाँ २१ करोड़ । जैसा कि कहा गया है “उसके ऊपर २१ करोड़ घोर नरक हैं ।” यहाँ भी “अण्ड के भीतर अनन्त……… ।” (तं० आ० ८।३९३) “सर्व के साथ भीतर आठ……… ।’ (तं०आ० ८।३९७) यह आगे कहा जाने वाला कथन खण्डित हो जाएगा । प्रश्न है तो यहाँ क्या मानना चाहिए ? उत्तर देते हैं-यहाँ यह मानना चाहिए कि अनन्त की स्थिति बाहर है । तन्त्रराजभट्टारक में ब्रह्माण्डमण्डप के भीतर… ।’ इत्यादि (वर्णन) अनन्त की अन्त:स्थिति का विधायक नहीं है किन्तु इस प्रकार होने वाले शुद्धि के क्रम का (विधायक है) क्योंकि उसकी स्थिति पहले कही गई अष्टममाह्निकम् ‘अतो’ भुवनदीक्षान्या शृणु पार्वति तत्त्वतः । आदिष्टके पुरा प्रोक्तमेतन्निखिलतो मया ।। तथापि तव वक्ष्यामि संक्षेपादिह भामिनि । इत्युपक्रम्य ‘तेषां विभागमधुना शृणु वीरेन्द्रवन्दिते ।’ इति । तत्र च अस्यादिषट्के बहिरेवावस्थानं विहितम् । यदुक्तम् ‘यत्तद्भूम्यण्डकं भाति पीतमम्बुजजन्मनः । तस्याधोभागगा भान्ति पूर्वदृष्टान्तकारकाः ।। शेषाहिफणमाणिक्यविश्वकर्मप्रसादतः ।’ इत्युपक्रम्य ‘अनन्तशक्तिचन्द्रांशुपीयूषोर्मिभिरुल्वणैः । आलिङ्गितमतश्चोच्चैरप्तत्वाध: पथोच्छलत् ।। भुवनं तस्य वीरस्य भात्यनन्तस्य स्वश्रिया । अनन्तवनितावक्त्रपद्मषण्डसरः सदा ।।’ इति विशेष्य ‘ततो हूहुकरुद्रस्य चूडामणिनभ (विव) स्वतः । है है है— इतना ही यहाँ विवक्षित है । जैसा कि वहाँ कहा गया है “हे पार्वति ! अब दूसरी भुवनदीक्षा को ठीक से सुनो । मैने प्रथम छ (आह्निकों) में इसे पूरी तरह कह दिया है तो भी हे भामिनि । संक्षेप में तुम्हें बता रहा हूँ।” ऐसा प्रारम्भ कर “हे वीरेन्द्रवन्दिते ! अब उनका विभाग सुनो ।” वहाँ प्रथम छ (आह्निकों) में इसकी स्थिति बाहर ही कही गई है। जैसा कि कहा गया है ___ “जो वह ब्रह्मा का भूमिअण्डवाला पोत आभासित होता है उसके नीचे वर्तमान पूर्वदृष्टान्तकारक शेषनाग के फण पर माणिक्य के समान शोभायमान भुवन जो कि विश्वकर्मा के प्रसाद से निर्मित हैं, भासित होते हैं । ऐसा प्रारम्भ कर “तीव्र, अनन्तशक्ति वाले चन्द्रमा की किरणरूपी अमृत की लहरों से आलिङ्गित, इसलिए जलतत्त्व के नीचे उच्चमार्ग से उछलता हुआ, उस अनन्त वीर का भुवन है जो कि अनन्तवनिताओं के मुखकमल के षण्डों (= समूहों, से पूर्ण) तालाब रूप है, सदा शोभायमान रहता है ।” इस प्रकार वैशिष्ट्य बतला कर श्रीतन्त्रालोकः त्विषा प्रध्वस्ततिमिरं पुरं वीरगणाकुलम् ॥’ इत्यादिना हूहुकरुद्राणां भुवनानि, ‘भैरवीयमहारज्जुप्रबद्धानि महेश्वरि । एतान्यप्सु पुराण्यत्र निभृतानि शिवात्मना ।। लक्षोच्छ्रितानि सर्वाणि सलिलावर्तगानि च ।’ इत्यादिना च तेषां देशं मानं चाभिधाय ‘समन्ताद् ब्रह्मणोऽण्डं तु शतकोटिप्रविस्तरम्। कटाहं च स्मृतं कोटि: शतरुद्रैः समन्वितम् ।।’ इति । यत्पुनः …………………..अन्तर्भुवनानि विशोधयेत् ।’ इत्याद्युक्तं तन्मल्लग्रामवद्रूम्ना व्याख्येयम्, अन्यथा हि पूर्वापरव्याघात: स्यात् । एवमत्र अनन्तपूर्वक शतरुद्रपर्यन्तं भुवनानां शुद्धौ यौगपद्येन तदसंपत्तेः क्रममात्रमेवाभिधित्सितं न त्वन्तर्बहीरूपत्वमपि, तथात्वे तच्छुद्धावविशेषात् । एवं ‘एतेषां तु अधस्ताद्वै कालाग्निभुवनं ततः । हूहुकाश्च तथा देवि ब्रह्माण्डोदरवर्तिनः ।।’ “इसके बाद हुहूकरुद्र के चूड़ामणिरूपी सूर्य की कान्ति से ध्वस्त अन्धकारवाला, वीरगणों से व्याप्त (हुहूक रुद्रों का) पुर है ।” इत्यादि के द्वारा हुहूकरुद्रों के भुवनों की और “हे महेश्वरि ! भैरवीय महा रज्जु से बँधे हुये ये पुर जो कि लाखों की संख्या में ऊँचे तथा पानी की भँवर में जाने वाले थे । शिव के द्वारा जल मे विलीन कर दिये गए ।” इत्यादि के द्वारा उनके देश और परिमाण को बतलाकर “ब्रह्माण्ड के चारो ओर सौ करोड़ (योजन) विस्तीर्ण एवं करोड़ों शतरुद्रों से समन्वित एक कटाह माना गया है ।’’ और जो “……………अन्तर्भुवनों का शोधन करना चाहिए ।” इत्यादि कहा गया उसकी मल्लग्राम के समान अधिकता से व्याख्या करनी चाहिए । नहीं तो पूर्वापर में विरोध हो जाएगा । इस प्रकार अनन्त से लेकर शतरुद्र पर्यन्त भवनों की शुद्धि होने पर एक साथ उनकी प्राप्ति न होने से केवल क्रम को ही दिखलाना इष्ट था न कि अन्तः और बाह्यरूपता को भी । क्योंकि वैसा होने पर उनकी शुद्धि में कोई वैशिष्ट्य नहीं होता । “हे देवि ! इनके नीचे कालाग्नि भुवन है उसके नीचे ब्रह्माण्ड के उदर मेंअष्टममाह्निकम् इत्यादावपि व्याख्येयम् । एतच्चोत्तानतयैव गृहीत्वा संग्रहकारा: प्रवृत्ता:-इति तत्र तत्र तथाभ्यधः, येनास्य अन्तरवस्थाने भ्रान्तिबीजत्वं प्ररूढम् । तथा च सोमशंभुः - ‘अथ हूहुककालाग्निरुद्रौ हाटक एव च । कूष्माण्डश्चाथ शर्वश्च ब्रह्मा विष्णुश्च सप्तमः ।। रुद्रश्चाष्टाविमे रुद्राः कटाहस्यान्तरे स्थिताः ।’ इति । गुरुभिरेतन्नाना विकल्पितम्,-इति तन्मतप्रदर्शनाशयेन ‘अण्डस्यान्तरनन्त.. ……. | (८/३९३) इति, अष्टावन्त: साकं शर्वेण.. ……… । (८।३९७) इति च पुरस्तादिह वक्ष्यति,-इति न पूर्वापरव्याहतत्वम् । यद्वक्ष्यति अथ सकलभुवनमानं यत्पूर्वं निगदितं निजैर्गुरुभिः । तद्वक्ष्यते समासाद् बुद्धौ येनाशु संक्रामेत् ।।’ (८।३९२) इति । यत्तु कालाग्निभुवनान्तरेवास्य भुवनं न पृथक्,-इत्युक्तं तदयुक्तम्; अयं हि हूहुकरुद्राधिपतेर्बहिरवस्थितात् पृथक्शोध्यादनन्तात् कालाग्नेर्भुवनान्तर्वर्ती रहने वाले हुहूक (रहते हैं) ।” इत्यादि में भी इसी प्रकार व्याख्या करनी चाहिए । इसे उत्तानरूप (= यथोक्त रूप) में लेकर ही संग्रहकार प्रवृत्त हये इसलिए स्थान-स्थान पर (उन्होंने) वैसा कहा है जिससे इसकी अन्त:स्थिति के विषय में भ्रान्ति का बीज उत्पन्न हुआ । सोमशम्भु कहते हैं “हुहूक, कालाग्निरुद्र, हाटक, कूष्माण्ड, शर्व, ब्रह्मा विष्णु (जो कि) सातवें है और रुद्र आठवें, ये रुद्रगण कटाह के भीतर स्थित हैं ।” गुरुओं ने इसकी अनेक प्रकार से व्याख्या की है । इस प्रकार उनके मत को बतलाने के उद्देश्य से “अण्ड के भीतर अनन्त… ।’’ (तं० आ० ८।३९३) और “शर्व के साथ आठ भीतर… ।’ (तं० आ० ८।३९७) यह आगे चलकर कहेंगे । इस प्रकार पूर्वापर विरोध नहीं है जैसा कि कहेंगे “अब समस्त भुवनों का परिमाण, जो कि अपने गुरुओं के द्वारा कहा गया है, संक्षेप में कहा जाएगा जिससे शीघ्र बुद्धि में संक्रान्त हो जाए ।” (तं० आ० ८।३९२) जो कि ‘कालाग्नि भुवन के भीतर ही इसका (= अनन्त का) भुवन है न कि २त.तृ. १८ श्रीतन्त्रालोकः RINA A MANZANER M RAHEL STAR तत्परिवारभूतोऽन्यः । एतस्यैव हि तत्त्वे पृथक्शोध्यत्वमनभिधानीयम्, कालाग्नि रुद्रशुद्ध्यैव तच्छुद्धेः; अन्यथा पद्मादीनामपि तदापतेत्-इति अन्तरनेके रुद्रा: शोधनीयाः स्यु:-इति वृत्तावष्टोत्तरादपि शतादधिकानि प्रसज्येरन् । एवमन्यैश्च यदस्य बहिर्देशावस्थानेऽपि अधःस्थशतरुद्रदशकान्यतरत्वमुक्तं तदप्ययुक्तम्; एवं हि अस्य तन्मध्यपाठेनैव गतार्थत्वादितरमेव पृथगभिधानं स्यात् । यच्च श्रीसिद्धा तन्त्रोक्तं भुवनमानमिह न ग्राह्यम्-इत्युक्तं तदप्ययुक्तम्; यतो यदि नाम नरकादि वदनन्तभुवनस्येह मानं किंचिदुच्येत तत्प्रक्रियाभेदादन्यतन्त्रोक्तमग्राह्यमेव-इति स्यात् । भुवनस्य मानमवश्यभावि, तच्चेह नोक्तम्-इति तदाकाङ्क्षायामेव अवश्यमेवान्यतः कुतश्चिदपेक्षणीयम्-इति को नाम श्रीसिद्धातन्त्र प्रद्वेषः । यद्वा श्रीतन्त्रराजभट्टारकेऽपि अस्य लक्षोच्छ्रितत्वमुक्तम्, इति तदपेक्ष्यताम्, को नाम नो निर्बन्धः; यावता हि अस्माकमन्तर्भुवनमानसंख्याया आसमञ्जस्यमभिधानीयं तच्च उभयथापि सिद्धयेत्-इत्यलं बहुना । ‘कटाहरुद्राणाम्’ इति कटाहाधो वर्तिनां हूहकरुद्राणाम्: अतश्च तच्छुद्ध्यैव एतच्छुद्धिर्भवेदिति भावः । यदुक्तम् पृथक्-ऐसा कहा गया वह (कथन) असमीचीन है । यह उसका परिवारभूत दूसरा (भुवन) है जो कि हहक रुद्राधिपति के बाहर वर्तमान, अलग से शोधनीय, अनन्त कालाग्निभूवन के भीतर रहने वाला है । यदि यह इसी का तत्त्व होगा तो (उसका) अलग से शोध्य होना नहीं कहना चाहिए क्योंकि कालाग्निरुद्र की शुद्धि से ही उसके शुद्धि हो जाएगी । अन्यथा पद्म आदि के विषय में भी वही बात (= शुद्धि की बात) आ पड़ेगी । इस प्रकार अनेक रुद्र शोधनीय हो जाएंगे ऐसा होने पर १०८ से अधिक (पद्म) हो जाएंगे । इसी प्रकार अन्यलोगों के द्वारा जो इसे बाहाप्रदेश में स्थित होने पर भी अधःस्थ दश शतरुद्रों से भिन्न कहा गया, वह भी अयुक्त है। क्योंकि ऐसा होने पर इसका उनके बीच में पाठ करने से ही गतार्थ होने के कारण पृथक् कथन अतिरिक्त हो जायगा । और जो कि सिद्धातन्त्र में कथित भुवनमान का यहाँ ग्रहण नहीं होना चाहिए-ऐसा कहा गया, वह भी अयुक्त है । क्योंकि यदि नरक आदि के समान यहाँ अनन्तभुवन का कुछ परिमाण कहा जाए तो वह अन्य तन्त्र में कथित (मान) प्रक्रियाभेद के कारण अग्राह्य ही है- ऐसा होने लगेगा । भुवन का परिमाण अवश्य होता है और इसे यहाँ नहीं कहा गया इसलिए उस (= परिमाण) की आकांक्षा होने पर (इसे) अवश्य कहीं दूसरी जगह से लाना पड़ेगा (तो इसे सिद्धातन्त्र से ही ले लीजिये)—इस प्रकार सिद्धातन्त्र के विषय में (आपको) क्यों द्वेष है । अथवा तन्त्रराजभट्टारक में भी इसको लक्षोच्छ्रित (= एक लाख योजन ऊँचा अथवा एक लाख संख्या वाला ऊँचा) कहा गया है तो उसको मान लीजिये हमें क्या आपत्ति होगी? क्योंकि हमें तो आभ्यन्तरीण भुवनों के परिमाण की संख्या की सङ्गति बैठानी है और वह दोनों प्रकार से सिद्ध हो रही है—इतना (कथन) पर्याप्त है । कटाहरुद्रों का = कटाह के नीचे वर्तमान हुहूकरुद्रों का । इसलिए उसकी शुद्धि से ही इसकी शुद्धि हो जाती है-यह तात्पर्य है, जैसा कि कहा गया अष्टममाह्निकम् ‘तेन शुद्धेन शुद्धानि त्वण्डान्यत्रोहकैः सह ।’ (स्व० १०६) इति । एवमुत्तरत्रापि तत्तद्भुवनेश्वरद्वारेणैव तत्तद्भुवनशुद्धिरिति मन्तव्यम् । यदुक्तम् ‘न तत्र दुःखितः कश्चिन्मुक्त्वा दु:खमनङ्गजम् । रमन्ते तत्र वै वीरा नारीभिः सह लीलया ॥ (स्व० १०१८) इति । पोतारूढ इति, यदुक्तम् ‘अनन्तः संस्थितोऽधस्तात्पोतारूढो जलान्तरे ।’ इति । मद्यपानविघूर्णित इति, यदुक्तम् ‘महापानरतः श्रीमान्महामत्तः सदाम्भसि ।’ इति । भैरवं ध्यायन्नित्यनेन अस्य तदेकप्रवणतया ‘भुवनेश त्वया नास्य साधकस्य शिवाज्ञया । प्रतिबन्धः प्रकर्तव्यो यातुः पदमनामयम् ।।’ (मा०वि० ९।६४) इत्यादि तदाज्ञानुविधायित्वमस्ति, - इति प्रथमत एव सर्वाक्षेपेण प्रकाशितम् । नागैरिति, यदुक्तम् “उसके शुद्ध होने से यहाँ ऊहकों (= विश्व का परिसीमन करने वालों) के साथ अण्ड भी शुद्ध हो जाते हैं ।’’ (स्व० त० १०१६) इसी प्रकार आगे भी भिन्न-भिन्न भुवनेश्वरों के द्वारा ही भिन्न-भिन्न भुवनों की शुद्धि होती है-ऐसा समझना चाहिए । जैसा कि कहा गया है ___“काम से उत्पन्न दुःख को छोड़कर वहाँ और कोई (किसी) दुःखवाला नहीं है। और वीरसाधक नारियों के साथ उसी (दुःख) में आनन्द का अनुभव करते हैं।” (स्व० तं० १०६८) पोतारूढ जैसा कि कहा गया “अनन्तनाथ नीचे जल के भीतर पोत पर आरूढ़ होकर विराजमान हैं।” मद्यपान के कारण घूर्णन वाले—जैसा कि कहा गया “सदा जल में वर्तमान महापान में लगे हुये श्रीमान् महामत्त…।” भैरव का ध्यान करते हुए-उस (कथन) से उनकी भैरव के प्रति एकनिष्ठता के कारण “हे भवनेश ! शिव की आज्ञा से अनामय पद को जाने वाले इस साधक का प्रतिबन्ध तुम्हें नहीं करना चाहिए ॥” (मा०वि० ९।६४) श्रीतन्त्रालोकः ‘पद्मश्चैव महापद्मः शङ्खपालोऽथ वज्रिणः । काकोंटश्च निषादश्च कम्बलाश्वतरावुभौ ।। एभिश्चैव महानागैः समन्तात्परिवारितः।’ इति । एवं च स्वयमपि नागरूपत्वमेव, इति सिद्धम् । RAHARASHRARUNHANNEKHABHIRAMBREARRIPAHRARIHARAN यदुक्तम् ‘ऊर्ध्वबार्महाकायो नागरूपी महाबलः । फणानां तु सहस्रेण घारयित्वा जगत्स्थितः ॥’ इति । अत एव श्रीतन्त्रराजभट्टारके शेषाहित्वेनायमुक्तः ॥ २१ ॥ इदानीं ब्रह्माण्डस्यान्तर्भुवनानि वक्तुमुपक्रमते कालाग्नेर्भुवनं चोर्ध्व कोटियोजनमुच्छ्रितम् ॥ २२ ॥ लोकानां भस्मसाद्भावभयान्नोर्ध्वं स वीक्षते । ऊर्ध्वं इत्यर्थात् कटाहस्य, स च कोटियोजनानां घन: । यद्वक्ष्यति ‘अधश्चोर्ध्व कटाहोऽण्डे स घन: कोटियोजनः ।’ (स्व० १०।१६२) इति । इत्यादि उन (= भैरव) की आज्ञा के पालन का नियम संकेतित होता है । इसे पहले ही सब के आक्षेप के द्वारा प्रकाशित कर दिया गया है । नागों के द्वारा -जैसा कि कहा गया है “पद्म, महापद्म, शङ्खपाल, वज्री, कर्कोटक, निषाद, कम्बल, अश्वतर दोनों इन महानागों के द्वारा चारों तरफ से घिरे हुये ।” इस प्रकार (नागों से घिरे हुए वे) स्वयं नागरूप हैं—यह सिद्ध हो जाता है जैसा कि कहा गया है “ऊर्ध्वबाह, महाकाय, नागरूपी महाबलशाली (अनन्तनाथ) हजारों फणों से संसार को धारण कर स्थित हैं।” इसीलिए तन्त्रराजभट्टारक में शेषनाग के नाम से ये कहे गए हैं ॥ २१ ॥ अब ब्रह्माण्ड के भीतर भुवनों का कथन प्रारम्भ करते हैं (ब्रह्माण्डकटाह के) ऊपर एक करोड़ योजन ऊँचे कालाग्निभुवन को, लोकों के भस्म होने के डर से, ऊपर की ओर वे (अनन्तनाथ) नहीं देखते ॥ -२२-२३- ॥ ऊपर में अर्थात् कटाह के और वह (कटाह) एक करोड़ योजन घन (= विस्तार वाला) है । जैसा कि कहेंगे अष्टममाह्निकम् नोज़ स वीक्षते इति, यदुक्तम् नोर्ध्वं निरीक्षते देवो मेदं भूद्भस्मसाज्जगत् । इति । अत एवास्योर्ध्ववक्त्रमनुन्मीलितम्-इति चतुर्वक्त्रत्वमेव सर्वत्रोक्तम् । यदुक्तम् ‘त्रिनेत्र: स चतुर्वक्त्रो वह्निज्वालावलीधरः ।’ इति ॥ २२ ॥ ननु ‘यो हि यस्माद् गुणोत्कृष्टः स तस्मादूर्ध्वमिष्यते ।’ (मा०वि० २।६०) इत्याद्युक्त्या नरकोर्ध्वमस्यावस्थानं युक्तम्, तत् कथं तदध उक्तम्? - इत्याशङ्कयाह स च व्याप्तापि विश्वस्य यस्मात्प्लुष्यन्निमां भुवम् ॥ २३ ॥ नरकेभ्यः पुरा व्यक्तस्तेनासौ तदधो मतः । उक्तं च प्राक ‘निरयेभ्यः परा कालवह्वयक्तिर्यतस्ततः । “(इस) अण्ड में नीचे और ऊपर कटाह है । वह एक करोड़ योजन घना है।’’ (स्वतं० १०।१६२) वे ऊपर की ओर नहीं देखते । जैसा कि कहा गया है “यह जगत् भस्म न हो जाए इसलिए वे देव ऊपर नहीं देखते ।” इसीलिए इनका ऊर्ध्ववक्त्र (= पञ्चम वक्त्र) बन्द रहता है इसीलिए सर्वत्र इनको चारमुख वाला कहा गया है । जैसा कि कहा गया है “वे तीननेत्र वाले, चतुर्मुख और अग्नि की ज्वालावली को धारण करने वाले हैं” || २२ ॥ प्रश्न- “जो जिसकी अपेक्षा गुणों में उत्कृष्ट होता है वह उससे ऊपर माना जाता है ।” इत्यादि उक्ति के द्वारा नरक के ऊपर इसकी स्थिति ठीक है तो उसके नीचे कैसे कही गई ?-यह शङ्का कर कहते हैं ____ वह विश्वव्यापी होते हुए भी चूँकि इस धरती का दहन करता हुआ नरकों की अपेक्षा पहले व्यक्त हुआ, इस कारण यह उसके नीचे माना गया है ।। -२३-२४- ।। पहले भी कहा गया है श्रीतन्त्रालोकः …….. || विभुरप्येष तदधः………….. (तं आ. ६।१४२) इति ।। २३ ॥ दश कोट्यो विभोर्चाला तदर्धं शून्यमूर्ध्वतः॥ २४ ॥ तदूधै नरकाधीशाः क्रमाद् दुःखैकवेदनाः। अधो मध्ये तदूचे च स्थिता भेदान्तरैर्वृताः ॥ २५ ॥ अवीचिकुम्भीपाकाख्यरौरवास्तेष्वनुक्रमात् । एकादशैकादश च दशेत्यन्तः शराग्नि तत् ॥ २६ ॥ प्रत्येकमेषामेकोना कोटिरुच्छ्रितिरन्तरम् । लक्षमत्र खवेदास्यसंख्यानामन्तरा स्थितिः ॥ २७ ॥ कूष्माण्ड ऊर्वे लक्षोनकोटिस्थानस्तदीशिता । ‘तदर्ध’ पञ्च कोटयः । ‘शून्यम्’ धूमोष्मादिभयाज्जनरहितम् । यदुक्तम् ‘अस्योपरिष्टाद्देवेशि पञ्च कोट्यो वरानने । न कश्चिन्निवसत्यत्र धूमोष्मपरितापितः ॥’ (स्व० १०।३०) इति । तदूर्वे’ शून्योपरि । अनुक्रमादिति संहारात्मनः, तेन रौरवे कम्भीपाके चैकादशान्तर्भवन्ति अवीचौ च दश,—इत्यात्मना सह तन्नरकत्रयं “चूंकि कालाग्नि की अभिव्यक्ति नरक के पहले हुई इसलिए व्यापक होते हुए भी यह उसके नीचे है ॥ २३ ॥ (तं० आ० ६।१४ ____ उस व्यापक (कालाग्नि) की ज्वाला दश करोड़ (योजन के अन्तराल में) है । उसके ऊपर उसका आधा (= पाँच करोड़ योजन) शून्य है । उसके ऊपर नरकों के स्वामी लोग क्रमिक दुःखात्मक वेदना वाले हैं । इस प्रकार शून्य के ऊपर नीचे और मध्य में अवान्तर भेदों के सहित अवीचि कुम्भीपाक और रौरव (नरक) स्थित हैं । उनमें क्रमश: ग्यारह-ग्यारह और दश (नरक) भीतर है । (इस प्रकार कुल संख्या) शर = ५ और अग्नि = ३ अर्थात् ३५ हैं । इनमें से प्रत्येक की ऊँचाई ९९ लाख (योजन) है । इनके बीच में ख = ०, वेद = ४ आस्य = १ अर्थात् १४० लाख (नरकों की) स्थिति है । (उसके) ऊपर कूष्माण्ड ९९ लाख स्थान वाले उसके स्वामी हैं ।। -२४-२८- ।। उसका आधा = पाँच करोड़ । शून्य = धूप और गर्मी आदि के भय के कारण निर्जन, जैसा कि कहा गया है “हे देवेशि ! इसके ऊपर पाँच करोड़ (नरक) हैं । हे वरानने ! धूप और गर्मी से संतप्त इनमें कोई नहीं रहता ।’’ (स्व० १०।३०) उसके ऊपर = शून्य के ऊपर । इसे संहार के क्रम से जानना चाहिये । इस अष्टममाह्निकम् ‘शराग्नि’ पञ्चत्रिंशत्संख्यावच्छिन्नं भवतीत्यर्थः । यदुक्तम् ‘नरकैकादशगतमवीचिं शोधयेत्प्रिये । आत्मना द्वादशं देवि कुम्भीपाकं विशोधयेत् ॥ महारौरवसंज्ञं चाप्येवमेव विशोधयेत् । पञ्चत्रिंशत्प्रवक्ष्यामि समासेन वरानने ॥ अवीचिः कृमिनिचयो नदी वैतरणी तथा । लोहश्च शाल्मलिश्चैवाप्यसिपर्वत एव च । सोच्छ्रवासश्च निरुच्छवास: पूतिमांसः परस्तथा । तप्तत्रपुः क्षारकूपो जतुलेपस्तथैव च ।। अन्तर्भूता अवीचौ तु कुम्भीपाकस्य श्रूयताम् । अस्थिभङ्गः क्रकचच्छेदकूपश्चापि कटङ्कटः ।। वसामिश्रो ह्ययस्तुण्डस्त्रपुलेपश्च कीर्तितः । कुम्भीपाकश्च विज्ञेयस्तीक्ष्णासिश्च तथैव च ।। तप्तलोहश्च । विज्ञेयः क्षुरधारपथस्तथा । अशनिश्च सुतप्तश्च द्वादशैते प्रकीर्तिताः ।। एकादशान्तर्विज्ञेयाः कुम्भीपाकस्य दारुणाः । महारौरवराजे च अत ऊर्ध्वं निबोध मे ॥ कालसूत्रो महापद्मः कुम्भः सञ्जीवनेक्षुकौ । पाशोऽम्बरीशकश्चैव अय:पट्टस्तथैव च ॥ दण्डयन्त्रस्त्वमेध्यश्च घोररूपस्तथापरः । महारौरव नाम एतेषामुपरिष्टाव्यवस्थितः॥’ (स्व० १०८१-९०) इति । प्रकार रौरव और कुम्भीपाक में ग्यारह और अवीचि में दश (नरक) अन्तर्भूत होता है । इस प्रकार उक्त (३२) नरकों के साथ वे तीन नरक मिलकर शराग्नि अर्थात् ३५ संख्या वाले होते हैं । जैसा कि कहा गया है “हे प्रिये ! ग्यारह अवीचि नरकों का शोधन करना चाहिए । स्वयं (कुम्भीपाक) को लेकर बारह कुम्भीपाक और इसी प्रकार (बारह) रौरव की शुद्धि करनी चाहिए । हे वरानने ! ३५ (नरकों) का संक्षेप में वर्णन करूँगा । अवीचि में कृमिनिचय, वैतरणी नदी, लोह वृक्ष, शाल्मली वृक्ष, असिपर्वत, सोच्छ्वास, निरुच्छ्वास, पूतिमांस, तप्तत्रपु, क्षारकूप और जतुलेप हैं । कुम्भीपाक के (नरकों को) सुनो-अस्थिभङ्ग, क्रकचछेद, कूप, कटङ्कट, वसामिश्र, अयस्तुण्ड, त्रपुलेप, तीक्ष्णासि, तप्तलोह, क्षुरधारपथ, अशनि, सुतप्त ये बारह कुम्भीपाक कहे गये हैं। कुम्भीपाक के भीतर ग्यारह दारुण (नरक) कहे गए हैं। इसके बाद अब महारौरवराज में (वर्तमान नरकों को) मुझसे जानो । कालसूत्र, महापद्म, कुम्भ, २४ श्रीतन्त्रालोकः ‘एषाम्’ इति त्रयान्तर्भूतानां द्वात्रिंशतो नरकाणाम् ‘एकोना कोटि:’ इति नवनवतिर्लक्षाणि । ‘अन्तरम्’ इति प्रत्येक शून्यरूपम्, तेन द्वात्रिंशत् कोटयः । तत्र सचत्वारिंशच्छतं प्रधानम्, तत्रापि द्वात्रिंशत्, तत्रापि त्रयमित्युक्तं स्यात् । यदुक्तम् ‘अतः परं वरारोहे नरका: परिकीर्तिताः । पञ्चाशत् कोटयो देवि………………… ॥’(स्व०१०।३१) इति। तथा, ‘तेषु मध्ये शतं श्रेष्ठं चत्वारिंशाधिकं प्रिये । तेषामपि वराश्चान्ये द्वात्रिंशन्नरकाधिपाः ।। राजराजेश्वरास्त्रीणि……………………. ….. ॥ इति । एवमुपदेशे च अयमाशयो यत् दीक्ष्यस्य पापभूयस्त्वे तारतम्येन निश्चिते वितत्य नरकाणां शुद्धिः अन्यथा तु संक्षेपेणेति । ऊर्ध्व इति, नरकाणाम् ॥२७॥ नन्वेवंविधेषु नरकेषु के नाम वसन्ति, के वा न?–इत्याशङ्कयाह शास्त्रविरुद्धाचरणात् कृष्णं ये कर्म विदधते ॥ २८ ॥ तत्र भीमैर्लोकपुरुषैः पीड्यन्ते भोगपर्यन्तम् ।। सञ्जीवन, इक्षुक, पाश, अम्बरीश, अय:पट्ट, दण्डयन्त्र, अमेध्य, घोररूप । इनके ऊपर महारौरव व्यवस्थित है ।” (स्वतं० १०।८१-९०) इनकी = तीन के अन्तर्भूत ३२ नरकों की । एकोनकोटि = (= एक कम एक करोड़ अर्थात्) ९९ लाख । अन्तर = प्रत्येक शून्य रूप । इस प्रकार ३२ करोड़ होते हैं । उनमें से १४० प्रधान (नरक) है । उनमें भी ३२ और उनमें भी ३ (अत्यन्त प्रमुख हैं-) ऐसा कहना चाहिए । जैसा कि कहा गया है हे वरारोहे ! इसके बाद ५० करोड़ नरकों का कथन है ।” (स्वतं० १०।३१) और “उनमें १४० श्रेष्ठ हैं । उनमें भी ३२ नरकों के राजा हैं और उनमें भी तीन राजराजेश्वर हैं।” इस प्रकार के उपदेश का यह तात्पर्य हैं कि दीक्ष्य के पाप अधिक होने पर यदि उनका क्रम निश्चित हो जाए तो विस्तारपूर्वक नरकों की शुद्धि करनी चाहिए अन्यथा संक्षेप में । ऊपर-नरकों के ॥ २७ ॥ प्रश्न-इस प्रकार के नरकों में कौन लोग रहते हैं कौन नहीं?—यह शङ्का कर कहते हैं शास्त्रविरुद्ध आचरण करने के कारण जो लोग पाप कर्म करते हैं वे वहाँ भोगपर्यन्त भयङ्कर लोकपुरुषों के द्वारा पीड़ित होते हैं और जो अष्टममाह्निकम् ये सकृदपि परमेशं शिवमेकाग्रेण चेतसा शरणम् ॥ २९ ॥ यान्ति न ते नरकयुजः कृष्णं तेषां सुखाल्पतादायि ॥ ‘शास्त्रविरुद्धाचरणात्’ इति विहितस्याकरणात् निषिद्धस्य च करणात् । सुखाल्पतादायीति, प्रमादादपरिनिष्पन्नत्वात् । तदुक्तम् ‘एतेऽतिघोरा नरकास्त्रिकोणा: परिकीर्तिताः । असत्कर्मरतानां तु प्राणिनां पातनाय वै ।। निस्त्रिंशकर्मकर्तृणां शठानां पापकर्मणाम् । निर्दयाधमजातीनां परहिंसारतात्मनाम् ।। परदाररतानां च शिवशास्त्रस्य दूषिणाम् । देवद्रव्यापहाराणां ब्रह्मघ्नपितृघातिनाम् ।। गोध्नानां च कृतघ्नानां मित्रविसम्भघातिनाम्। सुवर्णभूमिहर्तृणां शौचाचारनिवर्तिनाम् ।। दयादाक्षिण्यहीनानां पैशुन्यानृतचेतसाम् । नरकाश्च समाख्यातास्त्वकर्मपथवर्तिनाम् ।। शुभकर्मरता लोका नरके न पतन्ति हि । तत् समासेन वक्ष्यामि यथावदनुपूर्वश: ॥ सत्यं क्षान्तिरहिंसा च शौचं स्नानमकल्कता। दया लौल्यं च यस्यासौ नरकान्नाधिगच्छति॥ लोग एक बार भी एकाग्रचित्त होकर परमशिव की शरण में जाते हैं वे नरक के भागी नहीं होते । कृष्णकर्म उनके लिए अल्प सुख देने वाले होते हैं ।। -२८-३०- ॥ _शास्त्रविरुद्ध आचरण के कारण = शास्त्रविहित (आचरण) न करने से और शास्त्रप्रतिषिद्ध के करने से । कम सुख देने वाला—प्रमाद के कारण पूर्णरूप से सम्पन्न न होने के कारण । वही कहा गया है ___“ये अत्यन्त घोर नरक त्रिकोण कहे गए हैं । जो प्राणी असत्कर्म में लगे हुये, क्रूर कर्म करने वाले, दुष्ट, पापी, निर्दय, अधम जाति वाले, परहिंसारत, परदाररत, शैवशास्त्र से द्वेष रखने वाले, देवता एवं द्रव्य के हर्ता, ब्रह्महा, पितहा, गोघ्न, कृतघ्न, मित्र के साथ विश्वासघात करने वाले, सुवर्ण और भूमि का हरण करने वाले, पवित्रता और आचार से हीन, दया दाक्षिण्य से रहित, चुगली करने और झूठ बोलने वाले और असत्कर्म के मार्ग पर चलने वाले प्राणियों के पतन के लिए ये नरक कहे गए हैं । जो लोग शुभ कर्म में लगे हुए हैं वे नरक में नहीं गिरते उन्हें मैं ठीक ढङ्ग से क्रमश: संक्षेप में कहूँगा । जिसके पास सत्य, क्षमा, अहिंसा, शौच, स्नान, अकल्कता (= पाप का अभाव) दया और अलौल्य श्रीतन्त्रालोकः शान्तो दान्तः सुहृष्टात्मा त्वनहङ्कारवान्समः । अद्रोही चानसूयश्च परैश्वर्ये च नि:स्पृहः । अमात्सर्यममानित्वं शिवभक्तिरचापलम् । जपध्यानरति: स्थैर्य कार्पण्यस्य च वर्जनम् ।। व्रतानि नियमाश्चैव स्वाध्यायश्च त्रिसन्ध्यता। सर्वत्र श्रद्दधानत्वमार्जवं ह्रीर्मनस्विता ।। ओजः प्रशान्ति: संतोषोऽप्रियवाक्यविवर्जनम्। परीक्ष्यकारिता नित्यं मनोहङ्कारनिग्रहः ।। अदम्भित्वममानित्वमकल्को ज्ञानशीलता । पितृदेवार्चने भक्तिगोब्राह्मणशरण्यता ॥ अग्नौ होमो गुरौ दानं ज्ञानिनां पर्युपासनम्। एकान्ते च रतिर्ध्यानमात्मन्येव च तुष्टता ।। अव्यापारः परार्थेषु औदासीन्यमनागसः । अक्रोधित्वमनालस्यमिति धर्माः प्रकीर्तिताः ॥ यस्त्वेतान्भजते धर्मान् सोऽमृतत्वाय कल्पते। नश्यन्ति पौरुषाः पाशा येऽप्यनन्ताः प्रकीर्तिताः ।। शिवाचाररतानां तु धार्मिकाणां हि देहिनाम् । तस्मादेवं तु विज्ञाय मनो धर्मे नियोजयेत् ॥ यस्य चित्तमसंभ्रान्तं निर्विकल्पमकल्मषम् । स याति परमाल्लोकान्नरकांश्च न पश्यति । यस्य बुद्धिरसंमूढा सर्वभूतेष्वपातकी । (= लोभ का अभाव) है वह नरक में नहीं जाता । जो शान्त, दान्त, प्रसन्नात्मा, अहङ्काररहित, समदर्शी, अद्रोही, असूयारहित, दूसरे के ऐश्वर्य के विषय में निष्पृह है। जिसके अन्दर मात्सर्य और अभिमान नहीं, शिवभक्ति और अचापल्य है, जप, दान में रति, कृपणता का अभाव, व्रत, नियम, स्वाध्याय, त्रिकालसन्ध्या, सर्वत्र श्रद्धा, सरलता, लज्जा, मनस्विता, ओज, शान्ति, सन्तोष, कटुवाक्य का न कहना, परीक्षा के बाद कार्य करना, मन और अहङ्कार का नियन्त्रण, दम्भ और अभिमान का अभाव, पापराहित्य, ज्ञानी, पितृदेवार्चन में भक्ति, गो ब्राह्मण को शरण देना, अग्निहोम, गुरु के लिए दान, ज्ञानियों की सेवा, परमात्मा के प्रति एकान्तप्रेम, ध्यान, आत्मतृप्ति, व्यापार का अभाव, दूसरे के अर्थ में उदासीनता, पापराहित्य, क्रोध और आलस्य का अभाव, ये कहे गए कर्म हैं । जो इन कर्मों का सेवन करता है वह अमर हो जाता है । शिवाचार में रत और धार्मिक प्राणियों के वे पौरुष पाश जो कि अनन्त कहे गए हैं, नष्ट हो जाते हैं । इसलिए ऐसा जानकर मन को कर्म में लगाना चाहिए । जिसका चित्त स्थिर, संशयहीन, पापरहित है वह परम लोक को प्राप्त होता है और नरक नहीं देखता । जिसकी बुद्धि मोहअष्टममाह्निकम् अकल्कवान्सत्यवान्योनरकान् स न पश्यति।।’ (स्व० १०॥५३-७१) इति ।। २९ ।। सहस्रनवकोत्सेधमेकान्तरमथ क्रमात् ॥ ३० ॥ पातालाष्टकमेकैकमष्टमे हाटकः प्रभुः। सहस्रशब्दसंनिधेरेक सहस्रं, तदेषामशीतिसहस्राणि मानं सिद्धम् । पातालाष्टकमिति,-यदुक्तम् ‘आभासं वरतालं च शर्करं च गभस्तिमत् । महातलं च सुतलं रसातलमतः परम् ।। सौवर्णमष्टमं ज्ञेयं सर्वकामसमन्वितम् ।’ (स्व० १०।९६) इति । अष्टम इति, सौवर्णाख्ये । यदुक्तम् ‘तदुर्ध्व चैव सौवर्णं पातालं परिकीर्तितम् । तत्रावसत्यसौ देवो हाटकः परमेश्वरः ॥ (स्व० १०।११६) इति । यद्यपि चात्र पातालसप्तके ‘त्रयोऽसुरास्तथा नागा राक्षसाश्चाविभागतः । एकैकत्र च पाताले कथितास्ते वरानने ।। से रहित है जो सभी प्राणियों के प्रति पाप नहीं करता जो अकल्कवान् और सत्यवान् है वह नरक को नहीं देखता ॥ -२८-३०- ॥ नव हजार (योजन) ऊँचा एकान्तर नरक है । उसके बाद आठपाताल क्रमश: एक के बाद एक हैं । आठवें में हाटक नामक रुद्र रहते हैं ।। -३०-३१- ॥ सहस्त्र शब्द निकट रहने के कारण एक सहस्र (समझना चाहिए) । तो इस प्रकार इनका (= नरकों का) परिमाण (= संख्या) ८० हजार सिद्ध होता है । आठपाताल जैसा कि कहा गया है “आभास, वरताल, शर्कर, गभस्तिमत्, महातल, सुतल इसके बाद रसातल और आठवाँ सभीकाम से युक्त सौवर्ण (नामक पाताल) समझना चाहिए । (स्वतं० १०।९६) आठवें में = सौवर्ण नामवाले में । जैसा कि कहा गया है “उसके ऊपर सौवर्ण नामक पाताल कहा गया है । वहाँ यह दीप्यमान हाटक रुद्र रहते हैं ।” (स्वतं० १०।११६) यद्यपि इन सात पातालों में “हे वरानने ! एक-एक पाताल में असुर, नाग और राक्षस ये तीन मिलकर श्रीतन्त्रालोक: H पातालसप्तके ज्ञेयास्तथान्ये भुवनाधिपाः । बलो ह्यतिबलश्चैव बलवान्बलविक्रमः ।। सुबलो बलभद्रश्च बलाध्यक्षश्च कीर्तिताः ।’ (स्व० १०।११४) इत्याधुक्तया प्रत्येकं पृथक् भुवनाधिपाः संभवन्ति, तथाप्येषां ‘हाटकेन विशुद्धेन सर्वेषां शुद्धिरिष्यते ।’ इत्याधुक्तया हाटकरुद्रशुद्ध्यैव शुद्धिः,—इत्यानर्थक्यादिह तदुपदेशो न कृतः ।। ३० ।। अस्य चैवमभिधाने किं निमित्तम् ? -इत्याशङ्कयाह प्रतिलोकं नियुक्तात्मा श्रीकण्ठो हठतो बहूः ॥ ३१ ॥ सिद्धीर्ददात्यसावेवं श्रीमद्रौरवशासने । ‘सिद्धी:’ इति सालोक्यादिरूपाः । यदुक्तं तत्र ‘प्रतिलोके नियुक्तात्मा श्रीकण्ठो भगवानसौ । करोति हाटको भूत्वा पातालद्वारपालनम् । हठेन भतवा यन्त्राणि पातालेषु महोदयाः। सिद्धीरभ्यस्तसन्मन्त्रान् साधकांल्लम्भयत्यसौ ॥ इति ॥ ३१ ॥ रहते है-यह तुमसे कहा गया । इसके अतिरिक्त अन्य भुवनेश्वरों को भी जानना चाहिए-बल, अतिबल, बलवान, बलविक्रम, सुबल, बलभद्र, और बलाध्यक्ष (भुवनाधिप) कहे गए हैं । (स्व० १०।११४) इत्यादि वचन के कारण प्रत्येक भुवन के अलग भुवनाधिप होते हैं । तो भी “हाटक के शुद्ध होने से सबकी शुद्धि हो जाती है ।” इत्यादि उक्ति के कारण हाटकरुद्र की शुद्धि से ही इनकी शुद्धि हो जाती है । इसलिए निरर्थक होने के कारण इनका उपदेश यहाँ नहीं किया गया ।।-३०-३१।। इसका इस प्रकार कथन करने में क्या निमित्त है? यह शङ्का कर कहते हैं प्रत्येक लोक में अपने स्वरूप को नियुक्त करने वाले यह श्रीकण्ठनाथ हठात् अनेक सिद्धियाँ देते हैं— ऐसा रौरव शास्त्र में (कहा गया है) ।। -३१-३२- ।। सिद्धियाँ-सालोक्य आदि । जैसा कि वहाँ कहा गया है “प्रत्येक लोक में आत्मनियुक्ति वाले यह भगवान् (अनन्तनाथ) हाटकरुद्र बनकर पातालद्वार की रक्षा करते हैं । यह हठपूर्वक पातालों में यन्त्रों को तोड़कर सन्मन्त्र का अभ्यास करने वाले साधकों को अत्यन्त उत्कृष्ट सिद्धियाँ देते अष्टममाह्निकम् नन्वसावेवं सिद्धी: केषां ददाति? – इत्याशङ्कयाह व्रतिनो ये विकर्मस्था निषिद्धाचारकारिणः ॥ ३२ ॥ दीक्षिता अपि ये लुप्तसमया न च कुर्वते । प्रायश्चित्तांस्तथा तत्स्था वामाचारस्य दूषकाः ॥ ३३ ॥ देवाग्निद्रव्यवृत्त्यंशजीविनश्चोत्तमस्थिताः । अधःस्थगारुडाद्यन्यमन्त्रसेवापरायणाः ॥ ३४ ॥ ते हाटकविभोरग्रे किङ्करा विविधात्मका: ॥ विकर्मस्थत्वे निषिद्धाचारकारित्वं हेतुः । लुप्तसमया इति, चण्डद्रव्यादि संस्पर्शात् । अत एव प्रायश्चित्ताकरणाद् भ्रष्टदीक्षाफलाः । यदुक्तम् ‘प्रायश्चित्तमकुर्वाणो मन्त्री विधिविलङ्घने । सिद्धिभ्रंशमवाप्नोति.. ………………….॥’ इति । ‘तत्स्थः’ इति वामाचारनिष्ठाः, तेन तत्कारिणस्तद्वेषिणश्च—इत्युक्तं स्यात् । तेषामेव च विशेषणं ‘देवेत्यादि । अन्येषां हि एवं नारकित्वमेव भवेत् । यथोक्तम् हैं ॥ -३१-३२- ॥ प्रश्न-यह इस प्रकार की सिद्धियाँ किन लोगों को देते हैं ?-यह शङ्का कर कहते हैं जो व्रती विरुद्धकर्म करते हैं और निषिद्ध आचार करने वाले हैं; दीक्षित होकर भी समय (= संस्कार) का लोप होने के बाद प्रायश्चित्त नहीं करते तथा उस (= वामाचार) में रहते हुये भी वामाचार की निन्दा करते हैं, देव अग्नि द्रव्यवृत्ति के अंश से जीविका चलाते हैं, शिवशासन में स्थित नहीं हैं वे भिन्न-भिन्न रूप में हाटक विभु के आगे किङ्कर के समान रहते हैं ।। -३२-३५- || विकर्मस्थता में निषिद्धाचार का करना कारण है । लुप्त समय (= संस्कार) वाले चण्डद्रव्य (= चाण्डाल और अशुद्ध द्रव्य अथवा आवेशकारक द्रव्य जैसे सड़ा गला मांस आदि) आदि के स्पर्श के कारण । इसलिए प्रायश्चित्त न करने के कारण भ्रष्ट दीक्षाफल वाले । जैसा कि कहा गया “मन्त्र का साधक नियम का उल्लङ्घन करने पर यदि प्रायश्चित्त न करे तो सिद्धिभ्रष्ट हो जाता है ।” उसमें स्थित = वामाचारनिष्ठ । इससे उसको करने वाले तथा उससे द्वेष रखने वाले-ऐसा कहना चाहिए था । देव अग्नि इत्यादि उन्हीं का विशेषण है । यदि दूसरे लोग ऐसे हों तो नारकी होंगे । जैसा कि कहा गया है श्रीतन्त्रालोकः RYAHATMARPARALLERH PARIWARITUTHI ‘यदीच्छेन्नरकं गन्तुं सपुत्रपशुबान्धवः । देवेष्वधिकृतिं कुर्याद् गोषु च ब्राह्मणेषु च ॥ इति । ‘उत्तमस्थिताः’ इति ‘वेदादिभ्यः परं शैवम्……………….. इत्याद्युक्तेः, ऊोर्ध्वशासनस्थाः । ‘विविधात्मका’ इति तत्तत्कर्मानुसारेणो त्तमादिभिन्ना:- इत्यर्थः । एतच्चैषां नि:ष्यन्दफलवत् न तु साक्षात् । तथात्वे हि ‘ब्राह्मणाः क्षत्रिया वैश्या शूद्रा वा वीरवन्दिते । आचार्यत्वे नियुक्ता ये ते सर्वे तु शिवाः स्मृताः ॥ अन्यथा प्राक्स्वरूपेण ये पश्यन्ति नराधमाः । नरके ते प्रपच्यन्ते सादाख्यं वत्सरत्रयम् ।। (स्व-४|४११) इति । A ER तथा, ‘प्राग्जात्युदीरणादेवि प्रायश्चित्ती भवेन्नरः । दिनत्रयं तु रुद्रस्य पञ्चाहं केशवस्य च । पितामहस्य पक्षकं नरके पच्यते तु सः ॥’ (स्व० ४।५४२) इत्यादिश्रुतिविरोध: स्यात् ।। ३४ ॥ ABHABET “यदि कोई पत्र, पशु और बान्धवों के सहित नरक में जाना चाहे तो देवता गौ ब्राह्मण के ऊपर अधिकार करें अर्थात् उनसे बलात् स्वार्थ सिद्ध करे ।’ उत्तमस्थिता “वेद आदि की अपेक्षा शैव शास्त्र उत्कृष्ट है ।” इत्यादि उक्ति के कारण ऊर्ध्व-शासन (= शैवशास्त्र) में स्थित । विविधात्मक भिन्न-भिन्न कर्मों के अनुसार उत्तम आदि अनेक । यह इनके लिए निष्यन्द (= परम्परया) फलवाला है न कि साक्षात् । वैसा होने पर ___“हे वीरवन्दिते ! ब्राह्मण क्षत्रिय वैश्य अथवा शूद्र (यदि वे) आचार्य पद पर नियुक्त हो गये तो वे सब शिव माने जाते हैं । जो नराधम उनको (उनके) पहले रूप में देखते हैं वे सदाशिव के तीन वर्ष तक नरक में निवास करते हैं ॥” (स्वतं० ४।५१४) तथा “हे देवि ! (आचार्य की) पूर्वजाति का कथन करने से मनुष्य प्रायश्चित्ती हो जाता है । वह रुद्र के तीन, विष्णु के पाँच और ब्रह्मा के १५ दिनों तक नरक में रहता है ॥” (स्व तं० ४।५४२) अष्टममाह्निकम् एवं भोगोपरमे पुनरेषां किं स्यात् ?–इत्याशङ्कयाह ते तु तत्रापि देवेशं भक्त्या चेत्पर्युपासते ॥ ३५ ॥ तदीशतत्त्वे लीयन्ते क्रमाच्च परमे शिवे । अन्यथा ये तु वर्तन्ते तद्भोगनिरतात्मकाः ॥ ३६ ॥ ते कालवह्निसंतापदीनाक्रन्दपरायणाः । गुणतत्त्वे निलीयन्ते ततः सृष्टिमुखे पुनः ॥ ३७॥ पात्यन्ते मातृभिर्घोरयातनौघपुरस्सरम् । अधमाधमदेहेषु निजकर्मानुरूपतः ॥ ३८ ॥ मानुषान्तेषु तत्रापि केचिन्मन्त्रविदः क्रमात् । मुच्यन्तेऽन्ये तु बध्यन्ते पूर्वकृत्यानुसारतः ॥ ३९ ॥ इत्येष गणवृत्तान्तो नाम्ना हुलहुलादिना । प्रोक्तं भगवता श्रीमदानन्दाधिकशासने ॥ ४० ॥ पातालोद्ये सहस्राणि विशतिर्भूकटाहकः । सिद्धातन्त्रे तु पातालपृष्ठे यक्षीसमावृतम् ॥ ४१ ॥ भद्रकाल्याः पुरं यत्र ताभिः क्रीडन्ति साधकाः । ‘देवेशम्’ इति हाटकम् । ‘अन्यथा’ इति तत्पर्युपासावैमुख्येन । ‘मातृभिः’ इत्यादि श्रुतियों से विरोध हो जाएगा ॥ ३४ ॥ इस प्रकार भोग समाप्त होने पर फिर इनका क्या होगा? — यह शङ्का कर कहते हैं यदि वे वहाँ (= नरक में) भी भक्ति के साथ, देवेश (= हाटकेश्वर) की, उपासना करते हैं तो (वे पहले) उस (लोक) के ईश्वर तत्त्व में और फिर क्रमश: परमशिव में लीन हो जाते हैं । उस (लोक) के भोग में आसक्त जो लोग भिन्न प्रकार से रहते हैं वे कालाग्नि के ताप से दीन और क्रन्दन युक्त होकर गुणतत्त्व में लीन हो जाते हैं और फिर माताओं के द्वारा घोरयातनासमूह के साथ अपने कर्मों के अनुसार सृष्टि के मुख (= प्रारम्भ) में मनुष्यपर्यन्त अधमाधम शरीरों में गिराये जाते हैं । उन (= मनुष्यों) में भी कुछ मन्त्रवेत्ता क्रमश: मुक्त हो जाते हैं और दूसरे (मनुष्य) अपने पूर्णकृत्यों के अनुसार बन्धन को प्राप्त होते हैं । यह गणवृत्तान्त हुलहुल आदि नाम से आनन्दाधिकशास्त्र में भगवान् के द्वारा कहा गया है । पाताल के ऊपर बीस हजार पृथ्वीकटाह है। सिद्धातन्त्र में तो (कहा गया है कि) पातालपृष्ठ में यक्षीभाव से युक्त भद्रकाली का पुर है जिसमें साधक उनके (= यक्षिणियों के) साथ खेलते हैं ।। -३५-४२- ।। श्रीतन्त्रालोकः 52HINRNARRAHABETERMER इत्यपराशक्तिभिः । यदुक्तम् ‘विषयेष्वेव संलीनानधोऽधः पातयन्त्यणून् । याः समालिङ्गय रुद्राणून् घोरतर्योऽपरा: स्मृताः ॥ _ (मा०वि०३।३१) इति । ‘तत्रापि’ इति मानुषत्वे । तद्धीना (अन्ये) इत्यमन्त्रविदस्तत्तत्स्वकौचित्येन तत्तज्जात्याद्यनुभवन्ति–इत्यर्थः । नचैतदस्माभिः स्वोपज्ञमेवोक्तम्- इत्याह ‘प्रोक्तमित्यादि’ । यदुक्तं तत्र ‘मातङ्गा हुलहुलाश्चान्ये हेतुका दिव्यरूपिणः । कापालिकाश्च कङ्काला महोच्छुष्माश्च शोभनाः ॥’ इत्युपक्रम्य ‘एवं संख्याविहीनास्तु महाचण्डेश्वरेरणात् । चण्डद्रव्यविलुप्तास्तु दीक्षिताः शिवशासने । चण्डद्रव्येण जीवन्ति ते स्मृता ब्रह्मराक्षसाः ।।’ इति । तथा ‘रमन्ते विविधैोगैस्तेऽपि पातालवासिनः । पाताले भूतराजानो भवन्ति बलदर्पिता: ॥’ देवेश = हाटकेश्वर । अन्यथा = उनकी उपासना से विमुख होने के कारण । मातृभिः = अपराशक्तियों के द्वारा । जैसा कि कहा गया है जो रुद्राणुओं का आलिङ्गन कर, विषयों में लीन जीवों को, नीचे-नीचे गिराती है, वे अपरा (शक्तियाँ) घोरतरी कही गई हैं ।” (मा०वि०सं० ३।३१) उनमें भी = मनुष्यों में । उससे हीन (दुसरे) मन्त्र को न जानने वाले, भिन्न-भिन्न अपने कर्म के अनुरूप भिन्न-भिन्न जन्म का अनुभव करते हैं । यह बात हमने स्वोपज्ञ ही नहीं कही है-यह कहते हैं-प्रोक्तम् इत्यादि । जैसा कि वहाँ कहा गया है “मातङ्ग, हुलहुल, हेतुक, दिव्यरूपी, (अथवा दिव्यरूप वाले हेतुक) कापालिक, कङ्काल और सुन्दर महोच्छुष्म ।’ _ यहाँ से प्रारम्भ कर इस प्रकार महाचण्डेश्वर की प्रेरणा से, असंख्य, चण्डद्रव्य से रहित, शिवसाधना में दीक्षित जो चण्डद्रव्य के द्वारा जीवित रहते हैं वे ब्रह्मराक्षस कहे गए तथा “वे पातालवासी भी अनेक प्रकार के भोगों के साथ रमण करते हैं और बल अष्टममाह्निकम् इति भूकटाहक’ इति मनुष्याधारभूः । एवमियदन्तं ब्रह्माण्डस्यार्धम् तत्कटाहः कोटि:, कालाग्निपुरं कोटिः, तज्ज्वाला दशकोटयः, धूमः पञ्च, नरका द्वात्रिंशत्, कूष्माण्डपुरं नवनवतिलक्षाणि, पातालाष्टकमशीतिसहस्राणि, भूकटाहो विंशतिः,—इत्येवं पञ्चाशत् कोटयः । अत्रैव श्रीसिद्धयोगीश्वरीमतोक्तं विशेष दर्शयति ‘सिद्धातन्त्रे’ इत्यादिना । यदुक्तं तत्र ‘पातालोचे भवेद्भद्रं भद्रकालीगृहं शुभम् । यक्षिणीनां तु सर्वासां नायिका संप्रकीर्तिता ।। चतुष्षष्टिः सहस्राणि यक्षिणीनां पुराणि तु । तत्र कोटिशतं यावत्कन्यानां तु पुरे पुरे ॥ क्रीडन्ति साधकास्तत्र तैः सार्धं तु मला(हा)बलाः । ज्ञात्वा तु यक्षिणीकल्पं सिद्धयोगीश्वरीमते ॥’ इति । ‘तस्योध्वं च पुनर्लक्षं तमश्चैवातिदुस्सहम् । तप्ताङ्गारनिभा भूमिस्तप्तपाषाणदीपिता ।।’ इति । ‘तस्योध्वं च न किंचित्स्याद्यावल्लक्षाश्चतुर्दश। पुनर्नागालयं चैवमनन्तभयकारकम् ।। कृष्णनागसहस्रस्तु लक्षधा परिवारितम् ।’ इति। ‘मातृद्रोही पितृद्रोही गुरुद्रोही च भ्रूणहा । बालहन्ता व्रजत्यत्र स्त्रीव्यङ्गे च महापशुः ।। से दर्पित होकर पाताल में प्राणियों के राजा हो जाते हैं ।’ भूकटाहक = मनुष्यों की आधारभूमि । इस प्रकार यहाँ तक ब्रह्माण्ड का आधा भाग है । उस (= ब्रह्माण्ड) का कटाह १ करोड़, कालाग्निपुर १ करोड़, उसकी ज्वाला १० करोड़, धूम पाँच (करोड़), नरक बत्तीस करोड़, कुष्माण्ड पुर ९९ लाख, ८ पाताल ८० हजार, भूकटाह २०, इस प्रकार (इसका मान) पचास करोड़ होता है । इसी विषय में सिद्धयोगीश्वरी मत में कहे गए विशेष को ‘सिद्धातन्त्र’ में इत्यादि (कथन) के द्वारा दिखलाते हैं जैसा कि वहाँ कहा गया “पाताल के ऊपर सुन्दर शुभ भद्रकाली का गृह है । (वह भद्रकाली) सब यक्षिणियों की नायिका कही गई है । यक्षिणियों के ६४ हजार पुर है । उनमें एक-एक पुर में एक सौ करोड़ कन्यायें रहती हैं । वहाँ सिद्धयोगीश्वरीमत में यक्षिणीकल्प को जानकर महाबलशाली साधक उन (कन्याओं) के साथ क्रीड़ा करते उसके ऊपर फिर एक लाख (योजन) अत्यन्त दु:सह अन्धकारपुर है । वहाँ तप्त पाषाण से जलती हुई भूमि तप्त अङ्गार के सदृश है।” “उसके ऊपर १४ लाख (योजन) तक कुछ नहीं है । उसके बाद हजारों नागों ३ त.तृ. श्रीतन्त्रालोकः तिष्ठते यावत्पाताले मन्त्रमार्गस्य दूषकः ॥’ इति ॥ ४१ ॥ एवं ब्रह्माण्डस्य भूकटाहान्तमेकमर्धमभिधाय तदूर्ध्वमपि भुवनादि दर्शयति ततस्तमस्तप्तभूमिस्ततः शून्यं ततोऽहयः ॥ ४२ ॥ एतानि यातनास्थानं गुरुमन्त्रादिदूषिणाम्। ततो भम्यर्ध्व(मध्य) तो मेरुः सहस्त्राणि स षोडश ॥४३ ॥ मग्नस्तन्मूलविस्तारस्तद्वयेनो+विस्तृतिः। सहस्राब्धिवदुच्छ्रायो हैमः सर्वामरालयः ॥ ४४ ॥ सहस्राणीति, योजनानाम् । ‘मग्नः’ इत्यर्थाद्भूकटाहे । तन्मूलविस्तार इति, तच्छब्देन षोडशानां सहस्राणां परामर्शः । ‘तद्वयेन’ द्वात्रिंशता सहस्रः । ‘सहस्राब्धिवसूच्छ्राय’ इति चतुरशीतिसहस्रोच्छ्रितिः-इत्यर्थः । तदुक्तम् ‘तस्या मध्ये महामेरुः सौवर्ण…………. ।’ (स्व. १०।१२१) इत्याधुपक्रम्य ‘योजनानां सहस्राणि चतुरशीतिरुच्छ्रितः । षोडशैव सहस्राणि अधोभागे प्ररोपितः ॥ के द्वारा १ लाख बार घिरा हुआ अनन्तभयकारक नागों का पुर है ।’’ मातृद्रोही, पितृद्रोही, गुरुद्रोही, भ्रूणहा, बालघाती, स्त्री के व्यङ्ग (= गुप्ताङ्ग) के विषय में महापशु और मन्त्रमार्ग का निन्दक यहाँ जाता है और इस पाताल में (प्रायश्चित की समाप्ति) तक रहता है ॥ ३५-४१ ॥ __ इस प्रकार भूकटाहपर्यन्त ब्रह्माण्ड के एक अर्धभाग का कथन कर उसके ऊपर भी भुवन आदि को दिखलाते हैं उसके बाद अन्धकार, तप्तभूमि, उसके बाद शून्य, उसके बाद सर्प ये सब गुरुमन्त्र आदि के दूषकों के लिए यातना के स्थान हैं । इसके बाद भूमि के मध्य में १६ हजार (योजन) मेरु पर्वत है । यह (भूकटाह में) डूबा हुआ उतने मूल के विस्तार वाला है । उसके दोगुने (= ३२ हजार योजन) से उसका ऊपरी विस्तार है । सभी देवतागण का स्वर्णिम आवासस्थल (यह सुमेरु) ८४ हजार (योजन) ऊँचा है ॥ -४२-४४ ॥ एक हजार योजन-डूबा हुआ अर्थात् भूकटाह में । उतना मूल का विस्तार यहाँ । ‘उतना’ शब्द से सोलह हजार का परामर्श है । उसके दो गुने से = ३२ हजार से । सहस्र अब्धि = ४, वस् = ८ अर्थात् ८४ हजार (योजन) ऊँचाई । वही कहा गया है “उसके बीच में सुवर्णमय महामेरु है । (स्वतं० १०।१२१) इत्यादि से प्रारम्भ कर ३५ अष्टममाह्निकम् तान्येव मूलविस्तारो द्विगुणो मूर्धविस्तरः ।’ (स्व १०।१२३) इति ॥ ४४ ।। नन्वेवंमानत्वेऽपि अस्य कीदृगाकार: ?-इत्याशङ्क्याह मध्योर्ध्वाधः समुद्वृत्तशरावचतुरश्रकः । ‘समुद्वृत्त’ इति सम्यगष्टाश्रतापत्तिपूर्वं उदूर्ध्वं वृत्तः, तेनाधो ब्रह्मभागे चतुरश्रो, मध्ये विष्णुभागेऽष्टाश्रो रुद्रभागे च वृत्त ऊचे मस्तके च शरावाकृतिरित्यर्थः । नन्वेवमाकारत्वम् ‘अव्यक्तं चतुरष्टाश्रवृत्तभागोपलक्षितम् ।’ इति, तथा ‘तच्छुत्रं कुक्कुटाण्डं च…………………… ।’ इत्याद्युक्तया पारमेश्वरस्य लिङ्गस्य संभवेत् तत्कथम् ?–इत्याशङ्कयाह भैरवीयं च तल्लिङ्ग धरणी चास्य पीठिका ॥ ४५ ॥ सर्वे देवा निलीना हि तत्र तत्पूजितं सदा । मध्ये मेरुसभा धातुस्तदीशदिशि केतनम् ॥ ४६ ॥ ____ “चौरासी हजार योजन ऊँचा, सोलह हजार (योजन) पृथ्वी के नीचे धंसा हुआ है । यह मूल का विस्तार है (उसका) दो गुना ऊपर फैला हुआ है ।” (स्वतं० १०।१२३) ।। ४४ ॥ प्रश्न-इतना परिमाण होने पर भी इसका आकार कैसा है? यह शङ्का कर कहते हैं मध्य में ऊपर और नीचे क्रमश: समुदृवृत्त = (अष्टकोण) शराव (कसोरे जैसा) और चतुष्कोण है ।। ४५- ।। समुद्वृत्त = अच्छीतरह अष्टकोणपूर्वक ऊपर उठा हुआ । इससे नीचे = ब्रह्मभामा में चतुष्कोण, मध्य = विष्णुभाग में अष्टकोण और रुद्रभाग अर्थात् ऊथ्वीस्तक में शराव (= पुरवा या कसोरा) की आकृतिवाला है । प्रश्न-इस प्रकार का आकार अव्यक्त (का आकार) चतुष्कोण अष्टकोण और वृत्त भाग जैसा है ।” तथा “वह छाता या मुर्गी के अण्डे जैसा है ।” इत्यादि उक्ति के द्वारा (यह आकार) परमेश्वर (= शिव) के लिङ्ग का होता है तो यह कैसे? यह शंका कर कहते हैं क्योंकि वह (= मेरु) भैरव का लिङ्ग है । धरणी उसका आधार है । ३६ श्रीतन्त्रालोकः ज्योतिष्कशिखरं शंभोः श्रीकण्ठांशश्च स प्रभुः। अवरुह्य सहस्त्राणि मनोवत्याश्चतुर्दश ॥ ४७ ॥ चक्रवाटश्चतुर्दिक्को मेरुरत्र त लोकपाः । अमरावतिकेन्द्रस्य पूर्वस्यां दक्षिणेन ताम् ॥ ४८ ॥ अप्सरः सिद्धसाध्यास्तामुत्तरेण विनायकाः । तेजोवती स्वदिश्यग्नेः पुरी तां पश्चिमेन तु ॥ ४९ ॥ विश्वेदेवा विश्वकर्मा क्रमात्तदनुगाश्च ये। याम्यां संयमनी तां तु पश्चिमेन क्रमात् स्थिताः ॥ ५० ॥ मातृनन्दाः स्वसंख्याता रुद्रास्तत्साधकास्तथा। कृष्णाङ्गारा निऋतिश्च तां पूर्वेण पिशाचकाः॥ ५१ ॥ रक्षांसि सिद्धगन्धर्वास्तूत्तरेणोत्तरेण ताम् । वारुणी शुद्धवत्याख्या भूतौघो दक्षिणेन ताम्॥ ५२ ॥ उत्तरेणोत्तरेणैनां वसुविद्याधराः क्रमात् । वायोर्गन्धवती तस्या दक्षिणे किन्नराः पुनः ॥ ५३ ॥ वीणासरस्वती देवी नारदस्तुम्बुरुस्तथा । महोदयेन्दोमुह्याः स्युः पश्चिमेऽस्याः पुनः पुनः ॥ ५४॥ उसमें सभी देवता लीन (= रहते) हैं । वहाँ सब हमेशा पूजित हैं । मेरु के मध्य में ब्रह्मा की मेरुसभा है । उस (सभा) के (ईशान कोण) में शंभु का ज्योतिर्मय शिखर है । उसके प्रभु श्रीकण्ठनाथ के अंश भूत शंभु हैं । उसके नीचे उतरने पर चौदह सहस्त्र योजन विस्तार वाली ब्रह्मा की सभा मनोवती है । उसके चारो ओर चक्रवाट (= नगरसमूह) तथा मेरु बसा हुआ है। ___ यहाँ अमरावती केन्द्र के पूर्व में लोकपाल उसके दक्षिण में सिद्ध साध्य अप्सरायें, उसके उत्तर में विनायक, अग्निकोण में तेजोवती अग्निपुरी, उसके पश्चिम विश्वेदेव, उसके पीछे विश्वकर्मा, दक्षिण दिशा में संयमनी (पुरी), उसके पश्चिम में क्रमश: मातृनन्दा (पुरी) है जिसमें ग्यारह रुद्र तथा ग्यारह उस (= यम) के साधक कृष्णाङ्गार (= काले कोयले के) समान हैं निऋति भी हैं । उसके पूर्व में पिशाच हैं । उत्तर दिशा में राक्षस और सिद्ध गन्धर्व है। उसके उत्तर में वारुणी शुद्धवती है । उसके दक्षिण में भूतसङ्घ (= प्राणिवर्ग) का निवास है । उसके उत्तर में वसु एवं विद्याधर तथा उसके उत्तर में वाय देवता की गन्धवती नगरी हैं | उसके दक्षिण में किन्नर है । इसके पश्चिम में वीणाधारिणी सरस्वती देवी (अथवा वीणासरस्वती देवी), नारद और तुम्बुरु रहते हैं । उत्तर में सोमदेव की महोदया नगरी है । उसकेअष्टममाह्निकम् कुबेरः कर्मदेवाश्च तथा तत्साधका अपि । यशस्विनी महेशस्य तस्याः पश्चिमतो हरिः ॥ ५५ ॥ दक्षिणे दक्षिणे ब्रह्माश्विनौ धन्वन्तरिः क्रमात् । चशब्दद्वयं हेतौ । पूजितमित्यर्थात् त्रिषु लोकेषु । तदुक्तम् ‘लिङ्गरूपी भवेन्मेरु:. इत्युपक्रम्य ‘चतुरश्रमधो ब्रह्मा…. ……. ।’ इति, ‘मध्ये अष्टाश्रको विष्णः…………………. ।’ इति, ‘ऊर्ध्वं तु भवति रुद्रो वृत्ताकारः समन्ततः । मेरुः सञ्जायते लिङ्ग धरणी चास्य पीठिका।। आलय: सर्वदेवानां तेन लिङ्गत्वमागतम् । लीनमस्य जगत्सर्वं ब्रह्माद्यं सचराचरम् ॥ इति ।। ‘एवं ते भाषितं लिङ्गं त्रिषु लोकेषु पूजितम्।’ इति । ‘सुमेरुहेमसंपृक्तः शरावाकृतिमस्तकः ।’ इति ।। ‘धातुः’ इति ब्रह्मणः । यदुक्तम् पश्चिम में गुह्यसमाज रहता है। वहीं पर कुबेर कर्मदेव और उसके साधक रहते हैं । महेश की (दिशा = ईशान कोण में) यशस्विनी नामक नगरी है। उसके पश्चिम में हरि रहते हैं । उसके दक्षिण में ब्रह्मा उसके दक्षिण अश्विद्वय उनके दक्षिण में धन्वन्तरि रहते हैं । -४५-५६- ॥ दो चकार हेतु (अर्थ) में हैं । पूजित हैं अर्थात् तीनों लोकों में । वही कहा गया है “मेरु लिङ्गरूपी है।” ऐसा प्रारम्भ कर “नीचे चारकोण अध:स्थित ब्रह्मा है ।” “मध्य में आठकोण वाले विष्णु है ।’’ “और ऊपर चारो ओर वृत्ताकार रुद्र है । मेरु लिङ्ग है । धरणी इसका आधार (= योनि) है । यह सभी देवों का आलय है इसलिए यह लिङ्ग है क्योंकि ब्रह्मा आदि समस्त चराचर जगत् इसमें लीन हैं ।” ___ “इस प्रकार तीनों लोकों में पूजित । लिङ्ग का तुम्हें वर्णन किया गया ।” “सुमेरु सोने से बना हुआ मस्तक में शराव की आकृतिवाला है ।” धाता का = ब्रह्मा का । जैसा कि कहा गया है ३८ श्रीतन्त्रालोकः ‘तस्योचे तु सभा दिव्या नाम्ना चैव मनोवती ।’ (स्व० १०११२३) इत्युपक्रम्य ‘सर्वभोगगुणोपेता ब्रह्मणस्तु महात्मनः ।’ (स्व० १०।१२४) इति । तदीशदिशीति, तच्छब्देन सभापरामर्शः । अत्र च यद्यपि शृङ्गत्रयमस्ति तथाप्येतदिह प्राधान्यादुक्तम् । यदुक्तं किरणायाम् ‘त्रिभिः शृङ्गः समायुक्तो रुक्मकाञ्चनरत्नजैः । रत्नजं त्र्यम्बकस्योक्तं राजतं तु त्रिविक्रमे ।। सौवर्णं कनकाण्डस्य…………………….. ।’ इति ।। लोकपा इति, भूम्ना । ‘दक्षिणेन ताम्’ इति तस्या दक्षिणे । तेन तद्दक्षिणेऽप्सर:पुरी, तद्दक्षिणे च सिद्धपुरीत्यादिक्रमः । अप्सर:प्रभृतिभिश्चात्र कामवत्याख्याः स्वपर्यो लक्ष्यन्ते । एवमुत्तरत्रापि ज्ञेयम् । अत्र च बहवचनादाद्यों लभ्यते’ इति नीत्याऽऽदित्यानामपि ग्रहणम्,–इत्यस्मिन्नन्तराले चतस्रः पुर्यो ऽन्यथा षड्विंशतिर्न स्यात् । ‘ताम्’ इति अमरावतीम् । तेन तस्या एव वामे विनायकाः,-इति ज्ञेयम् । ‘स्वदिशि’ इत्यग्निकोणे । तच्चोत्तरत्रापि योज्यम् । “उसके ऊपर मनोवती नाम की दिव्यसभा” (स्व० तं०१०।१२३) ऐसा प्रारम्भ कर महात्मा ब्रह्मा की सभी भोग और गुणों से युक्त (सभा) है ।” (स्वतं० १०।१२४) तदीश की दिशा में यहाँ तत् शब्द से सभा को समझना चाहिए । यहाँ यद्यपि तीन-शृङ्ग है तो भी प्रधान होने के कारण इसका यहाँ कथन है । जैसा कि किरणसंहिता (अथवा किरणागम) में कहा गया है “सुवर्ण रजत एवं रत्न से उत्पन्न तीन शृङ्गों से युक्त है । उनमें रत्नज शङ्कर का, रजतमय विष्णु का और स्वर्णमय ब्रह्मा का (शृङ्ग) कहा गया है ।” लोकप-यह कथन अधिकता के कारण है । दक्षिणेन ताम् = उसके दक्षिण । इस प्रकार उसके दक्षिण अप्सराओं की पुरी और उसके दक्षिण में सिद्धपुरी है-इस प्रकार क्रम है । अप्सरः आदि के द्वारा यहाँ कामवती की अपनी पुरियाँ लक्षित होती हैं । इसी प्रकार आगे भी समझना चाहिए । यहाँ “बहुवचन से इत्यादि अर्थ का ग्रहण होता है ।” इस नीति के द्वारा आदित्यों का भी ग्रहण होता है । इस प्रकार इस बीच में चार पुरियाँ और हैं अन्यथा वे छब्बीस नहीं होगी । उसका = अमरावती को । इससे उसके बायें विनायक लोग हैं—ऐसा जानना चाहिए । अपनी अष्टममाह्निकम् ‘तां पश्चिमेन’ इति तस्याः पश्चिमे । तदनुगा इति, उत्तरत्रापि योज्यम् । एतच्च पुरीद्वयं वक्ष्यमाणायाः संयमन्यभिधाया: पुर्याः पुरस्तात्-इत्यर्थसिद्धम् । एता हि सर्वा एव पुर्य: पूर्वाभिमुखाः, येनास्यां पूर्वपश्चिमादिविभागः । ‘मातृनन्दा’ इति पुर्यभिधानम् । “स्वसंख्याताः’ इत्येकादश । ‘तत्साधकाः’ इति यमपरिचारकाः । रुद्रा इति, काकाक्षिवत् । ‘क्रमात्’ इति मातृनन्दानन्तरं यमपरिचारकाणां रुद्राणां पुरी, तदनन्तरमेकादशानामिति । ‘रक्षांसि’ इति निस्त्रिंशाभिधानानि । ‘तस्या दक्षिणे’ इत्यर्थात् शुद्धवत्या उत्तरेण । ‘पुरः’ इति पुरस्तात् । वीणासरस्वती, गान्धर्ववेदवती-इत्यर्थः । ‘तत्साधकाः’ इति कुबेरपरिचारका यक्षाः । दक्षिणे इत्यर्थादमरावत्याः । “उत्तरे दक्षिणे’ इति द्विवचनादश्विनोर्धन्वन्तरेश्चैकैव पुरीति ज्ञेयम् ॥ ५५ ॥ तदेवोपसंहरति भैरवे चक्रवाटेऽस्मिन्नेवं मुख्याः पुरोऽष्टधा ॥ ५६ ॥ अन्तरालगतास्त्वन्याः पुनः षड्विंशतिः स्मृताः । ‘मुख्या’ इति, लोकपालसंबन्धित्वात् । ‘अन्या’ इति गौण्यः । तदुक्तम् ‘सभाया, ब्रह्मणोऽधस्ताद्योजनानां चतुर्दश । दिशा में = अग्निकोण में । इसे आगे भी समझना चाहिए । ‘तां पश्चिमेन’ = उसके पश्चिम में | इसके पीछे-इसे आगे भी जोड़ना चाहिए । ये दोनों पुरी आगे कही जाने वाली संयमनी नामकपुरी के पूर्व में स्थित है—यह अर्थात् सिद्ध हो गया। ये सभी नगरियाँ पूर्व को ओर मुख वाली हैं । जिससे इसमें पूर्व पश्चिम आदि विभाग है । ‘मातृनन्दा’ यह पुरी का नाम है । अपनी संख्या वाली = ग्यारह संख्या वाली । उसके साधक = यम के परिचारक । ‘रुद्र’ इस पद को काक की अक्षि के समान (दोनों तरफ जोड़ना चाहिए) ‘क्रमशः’ मातृनन्दा के बाद यमपरिचारक रुद्रों की पूरी है । उसके बाद ग्यारह (रुद्रों) की पुरी है । राक्षसगण = निस्त्रिंश नाम वाले राक्षस । उसके दक्षिण = शुद्धवती के दक्षिण । पुरः = सामने । वीणासरस्वती = गान्धर्ववेद वाली । उसके साधक = कुबेर के परिचारक यक्ष । दक्षिण में-अर्थात् अमरावती के ‘उत्तर’ और ‘दक्षिणे’ ऐसे द्विवचन से अश्विद्वय और धन्वन्तरि की एक ही पुरी है । ऐसा जानना चाहिए ॥ ५५ ॥ उसका उपसंहार करते हैं इस प्रकार इस भैरवीय चक्रवाट में आठ मुख्य पुर है और बीच में छब्बीस अन्य (= गौण) पुरी हैं ।। -५६-५७- ॥ ___मुख्य–लोकपालों से सम्बद्ध होने के कारण । अन्य = गौण । वही कहा गया है “ब्रह्मा की सभा के नीचे चौदह हजार योजन तक छोड़कर चारों ओर चक्रवाट श्रीतन्त्रालाक: सहस्राणि परित्यज्य चक्रवाट: समन्ततः ।। स्वर्गाष्टकं तदुद्दिष्टं तत्र तिष्ठन्ति लोकपाः । पूर्वेणेन्द्रस्य विख्याता पुरी नाम्नामरावती ।। तेजोवती तथाग्नेय्यां चित्रभानोः प्रकीर्तिता । दक्षिणे यमराजस्य नाम्ना संयमनी पुरी ।। कृष्णाङ्गारा तु नैर्ऋत्यां राक्षसेशस्य कीर्तिता । पश्चिमेन जलेशस्य पुरी शुद्धवती स्मृता ।। वायव्यां तु पुरी वायोर्नाम्ना गन्धवहा प्रिये । उत्तरेणापि सोमस्य पुरी नाम्ना महोदया ।। ऐशान्यामीशराजस्य पुरी नाम्ना यशोवती । एतासामन्तरे देवि शृणु षड्विंशतिं पुरीः । दक्षिणेनामरावत्याः कामवत्यप्सर:पुरी । सौवर्णी सिद्धसङ्घानां तस्या वै दक्षिणेन तु ।। तस्या वै दक्षिणेनान्या पद्मरागोपशोभिता । आदित्यानां पुरी ख्याता नाम्ना चांशुमती शुभा ।। साध्यानां राजते दिव्या ख्याता वै कुसुमावती । वह्नः पश्चिमदिग्भागे विश्वेषां रेवती पुरी ।। तस्यास्तु पश्चिमे देवि दिव्या वै विश्वकर्मणः । पश्चिमे धर्मराजस्य मातृनन्दा पुरी स्मृता ।। क्रीडन्ति मातरस्तत्र मधुपानविघूर्णिताः । रुद्राणां पश्चिमे तस्या रोहिता नाम काञ्चनी ।। SHETATLTIBILE है । उसे स्वगीष्टक कहा गया है। उसमें लोकपाल रहते हैं। पूर्व में अमरावती नाम से विख्यात इन्द्र की पुरी है | आग्नेयी दिशा में चित्रभानु की तेजोवती (पुरी) कही गई है । दक्षिण में यमराज की संयमनी नामक पुरी है । नैऋत्य दिशा में राक्षसेश की कृष्णाङ्गार पुरी है । पश्चिम में जलेश की शुद्धवती पुरी है । हे प्रिये ! वायत्यदिशा में वायु की गन्धवहा नामक पूरी है । उत्तर में सोम की महोदया नामक पुरी और ईशान दिशा में ईशराज की यशोवती नामक पुरी है । हे देवि इनके बीच में छब्बीस पुरियों को सुनो-अमरावती के दक्षिण में अप्सराओं की कामवती पुरी है । उसके दक्षिण सिद्धसङ्घों की सौवर्णी पुरी है । उसके दक्षिण में एक दूसरी, पद्मरागमणियों से शोभित, शुभ अंशुमती नामक पुरी आदित्यों की है । साध्यों की कुसुमावती नामक दिव्य पुरी है । अग्नि (दिशा) के पश्चिमदिग्भाग में विश्वेदेवा लोगों की रेवती पुरी है । उसके पश्चिम में विश्वकर्मा की दिव्या पुरी है । पश्चिम में धर्मराज की मातृनन्दा पूरी है वहाँ मधुपान से मत्त मातायें क्रीडा करती रहती हैं । उसके पश्चिम में रुद्रों की स्वर्णमयी रोहिता नामक पुरी है वहाँ यम के परिचारक शलधारी रुद्र रहते हैं । उसके पश्चिम वज्र के प्राकार और तोरण वाली, ग्यारह रुद्रों अष्टममाह्निकम् तत्र शूलधरा रुद्रा यमस्य परिचारकाः । तस्य पश्चिमतो ज्ञेया नाम्ना गुणवती पुरी ।। एकादशानां रुद्राणां वज्रप्राकारतोरणा । निर्ऋते: पूर्वभागे तु पिङ्गला नाम वै पुरी ।। सुकर्मसंज्ञा देवेशि पिशाचास्तत्र संस्थिताः । नैऋत्युत्तरसामीप्ये पुरी कृष्णवती शुभा ॥ निस्त्रिंशा नाम तत्रैव वसन्ति राक्षसाः सदा । तस्या अप्युत्तरे भागे पुरी हैमी सुखावती ॥ मित्रो वसति तत्रैव बहुभृत्यजनावृतः । अस्या अप्युत्तरे हैमी गान्धर्वी नाम विश्रुता ।। वसन्ति तत्र गन्धर्वा दिव्यकन्यासमावृताः ।’ (स्व० १०।१३०-१४५) इति । तथा ‘भूतानां सिद्धसेना तु वरुणस्य तु दक्षिणे । हेमसंज्ञा वसूनां तु वरुणस्यापि चोत्तरे ॥ तस्यास्तूत्तरतो देवि नाम्ना सिद्धवती पुरी। सर्वविद्याधराणां तु सा पुरी परिकीर्तिता ।। वायोर्दक्षिणतो देवि सिद्धा नाम पुरी स्थिता। वसन्ति किन्नरास्तत्र पुरैहेंमार्कसंनिभैः ।। वायोः पूर्वेण गान्धर्वी हैमी चित्ररथस्य तु । गन्धर्वराजमुख्यस्य दिव्यगन्धर्वनादिता ॥ की पुरी गुणवती नाम से जाननी चाहिए । निऋति के पूर्वभाग में पिङ्गला नामकी पुरी है । हे देवेशि! वहाँ सुकर्मा नामक पिशाच रहते हैं । निति के उत्तर मास में ही कृष्णवती नाम की सुन्दरपुरी है । उसमें सदा निस्त्रिश नामक राक्षस रहते हैं। उसके भी उत्तर भाग में सुखावती नामक सोने की पुरी है । उसमें अनेक दासों से आवृत मित्र रहते हैं । इसके भी उत्तर में सुवर्ण की गान्धर्वी नामक नगरी प्रसिद्ध है। वहाँ दिव्यकन्याओं से युक्त गन्धर्व रहते हैं” ॥ (स्वतं०१०।१३०-१४५) तथा “वरुण के दक्षिण में भूतों की सिद्धसेना (नामक पुरी) है । वरुण के उत्तर में वस्ओं की हेमनामक (पुरी) है । हे देवि उसके भी उत्तर में सिद्धवती परी है। वह सभी विद्याधरों की पुरी कही गई है । वायु के दक्षिण में सिद्धा नामक पुरी है वहाँ सुवर्ण और सूर्य के समान नगरों के साथ किन्नर रहते हैं । वायु के पूर्व गन्धर्वराजमुख्य चित्ररथ की दिव्य गन्धर्वो से शब्दायमान स्वर्णमयी गान्धर्वी पुरी है । वहाँ साक्षात् देवी सरस्वती विराजमान है जो सप्तस्वरविभूषित, तीनों ग्रामों (= उस mianRLSERHIT श्रीतन्त्रालोकः आस्ते भगवती साक्षात् सप्तस्वरविभूषणा । ग्रामत्रयपरीधाना जातिमेखलमण्डिता ॥ मूर्छनातानचित्राङ्गी नानातानकलोदया । लक्षणव्यञ्जनोपेता मध्यमेनावगुण्ठिता ।। गन्धर्वैर्गीयमाना सा तत्र देवी सरस्वती । तस्याः पूर्वेण चित्रा वै तुम्बुरो रदस्य च ।। सोमस्य पश्चात्प्रमदा गुह्यकानां प्रकीर्तिता ।। पूर्वेण वै तु सोमस्य नाम्ना चित्रवती पुरी । सर्वधातुमयी चित्रा कुबेरस्य महात्मनः ।। षड्विंशतिसहस्रेस्तु कोटीनां परिवारितः । यक्षाणामुत्तमः श्रीमानास्ते भोगैरनुत्तमैः ।। तस्याः पूर्वे शुभा नाम्ना जाम्बूनदमयी पुरी। तत्र वै कर्मदेवास्तु देवत्वं कर्मणा गताः ।। पश्चिमेनेशराजस्य विष्णोर्वै श्रीमती पुरी । तत्रास्ते श्रीपतिः श्रीमानतसीपुष्पसंनिभः । शङ्खचक्रगदापाणि: पीतवासा जनार्दनः ।। ईशस्य दक्षिणे भागे नाम्ना पद्मावती पुरी ॥ महापद्मोपविष्टस्य पद्ममालाधरस्य तु । पद्मपत्रायताक्षस्य ब्रह्मण: पद्मजन्मनः। तस्या दक्षिणतो देवि नाम्ना कामसुखा पुरी ।। नाम वाले स्वरों) की परिधानवाली, जाति (नामक स्वररूपी) मेखला से मण्डित, मूर्च्छनातानरूपी विचित्र अङ्गों वाली, अनेक तान एवं कला के उदय का स्थान, लक्षणाओं व्यञ्जनाओं से युक्त, मध्यम (स्वर) से अवगुण्ठित तथा गन्धर्वो के द्वारा गीयमान है। उसके पूर्व में तुम्बुरु सोम और नारद की चित्रा नामक पुरी है । पश्चिम में गुह्यकों की प्रमदा नामक (पुरी) कही गयी है । सोम की (पुरी) के पूर्व में महात्मा कुबेर की सर्वधातुमयी विचित्र चित्रवती नाम की पुरी है वहाँ यक्षों में श्रेष्ठ श्रीमान् (कुबेर) २६ हजार प्रकार के उत्तमोत्तम भोगों से युक्त होकर विराजते हैं। उसके पूर्व शुभा नामकी स्वर्णमयी पुरी है । वहाँ पर अपने कर्मों के द्वारा देवत्व को प्राप्त कर्मदेव नामक (देवता रहते हैं) । देवराज के पश्चिम विष्णु की श्रीमती नामक पुरी है। वहाँ पर अतसी (= अलसी, तीसी) के समान कान्ति वाले, हाथ में शङ्ख चक्र गदा धारण किये ये पीतवस्त्रधारी लक्ष्मीपति जनार्दन रहते हैं । ईश के दक्षिण भाग में पद्मजन्मा, महापद्म पर उपविष्ट, पद्ममालाधारी, पद्मपत्र के समान विशालनेत्र वाले ब्रह्मा की पद्मावती नामक पुरी है । हे देवि ! उसके दक्षिण कामसुरवा नाम की पुरी है । हे देवेशि ! वहाँ अश्विद्वय तथा धन्वन्तरि रहते है। अमरावती के उत्तर में महामेघ नाम की विनायकों की प्रसिद्ध दिव्य बस्ती मानी अष्टममाह्निकम् अश्विनौ तत्र देवेशि तथा धन्वन्तरिः स्मृतः । उत्तरे त्वमरावत्या महामेघेति विश्रुता ।। विनायकानां सा दिव्या वसतिस्तत्र कल्पिता।’ (स्वतं० १०।१४६-१६१) इति च ।। ५६ ।। एतच्च पुण्यकर्मणां भोगस्थानम्-इत्याह इष्टापूर्तरताः पुण्ये वर्षे ये भारते नराः ॥ ५७ ॥ ते मेरुगाः सकृच्छम्भुं ये वार्चन्ति यथोचितम् । ‘पण्ये’ इति वर्षान्तरेभ्यो वैलक्षण्यं कटाक्षितम् । यथोचितमिति, पौराणिक्या प्रक्रियया-इत्यर्थः । तदुक्तम् ‘इष्टापूर्तरता देवि ये नरा: पुण्यभारते । त्र्यम्बकं सकृदर्चन्ति मेरुं गच्छन्ति ते नराः।।’ (स्व० १०।१६९) इति ।। ५७ ।। इदानीं मेर्वधो वर्षादि विभक्तुमुपक्रमते मेरोः प्रदक्षिणाप्योदग्दिक्षु विष्कम्भपर्वताः ॥ ५८ ॥ मन्दरो गन्धमादश्च विपुलोऽथ सुपार्श्वकः । सितपीतनीलरक्तास्ते क्रमात्पादपर्वताः ॥ ५९ ॥ विष्कम्भेति, भुवोऽवष्टम्भकत्वात् ॥ ५९ ॥ गयी है ॥ ५६ ॥ (स्वतं० १०।१४६-१६१) यह पुण्यकर्मवालों का भोग स्थान है—यह कहते हैं पवित्र भारतवर्ष में जो पुरुष इष्ट एवं पूर्त में लगे हुये हैं—अथवा जो शिव की एक बार यथोचित पूजा करते हैं वे सुमेरु पर्वत पर आसीन होते हैं ।। -५७-५८- ।। ‘पवित्र’ शब्द से, अन्य देशों से विलक्षणता बतलायी गई है । यथोचित् (का अर्थ है) पौराणिक रीति से । वही कहा गया है हे देवि ! पवित्र भारत में जो पुरुष इष्ट-पूर्व में लगे हुये हैं अथवा जो एक बार शम्भु की अर्चना करते हैं वे पुरुष सुमेरु (पर्वत) को जाते हैं ॥ ५७ ।। अब मेरु के नीचे वर्ष आदि का विभाग करने का उपक्रम करते हैं मेरु के दक्षिण पश्चिम और उत्तर दिशाओं में, विष्कम्भ पर्वतसमूह मन्दर, गन्धमादन, विपुल, सुपार्श्वक क्रमश: श्वेत, पीत, नील और रक्त वर्ण के (चार) पाद पर्वत (पैर के समान) है ॥ -५८-५९ ॥ पृथ्वी के अवष्टम्भक (= स्थिर रखने वाला) होने के कारण ये विष्कम्भ है । श्रीतन्त्रालोकः TANISH तदाह ___एतैर्भुवमवष्टभ्य मेरुस्तिष्ठति निश्चलः । एषां च पृथङ्मानस्यानुक्तत्वात् वक्ष्यमाणेलावृताख्यवर्यैकदेशत्वमवगन्तव्यम्, तच्च मेर्वासन्नमन्यथैषां पादपर्वतत्वं न स्यात् ।। एषु च चतुर्ध्वपि अचलेषु प्रत्येकमुद्यानसर:कल्पवृक्षा: संभवन्ति–इत्याह चैत्ररथनन्दनाख्ये वैभ्राजं पितृवनं वनान्याहुः ॥ ६० ॥ रक्तोदमानससितं भद्रं चैतच्चतुष्टयं सरसाम् । वृक्षाः कदम्बजम्ब्वश्वत्थन्यग्रोधकाः क्रमशः ॥ ६१ ॥ एषु च चतुर्भुचलेषु त्रयं त्रयं क्रमश एतदाम्नातम् । अत्र च जम्बूरसोत्था जम्बुनदी संभवतीति शेषः । तदुक्तम् ‘कदम्बो मन्दरे ज्ञेयो जम्बूर्वै गन्धमादने । अश्वत्थो विपुले ज्ञेयो न्यग्रोधश्च सुपार्श्वके ।। सरांस्युपवनान्यत्र अरुणोदं तु पूर्वतः । मानसं दक्षिणे ज्ञेयं सितोदं पश्चिमेन तु ।। महाभद्रमुत्तरतस्ततश्चैत्ररथं वनम् । नन्दनं तु सवैभ्राजं पितृसंज्ञं क्रमात्स्थितम् ॥’ इति । वहीं कहते हैं इनके द्वारा पृथ्वी को स्थिर करके सुमेरु निश्चल रहता है । ६०- ॥ इनका पृथक् परिमाण नहीं कहे जाने से वक्ष्यमाण इलावृत नामक वर्ष का एक भाग समझना चाहिए । और वह सुमेरु के समीपस्थ है अन्यथा ये पादपर्वत नहीं हो सकते ॥ ५९ ॥ इन चारों पर्वतों में प्रत्येक में उद्यान, तालाब और कल्पवृक्ष हैं-यह कहते पर ताब इसमें चैत्ररथ, नन्दन, वैभ्राज और पितृवन नामक उद्यान है रक्तोद, मानस, सित और भद्र ये चार तालाब है । कदम्ब, जामुन, पीपल और बरगद क्रमश: ये वृक्ष उनमें हैं । इन चारो पर्वतों में ये तीन-तीन क्रमश: कहे गए हैं || -६०-६२- ।। “यहाँ जामुन के रस से उत्पन्न जम्बू नदी है । वही कहा गया है मन्दराचल में कदम्ब, गन्धमादन में जम्बू, विपुल में अश्वत्थ, और सुपार्श्वक में बरगद को जानना चाहिए । यहाँ तालाब और उपवन (इस प्रकार) हैं-पूर्व में अरुणोद, दक्षिण में मानसरोवर, पश्चिम में सितोद और उत्तर में महाभद्र । इसी अष्टममाह्निकम् ‘तत्प्रमाणा स्मृता जम्बूर्गन्धमादनमूर्धनि । तस्याः फलसमूहोत्थो रसो ज्ञेयोऽमृतोपमः ।। तेन जम्बूनदी जाता प्रिये वेगवती भृशम् । मेरुं प्रदक्षिणीकृत्य जम्बूमूलं विशेत्स्वकम् ।। तत्संपर्कात् समुत्पन्नं कनकं देवभूषणम् । तेन जाम्बूनदं लोके जायते भूषणोत्तमम् ॥’ (स्व० १०।१९१) इति ॥ ६१ ॥ मेर्वधो लवणाब्ध्यन्तं जम्बुद्वीपः समन्ततः ॥ ६२ ॥ लक्षमात्रः स नवधा जातो मर्यादपर्वतैः । समन्तत इति, वलयाकारत्वेन । तदुक्तम् ‘मेर्वधो वलयाकारो जम्बुद्वीपो व्यवस्थितः । लक्षयोजनविस्तारः ……………………. ।।’ इति ।। ६३ ।। नवधा जातत्वमेव अस्य दर्शयति निषधो हेमकूटश्च हिमवान्दक्षिणे त्रयः ॥ ६३ ॥ लक्षं सहस्रनवतिस्तदशीतिरिति क्रमात् । प्रकार क्रमश: चैत्ररथ, नन्दन, सर्वभ्राज और पितृवन स्थित है ।” “यहाँ गन्धमादन के शिखर पर उतने ही प्रमाण वाले जम्बू वृक्ष है । उसके फलसमूह से निकला हुआ रस अमृत के समान है । हे प्रिये ! उससे अत्यन्त वेगवती जम्बूनदी उत्पन्न हुई है (वह नदी) सुमेरु पर्वत की प्रदक्षिणा करके अपने जम्बूमूल में प्रवेश करती है । उसके सम्पर्क से देवताओं का आभूषण सुवर्ण उत्पन्न होता है । इसीलिए संसार में सुवर्ण उत्तम भूषण होता है ॥ ६१ ॥ (स्वंतं० १०।१९१) ‘सुमेरु के नीचे नमक के सागर तक चारों ओर जम्बूद्वीप है । एक लाख योजन विस्तृत वह (= सुमेरु) मर्याद पर्वतों के द्वारा नव प्रकार से विभक्त हो गया है ।। -६२-६३- ।। चारो ओर = गोलाकार में । वही कहा गया है “सुमेरु के नीचे गोल आकार में एक लाख योजन विस्तृत जम्बूद्वीप इस (सुमेरु) के नव भागों को दिखाते हैं दक्षिण में निषध हेमकूट और हिमवान् ये तीन (पर्वत) क्रमश: १ लाख, ९० हजार और ८० हजार (योजन विस्तार वाले) हैं। बायीं ओर श्रीतन्त्रालोकः नीलः श्वेतस्त्रिशृङ्गश्च तावन्तः सव्यतः पुनः॥ ६४ ॥ मेरोः षडेते मर्यादाचलाः पूर्वापरायताः। पूर्वतो माल्यवान्पश्चाद्गन्धमादनसंज्ञितः ॥ ६५ ॥ सव्योत्तरायतौ तौ तु चतुस्त्रिंशत्सहस्रकौ । म अष्टावेते ततोऽप्यन्यौ द्वौ द्वौ पूर्वादिषु क्रमात् ॥ ६६ ॥ जाठरः कूटहिमवद्यात्रजारुधिशृङ्गिणः ।। एवं स्थितो विभागोऽत्र वर्षसिद्ध्यै निरूप्यते ॥ ६७ ॥ ‘दक्षिणत’ इति पूर्वाभिमुखस्य मेरोः । लक्षमिति, जम्बुद्वीपस्य तावत्परिमाण त्वात् । एवं सकलद्वीपायतत्वेऽपि एषां बहिर्यथायथं तद्वर्तुलतानुपाततो हेमकूट हिमवतोरायाममानह्रासः, विस्तरस्त्वेषामविशिष्ट एव । यदुक्तम् ‘लवणोदधिपर्यन्ता: सहस्रद्वयविस्तृताः (स्व० १०२०१) इति । ‘तावन्त’ इति लक्षादिमानाः । चतुस्त्रिंशत्सहस्रकाविति, नीलनिषधाभ्यां सीमन्तित्वेनैवंमानस्येलावृतस्य वक्ष्यमाणत्वात्, विस्तरतस्तु सहस्रम् । यदुक्तम् ‘पूर्वेण माल्यवान्मेरो: पर्वतस्तु विराजते ।। चतुस्त्रिंशत्सहस्राणि योजनानां सुरेश्वरि ।। नील, श्वेत और त्रिशृङ्ग उतने ही (परिमाण) वाले हैं । पूर्व में माल्यवान् पश्चिम में गन्धमादन नामक (पर्वत) है । ये दोनों ३४ हजार योजन तक दक्षिण और उत्तर की ओर फैले हुये हैं । ये आठ, इनके अतिरिक्त दो-दो (पर्वत) क्रमश: पूर्व आदि (दिशाओं) मे हैं । वे हैं-जाठर, हेमकूट, पारियात्र और जारुधी । इस प्रकार का विभाग वर्ष (= देश) की सिद्धि के लिए बताया जाता है । -६३-६७ ।। दक्षिण-पूर्वाभिमुख सुमेरु के । एक लाख-क्योंकि जम्बूद्वीप का उतना परिमाण है । इस प्रकार सम्पूर्ण द्वीप में फैलने पर भी बाहर क्रमश: उनकी गोलाई के अनुपात से हेमकूट और हिमवान् के विस्तार का परिमाण कम हो जाता है । शेष बातें इनमें समान हैं । जैसा कि कहा गया है नमक के समुद्र तक (ये पर्वत) दो हजार योजन विस्तार वाले है । (स्व० १०।२०१) उतने = एक लाख आदि मान वाले | चौंतीस हजार वाले-नील और निषध पर्वत के सीमावर्ती होने से इतने ही विस्तार वाले इलावृत के वक्ष्यमाण होने से । विस्तार-एक हजार (योजन) । जैसा कि कहा गया है हे सुरेश्वरि । मेरु के पूर्व में चौंतीस हजार योजन विस्तृत माल्यवान् पर्वत है ।अष्टममाह्निकम् X4 याम्योत्तरायतो भाति सहस्रं तस्य विस्तृतिः । तथैवापरदिग्भागे तत्तुल्यो गन्धमादनः ॥’ = (स्व० १०।२०४) इति । अत्र च नीलनिषधमाल्यवद्गन्धमादनाख्यानां चतुर्णा पर्वतानां चत्वारिंशत् सहस्राणि योजनानामुत्सेधोऽन्येषां तु दश–इति ज्ञेयम् । यदुक्तम् ‘नीलश्च निषधश्चैव माल्यवान् गन्धमादनः । चत्वारिंशत्सहस्राणि योजनानां समुच्छ्रितः ।।’ (स्व० १०।२०५) इति । तथा श्रीमृगेन्द्रोत्तरे ………..‘दशोत्सेधा नवान्तरा: ।’ इति । एवं दक्षिणोत्तरस्थैस्त्रिभिस्त्रिभिः, पूर्वपश्चात्स्थेन चैकैकेन-इत्यष्टभिः पर्वतैर्विभक्तो जम्बूद्वीपो नवधा जातः । ‘ततः’ इत्यष्टाभ्यः । ‘कूटो’ हेमकूटः । हिमवानर्थात् सकैलास: । ‘यात्रः’ पारियात्रः, स च अर्थानिषधयुक्तः । तदुक्तम् ‘जठरो हेमकूटश्च पूर्वभागे व्यवस्थितौ । कैलासो हिमवांश्चैव दक्षभागे व्यवस्थितौ ॥ निषध: पारियात्रश्च अपरेण महीधरौ । उसका विस्तार दक्षिण से उत्तर की ओर है । उसी प्रकार दूसरी (= पश्चिम) दिशा में उसी के समान गन्धमादन हे ।” (स्व० तं० १०।२०४) ___ इनमें से नील, निषध, माल्यवान् और गन्धमादन नामक चार पर्वतों की ऊँचाई चालीस हजार योजन है । अन्य की दश हजार-ऐसा जानना चाहिये । जैसा की कहा गया है ___“नील, निषध, माल्यवान् और गन्धमादन चालीस हजार योजन ऊँचे हैं ।” (स्व० तं० १०।२०५) तथा मृगेन्द्रतन्त्र में “शेष नव दशहजार योजन (ऊँचे) हैं।” इस प्रकार दक्षिण से उत्तर की ओर स्थित तीन-तीन और पूर्व से पश्चिम की ओर स्थित एक-एक के द्वारा-इस प्रकार आठ पर्वतों से विभक्त जम्बूद्वीप नव प्रकार का हो गया । इससे = आठ से । कूट = हेमकूट । हिमवान् = कैलाश के सहित । यात्र = पारियात्र । वह अर्थात् निषध युक्त है । वही कहा गया है __“जठर और हेमकूट पूर्वभाग में स्थित हैं । कैलाश और हिमवान् दक्षिण में व्यवस्थित है । निषध और पारिजात पर्वत पश्चिम में तथा जारुधि और शृङ्गवान् श्रीतन्त्रालोकः जारुधिः शृङ्गवांश्चैव उत्तरेण व्यवस्थितौ ।’ (स्व० १०।२०८) इति । एते च विष्कम्भपर्वता नियतदेशस्था:- इति नात्र विभागान्तरनिमित्तं विभागो नवखण्डात्मा ।। ६७ ।। तदेवाह समन्ताच्चक्रवाटाधोऽनर्केन्दु चतुरश्रकम् । सहस्रनवविस्तीर्णमिलाख्यं त्रिमुखायुषम् ॥ ६८ ॥ मेरोः पश्चिमतो गन्धमादो यस्तस्य पश्चिमे । केतुमालं कुलाद्रीणां सप्तकेन विभूषितम् ॥ ६९ ॥ मेरोः पूर्वं माल्यवान्यो भद्राश्वस्तस्य पूर्वतः। सहस्रदशकायुस्तत्सपञ्चकुलपर्वतम् ॥ ७० ॥ पूर्वपश्चिमतः सव्योत्तरतश्च क्रमादिमे । द्वात्रिंशच्च चतुस्त्रिंशत्सहस्राणि निरूपिते ॥ ७१ ॥ मेरोरुदक् शृङ्गवान्यस्तद्वहिः कुरुवर्षकम् । चापवन्नवसाहस्रमायुस्तत्र त्रयोदश ॥ ७२ ॥ कुरुवर्षस्योत्तरेऽथ वायव्येऽब्धौ क्रमाच्छराः । दश चेति सहस्राणि द्वीपौ चन्द्रोऽथ भद्रकः ॥ ७३ ॥ उत्तर में व्यवस्थित है। (स्वतं० १०।२०८) ये विष्कम्भपर्वत निश्चित देश में है इसकारण यहाँ विभागान्तर का निमित्तभूत नवखण्ड वाला विभाग नहीं है ॥ ६७ ॥ वही कहते हैं चक्रवाट के नीचे चारो ओर सर्य और चन्द्रमा (के प्रकाश) से रहित सब ओर समतल, नव हजार योजन विस्तृत तेरह हजार वर्ष की आयुवाला इला नामक खण्ड (= यूरोप) है । मेरु के पश्चिम में जो गन्धमादन पर्वत है उसके पश्चिम सात कुलपर्वतों से विभूषित केतुमाल ‘देश’ है । सुमेरु के पूर्व में जो माल्यवान् है और उसके पूर्व जो भद्राश्व (वर्ष) है वह पाँच कुल पर्वतों से युक्त दश हजार वर्ष की आयु वाला है । पूर्व से पश्चिम और दक्षिण से उत्तर क्रमश: ये दो (वर्ष) बत्तीस और चौंतीस हजार (वर्ष आय वाले) कहे गए हैं । मेरु के उत्तर जो शृङ्गवान् (नामक पर्वत) है उसके बाहर (= उत्तर) कुरु वर्ष है । यह धनुष के समान नव हजार योजन तक फैला हुआ है । इसकी (परिधि में रहने वालों की) आयु तेरह हजार वर्ष है। कुरुवर्ष के उत्तर और वायव्य कोण में समुद्र के बीच क्रमश: ५ एवं अष्टममाह्निकम् यौ श्वेतशृङ्गिणौ मेरोर्वामे मध्ये हिरण्मयम् । तयोर्नवकविस्तीर्णमायुश्चार्धत्रयोदश ॥ ७४ ॥ तत्र वै वामतः श्वेतनीलयो रम्यकोऽन्तरे। सहस्रनवविस्तीर्णमायुादश तानि च ॥ ७५ ॥ मेरोदक्षिणतो हेमनिषधौ यौ तदन्तरे । हर्याख्यं नवसाहस्रं तत्सहस्राधिकायुषम् ॥ ७६ ॥ तत्रैव दक्षिणे हेमहिमवद्वितयान्तरे । कैन्नरं नवसाहस्रं तत्सहस्राधिकायुषम् ॥ ७७ ॥ तत्रैव दक्षिणे मेरोहिमवान्यस्य दक्षिणे । भारतं नवसाहस्रं चापवत्कर्मभोगभूः ॥ ७८ ॥ ‘इलाख्यम्’ इति इलावृताख्यस्वाम्यधिष्ठितत्वात् इलावृताभिधानं वर्षम् इत्यर्थः । एतच्च पुरस्तादेव स्फुटीभविष्यति- इति नेहायस्तम् । एवं वर्षान्तरे ष्वपि तदभिधानप्रवृत्तौ निमित्तं ज्ञेयम् । तच्च समन्तान्मेरोश्चतुर्दिक्कं नवसहस्रं विस्तीर्णमिति । मध्ये मेरुमूलीयानि षोडशसहस्राण्याकलय्य चतुस्त्रिंशत्सहस्रम्, अत एव माल्यवद्गन्धमादनयोादियदेव मानमुक्तम्, अत एव सर्वतोदिक्क दश हजार (योजन तक फैले), चन्द्र और मद्रक दो द्वीप हैं । मेरु (पर्वत) के बायें जो श्वेत और शृङ्गवान् दो पर्वत हैं वे मध्य में हिरण्मय हैं । उनका विस्तार नव हजार योजन है । उन दोनों में रहने वालों की आयु बारह हजार पाँच सौ वर्ष है । वहाँ (= मेरु के) बायीं ओर श्वेत और नील के बीच में रम्यक है जो नव हजार योजन विस्तारवाला तथा बारह हजार वर्ष आयुयुक्त वासियों वाला है । मेरु के दक्षिण में जो हेम और निषध हैं उनके बीच में हरि नामक (वर्ष) है जो नव हजार (योजन) विस्तृत तथा दश हजार वर्ष की आयु वालों का देश है । उसी के दक्षिण में हेम और हिमवान् दोनों के बीच में किन्नरों का वर्ष (= देश) है । जो नव हजार (योजन विस्तृत) तथा दश हजार वर्ष की आयुवालों (का स्थान) है वही पर मेरु के दक्षिण हिमवान् है । जिसके दक्षिण में नव हजार योजन विस्तृत, चाप के समान कर्मभोग भूमि भारतवर्ष है ।। ६८-७८ ।। इलाख्य = इलावृतनामक स्वामी से अधिष्ठित होने के कारण इलावृत नाम देश । यह आगे स्पष्ट हो जाएगा इस कारण यहाँ विस्तृत विवेचन नहीं हुआ । इसी प्रकार दूसरे वर्षों के विषय में भी उनके नाम की प्रवृत्ति में निमित्त जानना चाहिए अर्थात् उन देशों के नाम उनके स्वमियों के नाम की पीछे रखे गये हैं। और वह मेरु के चारो ओर चारो दिशाओं में नव हजार योजन विस्तृत है । मध्य में मेरु के मूलवाले सोलह हजार को जोड़कर चौंतीस हजार । इसीलिए माल्यवान् और गन्धमादन के विस्तार से इतना ही मान कहा गया । इसीलिए चारों दिशा में ४ त.तृ. श्रीतन्त्रालोकः साम्याच्चतुरश्रं न तु वर्षान्तरवदायतचतुरश्रम् । अनर्केन्दुत्वे चक्रवाटाधोवर्तित्वं हेतु: । ‘त्रिमुखायुषम्’ इति सहस्रशब्दसंनिधेस्त्रयोदशसहस्रायुरित्यर्थः । यदुक्तम् ‘मेरोः समन्ततो रम्यमिलावृतमुदाहृतम् । अधस्ताच्चक्रवाटस्य नवसाहस्रविस्तृतम् ॥ योजनानां चतुर्दिक्षु चतुरश्रं समन्ततः । नातपो भानुजस्तत्र न च सोमस्य रश्मयः ।। प्रभवन्ति हि लोकानां मेरो सा प्रभासितम् ।’ (स्व० १०।२११) इति । ‘त्रयोदशाब्दसाहस्रमायुस्तेषां प्रकीर्तितम् ।’ (स्व० १०।२१३) इति च । पश्चिमत इति, न तु दक्षिणतोऽवस्थितो विष्कम्भपर्वतः । सप्तेनति, यदुक्तम्– ‘जयन्तो वर्धमानश्च अशोको हरिपर्वतः । विशाल: कम्बल: कृष्णस्तत्र सप्त कलाद्रयः ।।’ (स्व० १०॥२१८) इति । सहस्रदशकायुरिति, केतुमालशेषतयापि व्याख्येयम् । उक्तं हि समान होने से इसे चतुरश्र कहा गया है न कि दूसरे वर्षों के समान आयताकार चतुरश्र है । सूर्य चन्द्र से रहित होने में चक्रवाट के नीचे होना कारण है । ‘त्रिमुखयुष वाला-सहस्रशब्द के पार्श्ववर्ती होने से तेरह हजार वर्ष की आयु वाला-अर्थ है । जैसा कि कहा गया है “मेरु के चारो ओर रम्य इलावृत कहा गया है। यह चक्रवाट के नीचे नव हजार योजन विस्तृत है । चारो दिशाओं में सब ओर से समतल है । वहाँ सर्य का ताप और चन्द्र की किरणें लोगों के लिये नहीं है । वह मेरु के प्रकाश से प्रकाशित है ।” (स्वतं० १०।२११) “उनकी (= उसमें रहने वाले लोगों) आयु तेरह हजार वर्ष कही गयी है ।” (स्व० तं० १०२१३) पश्चिम की ओर, न कि विष्कम्भ पर्वत दक्षिण की ओर स्थित है । सात से जैसा कि कहा गया है “जयन्त, वर्धमान, अशोक, हरिपर्वत, विशाल, कम्बल और कृष्ण ये सात कुलपर्वत है ।” (स्व० तं० १०।२१८) ____दशहजार आयु, केतुमाल के शेष के रूप में व्याख्या करनी चाहिए । कहा गया है अष्टममाह्निकम् ….जीवन्त्ययुतमेव च ।’ इति । सपञ्चकुलपर्वतमिति, यदुक्तम् ‘कौरञ्जः श्वेतपर्णश्च नीलो मालाग्रकस्तथा । पद्मश्चैव समाख्यातास्तत्र पञ्च कुलाद्रयः ।। (स्व० १०।२२०) इति । ‘इमे’ इति केतुमालभद्राश्वाख्ये वर्षे । ‘क्रमात्’ इति यथासंख्येन । तेन पूर्वपश्चिमतो भद्राश्वकेतुमाले द्वात्रिंशद्वात्रिंशत्सहस्राणि, माल्यवान् गन्धमादन श्चैकमेकं सहस्रम्, उभयपार्वाभ्यामिलावृतमष्टादश, मेरुः षोडश–इत्येवं पूर्वा परायतजम्बुद्वीपं योजनानां लक्षम्, सव्योत्तरतश्च चतुस्त्रिंशत्, इत्येतदिलावृतमान निरूपणादेव गतार्थम् । शृङ्गवाँस्तृतीयः पर्वतः, ‘तद्वहिः’ तस्यापि उदगित्यर्थः । ‘चापवत्’ इति वलयाकारम्, क्षाराब्धिसामीप्यात् । यदुक्तम् ‘नवयोजनसाहस्रं धन्वाकारं प्रकीर्तितम् ।’ (स्व० १०।२२५)इति । आयाममानावचने चात्रायमाशयो यत् शृङ्गवन्माननिरूपणादेव गतार्थमेतत इति । एवमत्तरत्रापि ज्ञेयम । त्रयोदशेति, अर्थात सहस्राणि । यदक्तम - ……..(वहाँ रहने वाले) दश हजार वर्ष तक जीवित रहते हैं ।” पाँच कुलपर्वतों के सहित । जैसा कि कहा गया है “कौरञ्ज, श्वेतपर्ण, नील, मालाग्रक और पद्म ये पाँच कुलपर्वत कहे गए है।” (स्व० सं० १०।२२०) ये = केतुमाल और भद्राश्व नामक वर्ष । क्रमात् = क्रमश: । इस प्रकार पूर्व से से पश्चिम की ओर भद्राश्व और केतुमाल, बत्तीस-बत्तीस हजार (योजन), माल्यवान् और गन्धमादन एक-एक हजार, इस प्रकार दोनों पार्यों को मिलाने पर इलावत अठारह और मेरु षोडश-इस प्रकार पूर्व और पश्चिम की ओर फैला हुआ जम्बूद्वीप एक लाख योजन और दक्षिण से उत्तर चौतीस हजार योजन-यह इलावृत के परिमाण के निरूपण से ही गतार्थ हो गया । शृङ्गवान् तीसरा पर्वत है । उसके बाहर = उसके भी उत्तर । चापवत् = गोलाकार क्योंकि दुग्ध का समुद्र पास में है इस कारण । जैसा कि कहा गया नव हजार योजन, धनुष के आकार का, कहा गया है । (स्व० १०।२२५) विस्तार और परिमाण का कथन न करने में यह तात्पर्य है कि शृङ्गवान् के मान के निरूपण से ही यह (= इसका विस्तार और परिमाण) गतार्थ हो गया । इसी प्रकार आगे भी जानना चाहिए। तेरह अर्थात् तेरह हजार है जैसा कि कहा गया है श्रीतन्त्रालोकः ‘त्रिदशाब्दसहस्रायुः कुरुवृक्षफलाशनः । युग्मप्रसूतिः कुरुषु श्यामापुष्पद्युतिर्जनः ।।’ इति । ‘अब्धौ’ इति अब्धिमध्ये । तदुक्तम् ‘तस्य चोत्तरदिग्भागे प्रविश्य लवणोदधिम् । योजनानां सहस्राणि चत्वार्येव वरानने ।। एकाधिकानि विस्तीर्णं चन्द्रद्वीपं प्रकीर्तितम् । दशयोजनसाहस्रं द्वीपं भद्रं प्रकीर्तितम् ।।’ (स्व० २०।२२९) इति । ‘तयोः’ इति मेरुवामार्धस्थितयोः श्वेतशृङ्गिणोः । तेन शृङ्गवतो दक्षिणे, श्वेतस्य वामे,—इत्यर्थसिद्धम् । ‘अर्धत्रयोदश’ इति–अर्धेन त्रयोदश द्वादश- । सहस्राणि सार्धाणीति यावत् । यदुक्तम् ‘अध्यर्धानि सहस्राणि द्वादशायुर्हिरण्मये ।’ इति । ‘अन्तरे’ इत्यर्थात् श्वेतस्य दक्षिणे, नीलस्य तु वामे । तानीति, सहस्राणि । ‘तदन्तरे’ इत्यर्थात् निषधस्य दक्षिणे, हेमकूटस्य वामे । तदुक्तम् ‘हेमकूटस्य सौम्येन निषधस्य च दक्षिणे। हरिवर्ष समाख्यातं ……………………. ।। (स्व० १०।२३६) “कुरु देश में लोग तीस हजार वर्ष की आयु वाले कुरुवृक्ष के फल को खाने वाले दो सन्तान उत्पन्न करने वाले श्यामापुष्प के समान कान्ति वाले हैं।” समुद्र में = समुद्र के मध्य में । वही कहा गया है हे वरानने । “उसके उत्तर दिशा में नमक के सागर में प्रवेश करके चार हजार एक योजन विस्तीर्ण चन्द्रद्वीप कहा गया है । दश हजार योजन भद्रद्वीप कहा गया है ।” (स्व० तं० २०१२२९) ___उन दोनों के = मेरु के वामार्द्ध में स्थित श्वेत और शृङ्गवान् पर्वतों के । इसलिए शृङ्गवान् के दक्षिण और श्वेत के बायीं ओर, यह अर्थात् सिद्ध हो रहा है। अर्धत्रयोदश = आधा के साथ तेरह अर्थात् बारह हजार और पाँच सौ । जैसा कि कहा गया है “हिरण्मय में बारह हजार पाँच सौ । (वर्ष की आयु वाले लोग रहते हैं।” बीच में— श्वेत के दायें और नील के बायें । वे = सहस्र । उसके बीच में अर्थात् निषध के दायें और हेमकूट के बायें । वही कहा गया “हेमकूट के बायें और निषध के दायें हरिवर्ष कहा गया है ।” (स्व० तं० १०।२३६) बारह अर्थात् बारह हजार । कैनर = किंपुरुष नाम वाला । जैसा कि कहा अष्टममाह्निकम् इति । द्वादशेति, सहस्राणि । ‘कैन्नरम्’ इति किंपुरुषसंज्ञम् । यदुक्तम् ‘हेमकूटस्य याम्येन हिमवतश्चतथोत्तरे । वर्ष किंपुरुषं नाम……………………… ॥’ (स्व०१०।२३८) इति । ‘तत्सहस्राधिकायुषम्’ इति तेभ्यो नवसहस्रेभ्यः सहस्रेणाधिकमायुर्यत्र तद्दशसहस्रायु:-इत्यर्थः । अस्य ‘दक्षिणे’ इत्यर्थात् क्षाराब्धेरुत्तरे । तदुक्तम् ‘याम्ये हिमाचलेन्द्रस्य उत्तरे लवणोदधेः । भारतं नाम वर्ष तु तत्र चाल्पं सुखं स्मृतम्’ ।।। (स्व० १०।२४०) इति । अत एव लवणोदधेर्वलयाकारत्वात् चापवदित्युक्तम् । अस्य च वर्षान्तर वद्भोगभूमित्वेऽपि कर्मभूमित्वमपि अस्ति–इत्याह- ‘कर्मभूः’ इति । यदुक्तम् ‘गुणस्त्वेकः स्थितस्तत्र शुभाशुभफलार्जनम् ।’ (स्व० १०।२४६) इति ॥ ७८ ॥ वर्षान्तराणां हि भोगभूमित्वमेवास्ति, न तु कर्मभूमित्वमपि–इत्याह इलावृतं केतुभद्रं कुरुहरण्यरम्यकम् । हरिकिन्नरवर्षे च भोगभून तु कर्मभूः ॥ ७९ ॥ गया “हेमकूट के दक्षिण और हिमवान् के उत्तर किंपुरुष नाम का देश है ।” (स्व० तं० १०।२३८) उनकी अपेक्षा एक हजार अधिक आयुवाला = उन नव हजार से एक हजार अधिक आयु है जहाँ अर्थात् दश हजार वर्ष की आयुवाला । इसके दक्षिण अर्थात् क्षीरसागर के उत्तर । वही कहा गया “हिमाचल के दक्षिण और लवणोदधि के उत्तर भारत नाम का वर्ष (= खण्ड) है जहाँ थोड़ा सुख कहा गया है । (स्व० तं० १०।२४०) इसीलिए क्षीरसागर के वलयाकार होने से धनुष के समान कहा गया है । दूसरे देशों के समान भोगभूमि होते हुये भी यह कर्मभूमि भी है । इसलिए कहा कर्मभूमि । जैसा कि कहा गया ___“वहाँ एक ही गुण है-शुभ और अशुभ फलों की प्राप्ति” ॥ ७८ ॥ (स्व० तं० १०।२४६) दूसरे देश भोगभूमि ही है कर्मभूमि नहीं- यह कहते है “इलावृत, केतुभद्र, कुरु, हिरण्य, रम्यक, हरिवर्ष और किन्नरवर्ष ये देश भोगभूमि हैं न कि कर्मभूमि ।। ७९ ।। श्रीतन्त्रालोकः ननु क्वचिद्भोगभूमावपि कर्मभूमित्वं संभवेत् यदुक्तं प्राक् ‘ते त् तत्रापि देवेशं भक्तया चेत्पर्युपासते। तदीशतत्त्वे लीयन्ते क्रमाच्च परमे शिवे ।। अन्यथा ये तु वर्तन्ते तद्भोगनिरतात्मकाः। ते कालवह्निसन्तापदीनाक्रन्दपरायणाः ॥ गुणतत्त्वे निलीयन्ते ततः सृष्टिमुखे पुनः । पात्यन्ते मातृभि|रयातनौघपुरस्सरम् ॥ ७९ ॥’ इति, तत् कथमेतदुक्तं यद्भारतात् अन्यद्भोगभूरेव ?–इत्याशङ्कयाह अत्र बाहुल्यतः कर्मभूभावोऽत्राप्यकर्मणाम् । पशूनां कर्मसंस्कारः स्यात्तादृग्दृढसंस्कृतेः ॥ ८० ॥ ‘कर्मभूभावः’ कर्मभूमित्वम्-इत्यर्थः । नन्वत्र भूम्नापि कर्मभूमित्वं नास्ति, यत् तिर्यगादयः प्राक्कोपभोगमेव अत्र विदधति न त्वभिनवकर्मार्जनमपि? - इत्याशङ्कयाह-‘अत्रापि’ इति, अपिभिन्नक्रमः । तेनाकर्मणामपीति योज्यम् । अकर्मत्वं चैषामन्यवत्प्रतीतिवृत्तेनायोग्यत्वात् वस्तुवृत्तेन पुनस्तत्तद्वासनादाढादस्त्येव एषां कर्मसंस्कारः, तदेषामपि तत्कार्यं शुभाशुभं भवेदेव-इति भावः ।। ८० ॥ प्रश्न-कहीं भोगभूमि भी कर्मभूमि हो सकती है जैसा कि पहले कहा “वे लोग यदि वहाँ भी भक्ति के साथ देवेश की उपासना करते हैं तो (वे) ईशतत्त्व में और क्रमशः परमशिव में लीन होते हैं । जो लोग भोग में लगे हये दूसरी तरह से व्यवहार करते हैं वे कालवह्नि के संताप के कारण दीन आक्रन्द में लगे हुए गुणतत्त्व में लीन होते हैं फिर माताओं के द्वारा घोरयातनासमूह के साथ सृष्टि के मुख में डाल दिये जाते हैं” ॥ ७९ ॥ तो यह कैसे कहा गया कि भारत से भिन्न (भूमि) भोगभूमि ही है? यह शङ्का कर कहते हैं ___यह अधिकतया कर्मभूमि है। क्योंकि यहाँ कर्मरहित पशुओं का उस प्रकार का दृढसंस्कार होने के कारण कर्मसंस्कार रहता है ।। ८० ॥ कर्मभूभाव = कर्मभूमित्व । प्रश्न यह अधिकांश में कर्मभूमि नहीं है क्योंकि पक्षी आदि यहाँ पूर्वजन्म के कर्मों का उपभोग ही करते हैं न कि नूतन कर्मों का अर्जन भी ? यह शङ्का कर कहते हैं—‘यहाँ भी’ इसमें ‘भी’ शब्द का क्रम भिन्न है । इसलिए कर्मरहित का भी-ऐसी योजना (= अन्वय) करनी चाहिए । इनकी अकर्मता अन्य (= मनुष्य आदि) के समान प्रतीति के अयोग्य होने के कारण है। वस्तुतस्तु भिन्न-भिन्न वासना की दृढ़ता के कारण इनका कर्मसंस्कार तो रहता ही अष्टममाह्निकम् केषामपि कर्म न स्यादन्यत्र च स्यात्-इत्याशङ्कयाह संभवन्त्यप्यसंस्कारा भारतेऽन्यत्र चापि हि। दृढप्राक्तनसंस्कारादीशेच्छातः शुभाशुभम् ॥ ८१ ॥ स्थानान्तरेऽपि कर्मास्ति दृष्टं तच्च पुरातने। तत्र त्रेता सदा कालो भारते तु चतुर्युगम् ॥ ८२ ॥ ‘असंस्काराः’ इति कर्मणः संन्यस्तत्वात् । ‘अन्यत्र स्थानान्तरे’ इति स्वर्गादिस्थानमध्ये इत्यर्थः । एकोऽपिशब्दो भिन्नक्रमः, तेन शुभाशुभमपाति योज्यम् । नन्वत्र किं प्रमाणम् ?–इत्याशङ्कयोक्तम्-‘दृष्टं तच्च पुरातने’ इति । ‘पुरातने’ इति भारतरामायणाद्यात्मनि पुराणादौ । तत्र हि जनकस्य भारतवर्षेऽपि अकर्मित्वम्, नहुषस्य स्वर्गेऽपि अशुभकर्मयोगित्वमुक्तम्; अतश्च युक्तमुक्तम् यद्धारते भूम्ना कर्मभूमित्वमन्यत्र च भोगभूमित्वमिति । तत्रेति, इलावृतादौ । तदुक्तम् ‘नाष्टासु विद्यते काचिद्युगत्रयवती स्थितिः । चतुर्युगवती ज्ञेया भारताख्ये वरानने।’ (स्व० १०।२४७) इति ।। ८२ ।। है। इसलिए इनका भी वह कार्य शुभाशुभ होता ही है ।। ८० ॥ प्रश्न- इस प्रकार की यहाँ कर्मभूमिता और अन्यत्र भोगभूमिता नहीं सिद्ध होती जिससे कि यहाँ किसी का भी कर्म (-कर्तृत्व) नहीं है और अन्यत्र है? यह शङ्का कर कहते हैं भारत में और अन्यत्र भी संस्कारों का अभाव सम्भव है । दृढ प्राक्तन संस्कार के कारण भगवदिच्छा से शुभाशुभ (फल) भी होते हैं । दूसरे स्थानों में भी कर्म होते हैं और वह पुराणों में देखा भी गया है । वहाँ सदैव त्रेताकाल रहता है भारत में चारो युग होते हैं ॥ ८१-८२ ॥ संस्कारों का अभाव-कर्म के संन्यास के कारण । दूसरे स्थानों में = स्वर्ग आदि स्थानों में । (श्लोक में) ‘अपि’ शब्द भिन्न क्रम वाला है । इसलिए शुभ और अशुभ भी-ऐसा जोड़ना चाहिए । प्रश्न—इस विषय में क्या प्रमाण है ? यह शङ्का कर कहा गया और उसे पुराणों में देखा गया है । पुराणों में— महाभारत रामायण आदि पुराणों में । वहाँ = भारतवर्ष में भी जनक की अकर्मता और नहुष की स्वर्ग में भी अशुभकर्मयुक्तता (देखी गयी है) । इसलिए ठीक कहा गया कि भारत अधिकांशत: कर्मभूमि है और अन्यदेश भोगभूमि ही । वहाँ = इलावृत आदि में । वही कहा गया है “आठ (द्वीपों) में तीनों (द्वापर, सतयुग, कलियुग) युगों की कोई स्थिति नही है । हे वरानने ! भारत में चारों युगों वाली (स्थिति) है ॥ ८२ ॥ (स्व० श्रीतन्त्रालोकः BHENRERNATABAILEPRASARAMETERINEERENRELENTERNETHIBHEERA भारतमपि वर्ष जम्बुद्वीपवन्नवखण्डमेव,—इत्याह भारते नवखण्डं च सामुद्रेणाम्भसात्र च। स्थलं पञ्चशती तद्वज्जलं चेति विभज्यते॥ ८३ ॥ सामुद्रेणाम्भसेति, अर्थादष्टधा प्रसृतेन, तथात्वेनैव नवधात्वस्य संपत्तेः । यथा हि जम्बुद्वीपः पर्वतैरष्टभिर्विभक्तो नवधा जातः, तथैतदपि समुद्रैः, किंतु एते पूर्वापरायता एव सर्वे इति । तदुक्तम् ‘नव भेदा: स्मृतास्तत्र सागरान्तरिता: प्रिये । एकैकस्य तु द्वीपस्य सहस्रं परिकीर्तितम् ।। शतानि पञ्च विज्ञेयं स्थलं पञ्च जलं तथा । यत्तु श्रीमृगेन्द्रे ‘नवाब्धिस्रोतसि द्वीपा नवैवात्रार्धकस्थले।’ इत्याद्युक्तं तत् क्षराब्ध्यपेक्षया, अन्यथात्र दशाब्धिस्रोतांसि स्युः । अतश्च सर्वेषां द्वीपानां पार्श्वद्वयेऽपि सामुद्रमम्भः कन्याख्यस्य तु दक्षिण एव, वारुणेनैव पञ्चशतिकेन समुद्रेणास्य विभक्तत्वात् । तेनास्य वामतो हिमवानेव न तु १०।२४७) भारतवर्ष भी जम्बूद्वीप के समान नव खण्डों वाला है-यह कहते हैं समुद्र के जल को जोड़कर भारत में नवखण्ड हैं । (एक-एक खण्ड में) पाँच सौ योजन स्थल और उतना ही जल-ऐसा विभाग किया जाता है ।। ८३ ।। समुद्रीजल के साथ अर्थात् आठभागों में विभक्त । क्योंकि इसी रीति से नव खण्ड होते हैं । जैसे कि जम्बूद्वीप आठ पर्वतों से विभक्त होकर नव खण्डों का हुआ उसी प्रकार यह भारतवर्ष भी समुद्रों से (नव भागों में विभक्त हुआ) । किन्तु ये सब (समुद्र) पूर्व से पश्चिम की ओर फैले हुये हैं । वही कहा गया है “हे प्रिये ! समुद्र को लेकर नव भेद माने गए हैं । एक-एक द्वीप का एक हजार (योजन परिमाण) कहा गया है । (उसमें) पाँच सौ योजन स्थल और पाँच सौ योजन जल है ।” (स्व० तं० १०।२५१) जो कि मृगेन्द्र तन्त्र में “नव सामुद्रिक स्रोत तथा नव ही स्थल भाग यहाँ है ।” इत्यादि कहा गया वह क्षीरसागर की अपेक्षा से कहा गया । अन्यथा यही दश समुद्र स्रोत हो जाएंगे । इसलिए सभी द्वीपों के दोनों ओर समुद्र का जल है । कन्याकुमारी (= नामक स्थान जम्बू) द्वीप के दक्षिण में ही है । क्योंकि पश्चिम केअष्टममाह्निकम् समुद्रान्तरे, तथात्वे हि समुद्रान्तरितत्वात् द्वीपान्तरवत् तन्निवासिनामपि हिमवान गम्य: स्यात्: अतश्च हिमवत्संनिकर्षेणैव एतन्मितमिति सिद्धम् । तदुक्तं तत्र ‘द्वीपं कुमारिकाख्यं तु हिमवन्निकटे मतम्।’ इति । एवं चास्य सहस्रमपि योजनानां स्थलैकरूपत्वमेव, — इत्यर्थलभ्यम् । अत एवास्य श्रीतन्त्रराजभट्टारकादौ हिमवत्सकाशात् सीमान्तविभागं दर्शयित तत्पादावस्थिताद्विन्दुसरोनाम्नः सरोविशेषादारभ्य सहस्रयोजनपरिमाणत्वेन निर्देश: कृतः । तदुक्तं तत्र ‘प्रालेयरोधसो याम्ये सौम्ये वै वीचिमालिनः । कार्मुकाकारसंस्थानं वर्ष तत्कुरुमानगम् ।।’ इत्युपक्रम्य ‘शीतसानोः समाश्लिष्टं नाम्ना बिन्दुसर: सरः । तदारभ्य खण्डमेकं सर्वतः सज्जनाकुलम्।। वारिलुप्तं न यन्मानं दुहित्रे तद्ददौ भुवः । कुमार्य भरतो राजा सपत्नेन्दुनभोग्रहः ।। द्वीपं कुमारिकासंज्ञमतो ह्येतत्प्रगीयते । पाँच सौ (योजन विस्तृत समुद्र) से यह विभक्त है । इसलिए इसके बायें हिमालय ही है न कि समुद्र के बीच में क्योंकि वैसा होने पर दो समुद्रों के बीच में होने के कारण दूसरे द्वीपों की भाँति इसमें रहने वालों के लिए भी हिमालय अगम्य हो जाता । इसलिए हिमालय के सन्निकर्ष से ही यह मापा गया है । वही वहाँ कहा गया “कुमारिका नामक द्वीप हिमालय के निकट माना गया है ।” इस प्रकार यह एक हजार योजन तक स्थल ही है । इसीलिए तन्त्रराजभट्टारक आदि में हिमालय से इसका विभाग बतलाने के लिए उसके मूल में स्थित बिन्दुसर नामक विशिष्ट तालाब से प्रारम्भ कर एक हजार योजन परिमाण का निर्देश किया गया है । वही वहाँ कहा गया है “प्रालेय रोधस् के दक्षिण और वीचिमाली के बायें धनुषाकार संस्थान वाला जो देश है. वह कुरुदेश के परिमाण वाला है ।” इस प्रकार प्रारम्भ कर हिमशृङ्ग से सटा हुआ बिन्दुसर नाम का एक तालाब है वहाँ से लेकर एक खण्ड जो सब ओर से सज्जनों से भरा हुआ है, और जिसका मान वारिलुप्त (= जल में डुबा) नहीं है उसे सपत्नेन्दुनभोग्रह (= चन्द्रमा आकाश और ग्रहों को वश) में रखने वाले पृथ्वी के राजा भरत ने अपनी पुत्री कुमारी कन्या को दान में दे श्रीतन्त्रालोकः योजनानां सहस्रं तु नानावर्णाश्रमान्वितम् ।।’ इति । श्रीस्वच्छन्देऽपि ‘बिन्दुसर: प्रभृत्येव कुमार्याडं प्रकीर्तितम् । योजनानां सहस्रं तु नानावर्णाश्रमान्वितम् ।।’ (स्व० १०।२५४) इति ।। ८३ ॥ एषां च नवानामपि खण्डानां नामविभागमाह इन्द्रः कशेरुस्ताम्राभो नागीयः प्राग्गभस्तिमान् । सौम्यगान्धर्ववाराहाः कन्याख्यं चासमुद्रतः ॥ ८४ ॥ ‘आसमुद्रतः’ इति समुद्रादारभ्य, तेन क्षाराब्धिनिकटे इन्द्रद्वीपं यावत्पर्यन्ते हिमवन्निकटे कन्याद्वीपम् । ‘ताम्राभः’ इति ताम्रवर्णः । प्रागिति, गभस्तिमान आदौ पश्चान्नागीय: । ‘वाराहो:’ वारुणः । तदुक्तम् ‘इन्द्रद्वीपं कशेरुं च ताम्रवर्णं गभस्तिमत् । नागद्वीपं च सौम्यं च गान्धर्व वारुणं तथा ।। द्वीपं कुमारिकाख्यं च नवमं परिकीर्तितम् ।’ (स्व० १०२५३) इति ॥ ८४ । कन्याद्वीपे च नवमे दक्षिणेनाब्धिमध्यगाः। उपद्वीपाः षट् कुलाद्रिसप्तकेन विभूषिते ॥ ८५ ॥ दिया । इसलिए यह द्वीप कुमारिका नाम वाला कहा जाता है । नाना वर्ण-आश्रमों से युक्त (यह द्वीप) एक हजार योजन तक फैला है ।” स्वच्छन्दतन्त्र में भी “बिन्दुसर से लेकर एक हजार योजन तक विस्तृत अनेक वर्ण और आश्रमों से युक्त कुमारी नामक द्वीप कहा गया है । (स्व० तं० १०।२५४) ।। ८३ ॥ इन नव खण्डों का नाम विभाग कहते हैं समुद्र से लेकर इन्द्र, कशेरु, ताम्राभ, नागीय, गभस्तिमान्, सौम्य, गान्धर्व, वाराह और कन्या (द्वीप हैं) ।। ८४ ।। ___आसमुद्रतः = समुद्र से प्रारम्भ कर । इससे क्षारसमुद्र के निकट इन्द्रद्वीप है और अन्त में हिमालय के निकट कन्याद्वीप । ताम्राभ = ताँबे के रङ्ग का । प्राक का अर्थ है कि पहले गभस्तिमान् बाद में नागीय । वाराह = वारुण । वही कहा गया है “इन्द्रद्वीप, कशेरु, ताम्रवर्ण, गभस्तिमान्, नागद्वीप, सौम्य, गान्धर्व वारुण और नवम कुमारिका द्वीप कहा गया है । (स्व० १०।२५३) ।। ८४ ॥ अष्टममाह्निकम् अङ्गयवमलयशङ्कुः कुमुदवराहौ च मलयगोऽगस्त्यः । तत्रैव च त्रिकूटे लङ्का षडमी ह्युपद्वीपाः ॥ ८६ ॥ दक्षिणेनाब्धिमध्यगा इति, वारुणोदधेर्मध्यस्था—इत्यर्थः । तदुक्तम् ‘क्मार्याख्यस्य निकटे मध्यस्था वारुणोदधेः । अतीत्य योजनशतमनुद्वीपाश्च षट् स्मृताः ।। अङ्गद्वीपो यवद्वीपो मलयद्वीप एव च । द्वीपोऽन्यः शकुसंज्ञश्च कुमुदश्च ततोऽन्यतः ॥ वराहश्चैव षष्ठः स्यात्……………………….।’ इति। कुलाद्रिसप्तकेनेति, यदुक्तम् ‘महेन्द्रो मलय: सह्यः शुक्तिमानृक्षपर्वतः । विन्ध्यश्च पारियात्रश्च भान्त्येते कुलपवर्ताः ।।’ (स्व० १०।२५७) इति । मलयगोऽगस्त्य इति, तदुक्तम् ‘कथितो मलयद्वीपे मलयो नाम पर्वतः । तस्य पादे त्रिकूटो वै लङ्का तस्योपरि स्थिता ।।’ (स्व० १०।२५९) इति । ‘अगस्त्यशिखरं तत्र मलये भूधरोत्तमे । सात कुलपर्वतों के द्वारा विभूषित नवें कन्याद्वीप में दक्षिण की ओर समुद्र के बीच वर्तमान छ उपद्वीप हैं- अङ्ग, यव, मलय, शकु, कुमुद और वराह । अगस्त्य मलय में रहते हैं वहीं पर त्रिकुट पर्वत पर लङ्का है । ये छ उपद्वीप है ॥ ८५-८६ ॥ दक्षिण की ओर समुद्र के बीच = पश्चिम समुद्र के बीच । वही कहा गया “कुमारी नामक द्वीप के निकट सौ योजन पार कर पश्चिम उदधि के बीच में छ द्वीप स्थित माने गए हैं । अङ्गद्वीप, यवद्वीप, मलयद्वीप, शकु, कुमुद और उसके अतिरिक्त छठाँ बराह ।’ सात कुलाद्रि से-जैसा कि कहा गया है “महेन्द्र, मलय, सह्य, शुक्तिमान्, ऋक्ष, विन्ध्य और पारियात्र-ये कुलपर्वत हैं ।” (स्व० तं० १०।२५७) मलय में वर्तमान अगस्त्य । वही कहा गया है “मलय द्वीप में मलय नाम का पर्वत कहा गया है । उसके पाद में त्रिकूट है और उसके ऊपर लङ्का स्थित है ।” (स्व० तं० १०१२५९) श्रीतन्त्रालोकः तत्राश्रमो महापुण्य आगस्त्यः स्फटिकप्रभः ॥’ (स्व० १०।२६२) इति च ।। ८६ ॥ अत्र च कीदृग्लोक:?— इत्याशङ्ख्याह द्वीपोपद्वीपगाः प्रायो म्लेच्छा नानाविधा जनाः । मुक्ताः काञ्चनरत्नाढ्या इति श्रीरुरुशासने ॥ ८७ ॥ ‘म्लेच्छा’ इति वर्णाश्रमाचारबहिष्कृता:-इत्यर्थः । प्रायःशब्देन च क्वचित्सदाचारा अपि संभवन्ति, इत्युक्तम । नन्वत्र किं प्रमाणम? इत्याशङ्कयोक्तम्-‘इति श्रीरुरुशासने’ इति । तदुक्तं तत्र युक्ता वर्णाश्रमाचारैः कुमार्याख्ये परं प्रजाः । इतरे म्लेच्छभूयिष्ठाः प्रभूतमणिकाञ्चनाः ।।’ इति ॥ ८७ ।। नन्वेवमत्र शुभाशुभार्जनेन कोऽर्थः? –इत्याशङ्ख्याह भारते यत्कृतं कर्म क्षपितं वाप्यवीचितः। शिवान्तं तेन मुक्तिर्वा कन्याख्ये तु विशेषतः ॥ ८८ ॥ “उस पर्वतोत्तम मलय के ऊपर अगस्त्य शिखर है । वहाँ पर स्फटिक के समान कान्ति वाला महापुण्य अगस्त्य का आश्रम है ॥ ८५-८६ ॥ (स्वतं० १०।२४२) यहाँ के लोग कैसे हैं?—यह शङ्का कर कहते हैं एक द्वीप से दूसरे उपद्वीप में जाने वाले, अनेक प्रकार के प्रायः म्लेच्छ लोग मोती सुवर्ण और अन्यरत्नों से सम्पन्न हैं—ऐसा रुरुशास्त्र में (कहा गया है) ।। ८७ ॥ म्लेच्छ = वर्ण और आश्रम के आचार से बहिष्कृत । प्रायः शब्द का तात्पर्य है कि कहीं-कहीं सदाचारी लोग भी होते हैं । प्रश्न-इसमें क्या प्रमाण है-यह शङ्का कर कहा गया- रुरुशास्त्र में । वही वहाँ कहा गया है “कुमारी नामक (वर्ष) में प्रजायें वर्ण और आश्रम के आचार से युक्त हैं । दूसरे (वर्ष) में प्रजाओं में म्लेच्छ अधिक है (और वे) प्रचुर मणि और काञ्चन वाले हैं ॥ ८७ ।।” प्रश्न-इस प्रकार यहाँ शुभाशुभ के अर्जन से क्या तात्पर्य है ?-यह शङ्का कर कहते हैं भारतवर्ष में जो कर्म किया गया था । क्षीण किये गये उस (= कर्म) से अवीचि से लेकर शिवतत्त्व पर्यन्त मुक्ति होती है । कन्यावर्ष में विशेष रूप से ।। ८८ ।। अष्टममाह्निकम् ‘कर्म’ इति शुभाशुभम् । क्षपितमिति, क्रियाज्ञानादिना । तेनात्र कर्मणा कृतेन क्षपितेन वा पृथिव्यादिषु शिवान्तेषु तेषु तेषु तत्त्वेषु भुक्तिस्ततो वा मुक्ति भवेत्-इत्यर्थः । यदुक्तम् ‘तत्रैव यत्कृतं कर्म शुभं वा यदि वऽशुभम्। वसन्ति तेन लोकाश्च शिवाद्यावीचिमध्यगाः ।। (स्व० १०।२४८) इति । तथा, ‘कन्याख्ये यत्कृतं कर्म जन्तुभिस्तु सितासितम् ।। स्वारकापवर्गेषु तद्बीजं फलभोगदम् ।। इति ८८ ।। नन्वेतत् कन्याद्वीपे विशेषेण भवेत्,–इत्यत्र किं निमित्तम्? - इत्याशङ्कयाह महाकालादिका रुद्रकोटिरत्रैव भारते । गङ्गादिपञ्चशतिका जन्म तेनात्र दुर्लभम् ॥ ८९ ॥ अत्रैवेति कन्याख्ये द्वीपे । यदुक्तम् ‘तत्र मध्ये महद्द्वीपं कुमारीद्वीपसंज्ञितम् । तत्र रुद्रायुतं पूर्णमवतीर्णं शुभङ्करम् ।। कर्म = शभ-अशुभ । क्षीण किया गया—क्रिया ज्ञान आदि के द्वारा । इस कारण यहाँ किये गए या नष्ट किये गए कर्म से पृथिवी से लेकर शिवतत्त्व पर्यन्त उन-उन तत्त्वों में पहले भोग और फिर मोक्ष होता है । जैसा कि कहा गया है “वहीं पर जो शुभ अथवा अशुभ कर्म किया गया उससे लोग शिवतत्त्व से लेकर अवीचि के बीच निवास करते हैं । (स्वतं० १०।२४८) तथा “जन्तुओं के द्वारा कन्या नामक द्वीप में जो शुभाशुभ कर्म किया जाता है उसका बीज स्वर्ग नरक और अपवर्ग के रूप में फलभोग को प्रदान करने वाला होता है’ ॥ ८८ ॥ प्रश्न-कन्या द्वीप में यह विशेष रूप से होता है इसमें क्या निमित्त है? यह शङ्का कर कहते हैं यहीं पर भारत में महाकाल से लेकर करोड़ों रुद्र तथा गङ्गा आदि पञ्चशतिका (= पाँच सौ नदियाँ) है इसलिए यहाँ जन्म अत्यन्त दुर्लभ है ।। ८९ ।। यहीं पर = कन्याद्वीप में । जैसा कि कहा गया श्रीतन्त्रालोकः MIRMALH ARMATHEMETARATHI पशूनां हेतुभूतं च स्मरणात्पापनाशनम् ।’ इति। तथा ‘महाकालस्तथैकाम्रमेवमादि वरानने । तीर्थानां कोटिरुद्दिष्टा महाकामफलोदया ।। गङ्गादीनां नदीनां च तत्र पञ्च शतानि च ।’ (स्व० १०१२४९) इति । तेन तीर्थभूयिष्ठत्वादिनेति ॥ ८९ ।। ननु वर्षान्तरेषु ‘प्रत्यग्राम्बुजपत्राभा जनाश्चातीव कोमलाः । जम्बूफलरसाहारा जरामृत्युविवर्जिताः ।।’ (स्व० १०॥२१३) इत्याद्युक्त्या सुखभूयिष्ठा जनाः, इह च ‘जना रोगभयग्रस्ता दुःखिता मन्दसम्पदः ।’ (स्व० १०।२४०) इत्याद्युक्त्या दु:खभूयिष्ठाः,—इत्यत्र ‘जन्म दुर्लभम्’ इति केन निमित्तेनोक्तम्? इत्याशङ्कयाह अन्यवर्षेषु पशुवद् भोगात्कातिवाहनम् । प्राप्यं मनोरथातीतमपि भारतजन्मनाम् ॥ ९० ॥ “इसके बीच में कुमारी द्वीप नामक महाद्वीप है । वहाँ दशहजार रुद्रों का पूर्ण शुभङ्कर (= कल्याणकारी) अवतार है । (वह) पशुओं (= बद्ध जीवों के कल्याण) का हेतुभूत है तथा स्मरण से ही पाप का नाश करने वाला है।” “हे वरानने ! (वहाँ) महाकाल एकाग्र आदि तीर्थों की, महाकामनाओं के फल का उदय कराने वाली एक करोड़ संख्या कही गई है। वहाँ गङ्गा आदि पाँच सौ नदियाँ प्रवाहित हैं ।” (स्व० तं० १०॥२४९) उस कारण = तीर्थ की अधिकता के कारण ॥ ८९ ।। प्रश्न- दूसरे-दूसरे वर्षों में “ताजे कमल के पत्ते के समान कान्ति वाले लोग अत्यन्त कोमल, जम्बूफल के रस का आहार करने वाले, जरा एवं मृत्यु से रहित हैं ।” (स्व० १०॥२१३) इत्यादि उक्ति के द्वारा, अधिक सुख वाले लोग हैं । और यहाँ के “लोग रोग और भय से ग्रस्त, दुःखी एवं थोड़ी सम्पत्ति वाले हैं ।” (स्व० १०।२४०) इत्यादि उक्ति के द्वारा अधिक दुःख वाले है-इस प्रकार ‘यहाँ जन्म अत्यन्त है’-ऐसा किस कारण से कहा गया ?-यह शङ्का कर कहते हैं अष्टममाह्निकम् LDI मनोरथातीतमिति, भोगापवर्गादेर्महीयस्त्वात् ॥ ९० ॥ नन्वेवं चेदविशेषेण भारतजन्मनां सिद्धयेत् तत् ‘कन्याख्ये तु विशेषतः’ इति कस्मादुक्तम्?— इत्याशङ्कयाह नानावर्णाश्रमाचारसुखदुःखविचित्रता । कन्याद्वीपे यतस्तेन कर्मभूः सेयमुत्तमा ॥ ९१ ॥ यदुक्तम् ‘ये पूर्वोक्ता गुणा लोके भारते वरवर्णिनि । ते तत्रैव स्थिता लोके कुमारीसंज्ञके प्रिये ।।’ (स्व० १०।२५५) इति । अतश्च एतन्निवासिनामेव शुभाशुभकर्मानुष्ठानात् स्वर्निरयावाप्ति: स्यात् ॥११॥ तदाह पुंसां सितासितान्यत्र कुर्वतां किल सिद्ध्यतः । परापरौ स्वर्निरयाविति रौरववार्तिके ॥ १२ ॥ किमत्र प्रमाणम्?- इत्युक्तम्- ‘रौरववार्तिके’ इति । तदुक्तं तत्र अन्य देशों में कर्म का क्षय पशु के समान भोग से होता है । किन्तु भारतवर्ष में जन्म लेने वालों के लिए मनोरथातीत भी प्राप्य है ॥ ९० ॥ मनोरथातीत-भोग और अपवर्ग आदि की अपेक्षा महान् होने से ।। ९० ॥ प्रश्न-यदि भारत में जन्म लेने वालों को यह सामान्य रूप से सिद्ध हो जाता है तो ‘कन्या (= कुमारी) द्वीप में विशेष रूप से’ ऐसा कैसे कहा गया ? यह शङ्का कर कहते हैं चूँकि कुमारीद्वीप में अनेक वर्ण तथा आश्रम के आचार एवं सुख-दु:ख की विचित्रता है इसलिए यह उत्तम कर्मभूमि है ।। ९१ ।। जैसा कि कहा गया है “हे वरवर्णिनी ! भारत लोक में जो गुण पहले कहे गए हे प्रिये ! वे कुमारी नामक लोक में ही स्थित हैं । (स्वतं० १०।२५५) इसलिए इसमें रहने वालों को ही शुभाशुभ कर्मों के अनुष्ठान से स्वर्ग एवं नरक की प्राप्ति होती है ॥ ९१ ॥ वही कहते हैं यहाँ पुण्यापूण्य कर्म करने वालों को पर और अपररूपी स्वर्ग और नरक प्राप्त होते हैं—ऐसा रौरव वार्त्तिक में (कहा गया है) ॥ ९२ ।। ६४ श्रीतन्त्रालोकः ‘पुंसां सितानि कर्माणि कुर्वतामसितानि च । सिद्ध्यतः स्वर्गनिरयावत्र क्षिप्रं परापरौ ।’ इति॥ ९२ ॥ एतदेव उपसंहरति एवं मेरोरधो जम्बूरभितो यः स विस्तरात् । स्यात् सप्तदशधा खण्डैवभिस्तु समासतः ॥ ९३ ॥ सप्तदशधेति, इलावृताद्यान्यष्टौ, इन्द्रद्वीपादीनि च नवेति । नवभिरिति, भारतेन सहेलावृताद्यैः ॥ ९३ ।। नन्वेवङ्कण्डत्वेऽस्य किं निमित्तम्?— इत्याशङ्क्याह मनोः स्वायंभुवस्यासन् सुता दश ततस्त्रयः । प्राव्रजन्नथ जम्ब्वाख्ये राजा योऽग्नीध्रनामकः ॥ ९४ ॥ तस्याभवन्नव सुतास्ततोऽयं नवखण्डकः । नाभिर्यो नवमस्तस्य नप्ता भरत आर्षभिः ॥ ९५ ॥ तस्याष्टौ तनयाः साकं कन्यया नवमोऽशकः । भुक्तस्तैर्नवधा तस्माल्लक्षयोजनमात्रकात् ॥ ९६ ॥ इसमें क्या प्रमाण है ? इसलिए कहा गया—रौरववार्त्तिक में । वही वहाँ कहा गया है “यहाँ पर सित और असित कर्म करने वाले मनुष्यों को शीघ्र ही पर और अपररूपी स्वर्ग तथा नरक प्राप्त होते हैं ।। ९२ ।। इसका उपसंहार करते हैं ___इस प्रकार मेरु के नीचे और जम्बू के चारो ओर जो (भू-भाग है) वह विस्तृत रूप में सत्रह प्रकार का और संक्षेप में नव खण्डों का है ।। ९३ ।। सत्रह प्रकार का-इलावृत आदि आठ और इन्द्रद्वीप आदि नव । नव प्रकार भारत के साथ इलावृत आदि को लेकर ॥ ९३ ॥ प्रश्न-इस प्रकार इसका खण्ड करने में क्या निमित्त है ? यह शङ्का कर कहते हैं स्वायंभुव मनु के दश पुत्र थे । उनमें से तीन ने संन्यास ले लिया । (सात में से) जम्बू नामक द्वीप में जो अग्नीध्र नामक राजा हुआ उसको नव सुत (= पौत्र) हये । इसलिए यह नव खण्डों वाला है । जो नवाँ (पौत्र) नाभि (नामक) था, ऋषभ का पुत्र भारत उसका नाती था । कन्या के साथ उसको आठ पुत्र थे । (इसलिए) उस एक लाख योजन विस्तार वाले (जम्बू द्वीप) का उन लोगों ने नव भाग करके (प्रत्येक ने) नवें अंश अष्टममाह्निकम् ६५ ‘सुताः’ इति पौत्राः । जम्ब्वाख्ये राजेति, अर्थात् एतन्मध्यात् । ऋषभस्या पत्यमार्षभिः, अत एव नप्तेत्युक्तम् । अष्टो तनया इति, प्रागुक्ता इन्द्राद्याः । तदुक्तम् ‘स्वायंभुवो मनुर्नामः तस्य पुत्र: प्रियव्रतः । तस्याथ दश पुत्रा वे जाता वायबलात्कटाः ।। अग्नीध्रश्चाग्निबाहश्च मेधा मेधातिथिर्वपः । ज्योतिष्मान्द्युतिमान् हव्य: सावन: सत्र एव च ।। मेधा सत्रोऽग्निबाहश्च एते प्रव्रजितास्त्रयः । सप्तद्वीपेषु ये शेषा अभिषिक्ता महाबलाः ।। जम्बुद्वीपे तथाग्नीध्रस्तस्य पुत्रा नव स्मृताः । नाभिः किंपुरुषश्चैव हरिश्चैव इलावृतः ॥ भद्राश्वः केतुमालश्च रम्यकश्च हिरण्मयः । नवमस्तु कुरुनाम नववर्षाधिपाः स्मृताः ।। अग्नीध्रतस्तु जाता वै शूराश्चातिबलोत्कटा: । तेषां नामाकितानीह नव वर्षाणि पार्वति ।। नाभे: पुत्रो महावीर्य ऋषभो धर्मतत्परः । तस्यापि हि सुतो ज्ञेयो भरतस्तु प्रतापवान् ।। तन्नाम्नेव तु विज्ञेयं भारतं वर्षमुत्तमम् ।। तस्याप्यष्टौ पुन: पुत्रा जाता: कन्यापरा प्रिये ।। का भोग किया ।। ९४-९६ ।। स्त = पौत्र । जम्बू नामक द्वीप में राजा अर्थात् इनमें से । ऋषभ के अपत्य आर्षभि । इसीलिए नाती कहा गया । आठ लड़के = पहले कहे गए इन्द्र आदि । वही कहा गया “ब्रह्मा के पुत्र मनु और उनके पुत्र प्रियव्रत थे । उनके उत्कट बल एवं वीर्य वाले अग्नीध्र, अग्निबाह, मेधा, मेधातिथि, वप्, ज्योतिष्मान् द्युतिमान्, द्रव्यराज, सावन और सत्र नामक दश पुत्र हये । उनमें से मेधा, सत्र और अग्निबाह ने संन्यास ले लिया । जो शेष सात महाबली सात द्वीपों में अभिषिक्त हुये उनमें अग्नीध्र जम्बू द्वीप में अभिषिक्त हुआ । उस को नव पुत्र थे-नाभि, किंपुरुष, हरि, इलावृत, भद्राश्व, केतुमाल, रम्यक, हिरण्मय और नवें कुरु । ये नव वर्षों के राजा कहे गये हैं । अग्नीध्र से जो अत्यन्त बलशाली वीर उत्पन्न हये । हे पार्वति ! उनके नाम से यहाँ नव देश चिह्नित हैं । नाभि के पुत्र ऋषभ थे जो महापराक्रमी और धर्मपरायण थे । उसके पुत्र प्रतापी भरत हुये उन्हीं के नाम से उत्तम भारतवर्ष जाना जाता है । आगे उनके आठ पुत्र और एक कन्या उत्पन्न हुई । वे आठ पुत्र भारत के आठ द्वीपों में नियुक्त हुये और नवाँ कुमारी नामक द्वीप कन्या के लिए ५ त.तृ. श्रीतन्त्रालोकः भारते त्वष्टद्वीपेऽत्र अष्टौ पुत्रा निवेशिताः । नवमस्तु कुमार्याह्नः कन्यायाः प्रतिपादितः ।। तेषां नाम्ना तु ते द्वीपा भरतेन प्रकीर्तिताः।।’ (स्व० १०।२८३) इति । तस्मादिति, जम्बुद्वीपात् लक्षयोजनमात्रकादिति । तत्रास्य पूर्वपश्चिमतो लक्षयोजनत्वं प्राक् प्रदर्शितम्, दक्षिणोत्तरतस्तु इदानीमुच्यते । तत्र भारतादीनि षड्वर्षाणि प्रत्येकं नवसाहस्राणि-इति चतुष्पञ्चाशत्, हिमवदादयश्च प्रत्येक द्विसाहस्रा-इति द्वादश, मेरुमूलीयसहस्रषोडशकेन सह इलावृतं चतुस्त्रिंशत् सहस्राणि–इत्येवं योजनानां लक्षं जम्बुद्वीपम् ॥ ९६ ॥ इदानीं तद्वहिरपि संस्थानविशेषं दर्शयति लक्षकमात्रो लवणस्तद्वाहोऽस्य पुरोऽद्रयः । ऋषभो दुन्दुभिधूम्रः कङ्कद्रोणेन्दवो ख़ुदक् ॥ ९७ ॥ वराहनन्दनाशोकाः पश्चात् सहबलाहको । दक्षिणे चक्रमैनाको वाडवोऽन्तस्तयोः स्थितः ॥ ९८ ॥ अब्धेर्दक्षिणतः खाक्षिसहस्रातिक्रमाद् गिरिः। विद्युत्वास्त्रिसहस्रोच्छ्रिदायामोऽत्र फलाशिनः ॥ ९९ ॥ मलदिग्धा दीर्घकेशश्मश्रवो गोसधर्मकाः । नग्नाः संवत्सराशीतिजीविनस्तृणभोजिनः ॥१०० ॥ बनाया गया । भरत ने उनके नाम के अनुसार उन द्वीपों का नाम बनाया ।” (स्वतं० १०।२८३) उससे = एक लाख योजन विस्तार वाले जम्बू द्वीप से । उसमें इसका पूर्व से पश्चिम एक लाख योजन विस्तार पहले कहा गया । दक्षिण से उत्तर का विस्तार अब कहा जा रहा है । उसमें भारत आदि छ खण्ड थे प्रत्येक ९ हजार योजन विस्तार वाले थे । इस प्रकार (कुल) (९४६) चौवन (हजार योजन हुआ) । हिमालय आदि प्रत्येक दो हजार योजन-इस प्रकार १२ हजार (योजन विस्तार हआ)। मेरु के १६ हजार योजन मूल के साथ चौतीस हजार योजन इलावृत इस प्रकार (५४ + १२+३४) एक लाख योजन विस्तृत जम्बू द्वीप है ॥ ९४-९६ ।। अब उसके बाहर भी विशेष संस्थानों को दिखाते हैं जम्बूद्वीप के बाहर की ओर एक लाख योजन विस्तृत क्षार समुद्र है। उसके बाहर पूर्व की ओर ऋषभ दुन्दुभि और धूम्र पर्वत हैं। उत्तर की ओर कङ्क द्रोण और इन्दु, पश्चिम की ओर बराह आनन्द और अशोक, तथा बलाहक के साथ चक्र और मैनाक दक्षिण में है। उन दोनो (= चक्र और मैनाक) के बीच में वाडव स्थित है । समुद्र के दक्षिण बीस हजार योजन विस्तृत और तीन हजार योजन ऊँचा विद्युत्वान् पर्वत है । यहाँ केअष्टममाह्निकम् निर्यन्त्राणि सदा तत्र द्वाराणि बिलसिद्धये । इत्येतद् गुरुभिर्गीतं श्रीमद्रौरवशासने ॥ १०१॥ इत्थं य एष लवणसमुद्रः प्रतिपादितः । तद्वहिः षडमी द्वीपाः प्रत्येक स्वार्णवैर्वृताः ॥ १०२ ॥ क्रमद्विगुणिताः षड्भिर्मनुपुत्रैरधिष्ठिताः । शाककुशक्रौञ्चा: शाल्मलिगोमेधाब्जमिति षड्वीपाः । क्षीरदधिसर्पिरीक्षवमदिरामधुराम्बुकाः षडम्बुधयः ॥ १०३ ॥ मेधातिथिर्वपुष्माज्योतिष्मान्द्युतिमता हवी राजा । संवर इति शाकादिषु जम्बुद्वीपे न्यरूपि चाग्नीध्रः ॥१०४ ॥ ‘लवण’ इति लवणाम्भः क्षारसमुद्र-इत्यर्थः । ‘इन्दुः’ चन्द्रः । यदुक्तम् ‘वृत्रारिभयसंत्रस्ताः प्रविष्टास्तत्र पर्वताः । द्वादशैव महावीरास्तान्ब्रवीमि समासतः ॥’ ऋषभो दुन्दुभिधूम्रः प्रविष्टः पूर्वभागतः । चन्द्रः कङ्कस्तथा द्रोण: प्रविष्ट उत्तरेण तु ।। अशोकोऽथ वराहश्च नन्दनश्च तृतीयकः । अपरेण नगास्तत्र प्रविष्टा लवणोदधिम् ।। लोग फल खाकर जीने वाले, गन्दे, दाढ़ी और बाल बढ़ाये, पशुवत् धर्म वाले, नङ्गे, अस्सी वर्ष जीवित रहने वाले, घास-फूस खाने वाले हैं । वहाँ बिल में घुसने के लिए द्वार हमेशा खुले रहते हैं-ऐसा रौरव शास्त्र में गुरु ने कहा है । ऐसा जो नमक का समुद्र कहा गया उसके बाहर ये छ द्वीप प्रत्येक अपने-अपने समद्रों से घिरे हए हैं । ये क्रमश: दो गने विस्तार वाले तथा छ: मनुपुत्रों से शासित हैं । उनके नाम शाक, कुश, क्रौञ्च, शाल्मली, गोमेध और अब्ज हैं । ये (क्रमश:) दुग्ध, दधि, घृत, इक्षुरस, मदिरा और मधुर जल वाले छ समुद्र से युक्त हैं । यहाँ मेधातिथि, वपुष्मान्, ज्योतिष्मान्, द्युतिमान्, हवि और संवर ये शाक आदि (द्वीपों) में तथा जम्बू द्वीप में आग्नीध्र राजा कहे गए हैं ।। ९७-१०४ ।। नमक-नमकीन पानी वाला समुद्र । इन्दु = चन्द्र । जैसा कि कहा गया “वृत्रासुर के शत्र (= इन्द्र के) भय से संत्रस्त पर्वत उस (= क्षार समुद्र) में घुस गए । ये महावीर बारह ही थे उनको मैं संक्षेप में कह रहा हूँ-ऋषभ, दुन्दुभि, धूम्र पूर्व भाग से प्रवेश किये । चन्द्र कङ्क तथा द्राण उत्तर स, अशाक ६८ श्रीतन्त्रालोकः चक्रो मैनाकसंज्ञश्च तृतीयश्च बलाहकः । दक्षिणेन वरारोहे प्रविष्टाश्चैव भूधराः ॥ चक्रमैनाकयोर्मध्ये तिष्ठेद्वै वडवानलः । (स्व० १०।२७३) इति । दक्षिणत इति, चक्रमैनाकादिसंनिकर्षेण, ‘खाक्षि’ इति विंशतिः । गुरुभिरिति, बृहस्पतिपादैः । यदुक्तं तत्र ‘योजनानां सहस्राणि समतिक्रम्य विंशतिम् । विद्युत्वानिति विख्यातः समुद्रे दक्षिणे स्थितः ।। सहस्राण्यायतस्त्रीणि तावानेवोच्छ्रितोऽचलः । सहस्रविपुलस्तत्र तृणपर्णफलाशनाः ।। मलोपचितदिग्धाङ्गा दीर्घश्मश्रृशिरोरुहाः । गोधर्माणो जना नग्ना वत्सराशीतिजीविनः ।। तत्रायन्त्रबिलद्वारप्रवेशाः पुरसंपदः ।’ इति । क्रमद्विगुणिता इति, तेन शाकद्वीपे द्वे लक्षे, कुशद्वीपे चत्वारि-इत्यर्थक्रमः । ‘अब्जः’ पुष्करः । इक्षुरेव ऐक्षवः । ‘मधुराम्बुक:’ स्वादूदः । द्युतिमतेत्यर्थात् सह, ‘हवि:’ हव्यः । तदुक्तम् ‘जम्बुद्वीपं च शाकं च कुशं क्रौञ्चं सशाल्मलिम्। वराह और नन्दन पश्चिम से तथा चक्र मैनाक और बलाहक पर्वत दक्षिण से प्रवेश किये । हे वरारोहे ! चक्र और मैनाक के बीच में वड़वानल स्थित है । (स्वतं० १०।२७३) दक्षिण की ओर चक्र मैनाक आदि के सम्बन्ध से । खाक्षि = २० । गुरु के द्वारा = बृहस्पति के द्वारा । जैसा कि वहाँ कहा गया “बीस हजार योजन फैल कर विद्युत्वान् नामक (पर्वत) समुद्र में दक्षिण में (स्थित) कहा गया है । वह पर्वत तीन हजार योजन और उतने ही (विस्तार के साथ) ऊँचा है। वहाँ हजारों की संख्या में लोग तृण, पत्ता, फल खाने वाले अङ्गों में गन्दगी लपेटे हुए, दाढ़ी-बाल बढ़ाये हुए, पशुधर्मा, नङ्गे और अस्सी वर्ष की आयु वाले हैं । गृह के प्रवेशद्वार बिना अवरोध के हैं और पुर (= आवासीय गृहमात्र) ही उनकी सम्पत्ति है ।” ___ क्रमश: दो गुने-इससे शाक द्वीप में दो लाख, कुशद्वीप में चार इस प्रकार अर्थ क्रम है । अञ्ज = पुष्कर । इक्षु ही ऐक्षव है । मधुराम्बुक = स्वादिष्ट जल वाला । द्युतिमान से अर्थात् (द्युतिमान् के) साथ । हवि = द्रव्य । वही कहा गया है “हे पार्वति ! जम्बूद्वीप, शाक, कुश क्रौञ्च, शाल्मली, गोमेध और पुष्कर ये अष्टममाह्निकम् गोमेधं पुष्कराख्यं च सप्त द्वीपानि पार्वति’ ।। (स्व०१०।२८४) इति । ‘क्षार: क्षीरं दधि घृतं तथा चक्षुरसोऽपि च । मदिरोदश्च स्वादूदः समुद्राः सप्त कीर्तिताः ।। जम्बद्वीपं स्मृतं लक्षं योजनानां प्रमाणतः । परिमण्डलतो ज्ञेयः क्षारोदस्तत्समो बहिः ।। एवं द्विगुणवृद्ध्या तु समुद्रा द्वीपसंस्थिताः । (स्व०२११२८७) इति । अग्नीध्रस्तु समाख्यातो जम्बुद्वीपे वरानने । शाके मेधातिथि म वपुष्मान् कुशसंज्ञके ।। राजा क्रौञ्चेऽथ ज्योतिष्माञ्छाल्मलौ द्युतिमान् स्मृतः। गोमेधे हव्यनामा च संवर: पुष्करे तथा ।। (स्व० १०।२९०) इति च ॥ १०४ ।। द्वीपषट्कमेव च विभजति– गिरिसप्तकपरिकल्पिततावत्खण्डास्तु पञ्च शाकाद्याः । पुष्करसंज्ञो द्विदलो हरियमवरुणेन्दवोऽत्र पूर्वादौ॥ १०५ ॥ ‘तावन्त:’ सप्तव, गिरिसप्तकस्य पार्श्वगत्यावस्थितत्वात् । ‘द्विदल’ इति एकेन वलयाकारेण पर्वतेन मध्यतो विभक्तत्वात् । ‘पूर्वादौ’ इति चतुर्दिक्षु तदुक्तम् सात द्वीप हैं ।” (स्वतं० १०१२८४) ___ “क्षार, क्षीर, दधि, घृत, इक्षुरस, मदिरा और स्वादिष्ट जल वाले ये सात समुद्र कहे गए हैं । जम्बू द्वीप एक लाख योजन विस्तार वाला कहा गया है । उतना ही बाहर की ओर चारो तरफ क्षार समुद्र समझना चाहिए । इसी प्रकार (अन्य) द्वीपों में स्थित समुद्र दो गुने वृद्धि के साथ जानने चाहिए ।” (स्वतं० २११२८७) __“हे वरानने । जम्बू द्वीप में आग्नीध्र, शाक में मेधातिथि, कुश में वपुष्मान्, क्रौञ्च में ज्योतिष्मान, शाल्मली में द्युतिमान, गोमेध में हव्यराज और पुष्कर में संवर नामवाले राजा कहे गए हैं” ॥ ९७-१०४ ॥ (स्व० १०।२९०) छ द्वीपों का विभाग करते हैं सात पर्वतों के द्वारा उतने ही शाक आदि पाँच खण्ड परिकल्पित हैं । पुष्कर नामक (द्वीप) दो भागों वाला है । यहाँ पूर्व आदि (दिशाओं) में । (क्रमश:) हरि यम वरुण और चन्द्र (लोकपाल) हैं ।। १०५ ।। उतने ही = सात ही, क्योंकि सातो पर्वत अगल-बगल स्थित हैं । दो भाग वाला-क्योंकि एक वलयाकार पर्वत के द्वारा मध्य से विभक्त है । पूर्व आदि में = श्रीतन्त्रालोकः ‘मेधातिथे: सप्त पुत्राः शाकद्वीपेऽभिषेचिताः । शान्तोभयस्तु शिशिरः सुखदो नन्दकः शिवः ।। क्षेमकश्च ध्रुवश्चेति वर्षनाम्ना तु तेऽङ्किताः । वर्षाणि सप्त ख्यातानि पर्वतांश्च निबोध मे ।। गोमेधश्चन्द्रसंज्ञश्च नारदो दुन्दुभिस्तथा । ऋषभः सोमकश्चैव वैभ्राजश्च कुलाद्रयः ॥’ (स्व० १०।२९४) इति । ‘कुशे वपुष्मता पूर्व सप्त पुत्रा निवेशिताः । श्वेतलोहितजीमूता हरितो वैद्युतस्तथा ।। मानसः सुव्रतश्चेति वर्षनाम्नैव चाङ्किताः । कुमुदश्चोर्वदश्चैव वराहो द्रोणकङ्कतौ ।। महिषः कुमुदश्चैव सप्त सीमान्तपर्वताः।’ (स्व०१०।३००) इति । ‘ज्योतिष्मता सप्त पुत्रा: क्रौञ्चद्वीपे निवेशिताः । उद्भिज्जश्च समाख्यातो वेणुर्मण्डल एव च ॥ रथकारश्च लवणो धृतिमान्सुप्रतारकः ।। कपिलश्चति राजानो वर्षनाम्ना त् तेऽङ्किताः ।। वैद्रुमो हेमनाभश्च द्युतिमान्पुष्पदन्तकः । कुशलो हरिमर्दश्च सप्तैते तु कुलाद्रयः ।’ (स्व० १०॥३०५) इति । ‘सप्त द्युतिमता पुत्राः शल्मलावभिषेचिताः । चारो दिशाओं में । वही कहा गया है “मेधातिथि के सात पुत्र शाक द्वीप में अभिषिक्त किये गए-शान्तोभय, शिशिर, सुखद, नन्दक, शिव, क्षेमक और ध्रुव । वे वर्षों के नाम से चिह्नित हुये। सात वर्षों को कह दिया गया (अब) मुझसे पर्वतों को जानों । गोमेध, चन्द्र, नाग्द, दुन्दुभि, ऋषभ, सोमक और वैभ्राज (ये) सात कुलपर्वत हैं ।” (स्व० तं० वपुष्मान् ने कुश में सात पुत्रों को लगाया-श्वेत, लोहित, जीमूत हरित, वैद्युत, मानस तथा सुव्रत । ये भी वर्ष के नाम से अङ्कित है । कुमुद, उर्वद, वराह द्रोण, कङ्कत, महिष और कुमुद ये सात सीमान्त पर्वत है । (स्व०१०।३००) “ज्योतिष्मान् ने क्रौञ्च द्वीप में सात पुत्रों को नियुक्त किया-उद्भिज्ज, वेणु, मण्डल, स्थकार, लवण, धृतिमान्, सुप्रतारक एवं कपिल । वे राजा लोग वर्ष के नाम से अङ्कित है । वैद्रुम, हेमनाभ द्युतिमान्, पुष्पदन्तक, कुशल और हरिमर्द ये मात कलपर्वत है ।” (स्व० १०।३०५) अष्टममाह्निकम् मनोऽनुगस्तथोष्णश्च पावनो ह्यन्धकारकः ।। मुनिर्दुन्दुभिनामा च कुशलश्चेति ते स्मृताः ।’ (स्व० १०।३०९) इति । ‘क्रौञ्चोऽथ वामनश्चैवाप्यन्धकारो दिवाकृतिः । द्विबिन्दुः पुण्डरीकश्च दुन्दुभिश्च कुलाद्रय: ॥’ (स्व० १०।३११) इति । ‘हव्यराजः सुतान्सप्त गोमेधे चाभ्यषेचयत् । जलदश्च कुमारश्च सुकुमारो मरीचकः ॥ कुमुदश्चोन्नतश्चैव महाभद्र इति स्मृताः ।’ (स्व० १०।३१५) इति । ‘उदयः केसरश्चैवजठरोऽथ सुरैवतः । श्यामोऽम्बिकेयो मेरुश्च शैला: सीमान्तगास्त्विमे ।। ___ (स्व० १०।३१७) इति । ‘अतश्च पुष्कराख्ये च संवरस्तत्र नायकः । द्वौ पुत्रौ तेन विख्यातौ पुष्कराख्ये निवेशितौ ॥ पर्वतो वलयाकारो मानसोत्तरसंज्ञकः ।’ (स्व० १०।३२३) इति । ‘धातकी मध्यमे राजा महावीतो बहिर्नृपः । (स्व० १०।३२४) इति । ‘चतुर्णा लोकपालानां पुरीश्चात्र निबोध मे । हरेर्वस्वेकसाराख्या याम्या संयमनी पुरी ।। द्युतिमान् ने शाल्मली में सात पुत्रों को अभिषिक्त किया । वे मनोऽनुग, उष्ण, पावन, अन्धकार, मुनि, दुन्दुभि एवं कुशल है ।” (स्व० १०।३०९) “क्रौञ्च, वामन, अन्धकार, दिवाकृति, द्विविन्दु, पुण्डरीक और दुन्दुभि ये कुलाद्रि है ।” (स्व० १०॥३११) ____ हव्यराज ने गोमेध में सात पुत्रों का अभिषेक किया—(ये) जलद, कुमार, सुकुमार, मरीचक, कुमुद, उन्नत, और महाभद्र (नाम वाले) कहे गए है” ॥ (स्व० १०॥३१५) “उदय, केशर, जठर, सुरैवत, श्याम, अम्बिकेय और मेरु ये सीमान्तवर्ती पर्वत है । (स्व १०।३१७) पुष्कर में—वहाँ संवर सम्राट हैं । उन्होंने दो विख्यात पुत्रों को पुष्कर में लगाया । यहाँ मानसोत्तर नामक पर्वत वलयाकार में स्थित है ।” (स्व० १०।३२३) “पुष्कर के मध्य में धातकी तथा बाहर महावीत राजा हुये।’’ (स्व०१०।३२४) श्रीतन्त्रालोकः सुखापा वारुणी चैव सोमस्य तु विभावरी ।’ (स्व० १०।३२७) इति च ।। १०५ ।। इयदन्तं सङ्कलयति त्रिपञ्चाशच्च लक्षाणि द्विकोट्ययुतपञ्चकम् । स्वाद्वर्णवान्तं मेर्वर्धाद्योजननामियं प्रमा ॥ १०६ ॥ तत्र जम्बुद्वीपीयानि अर्थात् पञ्चाशत्सहस्राणि, क्षाराब्धिलक्षम्, शाकद्वीपं द्वे क्षीराब्धिश्च, कुशश्चत्वारि दध्यब्धिश्च, क्रौञ्चोऽष्टौ घृताब्धिश्च, शल्मलि: षोडश इक्षु रसाब्धिश्च, गोमेधो द्वात्रिंशत् मदिराब्धिश्च, पुष्करश्चतुःषष्टिः स्वादूदश्च,—इत्येवं मेर्वर्धादारभ्य स्वादूदान्तं ससहस्रपञ्चाशत्रिपञ्चाशल्लक्षाधिकं कोटिद्वयं योजनानां प्रमाणं भवत् । तदुक्तम् ‘कोटिद्वयं त्रिपञ्चाशल्लक्षाणि च ततः परम् । पञ्चाशच्च सहस्राणि सप्त द्वीपा: ससागराः ।।’ इति ॥ १०६ ।। सप्तमजलधेर्बाह्ये हैमी भूः कोटिदशकमथ लक्षम् । उच्छ्रित्या विस्तारादयुतं लोकेतराचलः कथितः ॥ १०७ ॥ लोकालोकदिगष्टकसंस्थं रुद्राष्टकं सलोकेशम् । “मुझसे चारो लोकपालों की पुरी को जानो । विष्णु की वसु, यम की संयमनी, वरुण की सुखा और सोम की विभावरी नामक नगरी है । (स्व० १०।३२७) ॥ १०५ ॥ यहाँ तक का संग्रह करते हुये बतलाते हैं सुमेरु के आधे से लेकर स्वादुजल वाले समुद्र तक दो करोड़ तिरपन लाख पचास हजार योजनों की यह माप है ॥ १०६ ।। उसमें जम्बू द्वीप का ५० हजार, क्षारसमुद्र १ लाख, शाकद्वीप २ लाख और क्षीरसागर, कुश और दधिसागर, चार लाख क्रौञ्च और घृतसागर, आठ लाख शाल्मली इक्षुरस समुद्र, सोलह लाख गोमेध और मदिराब्धि, बत्तीस लाख पुष्कर और स्वादुअब्धि चौसठ इस प्रकार मेरु से आरम्भ कर स्वादकान्त समुद्र तक २ करोड़ ५३ लाख ५० हजार योजन का परिमाण है वही कहा गया है ___सागरों के सहित सात द्वीप दो करोड़ तिरपन लाख ५० हजार (योजन विस्तृत) है ॥ १०६ ॥ सातवें समुद्र के उस पार दश करोड़ योजन स्वर्णमयी भूमि है । उसके बाद एक लाख योजन ऊँचा और दश हजार योजन विस्तृत लोकालोकपर्वत कहा गया है । लोकालोक के चारों ओर (= आठों दिशाओं में) रुद्राष्ट (= आठ रुद्रलोक) अपने लोकेशों के साथ स्थित है। अष्टममाह्निकम् केवलमित्यपि केचिल्लोकालोकान्तरे रविन बहिः ॥ १०८ ॥ हैमी भूरिति, अर्थाद्देवानां क्रीडार्थम् । ‘लोकेतराचल:’ इति लोकालोक पर्वतः । यदुक्तम् ‘ततो हेममयी भूमिर्दशकोट्यो वरानने । देवानां क्रीडनार्थाय लोकालोकस्त्वत: परम् ।। पर्वतो वलयाकारो योजनायुतविस्तृतः । लक्षमात्रसमुत्सेधो योजनानां वरानने ।’ (स्व० १०।३३१) इति । सलोकेशमिति, यदुक्तम् ‘लोकपाला: स्थितास्तत्र रुद्राश्चामोघशक्तयः ।। (स्व० १०१३३३) इति । केचिदिति, लीलाकारादयः । एतद्धि तैः समस्तलोकपालत्वात् रुद्रा एव लोकपालास्तत्र स्थिता:- इत्यन्यथा व्याख्यातम् । ‘लोकालोकमतो देवि तत्र रुद्रा व्यवस्थिताः । अमोघशक्तयः सर्वे विरजा वसुधामकाः ।। कर्दमः शङ्खपालश्च पर्जन्य: स्वर्णलोमकः । केतुमानाजनश्चैव पूर्वादीशान्तमास्थिताः ।। कुछ लोग (कहते हैं) कि केवल (रुद्र ही उसमें रहते हैं) । वहाँ लोकालोक के भीतर सूर्य है बाहर नहीं ।। १०७-१०८ ॥ स्वर्णमयी भू = अर्थात् देवों की क्रीड़ा के लिए । लोकेतर अचल = लोकालोक पर्वत । जैसा कि कहा गया है “हे वरानने ! उसके बाद दश करोड़ योजन स्वर्णमयी भूमि देवताओं की क्रीड़ा के लिए है । उसके बाद गोल आकार वाला दश हजार योजन विस्तृत तथा एक लाख योजन ऊँचा लोकालोक पर्वत है । (स्वतं० १०॥३३१) लोकेश के सहित—जैसा कि कहा गया है “वहाँ अमोघशक्ति वाले रुद्र और लोकपाल स्थित हैं।” (स्वतं० १०।३३३) ___कुछ लोग = लीलाकार आदि । समस्त लोकों का पालक होने के कारण वहाँ रुद्र ही लोकपाल है-ऐसी उन लोगों ने दूसरी प्रकार व्याख्या की है । “हे देवि ! इसके बाद लोकालोक पर्वत है उसमें रुद्र रहते हैं । वे सब अमोघ शक्ति वाले है । इनके नाम विरज (= निर्मल) वस्तुधाम (= धन-धान्य वाले) । कर्दम, शङ्खपाल, (= शङ्ख से रक्षा करने वाला) पर्जन्य, स्वर्णलोमक ७४ INHEALTHRITISMATHAHAHENNAMRAPHARNER श्रीतन्त्रालोकः लोकपालास्ततो बाह्ये व्याप्य सर्वमिदं स्थिताः।’ इत्यादीनामेतद्विरुद्धानां श्रुतीनां सम्भवात् । न बहिरिति, रवेलोकालोक समानोच्छ्रायत्वात् मेरुतदन्तरालवर्तित्वाच्च, अत एवान्त:स्थितानामेव लोकानामा लोको यत्र, तथा आलोक: प्रकाशोऽलोकश्च तमोऽन्तर्बहिश्च यस्येति स लोका लोक इति । तदुक्तम् ‘तस्यान्तर्भासते भानुर्न बहि: सुरसुन्दरि।’ इति ॥ १०८ ॥ एवं लोकालोकमेर्वन्तरालवर्तित्वेऽस्य भानोर्गतिवैचित्र्यं दर्शयति पितृदेवपथावस्योदग्दक्षिणगौ स्वजात्परे वीथ्यौ । भानोरुत्तरदक्षिणमयनद्वयमेतदेव कथयन्ति ॥ १०९ ॥ तत्रास्य भानोमेरुसंनिकर्षण गच्छत उत्तरो मार्गो, लोकालोकसत्रिकर्षेण तु दक्षिणः, तौ च मार्गी ‘स्वजात्परे वीथ्यौ’ सुवीथि-अजवीथिशब्दाभ्यां व्यपदेश्यो इत्यर्थः । यदुक्तम् ‘सुवीथी उत्तरे तस्य अजवीथी तु दक्षिणे।’ (स्व० १०१३३९) H (स्वर्ण जैसे रोम वाला) केतुभान और राजन है । ये पूर्व से लेकर ईशान कोण तक स्थित है । इसके बाहर इस सबको व्याप्त कर के लोकपाल स्थित है ।’ इत्यादि इसके विरुद्ध श्रुतियाँ सम्भव है । बाहर नहीं क्योंकि सूर्य लोकालोक जितने ऊँचे मेरु और उस (= लोकालोक) के बीच में (सञ्चरण करता) हैं । इसीलिए अन्दर वर्तमान लोकों का जहाँ प्रकाश होता है । तथा आलोक = प्रकाश और अलोक = अन्धकार भीतर और बाहर है जिसके वह लोकालोक है । जैसा कि कहा गया है “हे सुरसुन्दरी ! सूर्य उसके भीतर प्रकाशित होता है न कि बाहर” ॥१०८ ॥ इस प्रकार लोकालोक और मेरु के बीच में होने पर इस सूर्य की गति की विचित्रता की दिखलाते हैं इसके पितृपथ और देवपथ उत्तर और दक्षिण की ओर जाने वाले हैं । (उनके नाम) सु और अज के बाद वीथि (= सुवीथि और अजवीथि) नाम वाले हैं । (लोग) इसी को सूर्य का उत्तर और दक्षिण दो अयन अर्थात् उत्तरायण और दक्षिणायन कहते हैं ।। १०९ ।। मेरु के पास से जाने वाले इस सूर्य का उत्तर मार्ग है और लोकालोक के पास से दक्षिण । वे दोनों मार्ग सू और अज के बाद वीथी = सुवीथि और अजवीथि शब्दों से व्यवहार्य हैं । जैसा कि कहा गया है “उसके उत्तर में सुवीथी और दक्षिण में अजवीथी है।” (स्वतं० १०॥३३९) अष्टममाह्निकम् ७५ इति । तावेव च पितृणां देवानां च मार्ग:- इत्युक्तं ‘पितृदेवपथौ’ इति (मार्गों) । तत्र अजवीथी पितृणां मार्गः, सुवीथी तु देवानाम् । तदुक्तम् ‘अजवीथी दक्षिणं तु सुवीथी चोत्तरायणम्। पितृमार्गस्तथा दिव्यः कथितोऽनुक्रमेण तु ।।’ इति । एतदेव मार्गद्वयमुत्तरायणं दक्षिणायनं च—इत्युक्तम्- ‘उत्तरदक्षिणमयनद्वय मेतदेव’ इति । तदुक्तम् ‘लोकालोकोपरिष्टात्तु सवितुर्दक्षिणायनम् । तथोत्तरायणं तत्र उत्तरेण प्रकीर्तितम् ।। (स्व० १०।३३७) इति ॥ १०९ ।। ननु भानोर्मेरुसन्निकणोत्तरो मागों लोकालोकसन्निकर्षेण तु दक्षिण:- इत्यत्र किं प्रमाणम्?–इत्याशङ्क्याह _ ‘सर्वेषामुत्तरो मेरुलोकालोकश्च दक्षिणः।’ सर्वेषामिति, वर्षाष्टकादिनिवासिनाम् । इलावृते हि भानुरेव न प्रतपति,—इति कस्तद्गतिवैचित्र्येऽपि अवकाश:; भानुरेव हि भगवान् मेरुमधिकृत्य दक्षिणदिग वस्थिते भारतादौ वर्षत्रये पूर्वतः पश्चात्स्थिते केतुमाले दक्षिणात्, उत्तरदिगवस्थिते कुर्वादौ वर्षत्रये पश्चात्प्राच्ये भद्राश्वेऽपि उदक्तः समुदयन् स्वोदयानुसारेण पूर्वदिगव ___ वे ही दोनों पितरों और देवताओं के मार्ग हैं इसलिए कहा गया पितृदेवपथ । उनमें अजवीथी पितरों का मार्ग है और स्वीथी देवताओं का । वही कहा गया “अजवीथी दक्षिणायन है और सुवीथी उत्तरायण । यह क्रमश: पितृमार्ग (या पितृयान) और देवमार्ग (= देवयान) कहा गया है ।” यही दोनों मार्ग उत्तरायण और दक्षिणायन है-इसलिए कहा गया यही दोनों उत्तर और दक्षिण अयन है । वही कहा गया “लोकालोक के ऊपर सूर्य का दक्षिणायन (मार्ग) है । वही उत्तर की ओर उत्तरायण मार्ग है ।” (स्व० तं० १०।३३७) ॥ १०९ ॥ प्रश्न-मेरु के सन्निकर्ष से सूर्य का उत्तरायण और लोकालोक के सन्निकर्ष से दक्षिणायन होता है इसमें क्या प्रमाण है? – यह शङ्का कर कहते हैं मेरु सबके उत्तर और लोकालोक (सब के) दक्षिण में है ।। ११०- ।। सबके = आठ वर्ष आदि में रहने वालों के । इलावृत में सूर्य चमकता ही नहीं तो वहाँ गतिवैचित्र्य का क्या अवकाश । सूर्य भगवान् ही मेरु पर अधिकृत होकर दक्षिण दिशा में स्थित भारत आदि तीन देशों में, पूर्व से पश्चिम स्थित केतुमाल में, दक्षिण से उत्तर स्थित कुरु आदि तीन देशों में, पश्चिम से पूर्व स्थित ७६ श्रीतन्त्रालोकः स्थापनात् सर्वेषामुत्तरयति लोकालोकं च दक्षिणयति, येन अस्य तत्सन्निकर्ष विप्रकर्षाभ्यामुत्तरायणदक्षिणायनादि स्यात् ॥ न केवलमस्यैवं गतावेव वैचित्र्यमस्ति यावदुदयास्तमययोरपि— इत्याह उदयास्तमयावित्थं सूर्यस्य परिभावयेत् ॥ ११० ॥ ‘इत्थम्’ इति दक्षिणावर्तभङ्ग्या , मेरो: परिभ्रमणेन–इत्यर्थः ॥ ११० ।। तदाह अर्धरात्रोऽमरावत्यां याम्यायामस्तमेव च ।। मध्यन्दिनं तद्वारुण्यां सौम्ये सूर्योदयः स्मृतः ॥ १११॥ उदयो योऽमरावत्यां सोऽर्धरात्रो यमालये। केऽस्तं सौम्ये च मध्याह्न इत्थं सूर्यगतागते ॥ ११२ ॥ इह खलु ‘सौम्ये’ मेरोरुत्तरे भागे महोदयाख्यायां नगर्यां यदा वारुण्या आगच्छतः सूर्यस्योदयदर्शनं भवेत् तदा प्रहरद्वयस्य व्यतीतत्वात् वारुण्यां गन्धवत्याख्यायां नगयों मध्याह्नो याम्यायां दक्षिणदिगवस्थितायां संयमन्याख्यायां भद्राश्व में भी उत्तर की ओर से उदित होते हुए अपने उदय के अनुसार पूर्व दिशा की स्थापना के कारण सबको उत्तर की ओर कर देते है और लोकालोक को दक्षिण की ओर कर देते हैं जिससे इसकी निकटता और दूरी के कारण उत्तरायण और दक्षिणायन आदि होता है । इसका (= सूर्य का) केवल इस प्रकार गति में ही वैचित्र्य नहीं है बल्कि उदय और अस्त के विषय में भी, यह कहते हैं इसी प्रकार सूर्य के उदय और अस्त को भी समझना चाहिए ।। -११० ॥ इस प्रकार = दक्षिणावर्त्त की भङ्गी से मेरु के परिभ्रमण से ॥ ११० ।। वही कहते हैं (जब) अमरावती में अर्धरात्रि होती है तब संयमनी में सूर्यास्त, वारुणी में दोपहर, सौम्य (= महोदया) में सूर्योदय कहा गया है जो अमरावती में (सूर्य का) उदय (काल) है वह यमालय में अर्धरात्रि, वारुणी में सूर्यास्त और सोम्य में मध्याह्न है । इस प्रकार सूर्य का अस्तोदय है ॥ १११-११२ ।। सौम्य = मेरु के उत्तर भाग में पश्चिम की ओर वर्तमान महोदया नामक नगरी में आते ये सूर्य का (जब) उदय दर्शन होता है तब दो प्रहर के व्यतीत हो जाने से पश्चिम की ओर ही वर्तमान गन्धवती नामक नगरी में मध्याह्न होता है । याम्यअष्टममाह्निकम् नगर्यां च सूर्योऽस्तमेति, प्रहरचतुष्टयातिक्रमेण पर्वतच्छायान्तरितत्वात् प्रकाशो न दृश्यते—इत्यर्थः । पूर्वदिङ्नगर्याममरावत्याख्यायां चार्धरात्रस्तद्वारुण्युदयावसरे उस्तमयत्वात् प्रहरद्वयेन चोदयस्य भविष्यत्त्वात् । यश्च अमरावत्यां सूर्योदय: सौम्याया आगच्छतो दर्शनं स यमालयेऽर्धरात्र: प्रहरद्वयेन सूर्यस्योदेष्यमाणत्वात्, के वारुणे चास्तमयः सौम्योदयवेलायां तत्र मध्याह्नस्य वृत्तत्वात् इदानीं प्रहरचतष्टयस्य अतिक्रान्तत्वात, सौम्ये च प्रहरद्वयस्य अतीतत्वात मध्याह्न. – इत्यनेनैव क्रमेण पूर्वपश्चिमयोर्विदिक्षु चोदयास्तमयावपि सूर्यस्य चिन्त्यौ इत्युक्तम्- ‘इत्थं भानोर्गतागते’ इति । यदुक्तम् ‘अर्धरात्रोऽमरावत्यामस्तमेति यमस्य च ।’ (स्व० १०॥३३८) इति । तथा ‘यदैव चामरावत्यामुदयस्तस्य दृश्यते । तदास्तमेति वारुण्यामित्यादित्यगतागतम् ।।’ इति । एतच्च द्वीपान्तरेष्वपि योज्यं सूर्योदयस्य सर्वत्र समानत्वात् ।। ११२ ॥ एवमेतत्प्रसङ्गादभिधाय प्रकृतमेवानुसरति = दक्षिण दिशा में स्थित संयमनी नामक नगरी में सूर्यास्त होता है अर्थात् चार प्रहर बीत जाने से पर्वत की छाया के बीच में आ जाने से प्रकाश नहीं दिखलाई पड़ता । पूर्वदिशा में वर्तमान अमरावती नामक नगरी में आधी रात होती है क्योंकि दक्षिण दिशा में सूर्य अस्त हो जाता है और दो प्रहर के बाद उदय होने वाला होता है और जब अमरावती में सूर्योदय होता है अर्थात् उत्तर दिशा से आने वाले (सूर्य) का दर्शन होता है तब यम की नगरी में आधीरात होती है क्योंकि दो प्रहर के बाद सूर्य का उदय होने वाला होता है । के = वारुणी दिशा में, अस्तकाल होता है क्योंकि सौम्य की उदयवेला में वहाँ मध्याह्न रहता है फलत: चार प्रहर बीत गया रहता है। सौम्य दिशा में दो प्रहर के व्यतीत हो जाने से मध्याह्न होता है । इस प्रकार इसी क्रम से पूर्व पश्चिम की विदिशाओं (= कोणों) में भी सूर्य के उदय और अस्त समझने चाहिए । इसलिए कहा गया—“इस प्रकार सूर्य के गमनागमन होते है ।’’ जैसा कि कहा गया है “अमरावती में जब आधी रात होती है तब यम की नगरी में सूर्यास्त होता है।” (स्वतं० १०।३३८) “जब अमरावती में उसका उदय दिखलाई पड़ता है तब वारुणी में अस्त होता है । इस प्रकार सूर्य का गमनागमन है ।” यह (प्रक्रिया) दूसरे द्वीपों में भी जोड़नी चाहिए क्योंकि सूर्य का उदय सर्वत्र समान है ॥ १११-११२ ॥ ७८ श्रीतन्त्रालोकः पञ्चत्रिंशत्कोटिसंख्या लक्षाण्येकोनविंशतिः । चत्वारिंशत्सहस्राणि ध्वान्तं लोकाचलाहिः ॥ ११३ ॥ सप्तसागरमानस्तु गर्भोदाख्यः समुद्रराट् । लोकालोकस्य परतो यद्गर्भे निखिलैव भूः ॥ ११४ ॥ तदुक्तम् ‘तस्य बाह्ये तमो घोरं दुष्प्रेक्ष्यं जीववर्जितम् । पञ्चत्रिंशत्स्मृताः कोट्यो लक्षाण्येकोनविंशतिः ॥ चत्वारिंशत्सहस्राणि योजनानां वरानने । (स्व० १०॥३४१) इति । सप्तानां क्षारादीनां लक्षात्प्रभृति द्विगुणद्विगुणया वृद्ध्या सप्तविंशतिलक्षक कोट्यात्म यन्मानं तत्तुल्यमान:-इत्यर्थः । समुद्रराडिति, क्षारादिसमुद्रसप्तक गर्भीकारात् । तदुक्तम् ‘गदिता येऽब्धयः सप्त तेऽत्र गर्भे यतः स्मृताः । कथितस्तेन गर्भोद: समस्ताब्धिरसोद्वहः ॥’ ) इति ॥ ११४ ॥ अत्र च तम:स्थाने श्रीसिद्धयोगीश्वरमतोक्तं विशदयति प्रसङ्गात् इसका कथन कर प्रस्तुत का अनुसरण करते हैं लोकाचल के बाहर पैंतीस करोड़ उन्नीस लाख चालीस हजार योजन अन्धकार है । सात सागरों के परिमाण वाला गर्भोद नामक समुद्रों का राजा लोकालोक के बाद (स्थित है) जिसके गर्भ में सम्पूर्ण भूमि है ।। ११३-११४ ।। वही कहा गया है “हे वरानने ! उसके बाहर घोर दुष्प्रेक्ष्य और जीवरहित अन्धकार है (जिसका परिमाण) ३५ करोड १९ लाख ४० हजार योजन है ।” (स्वतं० १०।३४१) सात क्षार आदि (समुद्रों) का एक लाख से लेकर दो-दो गुनी वृद्धि के साथ एक करोड़ सत्ताईस लाख जो मान है उसके बराबर मान वाला । क्षार आदि सात समुद्र को गर्भ में धारण करने के कारण यह समुद्रों का राजा है । वही कहा गया ___“जो सात समुद्र कहे गए हैं चूँकि वे यहाँ गर्भीकृत कहे गए हैं इस कारण गर्भोद समस्त समुद्रों के रस का उद्वाहक माना गया है” || ११३-११४ ॥ (मृगेन्द्र०) इस अन्धकारपूर्ण स्थान के विषय में सिद्धयोगीश्वरी मत का वचन प्रस्तुत करते अष्टममाह्निकम् ७२ सिद्धातन्त्रेऽत्र गर्भाब्धेस्तीरे कौशेयसंज्ञितम्। मण्डलं गरुडस्तत्र सिद्धपक्षसमावृतः ॥ ११५ ॥ क्रीडन्ति पर्वताने ते नव चात्र कुलाद्रयः । तत उष्णोदकास्त्रिंशन्नद्य:पातालगास्ततः ॥ ११६ ॥ चतुर्दिङ्नैमिरोद्यानं योगिनीसेवितं सदा । ततो मेरुस्ततो नागा मेघा हेमाण्डकं ततः ॥ ११७ ॥ तीरे इति, अस्मात्परस्मिन् । तत्र हि लोकालोकसन्निकर्षे गोंदः । ‘नैमिरोद्यानम्’ इति नैमिरपुष्पसंज्ञकमित्यर्थः । नागा इत्यर्थाद्रत्नमय्यां भुवि । मेघा इत्यर्थाद्धरिचन्द्रपर्वतोपरि । ‘हमाण्डकम्’ इति हैमाण्डीया कर्परिका-इत्यर्थः । तदुक्तं तत्र गर्भोदस्य परे तीरे कौशेयं नाम मण्डलम् । तत्र तिष्ठति देवेशो गरुत्मांश्च समावतः ।। सिद्धपक्षसहस्रेस्तु तत्तुल्यबलदर्पितैः । तिष्ठन्ति पर्वताने ते क्रीडमाना मुहर्मुहुः ॥ इति । ‘हुलहालवरक्रोधाः कोटको मूलपर्वतः ।। रोधको वामनः काण्डो विज्ञेया: कुलपर्वताः।।’ इति । सिद्धातन्त्र में कहा गया कि) इस गर्भसमद्र के किनारे कौशेय नामक मण्डल है वहाँ सिद्ध पलों वाला (अथवा सिद्ध पक्षों वाले गरुड़ों या पर्वतों से घिरा हुआ) गरुड़ रहता है । यहाँ पर्वत के अग्र भाग में नव कुलपर्वत क्रीड़ा करते रहते हैं । उसके बाद पातालगामिनी गर्म जल वाली तीस नदियाँ हैं । उनके चारों ओर योगिनियों के द्वारा सर्वदा सेवित नैमिर नामक उद्यान है । इसके बाद मेरु फिर नाग, तत्पश्चात मेघ और फिर हमाण्डक है ॥ ११५-११७ ।। तीर पर-इसके बाद । वहाँ लोकालोक के पास में गर्भाद है । नैमिरोद्यान = निमिर पुष्पों वाला । नाग अर्थात् रत्नमयी पृथ्वी पर । मेघ अर्थात् हरिचन्द्र पर्वत के ऊपर । हेमाण्डक = हेमाण्ड वाली कड़ाही । वही वहाँ कहा है “गर्भोद के उस तीर पर कौशेय नामक मण्डल है वहाँ देवताओं के राजा गरुड़ हजारों सिद्ध पड वाले और उन्हीं के समान बल से दर्पयुक्त (गरुड़ों या पर्वतों) से घिरे हए रहते हैं । वे (गरुड़) पर्वत के अग्र भाग में बार-बार क्रीड़ा करते हुए विराजमान हैं ।” ___“हुल, हाल, वर, क्रोध, कोटक, मूल, रोधक, वामन और काण्ड (ये) कुलपर्वत जानने चाहिए।” श्रीतन्त्रालोकः ‘पर्वतान्ते पुनस्त्रिंशन्नद्यो योजनविस्तराः । उष्णोदकाः स्मृतास्तास्तु पातालतलनिम्नगाः।।’ इति । ‘पनस्तदापगातीरे वनं नैमेरपुष्पकम्। तत्र क्रीडन्ति देवेशि योगिन्यो बलदर्पिता: ।। इति । ‘वनस्य बाह्यस्य भूमि: सर्वतः संव्यवस्थिता। शुष्का जलविहीना तु पुनर्भूमिस्तु रत्नजा ।। दिङ्मातङ्गसमाकीर्णा समन्तात्परिशोधिता । वारणा बहवो यत्र मेरुमन्दरसन्निभाः ।।’ इति । ‘ततस्तानप्यतिक्रम्य उत्थितस्तु महाऽचलः । हरिश्चन्द्र इति ख्यातो वलयाकारसंस्थितः ।।’ इति । ‘तत्र सन्निहिता मेघा: संवर्ताद्या महारवाः ।’ इति । ‘पुनस्तद् दृश्यते चाण्डं काञ्चनं चातिभास्वरम् ।’ इति ।। ११७ ।। तदेव सङ्कलयति ब्रह्मणोऽण्डकटाहेन मेरोरर्धन कोटयः । पञ्चाशदेवं दशसु दिक्षु भूलोकसंज्ञितम् ॥ ११८ ॥ तत्र मेरोरारभ्य स्वादूदकान्तं प्राक्कलितं ससहस्रपञ्चाशत्रिपञ्चाशल्लक्षाधिक “पर्वत के अन्त में फिर एक योजन विस्तार वाली, गर्म जल वाली तथा पाताल तल को पहुंचने वाली तीस नदियाँ कही गयी हैं ।” __“पुन: उन नदियों के किनारो पर (नैमेरपुष्पक) नामक वन है । हे देवेशि! वहाँ बल दर्पित योगिनियाँ क्रीड़ा करती रहती हैं।” __“वन के बाहर की भूमि चारो ओर से सुव्यवस्थित है । वह शुष्क और जलहीन है । उसके बाद की भूमि रत्नों से उत्पन्न, दिग्गजों से व्याप्त चारो ओर से शोधित है जहाँ मेरु मन्दर के समान बहुत से हाथी विराजमान हैं ।” “उसके बाद उनको भी पार कर के हरिश्चन्द्र नामक महापर्वत वलयाकार में स्थित है ।” “वहाँ संवर्त्त आदि महाध्वनि वाले मेघ रहते हैं।” “उसके बाद वह अण्ड सुवर्णमय और अत्यन्त भास्वर दिखलाई पड़ता है” || ११५-११७ ।। उसी को संक्षिप्त करते हैं मेरु से लेकर (स्वादूदक सागर तक) आधा ब्रह्माण्ड कटाह को जोड़कर पचास करोड़ (भूमियाँ है)। इसी प्रकार दशों दिशाओं में भू-लोक स्थित है ।। ११८ ॥ अष्टममाह्निकम् कोटिद्वयं हैमी भूः, कोटिदशकं लोकालोकविष्कम्भः, सहस्रदशकं तमः, सहस्र चत्वारिंशदेकोनविंशतिलक्षाधिकं कोटिपञ्चत्रिंशकं गर्भोदश्च, ससप्तविंशतिलक्षा कोटिरित्येवं कोटिपरिमाणेन ब्रह्माण्डकटाहेन सह अर्थात्पञ्चाशत्कोटयो भवन्ति इत्येवं ‘दशसु दिक्षु’ इति सर्वत: कोटिशतं भूलोंको भवेत् ॥ ११८ ॥ एष च भूलोक: चतुर्दशविधस्यापि भूतसर्गस्यास्पदम्— इत्याह पशुखगमृगतरुमानुषसरीसृपैः षड्भिरेष भूर्लोकः । व्याप्तः पिशाचरक्षोगन्धर्वाणां सयक्षाणाम् ॥ ११९ ॥ विद्याभृतां च किं वा बहुना सर्वस्य भूतसर्गस्य । अभिमानतो यथेष्ट भोगस्थानं निवासश्च ॥ १२० ॥ ‘तरु’ इति स्थावरम् । ‘विद्याभृताम्’ इति ऐन्द्रप्रकारभूतानाम् । किं वा बहुना इति, एषां हि प्रकारप्रकारिभावेन वचनमानन्त्याय भवेदिति भावः । सर्वस्येति, चतुर्दशविधस्य । ‘अभिमानतः’ इत्यनेन ‘एतद्भोगस्थानादित्वमभिमानमात्रसारमेव न त वास्तवं किञ्चित् इति दर्शितम् । निवास इति, विनापि भोग केषाञ्चित अतश्चैतदत्रैव शोधनीयम्-इत्याशयः । तदुक्तम् ‘पैशाचं राक्षसं याक्षं गान्धर्वं त्वैन्द्रमेव च । सौम्यं तथा च प्राजेशं ब्राह्मं चैवाष्टमं विदुः ।। मेरु से प्रारम्भ कर स्वादूदक पर्यन्त पहले गिनी गई दो करोड़ तिरपन लाख, पचास हजार योजन स्वर्णभूमि है । दश करोड़ लोकालोक विष्कम्भ (= खण्ड) है । दश हजार योजन अन्धकार है । ३५ करोड १९ लाख ४० हजार योजन गर्भोद है। १ करोड २७ लाख योजन परिमाण वाले ब्रह्माण्डकटाह के साथ ५० करोड़ योजन (परिमाण) होता है । इस प्रकार दशों दिशाओं में चारों ओर से भूर्लोक १०० करोड़ योजन है ॥ ११८ ॥ यह भूर्लोक चौदह प्रकार की भूतसृष्टि का आश्रय है-यह कहते हैं यह पृथ्वी लोक पशु, खग, मृग, वृक्ष, मनुष्य और सरीसृप इन छ से व्याप्त है । पिशाच, राक्षस, गन्धर्व, यक्ष और विद्याधर यहाँ तक कि समस्त भूतसृष्टि का, अभिमानवश यह यथेष्ट भोगस्थान और निवास है ।। ११९-१२० ॥ तरु = स्थावर । विद्याभृत् = इन्द्र का एक प्रकार । यहाँ तक कि-इनका प्रकार (= विशेषण) और प्रकारी (= विशेष्य) रूप से कथन आनन्त्य के लिए होगा । सबका = चौदह प्रकार का । अभिमानवश–इससे यह दिखलाया गया कि यह भोगस्थान आदि का होना केवल अभिमान के कारण है न कि यह वास्तविक है । निवास-कुछ लोगों का बिना भोग के । इसलिए इस (चौदह प्रकार) का शोधन यहीं (= भूर्लोक में) कर लेना चाहिए । वही कहा गया है ६ त.तृ. श्रीतन्त्रालोकः (स्व० १०।३५१) इति । ‘पशुपक्षिमृगाश्चैव तथान्ये च सरीसृपाः । स्थावरं पञ्चमं चैव षष्ठं मानुषयोनिकम् ॥ देवयोनिसमायुक्तं प्रोक्तं संसारमण्डलम् । चतुर्दशविधं चैव भूलोके तु विशोधयेत् ।।’ (स्व० १०॥३५३) इति ॥ १२० ।। इदानीं भुवलोकाद्यभिधत्ते भुवोकस्तथा त्वाल्लिक्षमेकं तदन्तरे । दश वायुपथास्ते च प्रत्येकमयुतान्तराः ॥ १२१ ॥ आद्यो वायुपथस्तत्र विततः परिचर्च्यते। ‘आ अर्कात्’ इति अर्क यावदित्यर्थः । तदुक्तम् ‘भूपृष्ठाद्यावदादित्यं लक्षमेकं प्रमाणतः ।’ (स्व० १०।४२२) इति । ‘अयुतान्तरा’ इति दशसहस्रप्रस्थाना:– इत्यर्थः । तत्रेति, वायुपथ दशकमध्यात् ॥ १२१ ।। MIRAHASRANAMAHILAMILETERSaraPARAN तदाह– “(यह संसारमण्डल) पिशाच, राक्षस, यक्ष, गन्धर्व, इन्द्र, चन्द्र, वरुण, और आठवाँ ब्रह्मा का माना गया है ।” (स्वतं० १०३५१) “यह संसारमण्डल पशु, पक्षी, मृग तथा अन्य सरीसृप, पाँचवा स्थावर और छठवाँ मनुष्य तथा देवयोनि से युक्त कहा गया है। यह चौदह प्रकार का है इसे पृथ्वीलोक में ही शोधित कर लेना चाहिए ॥ ११९-१२० (स्वतं० १०।३५३) अब भुवर्लोक आदि का कथन करते हैं पृथ्वी लोक से लेकर सूर्य पर्यन्त एक लाख योजन भुव:लोक है । उसके बीच दश वायुपथ हैं और वें प्रत्येक दश हजार योजन विस्तृत है । उनमें से प्रथम वायुपथ की विस्तृत चर्चा करते हैं ॥ १२१-१२२- ॥ आ अर्कात् = सूर्य तक । वही कहा गया है “पृथ्वी से लेकर सूर्य पर्यन्त एक लाख योजन परिमाण है ।” (स्वतं० १०।४२२) अयुतान्तर = दश हजार प्रस्थान वाले (प्रस्थान एक प्रकार कर दूरी नापने वाला परिमाण है यह सम्भवत: ४ योजन का होता है)। वहाँ = दश वायुपथ में से (दश दश हजार प्रस्थान वाले दश वायु पथ मिलकर १ लाख प्रस्थान परिमाण बनाते हैं) ।। १२१ ।। अष्टममाह्निकम् पञ्चाशद्योजनोवें स्यादृतर्द्धिर्नाम मारुतः ॥ १२२ ॥ आप्यायकः स जन्तनां ततः प्राचेतसो भवेत। पञ्चाशद्योजनार्ध्वं तस्मादयशतेन त ॥ १२३ ॥ सेनानीवायुरत्रैते मूकमेघास्तडिन्मुचः । ये मह्याः क्रोशमात्रेण तिष्ठन्ति जलवर्षिणः ॥ १२४ ॥ तेभ्य ऊर्ध्वं शतान्मेघा भेकादिप्राणिवर्षिणः । पञ्चाशदूर्ध्वमोघोऽत्र विषवारिप्रवर्षिणः ॥ १२५ ॥ मेघाः स्कन्दोद्भवाश्चान्ये पिशाचा ओघमारुते। ततः पञ्चाशदूर्ध्वं स्युर्मेघा मारकसंज्ञकाः ॥ १२६ ॥ तत्र स्थाने महादेवजन्मानस्ते विनायकाः । ये हरन्ति कृतं कर्म नराणामकृतात्मनाम् ॥ १२७ ॥ पञ्चाशदूर्ध्वं वज्राङ्को वायुरत्रोपलाम्बुदाः । विद्याधराधमाश्चात्र वज्राङ्के संप्रतिष्ठिताः ॥ १२८ ॥ पञ्चाशद्योजनोचे इति, भूपृष्ठात् । आप्यायक इति, यदुक्तम् ‘यो विवर्धयते पुष्टिमोषधीनां बलं तथा । वही कहते है पचास योजन के ऊपर ऋतार्ध नामक वायु (का पथ) है । वह जन्तुओं की वृद्धि करता है । उसके बाद पचास योजन ऊपर तक प्राचेतस है । उसके ऊपर सौ योजन तक सेनानी वाय (का मार्ग) है । यहाँ वे विद्युद्वर्षी मूक मेघ है । जल वर्षा (अवस्था में) वे पृथ्वी से एक कोस की दूरी पर रहते हैं । उसके सौ योजन ऊपर मेढक आदि प्राणिवर्ग की वर्षा करने वाले मेघ हैं। उसके पचास योजन ऊपर विषजल की वर्षा करने वाले मेघ है । ओघ मारुत में स्कन्द से उत्पन्न पिशाच नामक मेघ रहते हैं । उसके ५० योजन ऊपर मारक नामक मेघ रहते हैं । उस स्थान में महादेव से उत्पन्न विनायक रहते हैं जो संशयात्मा लोगों के द्वारा किये गए कर्म को नष्ट कर देते हैं । इसके पचास योजन ऊपर व्रजाङ्क नामक वायु है यहाँ (पत्थर की वर्षा करने वाले) उपलाम्बुद नामक बादल रहते हैं । इस वज्राङ्क में निम्नकोटि के विद्याधर रहते हैं । -१२२-१२८ ॥ पचास योजन ऊपर-पृथ्वीतल से । वृद्धि करने वाला—जैसा कि कहा गया “जो अव्यय (नामक वायु) ओषधियों की पुष्टि और बल को बढ़ाता है, सारी RSHINARRHETARREARRAHATRNMEHEARRARHITRALEKHEME श्रीतन्त्रालोकः बृंहयेच्च महीं सर्वामाप्याययति चाव्ययः । (स्व० १०।४२४) इति । पञ्चाशद्योजनादूर्ध्वमिति, यथा भूपृष्ठात् पञ्चाशद्योजनानि परिवर्त्य ऊर्ध्वमृतर्द्धि: स्थितः, तथा तदूर्ध्वमपि पञ्चाशद्योजनान्यन्तरालत्वेन परिस्थाप्य अयम्-इत्यर्थः । ‘प्राचेतसः’ इति प्रचेतोभिर्निर्मितत्वात्, तदाख्येन चाग्निना सह निवासात्; अत एवाप्यायकत्वं दाहकत्वं च । तदुक्तम् ‘प्राचेतसो नाम वायुः प्रचेतोभिर्विनिर्मितः। स वै नाशयते वृक्षान्कदाचित्संप्रवर्तयेत् ।। अग्निः प्राचेतसो नाम तेनैव सह तिष्ठति ।’ (स्व० १०।४२७) इति । ‘तस्मादूर्ध्वं शतेन’ इति प्राचेतसादप्यूचं योजनानां शतमतिक्रम्य—इत्यर्थः । एवमुत्तरत्रापि व्याख्येयम् । तथाभिधायित्वाभावात् भेकादिप्राणिवर्षित्वादेव च सत्त्ववहा इत्युक्ताः । तदुक्तम् ‘योजनानां शतादूर्ध्वं मेघाः सत्त्ववहाः स्मृताः । मत्स्यमण्डूककूर्मांश्च वर्षन्ते दुर्दिने च ते॥’ (स्व० १०१४३०) इति । विषवारिवर्षित्वादेव चोपसर्गादिकारिणः । तदुक्तम् A H पृथिवी को बढ़ाता है और पुष्ट करता है । (स्वतं० १०॥४२४) पचास योजन के ऊपर, जैसे पृथ्वी तल से पचास योजन छोड़कर ऊपर ऋतर्द्धि (नामक वायु) स्थित है उसी प्रकार उसके ऊपर भी ५० योजन छोड़कर यह (स्थित) है । प्राचेतस-वरुणों के द्वारा निर्मित होने के कारण और उस नामकी अग्नि के साथ निवास होने से । इसीलिए यह वर्द्धक और दाहक है । वही कहा गया है “प्राचेतस नाम का वायु प्रचेताओं के द्वारा निर्मित है । वह वृक्षों का नाश करता है और कभी बढ़ाता भी है और प्राचेतस नाम का अग्नि उसी के साथ रहता है । (स्व० सं० १०।४२७) उसके ऊपर सौ योजन तक = प्राचेतस के ऊपर सौ बोजन पार कर । इसी प्रकार आगे भी व्याख्या करनी चाहिए । उस प्रकार का कथन न होने से और मेढ़क आदि प्राणियों की वर्षा होने के कारण सत्त्ववहा कहा गया है । वही कहा गया है “सौ योजन ऊपर प्राणिवाही मेघ कहे गए हैं जो दुर्दिन में मत्स्य मण्डूक और कूर्म बरसते हैं ।” (स्वतं० १०॥४३०) अष्टममाह्निकम् ‘पञ्चाशद्योजनादूर्ध्वं वायुरोधः प्रकीर्तितः ॥ तस्मिंस्तु रोगदा मेघा वर्षन्ति च विषोदकम्। तेनोपसर्गा जायन्ते मारका: सर्वदेहिनाम् ॥’ (स्व० १०।४३२) इति । ‘ओघे वसन्ति वै दिव्याः पिशाचा: स्कन्ददेहजाः। त्रिंशत्कोटिसहस्राणि स्कन्दस्यानुचरा: स्मृताः ।। ते वै दिव्यैश्च कुसुमैरर्चयन्ति हरात्मजम् ।’ (स्व० १०।४४२) इति । ‘तत्र स्थाने’ इति अमोघाख्ये मरुति । ‘अकृतात्मनाम्’ संशयानानाम् । तदुक्तम् ‘तस्मादूर्ध्वं त् तावद्भ्यो देव्यमोघः स्थितो मरुत। तस्मिंस्ते मारका मेघा अमोघे संप्रतिष्ठिताः ।।’ (स्व० १०।४३३) इति । ‘अमोघे विनायका घोरा महादेवसमुद्भवाः । त्रिंशत्कोटिसहस्राणि तस्मिन्वायौ प्रतिष्ठिताः ।। ये हरन्ति कृतं कर्म नराणामकृतात्मनाम् । (स्व० १०४४४) इति च । ‘उपलाम्बुदाः’ इति उपलवर्णित्वात् तदाख्याः । विद्याधराधमा इति, ___विषसम्पृक्त जल के वर्षक होने के कारण रोग उत्पन्न करने वाले हैं । वही कहा गया है “५० योजन के ऊपर वायुरोध कहा गया है । उसमें रोगप्रदान करने वाले बादल विषाक्त जल बरसाते हैं । उससे सभी शरीरधारियों को मारने वाले उपसर्ग (= रोग) उत्पन्न होते हैं ।” (स्वतं० १०॥४३२) ओघ वायु में दिव्य तथा स्कन्द के देह से उत्पन्न पिशाच रहते हैं । स्कन्द के ३० करोड़ हजार अनुचर हैं जो कि दिव्य कुसुमों के द्वारा शङ्कर-पुत्र (स्कन्द) की पूजा करते रहते हैं ।। उस स्थान में = अमोघ नामक वायु पथ में । अकृतात्माओं का = संशययुक्त लोगों का । वही कहा गया है “हे देवि ! उसके उतने ही ऊपर अमोघ वायु स्थित है । उस अमोघ में मारक मेघ प्रतिष्ठित हैं ।” (स्वतं० १०।४३३) “उस अमोघ वायु में महादेव से उत्पन्न तीस हजार करोड़ घोर विनायक प्रतिष्ठित हैं । जो कि संशयालु लोगों के (द्वारा) किये गए कर्मों का नाश कर देते हैं।” (स्वतं० १०।४४४) ARTHASEEBAI ८६ श्रीतन्त्रालोकः वक्ष्यमाणविद्याधरापेक्षया अल्पसिद्धित्वात्; अत एवैषां तत्रत्यमातङ्गारोहादेव तत्तद्गतिभाक्त्वम् ।। १२८ ।। एतत्पदप्राप्तौ चैषां निमित्तमाह ये विद्यापौरुषे ये च श्मशानादिप्रसाधने । मृतास्तत्सिद्धसिद्धास्ते वज्राङ्के मरुति स्थिताः ॥ १२९ ॥ ‘विद्यापौरुषे’ गारुडविद्यादिस्पर्धायाम् । मृता इत्यर्थादेतदन्ते । तदुक्तम् ‘वज्राङ्को नाम वै वाय: पञ्चाशद्योजने स्थितः । तस्मिंश्चोपलका नाम मेघास्तूपलवर्षिणः ।।’ (स्व० १०/४३४) इति । ‘वज्राङ्केऽपि तथा वायौ मातङ्गा: क्रूरकर्मिणः । भिन्नाञ्जननिभा घोरास्तापना नाम विश्रुताः ।। विद्याधराणामधमा मन:पवनगामिनः । ये विद्यापौरुषे ये च वेतालादीश्मशानतः ।। साधयित्वा तत: सिद्धास्तेऽस्मिन्वायौ प्रतिष्ठिताः । (स्व० १०।४४६) इति च ।। १२९ ।। उपलाम्बुद = पत्थर की वर्षा करने के कारण उस नाम वाले । अधम विद्याधर-आगे कहे जाने वाले विद्याधरों की अपेक्षा अल्पसिद्धि वाला होने के कारण । इसीलिए ये वहाँ के मातङ्ग पर आरोहण करने के कारण उस-उस गति वाले हो जाते हैं ॥ १२२-१२८ ॥ इनकी इस पद की प्राप्ति में कारण बतलाते हैं जो लोग विद्यापौरुष (शास्त्रार्थ या महाविद्या आदि की साधना) या श्मशान आदि की सिद्धि करने में मर जाते हैं उस सिद्धि के कारण सिद्ध वे लोग वज्राङ्कमरुत् में रहते हैं ।। १२९ ।। विद्यापौरुष में = गारुडविद्या आदि की स्पर्धा में । मर गए-अर्थात् इसके अन्त में । वही कहा गया है “वज्राङ्क नामक वायु पचास योजन में स्थित है उसमें उपलक नामक उपलवर्षी मेघ (स्थित) हैं ।” (स्वतं० १०।४३४) ___“वज्राङ्क वायु में भी भिन्न अञ्जन के समान घोर, क्रूरकर्मी, तापन नाम से प्रसिद्ध मातङ्ग, जो कि निम्नकोटि के विद्याधर हैं तथा मन या पवन के समान गति वाले है, रहते है । जो लोग विद्यापौरुष में अथवा वेताल आदि को श्मशान से सिद्ध कर, सिद्ध होते हैं वे इस वायु में प्रतिष्ठित है” || १२९ ॥ (स्वतं० १०४४६)अष्टममाह्निकम् पञ्चाशदूर्ध्वं वज्राङ्काद्वैद्युतोऽशनिवर्षिणः। अब्दा अप्सरसश्चात्र ये च पुण्यकृतो नराः॥ १३० ॥ भृगौ वह्नौ जले ये च संग्रामे चानिवर्तिनः । गोग्रहे वध्यमोक्षे वा मृतास्ते वैद्युते स्थिताः॥ १३१ ॥ पुण्यकृत्त्वमेव व्याचष्टे ‘भृगावित्यादिना’ । भृग्वादौ मृतास्तथाम्नातत्वात् तच्च लुप्तस्मृत्यादीनाम् । यदुक्तम् ‘भृगौ च स्मृतेर्लुप्त….. … ।’ इति । तथा, ‘परां काष्ठामनुप्राप्तो भिषग्भिः परिवर्जितः। रसास्वादपरित्यक्तो व्याधिभिः परिपीडितः ।। विमुखः स्वजनत्यक्तो देहत्यागोद्यतो नरः । आरुहेन्द्धैरवं यो हि स तत्फलमवाप्नुयात्। अन्यथा पातयेद्देहं ब्रह्महत्याफलं लभेत ।’ इति । ‘संग्रामे’ इत्यर्थाच्छरणागतादिनिमित्तम्, अन्यथा हि आत्मघातिन एते भवेयु:-इति कथमेतत्पदप्राप्ति: स्यात् । यदुक्तम्
  • ‘असुर्या नाम ते लोका अन्धेन तमसा वृताः । __वज्राङ्क से पचास योजन ऊपर वैद्युत नामक (वायु) है । यहाँ वज्रवर्षी बादल, अप्सरायें तथा जो पुण्यशील नर हैं, (वे रहते हैं) । भृगु (= पर्वत की ढलवाँ भूमि) अग्नि, जल में (मरे हुये) और जो लोग संग्राम में लौट कर नहीं आते अथवा गौ के पकड़ने, मारने या छुड़ाने में जो मर जाते हैं वे वैद्युत लोक में स्थित होते हैं ॥ १३०-१३१ ।। __ ‘भृगु में’ इत्यादि के द्वारा पुण्यकृत् की ही व्याख्या करते हैं । भृगु आदि में मृत क्योंकि वैसा आकर ग्रन्थों में कहा गया । और वह, जिनकी स्मृति लुप्त हो जाती है उनके लिए है । जैसा कि कहा गया है “स्मृति के लुप्त होने पर, भृगु (= जलप्रपात में गिरकर मरने से………)” “(रोग की) अन्तिम अवस्था को प्राप्त, वैद्यों के द्वारा अस्वीकृत, रस के आस्वाद में असक्त, व्याधियों से पीड़ित, निराश, अपने आदमियों के द्वारा परित्यक्त, शरीरत्याग के लिए उद्यत जो मनुष्य भैरव पर आरूढ़ होता है वह उसके फल को प्राप्त होता है । यदि दूसरे प्रकार से प्राणत्याग करता है तो ब्रह्महत्या के फल को पाता है।” संग्राम में शरणागत आदि के सन्त्राण के कारण, अन्यथा ये आत्मघाती हो जाऐंगे—इसलिए कैसे इस पद की प्राप्ति होगी । जैसा कि कहा गया है । ८८ श्रीतन्त्रालोकः तांस्ते प्रेत्याभिगच्छन्ति ये के चात्महनो जनाः ।। (ई०७० ३ ऋ०) इति । स्थिता इति, अर्थाद्विमानैः । तदुक्तम् ‘तावद्भिर्योजनैरेव ततो वै वैद्युतोऽनिलः । मेघास्तु वैद्यतास्तस्मिन्निवसन्ति त् वैद्यताः।। अशनिर्वायुसंक्षोभात्तेष्वसौ जायते महान् ।’ (स्व० १०४३५) इति । ‘वैदयुतेऽप्सरसस्तस्मिन्वासवेन प्रयोजिताः । तिष्ठन्ति सर्वदा तत्र पृथिवीपुरपालने ।। भृगौ वह्नौ जले वाथ संग्रामेष्वनिवर्तकाः । गोग्रहे वन्दिमोक्षे च म्रियन्ते पुरुषोत्तमाः । ते व्रजन्ति ततस्तूचं विमानैर्मणिचिह्नितैः ।। (स्व० १०।४४९) इति ।। १३१ ॥ वैद्यतादैवतस्तावांस्तत्र पष्टिवहाम्बदाः । ऊर्ध्वं च रोगाम्बुमुचः संवर्तास्तदनन्तरे ॥ १३२ ॥ रोचनाञ्जनभस्मादिसिद्धास्तत्रैव रैवते । क्रोधोदकमुचां स्थानं विषावर्तः स मारुतः ॥ १३३ ॥ “असुर्या नामक वे लोक घने अन्धकार से आवृत हैं । जो आत्मघाती मनुष्य होते है वे मर कर उन्हीं को प्राप्त होते हैं ।” (ई०उ० ३.३) स्थित अर्थात् विमानों के द्वारा । वही कहा गया है “उसके बाद उतने ही योजन वैद्युत वायु है । उस वैद्युत वायु में वैद्युत मेघ रहते हैं । उनमें वायु के संक्षोभ से महान् वज्रघोष होता है ।” (स्वतं० १०।४३५) “उस वैद्युत वायु में इन्द्र के द्वारा नियोजित अप्सरायें सदा पृथ्वीपुर के पालन में लगी रहती हैं । भृगु, वह्नि या जल में (मरने वाले) अथवा संग्राम से न लौटने वाले, मृगों के पालन, बन्धन और मोक्ष के सन्दर्भ में जो उत्तम पुरुष मरते हैं वे मणिखचित विमानों के द्वारा उसके ऊपर चले जाते हैं” ॥ १३१ ॥ (स्वतं० १०।४४९) वैद्युत से लेकर उतना (= पचास योजन) रैवत वायु लोक है। उसमें पुष्टिवह नामक मेघ रहते हैं । (उसके) ऊपर उसी के बीच रोगाम्बु बरसने वाले संवर्त (नामक मेघ रहते हैं) । उसी रैवत में गोरोचन अञ्जन भस्म आदि की सिद्धि वाले (लोग रहते हैं) । जहाँ क्रोधोदक बरसने वाले बादलों का स्थान है वहाँ विषावर्त्त नामक वायु है । पचास (योजन) ऊपर अष्टममाह्निकम् पञ्चाशदूर्ध्वं तत्रैव दुर्दिनाब्दा हुताशजाः । विद्याधरविशेषाश्च तथा ये परमेश्वरम् ॥ १३४ ॥ गान्धर्वेण सदार्चन्ति विषावर्तेऽथ ते स्थिताः । विषावर्ताच्छतादूर्ध्वं दुर्जयः श्वाससंभवः ॥ १३५ ॥ ब्रह्मणोऽत्र स्थिता मेघाः प्रलये वातकारिणः । पुष्कराब्दा वायुगमा गन्धर्वाश्च परावहे ॥ १३६ ॥ जीमूतमेघास्तत्संज्ञास्तथा विद्याधरोत्तमाः । ये च रूपव्रता लोका आवहे ते प्रतिष्ठिताः ॥ १३७ ॥ महावहे त्वीशकृताः प्रजाहितकराम्बुदाः । महापरिवहे मेघाः कपालोत्था महेशितुः ॥ १३८ ॥ ‘भस्मादि’ इत्यादिग्रहणात् पादुकादि । तदुक्तम् ‘तदूर्ध्वं योजनानां तु पञ्चाशद्रैवतः स्मृतः । तस्मिन्पुष्टिवहो नाम पुष्टिं वर्षति देहिनाम् ॥’ (स्व० १०॥४३६) इति । ‘रैवते तु महात्मानः सिद्धा वै सुप्रतिष्ठिताः । गोरोचनाञ्जने भस्म पादुके अजिनादि च ।। वहीं पर अग्नि से उत्पन्न दुर्दिन नामक बादल रहते हैं । विशिष्ट विद्याधर लोग तथा जो गान्धर्व रीति (= गायन वादन नृत्य) के द्वारा परमेश्वर की अर्चना करते रहते हैं, वे उसमें रहते हैं । विषावर्त्त से १०० योजन ऊपर ब्रह्मा के नि:श्वास से उत्पन्न दुर्जय (नामक वायु) स्थित है । यहाँ प्रलयकाल में हवा उत्पन्न करने वाले मेघ स्थित हैं । परावह (वायु) में पष्कर नामक मेघ तथा वायु की गति वाले गन्धर्व रहते हैं । जीमूत नामक मेघ तथा उसी नाम वाले उत्तम विद्याधर और जो रूपव्रत (= रूप बदलने वाले अर्थात् बहुरूपिया) लोग हैं वे आवह में प्रतिष्ठित है । महावह में ईश्वर के द्वारा बनाये गए प्रजाओं के हितकारी बादल रहते हैं । महापरिवह में महेश्वर के कपाल से निकले हुये बादल रहते हैं ॥ १३२-१३८ । भस्म आदि-आदि शब्द से पादुका आदि (समझना चाहिए) । वही कहा गया “उसके पचास योजन ऊपर रैवत (वायुलोक) कहा गया है उसमें पुष्टिवह नामक (मेघ) शरीरधारियों के लिए पुष्टि की वर्षा करते हैं ।” (स्वतं० १०।४३६) “रैवत में सिद्ध महात्मा सुप्रतिष्ठित हैं । वे महात्मा गोरोचन अञ्जन, भस्म, श्रीतन्त्रालोक: साधयित्वा महात्मानः सिद्धास्ते कामरूपिणः ।’ (स्व० १०।४५१) इति च । ऊर्ध्वमिति, रैवतात् । तदन्तरे’ इति तान्येव पञ्चाशद्योजनान्यन्तरं शून्यरूपं यत्र–इत्यर्थः । तदुक्तम् ‘संवर्ते रोगदा मेघास्ते रोगोदकवर्षिणः । पञ्चाशद्योजने ते वै तस्मिंस्तिष्ठन्ति तोयदाः।।’ (स्व० १०।४३७) इति दुर्दिनाब्दा इति, दुर्दिनकारित्वात् । ‘गान्धर्वेण’ इति वंशीवीणादिना । तदुक्तम् ‘विषाव” नाम वायुः पञ्चाशदुपरि स्थितः । तस्मिन्क्रोधोदका नाम मेघा वै संप्रतिष्ठिताः।। ते क्रोधरागबहुलं संग्रामबहुलं तथा । राज्ञां क्षयकरं चैव प्रजानां क्षयदं तथा । वर्ष चैव प्रकुर्वन्ति यदा वर्षन्ति ते घनाः।’ (स्व० १०।४४०) इति । ‘विषावर्ते महावायौ विद्याधरगणाः स्मृताः । दशं त्रिंशच्च कोट्यस्ते दिव्याभरणभूषिताः ॥’ (स्व १०/४५३) इति । ‘आग्नेया धूमजा मेघाः शीतदुर्दिनदाः स्मृताः । पादुका, चर्म आदि को सिद्ध कर कामरूपी सिद्ध बन गये होते हैं । (स्व० १०।४५१) ऊपर-रैवत के । उसके बीच–वे ही ५० योजन अन्तर = शून्य रूप है जहाँ वह स्थान । वही कहा गया है ___ “संवर्त में रोग देने वाले मेघ हैं । वे रोगजल बरसते हैं । वे बादल उसमें ५० योजन तक स्थित है ।” (स्वतं० १०।४३७) दुर्दिन मेघ-दुर्दिनकारी होने से । गान्धर्व के द्वारा–बाँस की वंशी आदि के द्वारा । वही कहा गया है “विषावर्त्त नामक वायु संवर्त से ५० योजन ऊपर स्थित है । उसमें क्रोधोदक नामक मेघ प्रतिष्ठित हैं । जब वे बरसते हैं तो वे क्रोधरागबहल, संग्रामबहल, राजाओं और प्रजाओं का क्षय करने वाली वर्षा करते हैं । (स्व० तं० १०।४४०) “विषावर्त्त महावायु में विद्याधरों का समूह रहता है । वे चालीस करोड़ हैं और दिव्य आभूषणों से अलंकृत हैं । (स्वतं० १०।४५३) अष्टममाह्निकम् विषावर्तं नावमिव ते वायुं यान्ति संश्रिताः ॥ तत्र गान्धर्वकुशला गन्धर्वसहधर्मिणः । वंशवीणाविधिज्ञाश्च पक्षिण: कामरूपिणः ।। (स्व० १०/४५५) इति च । अत्र च संवर्तेऽपि महावायाविति उद्द्योतकारव्याख्यापाठान्न भ्रमणीयम् - यत्संवतें कथं विद्याधरा नोक्ता विषावर्ते तु उक्ता इति, अस्मत्तर्कित एव हि पाठः साधुः, महाजनपरिगृहीतत्वात् । एवम् ‘योजनानां शतादूर्ध्वं वायुरोधः प्रकीर्तितः ।’ (स्व० १०॥४३१) इत्यादावपि अस्मत्तर्कित एव पाठो ग्राह्यः, अन्यथा हि ‘तस्मादूर्ध्वं तु तावद्भ्यः ……………….. ।’ (स्व० १०॥४३२) इत्यादौ तावदर्थस्तन्मतेऽपि न सङ्गतः स्यात् । ‘दुर्जयः’ इति तन्नामा वायुः । तदुक्तम् ‘ब्रह्मजा नाम वै मेघा ब्रह्मनि:श्वाससम्भवाः । उपरिष्टायोजनशतादुर्जयस्योपरि स्थिता: ।।’ (स्व० १०।४५६) इति । गन्धर्वाश्च इति, चशब्दाद् दुर्जयाख्यमेघादीनामपि ग्रहणम् । तदुक्तम् “धूम से उत्पन्न अग्निमय मेघ शीत और दुर्दिन प्रदान करने वाले कहे गए हैं । जिस प्रकार ऊपर पाल टंगी हुयी नाव वायु को आश्रित कर बिना पतवार के चलती है उसी प्रकार वे विषावर्त को आश्रित करके जाते हैं । वहाँ गान्धर्वविद्या में कुशल; गन्धर्वो के सहकर्मी बाँस की वंशी की विधि को जानने वाले कामरूपी पक्षी रहते हैं ।” (स्वंतं० १०।४५५) __ यहाँ ‘संवर्त्त महावायु में भी’ ऐसे उद्योतकार के व्याख्यापाठ के कारण भ्रान्त नहीं होना चाहिए कि संवर्त्त में विद्याधर नहीं कहे गए और यहाँ कहे गए क्योंकि महान् लोगों के द्वारा स्वीकृत होने के कारण हमारे द्वारा तर्कित पाठ ही समीचीन है। इस प्रकार “सौ योजन ऊपर वायु का रोध कहा गया है ।” (स्वतं०.१०।४३१) इत्यादि में भी हमारे द्वारा स्वीकृत पाठ ही मानना चाहिए । अन्यथा उससे ऊपर उतना ही… ” (स्वतं० १०।४३२) इत्यादि में उतना अर्थ उस मत में भी सङ्गत नहीं होगा । ‘दुर्जय’ उस नाम वाला वायु । वही कहा गया है “ब्रह्मा के निश्वास से उत्पन्न ब्रह्मज नाम के मेघ दुर्जय के ऊपर एक सौ योजन के बाद स्थित है ।” (स्व० तं० १०।४५६) श्रीतन्त्रालोकः ‘तत्रैव दुर्जया नाम इन्द्रस्य परिरक्षकाः । परावहाभिधं वायं ते समाश्रित्य संस्थिताः ॥ महावीर्यबलोपेता दश कोट्य: प्रकीर्तिताः । पुष्करावर्तका नाम मेघा वै पद्मजोद्भवाः ॥ शक्रेण पक्षा ये च्छिन्नाः पर्वतानां महात्मनाम् । परावहस्तान्वहति मनुजानिव वारणः ।। तस्मिन्वायुगमा नाम गन्धर्वा गगनालया: ।’ (स्व०१०।४६१) इति । तदाप्रभृति एषां नैरन्तर्येणावस्थानमवसातव्यमन्तरालविधायिन्याः श्रुतेरभावात् । ‘तत्संज्ञाः’ इति जीमूतसंज्ञाः । तदुक्तम् ‘जीमूता नाम ये मेघा देवेभ्यो जीवसम्भवाः । द्वितीयमावहं वायुं मेघास्ते च समाश्रिताः ।। तस्मिञ्जीमूतका नाम विद्याधरगणा दश ।’ (स्व० १०१४६२) इति । ‘रूपव्रता’ इति रूपविडम्बकवद् रूपविधानं न तु वस्तुनिष्ठं वस्तु येषां तेन व्रत(ता) जीविन–इत्यर्थः । तदुक्तं श्रीस्वच्छन्दे ‘ये च रूपव्रता लोकास्तेषां तत्र समाश्रयः ।’ इति । ‘‘गन्धर्वश्च’ यहाँ च शब्द से दुर्जय नामक मेघ आदि का भी ग्रहण किया गया है । वही कहा गया है _ “वहीं पर दुर्जय नामक इन्द्र के परिक्षक है । वे परावह नामक वायु को आश्रित कर रहते हैं । महावीर्य और महाबल से युक्त, दश करोड़, ब्रह्मा से उत्पन्न पुष्करावर्त्तक नामक मेघ हैं । महात्मा पर्वतों के जो पङ्ख इन्द्र के द्वारा काट डाले गए थे उन (पर्वतों) को परावह नामक वाय उसी प्रकार ढोता है जैसे हाथी मनुष्यों को । वहाँ गगनवासी वायुगामी (अथवा वायुगम नामक) गन्धर्व रहते हैं ।” (स्व० तं० १०।४६१) ___ वहाँ से लेकर आगे इनकी निरन्तर स्थिति समझनी चाहिए क्योंकि अन्तराल का कथन करने वाली श्रुति नहीं है । तत्संज्ञ = जीमूतनाम वाले । वही कहा गया ___“जीमूत नाम के जो मेघ देवताओं की सांसों से जिनका जीवन सम्भव है, वे मेघ दूसरे आवह (नामक) वायु के आधीन हैं । उसमें जीमूत नामक, विद्याधरों का दश गण रहता है ।” (स्वतं० १०॥४६२) रूपव्रत-रूप बदलने वाले के समान रूप विधान, न कि वस्तुनिष्ठ वस्तु, है जिनका, उससे व्रतजीवी लोग । वही स्वच्छन्दतन्त्र में कहा गया है अष्टममाह्निकम् एतदर्धं च उद्द्योतकृता न दृष्टम्,-इति न भ्रमणीयम् । ईशकृता इति उमापतिनिर्मिताः । तदुक्तम् ‘महावहस्ततो वायुर्यत्र द्रोणाः समाश्रिताः । तस्मिन्द्रोणाः समाख्याता मेघानां परिरक्षकाः।। हितार्थं तु प्रजानां वै निर्मितास्ते मया पुरा।’ (स्व० १०।४६३) इति । मेघाः’ इति संवर्ताद्याः । तदुक्तम् ‘उपरिष्टात्कपालोत्था: संवर्ता नाम वै घनाः । महापरिवहो नाम वायुस्तेषां समाश्रयः ।। (स्व० १०॥४६४) इति ।। १३८ ।। एतदेव उपसंहरति महापरिवहान्तोऽयमृतद्धेः प्राङ्मरुत्पथः । एवमत्र योजनानां सहस्रदशकात् ऋतद्धेरारभ्य महापरिवहान्तं षोडशानां वायूनामन्तरालेषु यथोक्तक्रमेण सार्धं शतसप्तकं परिसंख्याय शिष्टं विशेषश्रुत्य भावात् सममेव विभजनीयम्, येन प्रत्येक शतपञ्चकं सार्धक्रोशा चाष्टसप्ततिर्मानं स्यात् ।। जो रूपव्रत (= रूप बदलने वालों अर्थात् बहुरूपियों का) लोक हैं उनका वहाँ आश्रय है।” इस आधे को उद्योतकार ने नहीं देखा-ऐसा भ्रम नहीं करना चाहिए । ईश्वर के द्वारा किये गये = उमापति के द्वारा रचे गये । वही कहा गया है ___“उसके बाद महावह वायु है जहाँ द्रोण नामक मेघ रहते हैं । वे द्रोण मेघों के परिरक्षक कहे गए हैं । मेरे द्वारा प्रजाओं के हित के लिए वे पहले बनाये गए थे।” (स्वतं० १०।४६३) मेघ-संवर्त आदि । वही कहा गया है “ऊपर कपाल से निकले हुये संवर्त्त नाम के मेघ हैं । महापरिवह नामक वायु उनका आश्रय स्थान है” ॥ १३८ । (स्व० सं० १०।४६४) इसी का उपसंहार करते हैं ऋतर्धि से लेकर महापरिवह तक पूर्व की ओर वायु का मार्ग है ।। १३९- ॥ इस प्रकार यहाँ दश हजार योजन वाले ऋतर्द्धि से प्रारम्भ कर महापरिवह तक सोलह वायुओं के बीच उक्त क्रम से साढ़े सात सौ योजन गिनकर बचे हुये का, श्रीतन्त्रालोकः अग्निकन्या मातरश्च रुद्रशक्तया त्वधिष्ठिताः ॥ १३९ ॥ द्वितीये तत्परे सिद्धचारणा निजकर्मजाः । तुर्ये देवायुधान्यष्टौ दिग्गजाः पञ्चमे पुनः ॥ १४० ॥ षष्ठे गरुत्मानन्यस्मिङ्गङ्गान्यत्र वृषो विभुः। दक्षस्तु नवमे ब्रह्मशक्त्या समधिति (नि)ष्ठितः ॥ १४१ ॥ दशमे वसवो रुद्रा आदित्याश्च मरुत्पथे । नवयोजनसाहस्रो विग्रहोऽकस्य मण्डलम् ॥१४२ ॥ त्रिगुणं ज्ञानशक्तिः सा तपत्यर्कतया प्रभोः । स्वलोकस्तु भुवर्लोकाद् ध्रुवान्तं परिभाष्यते ॥ १४३ ॥ सूर्याल्लक्षेण शीतांशुः क्रियाशक्तिः शिवस्य सा । चन्द्राल्लक्षण नाक्षत्रं ततो लक्षद्वयेन तु ॥ १४४ ॥ प्रत्येकं भौमतः सूर्यसुतान्ते पञ्चकं विदुः । सौराल्लक्षेण सप्तर्षिवर्गस्तस्माद् ध्रुवस्तथा ॥ १४५ ॥ ब्रह्मैवापररूपेण ब्रह्मस्थाने ध्रुवोऽचलः । मेघीभूतो विमानानां सर्वेषामुपरि ध्रुवः ॥ १४६ ॥ विशेष श्रुति न होने के कारण, बराबर-बराबर विभाग कर लेना चाहिए जिससे प्रत्येक का पाँच सौ अठहत्तर और आधा = ५७८ (१/२) कोश परिमाण हो जाए ॥ १३८ ॥ दूसरे (वायु पथ) में अग्निकन्या और मातायें रुद्रशक्ति से अधिष्ठित होकर रहती हैं । तीसरे में सिद्ध चारण और निजकर्मज ‘अपने कर्म से होने वाले’ रहते हैं । चतुर्थ में आठ देवायुध हैं । पाँचवें (वायुपथ) में दिग्गज हैं । छठे में गरुड़ दूसरे (= सातवें) में गङ्गा, अन्यत्र (= आठवें में) वष विभ हैं। नवम (वायपथ) में दक्ष रहते हैं जो ब्रह्मशक्ति से आधीष्ठित हैं । दशवें मरुत्पथ में वसु रुद्र और आदित्य रहते हैं । सूर्य का मण्डल ९ हजार योजन शरीर (= विस्तार) वाला है । प्रभु की वह ज्ञानशक्ति सूर्य के रूप में तीन गुना (= सत्ताईस हजार योजन तक) चमकती है । भुवः लोक से ध्रुवपर्यन्त स्वः लोक कहा जाता है । सूर्य से एक लाख (योजन दर) चन्द्रमा है । यह शिव की क्रियाशक्ति है । चन्द्रमा से एक लाख (योजन दूर) नक्षत्र मण्डल उससे प्रत्येक दो लाख (योजन दूर), मङ्गल (और बुध) और अन्त में सूर्यसुत (= शनि) इस प्रकार पाँच (ग्रह) है । शनि से एक लाख (योजन दूर) सप्तर्षि मण्डल और उसके बाद (एक लाख योजन दूर) ध्रुव है । ब्रह्म ही अपर रूप में ब्रह्मस्थान में (नियोजित) अचल ध्रव है। (ग्रहों को एक लोक से दसरे लोक में ले जाने वाले) विमानों का बन्धरज्जु सबके ऊपर स्थिर है ।। -१३९-१४६ ।। अष्टममाह्निकम् ‘मातरो’ ब्राह्मयाद्याः । द्वितीय इति, वायुपथे । तत्पर इति, तृतीये । अष्टाविति, नाराचादीनि । तदुक्तम् ‘चतुर्थे पथि चैवात्र वसन्त्यायुधदेवताः । नाराचचापचक्रष्टिशूलशक्तीषुमुद्गराः ॥ (स्व० १०।४६८) इति । ‘दिग्गजा’ इति ऐरावतादयः । तदुक्तम् ‘पञ्चमे पथि देवेशि वसन्त्यैरावतादयः । ऐरावतोऽञ्जनश्चैव वामनश्च महागजः ॥ सुप्रतीक: करीन्द्रश्च पुष्पदन्तस्तथैव च । कुमुदः पुण्डरीकश्च सार्वभौमोऽपि चाष्टमः ।। दिग्गजा इति विख्याता: स्वासु दिक्षु व्यवस्थिताः।’ (स्व० १०१४७१) इति । अन्यस्मिन्निति, सप्तमे । अन्यत्रेति, अष्टमे । वसवोऽष्टौ, रुद्रा एकादश, आदित्या द्वादश । तदुक्तम् ‘अत्र चाङ्गारक: सर्पिर्नैर्ऋतः सदसत्पतिः । बुधश्च धूमकेतुश्च विख्यातश्च ज्वरस्तथा ।। अजश्च भुवनेशश्च मृत्युः कापालिकस्तथा । एकादश स्मृता रुद्राः सर्वकामफलोदयाः । धाता ध्रुवश्च सोमश्च वरुणश्चानिलोऽनल: ।। मातायें-ब्राह्मी आदि । दूसरे में = वायुपथ में । उसके बाद वाले में = तीसरे (पथ) में । आठ–नाराच आदि । वही कहा गया है “इस चतुर्थ पथ में वाण, धनुष, चक्र, ऋष्टि, शूल, शक्ति, इषु और मुद्गर (ये आठ) आयुध देवतायें रहती हैं ।” (स्व० तं० १०॥४६८) दिग्गज = ऐरावत आदि । वही कहा गया है “हे देवेशि ! पाँचवे पथ में ऐरावत आदि रहते हैं । ऐरावत, अञ्जन, वामन, महागज, सुप्रतीक, करीन्द्र, पुष्पदन्त, कुमुद, पुण्डरीक और आठवाँ सार्वभौम, ये दिग्गज के रूप में प्रसिद्ध है और अपनी-अपनी दिशाओं में व्यवस्थित है।” (स्वतं० १०॥४७१) अन्य में सातवें में । अन्यत्र-आठवें में आठ वसु, ग्यारह रुद्र और बारह आदित्य रहते हैं । वही कहा गया है “यहाँ अङ्गारक, सर्पिस्, नैर्ऋत, सदसस्पति, बुध, धूमकेतु, विख्यात, ज्वर, अज, भुवनेश, तथा मृत्युकापालिक ये सभी कामनाओं का फल देने वाले ग्यारह श्रीतन्त्रालोकः प्रत्यूषश्च प्रदोषश्च वसवोऽष्टौ प्रकीर्तिताः ॥ वसव: कथिता ह्येते आदित्यांश्च निबोध मे। अर्यमा इन्द्रवरुणौ पूषा विष्णुर्गभस्तिमान् ॥ मित्रश्चैव समाख्यातस्त्वजघन्यो जघन्यकः । विवस्वांश्चैव पर्जन्यो धाता वै द्वादश स्मृताः ॥ (स्व० १०।४९९) इति । त्रिगुणमिति, सप्तविंशतिसहस्राणि । ‘तपति’ विश्वं प्रकाशयति—इत्यर्थः । ज्ञानस्य हि प्रकाशकत्वमेव स्वभाव-इति भावः । तदुक्तम् ‘ज्ञानशक्तिः परस्यैषा तपत्यादित्यविग्रहा।’ (स्व० १०।४९८) इति । भुवोकादित्यारभ्य सूर्यादिति, भुवर्लोकान्ते स्थितात् । क्रियाशक्तिरिति, जगदाप्यायकारित्वात् । तदुक्तम् ‘चन्द्ररूपेण तपति क्रियाशक्ति: शिवस्य तु ।’ (स्व० १०५०१) इति । नाक्षत्रमिति, मण्डलम् । तदुक्तम् ‘इन्दूचे लक्षमात्रेण स्थितं नक्षत्रमण्डलम् ।’ (स्व० १०५०१) रुद्र कहे गये हैं । धाता, ध्रुव, सोम, वरुण, अनिल, अनल, प्रत्यूष, प्रदोष ये आठ वसु कहे गये हैं । इस प्रकार (मेरे द्वारा) ये वसु कहे गये । अब आदित्यों को मुझसे जानो-अर्यमा, इन्द्र, वरुण, पूषा, विष्णु, गभस्तिमान्, मन्त्र, अजघन्य, जघन्यक, विवस्वान्, पर्जन्य और धाता ये बारह कहे गए हैं ।’’ (स्वतं० १०।४९९) त्रिगण = सत्ताईस हजार । तपति = विश्व को प्रकाशित करते हैं । ज्ञान का स्वभाव ही प्रकाश करना है-यह तात्पर्य है । वही कहा गया है ___“परमेश्वर की यह ज्ञानशक्ति ही आदित्य के रूप में चमकती है ।” (स्व० १०।४९८) भुव: लोक से लेकर इस लोक के अन्त में स्थित सूर्य तक । क्रियाशक्ति संसार का भरण करने के कारण यह क्रिया शक्ति कही जाती है । वही कहा गया ‘शिव की क्रियाशक्ति चन्द्ररूप से चमकती है।” (स्व० १०५०१) नाक्षत्र = नक्षत्रमण्डल । वही कहा गया है “चन्द्रमा के ऊपर एक लाख योजन की दूरी पर नक्षत्रमण्डल स्थित है” ॥ (१०।५०१)अष्टममाह्निकम् इति । लक्षद्वयेन इत्यूर्ध्वम्; तेन नक्षत्रमण्डलादूर्ध्वं लक्षद्वयेन भौमः, ततोऽपि बुधो यावदन्ते सौरः । लक्षण इत्यूर्ध्वम् । तदुक्तम् ‘अत्रिश्चैव वसिष्ठश्च पुलस्त्य: पुलहः क्रतुः । भृग्वङ्गिरा मरीचिश्च ऋषयः सप्त कीर्तिताः ।।’ (स्व० १०।५०५) इति । तथेति, लक्षणोर्ध्वम्-इत्यर्थः । ‘मेधीभूतः’ इति बन्धनस्थानता | माप्त:-इत्यर्थः । विमानानामिति, ग्रहादिसम्बन्धिनाम् । तदुक्तम् ‘ब्रह्मैवापररूपेण ध्रुवस्थाने नियोजितः । तस्य ज्योतिर्गणो देवि निबद्धो भ्रमते सदा ॥ निश्चल: स तु विज्ञेयः शिवशक्त्या त्वधिष्ठितः ।’ (स्व० १०५१०) इति ।। १४६ ।। अत्र बद्धत्वेऽपि एषामाधारः कः ?–इत्याशङ्कयाह अत्र बद्धानि सर्वाण्यप्यूह्यन्ते निलमण्डले । अनिलमण्डलानि च कियन्ति ? — इत्याशङ्कयाह स्वस्सप्त मारुतस्कन्धा आमेघाद्याः प्रधानतः ॥ १४७ ॥ स्वरिति, स्वर्गलोके । ‘आमेघाद्या’ इति आमेघादामेघ तदाद्यो येषाम् । दो लाख योजन से ऊपर की ओर । इस प्रकार नक्षत्रमण्डल से दो लाख योजन ऊपर भौम है । उससे भी (दो लाख योजन ऊपर) बुध और अन्त में शनि १ लाख से ऊपर । वही कहा गया है “अत्रि, वशिष्ठ, पुलस्त्य, पुलह, क्रतु, भृगु, अङ्गिरा और मरीचि ये सात ऋषि (सप्तर्षि) कहे गए हैं ।” (स्व० १०१५०५) तथा—एक लाख योजन ऊपर । मेधीभूत-बन्धनरूपता को प्राप्त । विमानों का—ग्रह आदि से सम्बद्ध (विमानों) का । वही कहा गया है “ब्रह्मा ही अपर रूप से ध्रव के स्थान में लगाये गए हैं। उससे निबद्ध ज्योतिर्गण सदा घूमते रहते हैं । शिव की शक्ति के द्वारा अधिष्ठित उसे (= ब्रह्मा को) निश्चल जानना चाहिए’ ॥ १४६ ॥ (स्व० १०।५१०) यहाँ (= ध्रुव स्थान में) बद्ध होने पर भी इनका आधार क्या है? यह शङ्का कर कहते हैं यहाँ सबके सब अनिलमण्डल में बद्ध माने जाते हैं ।। १४७- ।। अनिलमण्डल कितने हैं ? यह शङ्का कर कहते हैं स्वर्ग में मेघ से प्रारम्भ कर प्रधानरूप से सात वायुस्कन्ध हैं ।। -१४७ ।। ७ त. तृ. ९८ श्रीतन्त्रालोकः तदुक्तम् - ‘आमेघाद्भास्करात्सोमान्नक्षत्राद् ग्रहमण्डलात् । ऋषिसप्तकनिर्देशादाध्रुवान्तं च सप्तमः ॥’ (स्व० १०॥५१२) इति । तथा ‘पृथिव्याः प्रथम: स्कन्ध आमेघेभ्यो य आवहः । द्वितीयश्चापि मेघेभ्य आसूर्यात्प्रवहश्च यः ।। सूर्यादूर्ध्वं तथा सोमादुद्वहो यस्तु वै स्मृतः । सोमादूर्ध्वं तथर्वेभ्यश्चतुर्थः संवहस्तु सः ।। ऋक्षेभ्यश्च तथैवोर्ध्वमाग्रहाद्विवहस्तु सः । ऊर्ध्वं ग्रहादृषिभ्यस्तु षष्ठो योऽसौ परावहः ॥ सप्तर्षिभ्यस्तथैवोर्ध्वमाध्रुवात्सप्तमस्तु सः । वातस्कन्धः परिवहः…….. …………।। (पुरा०) इति ॥ १४७ ।। केषां चात्र निवास: ?-इत्याह इतश्च क्रतुहोत्रादि कृत्वा ज्ञानविवर्जिताः । स्वयन्ति तत्क्षये लोकं मानुष्यं पुण्यशेषतः ॥ १४८ ॥ एतत्सङ्कलयन्नन्यदवतारयति स्वः = स्वर्ग लोग में । आमेघाद्या:-आमेघ से आमेघ, और वह प्रथम है जिनमें । वही कहा गया है “मेघ से प्रारम्भ कर सूर्य, चन्द्र, नक्षत्रमण्डल, ग्रहमण्डल, सप्तर्षि, और ध्रुव तक सातवाँ (स्कन्ध) है ।’’ (स्व० १०।५१२) तथा ‘पृथिवी से लेकर मेघ तक जो प्रथम स्कन्ध (है उसका नाम) आवह है । मेघ से लेकर सूर्य तक का द्वितीय स्कन्ध प्रवह है । सूर्य से लेकर चन्द्र तक जो कहा गया है वह (तृतीय स्कन्ध) उद्वह है । सोम से लेकर नक्षत्रमण्डल तक चतुर्थमार्ग संवह है। नक्षत्रमण्डल से लेकर ग्रहों तक विवह है और ग्रहमण्डल से ऊपर सप्तऋषि तक जो छठां (स्कन्ध) है वह परावह है । सप्तर्षि से ऊपर ध्रुव तक सातवाँ वातस्कन्ध परिवह है । (पुरा०) ॥ १४७ ॥ यहाँ किनका निवास है ?—यह शङ्का कर कहते हैं यज्ञ होम आदि करके ज्ञानरहित लोग यहाँ से स्वर्ग को जाते हैं । उस (स्वर्ग) का क्षय होने पर पुण्य के शेष होने के कारण पुनः मनुष्यलोक में लौट आते हैं ॥ १४८ ॥ अष्टममाह्निकम् एवं भूमे वान्तं स्याल्लक्षाणि दश पञ्च च । द्वे कोटी पञ्च चाशीतिर्लक्षाणि स्वर्गतो महान् ॥ १४९ ॥ मार्कण्डाद्या ऋषिमुनिसिद्धास्तत्र प्रतिष्ठिताः । निवर्तिताधिकाराश्च देवा महति संस्थिताः ॥ १५० ॥ महान्तराले तत्रान्ये त्वधिकारभुजो जनाः । अष्टौ कोट्यो महल्लोकाज्जनोऽत्र कपिलादयः॥ १५१ ॥ तिष्ठन्ति साध्यास्तत्रैव बहवः सुखभागिनः । जनात्तपोर्ककोट्योऽत्र सनकाद्या महाधियः ॥ १५२ ॥ प्रजापतीनां तत्राधिकारो ब्रह्मात्मजन्मनाम् । ब्रह्मालयस्तु तपसः सत्यः षोडश कोटयः ॥ १५३ ॥ तत्र स्थितः स स्वयम्भूर्विश्वमाविष्करोत्यदः । सत्ये वेदास्तथा चान्ये कर्मध्यानेन भाविताः ॥ १५४ ॥ आनन्दनिष्ठास्तत्रोद्ये कोटिरिञ्चमासनम् । ब्रह्मासनात्कोटियुग्मं पुरं विष्णोर्निरूपितम् ॥ १५५ ॥ ध्यानपूजाजपैर्विष्णौभक्ता गच्छन्ति तत्पदम् । वैष्णवात्सप्तकोटीभिर्भुवनं परमेशितुः ॥ १५६ ॥ रुद्रस्य सृष्टिसंहारकर्तुर्ब्रह्माण्डवम॑नि । इसका संक्षेप करते हुए अन्य (विषय) का प्रारम्भ करते हैं इस प्रकार भूमि से लेकर ध्रुव पर्यन्त १५ लाख योजन विस्तार का अन्तराल है । स्वर्ग से आरम्भ कर दो करोड़ पचासी लाख योजन महर्लोक की दूरी है । वहाँ मार्कण्डेय आदि ऋषि मुनि और सिद्ध प्रतिष्ठित हैं। जिनका अधिकार समाप्त हो गया है वे देवता (भी) महर्लोक में स्थित हैं । उस महअन्तराल में दूसरे आधिकारभोगी लोग रहते हैं । महर्लोक से आठ करोड़ (योजन दूर) जनलोक है । यहाँ कपिल आदि रहते हैं और वहीं पर बहुत से सुखी साध्य (= विशेष प्रकार के देवता) लोग रहते हैं । जन लोक से तपो लोक १२ करोड़ (योजन दूर) है। यहाँ महाबुद्धिमान् सनक आदि रहते हैं । वहाँ ब्रह्मपुत्र प्रजापतियों का अधिकार है । तपोलोक से सोलह करोड़ योजन दूर ब्रह्मा का आलयभूत सत्यलोक है । वहाँ वह स्वयम्भू रहते हैं । ये विश्व की सृष्टि करते हैं । सत्यलोक में वेद रहते हैं । तथा कर्मध्यान से भावित आनन्दपूर्ण दूसरे लोग (भी रहते) हैं । वहाँ से एक करोड़ योजन ऊपर ब्रह्मा का आसन (= भुवन) है। ब्रह्मासन से दो करोड़ योजन ऊपर विष्णु का पुर कहा गया है । ध्यान, पूजा जप (आदि) के द्वारा विष्णु की भक्ति करने वाले उस पद को प्राप्त होते हैं । १०० श्रीतन्त्रालोकः ___ तत्र भुवोको लक्षण, ततः सोमस्ततोऽपि नक्षत्रमण्डलम् इति त्रीणि लक्षाणि । ततो भौमात्सौरान्तं प्रत्येकं लक्षद्वयेन दश, तत: सप्तर्षयो लक्षण, ततो ध्रुव:-इति पञ्चदश भूमेधुंवान्तं भवेत् । ‘स्वर्गतः’ इति स्वर्लोकादारभ्ये त्यर्थः । ‘देवाः’ इति तत्तल्लोकवासिनः सङ्क्रन्दनाद्याः, ‘ये निवृत्ताधिकारास्तु लोकत्रयनिवासिनः । सङ्क्रन्दनादयस्तेषां महल्लोके लय: स्मृतः।।’ यदभिप्रायेणैव पूर्व ‘कूष्माण्डहाटकाद्यास्तु क्रीडन्ति महदाह्वये ।’ इत्याद्युक्तम् । ‘अन्ये’ इति तत्तद्यज्ञानुष्ठातार: कपिलादय इति । तदुक्तम् ‘एकपादोऽथ जह्वश्च कपिलश्चासुरिस्तथा । भौतिको वाड्वलिश्चैव जनलोकनिवासिनः ॥’ (स्व० १०।५०८) इति ।। तथा ‘साध्या नाम सुरास्तस्मिन्वसन्ति सुखिनः सदा।’ इति । वैष्णव लोक से सात करोड़ (योजन ऊपर) ब्रह्माण्ड वर्त्म में सृष्टि का संहार करने वाले परमेश्वर रुद्र का भुवन है ॥ १४९-१५७- ।। उनमें भुव:लोक एक लाख, उसके बाद चन्द्रलोक उसके बाद नक्षत्र मण्डल, इस प्रकार तीन लाख योजन । इसके बाद भूलोक से सूर्यलोक तक प्रत्येक के दो लाख (योजन) होने से दश (लाख योजन)। उसके बाद सप्तर्षि एक लाख, उसके बाद ध्रुव । इस प्रकार भूलोक से लेकर ध्रुवलोक तक १५ लाख बोजन विस्तार होता है । स्वर्गत: = स्वर्गलोक से आरम्भ करके । देवतायें = उन-उन लोकों में रहने वाले संक्रन्दन आदि । “जिनका अधिकार समाप्त हो गया है ऐसे तीनों लोक में रहने वाले जो संक्रन्दन आदि, उनका महःलोक में लय कहा गया है ।” इसी अभिप्राय से पहले ही “कूष्माण्ड हाटक आदि महद् नामक (लोक) में क्रीड़ा करते हैं।” इत्यादि कहा गया । अन्य लोग = भिन्न-भिन्न यज्ञों का अनुष्ठान करने वाले । कपिल आदि। वही कहा गया “एकपाद, जह्व, कपिल, आसुरि, भौतिक और वाड्वलि जनलोक के निवासी हैं ।” (स्व०१०।५०८) तथा “उसमें सदैव साध्य नाम वाले देवता सुखपूर्वक रहते हैं ।” अष्टममाह्निकम् अर्ककोट्यो द्वादश । ब्रह्मात्मजन्मनामित्यर्थान्मानसानाम् । तदुक्तम् ‘सनकश्च सनन्दश्च सनत्कुमारः सनन्दनः । शङ्कुश्चैव त्रिशकुश्च तपोलोकनिवासिनः।।। (स्व० १०१५२०) इति तथा ‘प्रजानां पतयस्तत्र मानसा ब्रह्मण………।’ इति । ‘आविष्करोति’ इति सृजति–इत्यर्थः । ‘अन्ये’ इति शिक्षाकल्पादयः । ‘आसनम्’ इति आस्यतेऽस्मिन्निति भुवनम् । तदुक्तम् ‘कर्मज्ञानेन संसिद्धा अद्वैतपरिनिष्ठिताः । आनन्दपदसंप्राप्ता आनन्दपदमागताः ।। ऋग्वेदो मूर्तिमांस्तस्मिन्निन्द्रनीलसमद्युतिः ।’ (स्व० १०॥५२५) इति । ‘उत्तरेण यजुर्वेदः शुद्धस्फटिकसन्निभः ।’ (स्व० १०१५२६) इति । ‘स्थित: पश्चिमदिग्भागे सामवेदः सनातनः।’ (स्व० १०१५२७) इति । ‘अथर्वाञ्जनवच्छ्यामः स्थितो दक्षिणतस्तथा।’ (स्व० १०१५२९) इति । ‘षडङ्गानीतिहासाश्च पुराणान्यखिलानि तु । अर्ककोटि = बारह (करोड़) । ब्रह्मात्मजन्मा के = (ब्रह्मा के) मानस पुत्रों के । वही कहा गया है “सनक, सनन्दन, सनत्कुमार, सनातन, शङ्क और त्रिशङ्क ये तपोलोक में रहने वाले हैं । (स्व० १०१५२०) तथा “ब्रह्मा के मानस पुत्र प्रजाओं के पतिगण………….. ।” आविष्कार करते हैं = सृष्टि करते हैं । अन्य = शिक्षा कल्प आदि । आसन = जिसमें बैठा जाए = भुवन । वही कहा गया है “कर्म ज्ञान के द्वारा सिद्ध, अद्वैत के विषय में परिपक्व, आनन्द पद को प्राप्त आनन्द पद में आते हैं । उसमें (= सत्यलोक में) इन्द्रनील के समान कान्तिवाला मूर्तिमान् ऋग्वेद रहता है ।” (स्व० १०।५२५) ‘उत्तर की ओर शुद्ध स्फटिक के समान यजुर्वेद रहता है ।(स्व० १०।५२६) “पश्चिम दिशा में सनातन सामवेद स्थित है ।” (स्व० १०५२७) “अञ्जन के समान काला अथर्ववेद (सत्यलोक के) दक्षिण में स्थित है ।” (स्व० १०॥५२९) श्रीतन्त्रालोकः वेदोपनिषदश्चैव मीमांसारण्यकं तथा ।। स्वाहाकारवषट्कारौ रहस्यानि तथैव च । गायत्री च स्थिता यत्र यत्र देवश्चतुर्मुखः ।।’ (स्व० १०।५३०) इति ‘कोटियोजनमानेन सत्यलोकोर्ध्वतः प्रिये । ब्रह्मासनमिति ख्यातम्…………………. ।। (स्व० १०५३३) इति च । ‘तत्पदम्’ इति विष्णुपदम् । वैष्णवादिति, तदूर्ध्वम्-इत्यर्थः ।। १५६ ।। केषां चात्र निवास: ?-इत्याह दीक्षाज्ञानविहीना ये लिङ्गाराधनतत्पराः ॥ १५७ ॥ ते यान्त्यण्डान्तरे रौद्रं पुरं नाधः कदाचन । लिङ्गाराधनतत्परा इति, शिवधर्मोत्तरादिप्रक्रियया ।। १५७ ॥ ननु यद्येवं तत्किमेते तत्रैवासते किमुत ततोऽप्यूज़ यान्ति ? -इत्याशङ्कयाह तत्स्थाः सर्वे शिवं यान्ति रुद्राः श्रीकण्ठदीक्षिताः॥ १५८ ॥ अधिकारक्षये साकं रुद्रकन्यागणेन ते। “वेद के छ अङ्ग, समस्त इतिहास पुराण, वेद और उपनिषद, मीमांसा और आरण्यक, स्वाहा और वषट्, रहस्यविद्या और गायत्री वहीं स्थित है जहाँ ब्रह्मा स्थित हैं ।” (स्व० १०।५३०-३१) “हे प्रिये ! सत्य लोक से एक करोड़ योजन ऊपर ब्रह्मा का आसन कहा गया है ।” (स्व० १०।५३३) तत्पद = विष्णुपद । वैष्णव से = उसके ऊपर ॥ १४९-१५६ ॥ यहाँ किन लोगों का निवास है ?-यह कहते हैं जो लोग दीक्षा और ज्ञान से रहित हैं तथा लिङ्ग की आराधना में लगे हुए हैं वे दूसरे अण्ड में अर्थात् रुद्रपुर को जाते हैं; कभी भी नीचे नहीं ।। -१५७-१५८- ।। लिङ्गाराधन में तत्पर-शिवधर्मोत्तर आदि की रीति से ॥ १५७ ॥ प्रश्न- यदि ऐसा है तो ये लोग क्यों वहीं रहते हैं उससे ऊपर क्यों नहीं जाते यह शङ्का कर कहते हैं उसमें रहने वाले वे सभी रुद्र अधिकार की समाप्ति होने पर रुद्रकन्यागण के साथ, श्रीकण्ठ के द्वारा दीक्षित होकर शिवैक्य को प्राप्त अष्टममाह्निकम् १०३ शिवमिति परम्, ‘यान्ति’ इति तदैकात्म्यापत्त्या मुच्यन्ते—इत्यर्थः ॥ नन्वेवं माहात्म्यवत्किमेतदेव भुवनमस्ति उत, भुवनान्तराण्यपि ?–इत्याह पुरं पुरं च रुद्रोर्ध्वमुत्तरोत्तरवृद्धितः ॥ १५९ ॥ तदाह ब्रह्माण्डाधश्च रुद्रोर्ध्वं दण्डपाणे: पुरं स च । शिवेच्छया दृणात्यण्डं मोक्षमार्ग करोति च ॥ १६० ॥ सर्वरुद्रो भीमभवावुनो देवो महानथ । ईशान इति भूर्लोकात् सप्त लोकेश्वराः शिवाः॥ १६१ ॥ ‘ब्रह्माण्ड’ इति तत्कर्परिकाध:- इत्यर्थः । ‘दृणाति’ इति खण्डयति विगता वरणं करोति-इत्यर्थः । ‘देवो महान्’ इति महादेवः । भूर्लोकादित्यारभ्य, तेन भूलोंके शर्वोऽधिपतिर्यावत्सत्यलोके ईशानः, इति—क्रमः । पशुपतिस्तु रुद्रलोके ऽधिपतिरित्यर्थसिद्धम् ॥ १६१ ॥ अत्र च लोकानां परापरत्वमप्यस्तीत्याह हो जाते हैं । -१५८-१५९- ॥ शिव को = परम (शिव) को । जाते हैं-उनके साथ तादात्म्य को प्राप्त होकर मुक्त हो जाते हैं ॥ १५८ ॥ प्रश्न-महात्म्य वाला क्या यही भुवन है या दूसरे भुवन भी हैं ? यह कहते रुद्र (पुर) के ऊपर उत्तरोत्तर वृद्धि के क्रम से कई पुर (= भुवन) हैं ।। -१५९ ॥ वह कहते हैं ब्रह्माण्ड के नीचे रुद्र के ऊपर दण्डपाणि का भुवन है और वह (= दण्डपाणि) शिव की इच्छा के द्वारा अण्ड का भेदन करते हैं और मोक्ष का मार्ग बनाते हैं । शर्व, रुद्र, भीम, भव, उग्र, महादेव और ईशान ये सात शिव भूलोक से प्रारम्भ करके ऊर्ध्व लोकों के शिव हैं ।। १६०-१६१ ॥ ब्रह्माण्ड-उस कड़ाही के नीचे । दृणाति = खण्डन करते हैं अर्थात् आवरणरहित करते हैं । देव महान् = महादेव । भूर्लोक से = भूर्लोक से लेकर । इस प्रकार भूर्लोक में शर्व अधिपति है जबकि सत्य लोक में ईशान-यही क्रम है । पशुपति रुद्रलोक में अधिपति हैं—यह अर्थात् सिद्ध है ।। १६०-१६१ ।। यहाँ लोकों में परापर स्तर भी हैं-यह कहते हैं १०४ श्रीतन्त्रालोकः MOHAMIRRORMATHARTERTAEPHHHHATRI स्थूलैर्विशेषैरारब्धाः सप्त लोकाः परे पुनः । सूक्ष्मैरिति गुरुश्चैव रुरौ सम्यङ्न्यरूपयत् ॥ १६२ ॥ विशेषैरिति भूतैः, सूक्ष्मैरिति अविशेषैस्तन्मात्रैः । तदाहुः ‘तन्मात्राण्यविशेषास्तेभ्यो भूतानि पञ्च पञ्चभ्यः ।। एते स्मृता विशेषा…………………………. ॥’ (सां०का० ३८) किमत्र प्रमाणम्-इत्याशयोक्तम्- ‘इति गुरुश्चैव रुरौ सम्यङ्न्यरूपयत्’ इति ।। १६२ ।। तदाह ये ब्रह्मणादिसर्गे स्वशरीरान्निर्मिताः प्रभूताख्याः। स्थूलाः पञ्च विशेषाः सप्तामी तन्मया लोकाः ॥ १६३ ॥ परतो लिङ्गाधारैः सूक्ष्मैस्तन्मात्रजैर्महाभूतैः । लोकानामावरणैर्विष्टभ्य परस्परेण गन्धाद्यैः ॥ १६४ ॥ लिङ्गाधारैः शरीराश्रयैः; अत एव लोकावरणै कारणभूतैः–इत्यर्थः । ‘विष्टभ्य परस्परेण’ इति सामान्यविशेषरूपतया परस्परावष्टम्भेन अवस्थितैः (पञ्च) स्थूल (महाभूतों) से सात लोकों की रचना हुई है और दूसरे (लोक) सूक्ष्म (सामान्यों) के द्वारा रचित हुये हैं—ऐसा रुरुशास्त्र में (मेरे) गुरु ने अच्छी तरह वर्णन किया है ॥ १६२ ॥ विशेषों के द्वारा = भूतों के द्वारा । सूक्ष्मों के द्वारा = सामान्य तन्मात्राओं के द्वारा । वही कहते हैं “तन्मात्रायें सामान्य हैं उन पाँच (तन्मात्राओं) से पाँच भूत (उत्पन्न हुये) हैं । ये विशेष कहे गए हैं…” (सां०का० ३८) इस विषय में क्या प्रमाण है ?—यह शङ्का कर कहा गया— ‘गुरु ने रुरुशास्त्र में सम्यक निरूपित किया है’ ॥ १६२ ।। वही कहते हैं सृष्टि के प्रारम्भ में ब्रह्मा के द्वारा अपने शरीर से निर्मित जो प्रभूत नामक प्रतीक उत्पन्न हुए उनमें पाँच विशेष (= पञ्चीकृत स्थूल भूत बने) ये सात लोक उन्हीं (विशेषों) से बनाये गए हैं । उसके बाद (वाले लोक), शरीर के आधार भूत, सूक्ष्म, तन्मात्राओं से उत्पन्न, लोकों का आवरण करने वाले, गन्ध आदि के द्वारा परस्पर आश्रित होकर (स्थित सामान्य और विशेषों के द्वारा बनाये गए हैं) ॥ १६३-१६४ ॥ लिङ्गाधार = शरीर के आश्रयभूत । इसीलिए लोकों के आवरण के विषय में अष्टममाह्निकम् १०५ इत्यर्थः ॥ १६४ ॥ एतदेव सङ्कलयति कालाग्नेर्दण्डपाण्यन्तमष्टानवतिकोटयः अत ऊर्ध्वं कटाहोऽण्डे स घनः कोटियोजनम् ॥ १६५ ॥ पञ्चाशत्कोटयश्चोर्ध्वं भूपृष्ठादधरं तथा । तत्र अधस्ताद् भूकटाहान्तं पञ्चाशत्कोटयः सङ्कलिताः, ऊर्ध्वं तु भूपृष्ठाद् ध्रुवान्तं पञ्चदश लक्षाणि, महान् सपञ्चाशीतिलक्षे द्वे कोटी, जनोऽष्टौ, तपो द्वादश, सत्यः षोडश, ब्राह्मं भुवनमेकम्, वैष्णवं द्वे, रौद्रं सप्त, कटाह एकः,—इत्येवं पञ्चाशत्कोटयः ॥ १६५ ।। एतदेव उपसंहरति एवं कोटिशतं भूः स्यात् सौवर्णस्तण्डुलस्ततः ॥ १६६ ॥ शतरुद्रावधिहुँफट् भेदयेत्तत्तु दुःशमम् । तण्डुल इति वर्तुलाकारत्वात् स एव–इत्यर्थः । ‘ततः’ इति विस्तीर्णः; अत एव शतरुद्रावधि:- इत्युक्तम् । दुःशममिति, वज्रसाराधिकसारत्वात् देवैरपि दुर्भेद्यमित्यर्थः । तदुक्तम् कारणभूत । परस्पर विष्टब्ध होकर = सामान्य एवं विशेष रूप में परस्पर आश्रित होकर स्थित (तत्त्वों) के द्वारा ॥ १६३-१६४ ।। इसी का संग्रह करते हैं कालाग्नि से लेकर दण्डपाणि तक ९८ करोड़ (योजन विस्तार) है । इसके ऊपर अण्ड में कटाह है वह एक करोड़ योजन विस्तार वाला है । भूपृष्ठ से ऊपर और नीचे ५० करोड़ (योजन) है ।। १६५-१६६- ॥ नीचे से लेकर भूकटाह के अन्त तक ५० करोड़ गिने गए हैं । भूपृष्ठ से ऊपर ध्रुव तक १५ लाख, मह:लोक २ करोड़ पच्चासी लाख, जनलोक ८ करोड़, तप लोक १२, सत्य लोक १६, ब्रह्मभुवन एक कोटि, वैष्णव दो, रौद्र सात और कटाह एक, इस प्रकार (ये भुवन) ५० करोड़ हैं ॥ १६५ ॥ ___ इसी का उपसंहार करते हैं इस प्रकार एक सौ करोड़ (योजन) पृथ्वी है । उसके बाद सुवर्णमय वर्तुलाकार शतरुद्रावधि विस्तृत (सौवर्ण परिमण्डल) है । हुं फट् के द्वारा इसका भेदन करना चाहिए । यह अत्यन्त दुर्भेद्य है ।। -१६६-१६७- ।। तण्डुल-गोल होने के कारण वही है । ततः = विस्तीर्ण है। इसलिए शतरुद्रावधि ऐसा कहा गया । दःशमम्-वज्र से भी अधिक कठोर होने के कारण १०६ श्रीतन्त्रालोकः ‘एवं कोटिशतं ज्ञेयं पार्थिवं तत्त्वमुच्यते । शतरुद्रावधि ज्ञेयं सौवर्णं परिवर्तुलम् ॥ वज्रसाराधिकसारं दुर्भेद्यं त्रिदशैरपि। हुंफट्कारप्रयोगेण भेदयेत्तु वरानने ।’ (स्व० १०।६२१) इति ॥ १६६ ॥ ननु शतरुद्राः कुत्रावस्थिता-यदवधिकत्वमपि अस्योच्यते-इत्याशङ्कयाह प्रतिदिक्कं दश दशेत्येवं रुद्रशतं बहिः ॥ १६७ ॥ ब्रह्माण्डाधारकं तच्च स्वप्रभावेण सर्वतः । यदुक्तम् ‘दश दश क्रमेणैव दशदिक्षु समन्ततः । पूर्वादिक्रमयोगेन कथयाम्यनुपूर्वश: ॥ कपालीशो ह्यजो बुध्नो वज्रदेहः प्रमर्दनः । विभूतिरव्ययः शास्ता पिनाकी त्रिदशाधिपः ।।’ (स्व० १०।६२३) इति ।। ‘अग्निरुद्रो हुताशी च पिङ्गल: खादको हरः ।। ज्वलनो दहनो बभ्रर्भस्मान्तकक्षयान्तकौ ॥ (स्व० १०।६२५) इति । देवताओं के द्वारा भी दुर्भेद्य है । वही कहा गया है इस प्रकार ज्ञेय पार्थिव तत्त्व एक सौ करोड़ योजन कहा गया है । इसे सौवर्ण एवं वर्तुंलाकार शतरुद्रावधि जानना चाहिए । हे वरानने ! वज्र की कठोरता से अधिक कठोर (वह) देवताओं के द्वारा भी दुर्भेद्य है । इसका भेदन हंफटकार के प्रयोग से करना चाहिए ॥ १६६ ॥ (स्वतं० १०।६२१). प्रश्न-शतरुद्र कहाँ रहते हैं जो इसकी अवधि माना गया है ? यह शङ्का कर कहते हैं प्रत्येक दिशा में दश-दश, इस प्रकार (दशो दिशाओं में) एक सौ रुद्र बाहर की ओर हैं । और वे अपने प्रभाव से सर्वत्र ब्रह्माण्ड को धारण करने वाले हैं ।। -१६७-१६८- ।। जैसा कि कहां गया है “दश-दश के क्रम से दशों दिशाओं में चारो ओर (शतरुद्र रहते हैं)। इनको क्रमश: पूर्व आदि के क्रम से कह रहा हूँ । (पूर्वदिग्वर्ती इनके नाम) कपालीश, अज, बुधन, वज्रदेह, प्रमर्दन, विभूति, अव्यय, शास्ता पिनाकी और त्रिदशाधिप हैं ।।” (स्व० १०।६२३)अष्टममाह्निकम् १०७ ‘याम्यो मृत्युर्हरो धाता विधाता कर्तृसंज्ञकः । संयोक्ता च वियोक्ता च धर्मो धर्मपतिस्तथा।।’ ___(स्व० १०।६२७) इति । ‘नैर्ऋतो दारुणो हन्ता क्रूरदृष्टिर्भयानकः । ऊर्ध्वकेशो विरूपाक्षो धूम्रो लोहितदंष्ट्रकौ ।’ _ (स्व० १०।६२९) इति । ‘बलो यतिबलश्चैव पाशहस्तो महाबलः । श्वेतोऽथ जयभद्रश्च दीर्घबाहुर्जनान्तकः ॥ मेघनादी सुनादी च ……………. (स्व० १०।६३२) इति । शीघ्रो लघुर्वायुवेग: सूक्ष्मस्तीक्ष्णो भयानकः । पञ्चान्तकः पञ्चशिखी कर्पदी मेघवाहनः ।।’ (स्व०१०।६३४) इति । ‘निधीशो रूपवान्धन्य: सौम्यदेहो जटाधरः । लक्ष्मीरत्नधरौ कामी प्रसादश्च प्रभासकः ।। (स्व० १०।६३६) इति । ‘विद्याधिपोऽथ सर्वज्ञो ज्ञानदृग्वेदपारगः । शर्वः सुरेशो ज्येष्ठश्च भूतपालो बलि: प्रियः ।’ (स्व० १०।६३८) इति । ___ “(अग्निकोण में) अग्निरुद्र, हताशी, पिङ्गल, खादक, हर, ज्वलन, दहन, बभ्र भस्मान्तक और क्षयान्तक हैं ।” (स्व०१०।६२५) “(दक्षिण में) याम्य, मृत्यु, हर, धाता, विधाता, कर्तृसंज्ञक (= कर्त्ता), संयोक्ता, विमोक्ता, धर्मी और धर्मपति ।” (स्व० १०।६२७) “(नैऋत्यकोण में) नैर्ऋत दारुण, हन्ता, क्रूरदृष्टि, भयानक, ऊर्ध्वकेशी, विरूपाक्ष, धूम्र, लोहित और दंष्टक हैं ।” (स्व० १०।६२९) “(पश्चिम में) बली, अतिबल, पाशहस्त, महाबल, श्वेत, जयप्रद, दीर्घबाहु, जनान्तक, मेघनादी और सुनादी हैं ।’’ (स्व० सं० १०।६३२) “(वायव्यकोण में) शीघ्र, लघु, वायुवेग, सूक्ष्म, तीक्ष्ण, भयानक, पञ्चान्तक, पञ्चशिखी, कपर्दी, मेघवाहन रहते हैं ।” (स्व० सं० १०।६३४) _“(उत्तर में) निधीश, रूपवान्, धन्य, सोम्यदेह, जटाधर, लक्ष्मीधर, रत्नधर, कामी, प्रसाद और प्रभासक का निवास है ।” (स्व० सं० १०।६३६) “(ईशानकोण में) विद्याधिप, सर्वज्ञ, ज्ञानदृक्, वेदपारग, शर्व, सुरेश, ज्येष्ठ, भूतपाल, बलि और प्रिय रहते हैं ।” (स्वतं० १०।६३८) १०८ श्रीतन्त्रालोकः ‘वृषो वृषधरोऽनन्तोऽक्रोधनो मारुताशनः । ग्रसनो डम्बरेशौ च फणीन्द्रो वज्रदंष्ट्रकः ॥’ (स्व० १०।६४०) इति । ‘शम्भुर्विभुर्गणाध्यक्षस्त्र्यक्षस्तु त्रिदशेश्वरः । संवाहश्च विवाहश्च नभो लिप्सुस्रिलोचनः ।।’ (स्व० १०।६४२) इति । ‘शतरुद्रा इति ख्याता ब्रह्माण्डं व्याप्य संस्थिता:।’ (स्व० १०।६४४) इति । ‘स्वप्रभावेण’ इति स्ववीर्यमाहात्म्याद्-इत्यर्थः ।। ननु अण्डं नाम किमुच्यते यदपि ब्रह्मसम्बन्धि स्यात् ?–इत्याशङ्कयाह अण्डस्वरूपं गुरुभिश्चोक्तं श्रीरौरवादिषु ॥ १६८ ॥ तद्ग्रन्थमेव पठति व्यक्तेरभिमुखीभूतः प्रच्युतः शक्तिरूपतः। आवापवाननिर्भक्तो वस्तुपिण्डोऽण्ड उच्यते ॥ १६९ ॥ तमोलेशानुविद्धस्य कपालं सत्त्वमुत्तरम् । रजोऽनुविद्धं निर्मुष्टं सत्त्वमस्याधरं तमः ॥ १७० ॥ “(ऊर्ध्व में) वृष, वृषधर, अनन्त, अक्रोधन, मारुताशन, ग्रसन, डम्बर, ईश, फणीन्द्र और वज्रदंष्ट्रक रहते हैं ।” (स्व० तं० १०।६४०) “(अध: में) शम्भु, विभु, गणाध्यक्ष, त्र्यक्ष, त्रिदशेश्वर, संवाह, विवाह, नभ, लिप्सु और त्रिलोचन का वास है । (स्व० तं० १०।६४२) ये शतरुद्र कहे गए (जो) ब्रह्माण्ड को व्याप्त कर स्थित हैं । (१०।६४४) अपने प्रभाव से = अपने पराक्रम की महिमा से—यह अर्थ है ॥ प्रश्न-अण्ड किसे कहते हैं जो कि ब्रह्म से सम्बद्ध है ? यह शङ्का कर कहते हैं श्रीरौरव आदि में गुरुओं के द्वारा अण्ड का स्वरूप कहा गया है ।। -१६८ ॥ उस ग्रन्थ को ही पढ़ रहे हैं अभिव्यक्ति की ओर गतिमान् शक्तिरूप से च्युत, भिन्न-भिन्न वस्तुओं के प्रक्षेप वाला, अविभक्त वस्तपिण्ड अण्ड कहलाता है । तमोलेश से युक्त (इस अण्ड) का ऊर्ध्व कपाल सत्त्वमय है और रजोऽनुविद्ध इस का अधर सत्त्वरहित तमोबहुल है ।। १६९-१७० ।। अष्टममाह्निकम् तत्राद्यं श्लोकं विषमत्वात्स्वयमेव व्याचष्टे वस्तुपिण्ड इति प्रोक्तं शिवशक्तिसमूहभाक् । अण्डः स्यादिति तद्व्यक्तौ संमुखीभाव उच्यते ॥ १७१ ॥ तथापि शिवमग्नानां शक्तीनामण्डता भवेत् । तदर्थं वाक्यमपरं ता हि न च्युतशक्तितः ॥ १७२ ॥ तन्वक्षादौ मा प्रसाङ्क्षीदण्डतेति पदान्तरम् । तन्वक्षादिषु नैवास्ते कस्याप्यावापनं यतः ॥ १७३ ॥ तन्वक्षसमुदायत्वे कथमेकत्वमित्यतः । अनिर्भक्त इति प्रोक्तं साजात्यपरिदर्शकम् ॥ १७४ ॥ अण्डो हि नाम ‘वस्तूनां’ तन्वक्षादीनां ‘पिण्डः’ समुदाय उच्यते, तदस्य लक्षणम्-इत्यर्थः । एवमुक्ते हि शिवस्यापि ‘शक्तयोऽस्य जगत्कृत्स्नं……………… इत्याधुक्त्या तन्वादिशक्तिसमुदायभाक्त्वात् तत्त्वं प्रसज्यते इति तस्याण्डस्य व्यक्तौ संमुखीभाव इदंप्रथमतया बहिरवभासो न तु पूर्वमपि—इति ‘व्यक्तेरभि मुखीभूतः’ इत्यनेनोच्यते येनैवमतिव्याप्तिर्न स्यात्, स हि ‘सकृद्विभातोऽयमात्मा’ इति न्यायात् सर्वदैवावभासमानः । एवमपि शक्तिमदैकात्म्यभाज: शक्तिसमूहस्या प्रथम श्लोक के कठिन होने के कारण स्वयं व्याख्या करते हैं (यद्यपि) शिवशक्ति के समूह वाली वस्तु पिण्ड कही गयी है । उसका अभिव्यक्ति की ओर झुकना अण्ड कहा जाता है । तथापि शिव के अन्दर निहित शक्तियाँ ही अण्ड होती हैं । इसीलिए दूसरा वाक्य (व्यक्तेरभिमुखीभूत…) है । वे (= शक्तियाँ) शक्तिहीन से (उत्पन्न) नहीं हो सकतीं । शरीर इन्द्रिय आदि अण्ड न माने जाए एतदर्थ दूसरा पद (= आवापन) दिया गया क्योंकि शरीर इन्द्रिय आदि में किसी का भी आवापन नहीं है। शरीर इन्द्रिय आदि के समुदाय में एकत्व कैसे होगा इसलिए साजात्य को बतलाने वाला ‘अनिर्भक्त’ पद कहा गया ।। १७१-१७४ ।। वस्तु = शरीर इन्द्रिय आदि का, पिण्ड = समुदाय, अण्ड कहलाता है । अर्थात् यह इसका लक्षण है । ऐसा कहने पर शिव भी ‘इसकी शक्तियाँ ही सम्पूर्ण संसार है ।’ इत्यादि उक्ति के द्वारा, तनु आदि शक्तिसमुदाय वाला होने के कारण अण्ड हो जाएगा । इसलिए उस अण्ड की अभिव्यक्ति में संमुखीभाव अर्थात् इदंप्रथम्नया बाहर अवभास न कि पहले भी यह बात ‘व्यक्तरभिमुखीभूत’ इसी से ही कहा जाता है जिससे इस प्रकार अतिव्याप्ति न हो । वह (परमेश्वर) ‘यह आत्मा एक ११० श्रीतन्त्रालोकः ण्डत्वं प्रसक्तं भवेत् । तासां हि शक्तीनां तत्तदर्थात्मना कादाचित्क एव बहिरभिव्यक्तौ संमुखीभावः, तन्निवृत्त्यर्थं वाक्यान्तरस्योपादानं ‘प्रच्युतः शक्तिरूपतः’ इति । स हि व्यक्त्यभिमुखीभूतत्वादेव शक्त्यात्मनः सूक्ष्माद्रूपात् ‘प्रच्युतः’ स्थूलतया व्यक्तरात्मना बहिः प्रथित:-इत्यर्थः । शक्तीनां तु व्यक्तावभिमुखी भावेऽपि न शक्तिरूपतः प्रच्याव: स्वरूपविप्रलोपप्रसङ्गात् । एवमपि तन्वक्षा दावण्डता मा प्रसक्ता भूदिति पदान्तरमुपात्तम् ‘आवापवान्’ इति । आवापो वस्त्वन्तरप्रक्षेपो विद्यते यस्य स तथा, चतर्दशविधस्य भतजातस्य तास तास योनिष्वावापनात; तन्वादौ पुनरेतन्नास्ति अन्याश्रितत्वात्, तथात्वे चान्याश्रयत्वा नुपपत्तेः । ननु एवमपि तन्वादीनामानैक्यात् समुदायरूपतया कथमस्यैकत्वेन निर्देश: स्यात्? –इत्युक्तम् ‘अनिर्भक्तः’ इति । तद्विभागाप्रतिपत्तेरेकत्वानुप्राणकं साजात्यमेव परिदर्शयति येनास्य नगरादिज्ञानवदेकत्वमेव न्याय्यं स्यात् ।। १७४ ।। ननु यद्येवं तत्प्रतितत्त्वमण्डत्वं स्यात्-इत्येतद्व्यावर्तनाय वस्तुपिण्डपदस्याप्यु पादानम्,–इत्याह विनापि वस्तुपिण्डाख्यपदेनैकैकशो भवेत् । तत्त्वेष्वण्डस्वभावत्वं नन्वेवमपि किं न तत्॥ १७५ ॥ बार प्रकाशित हुआ तो सदा के लिये हो गया’ इस न्याय से सदैव आभासित हो रहा है। इस प्रकार भी शक्तिमान के साथ एकात्मता वाला शक्तिसमूह अण्ड होने लगेगा। उन शक्तियों का भिन्न-भिन्न रूप में बाह्य अभिव्यक्ति के विषय में कभी-कभी ही संमुखीभाव होता है, उसकी निवृत्ति के लिए दूसरा वाक्य–‘शक्तिरूप से च्यूत…’ कहा गया । वह अभिव्यक्ति की ओर उन्मुख होने के कारण ही शक्त्यात्मक सूक्ष्मरूप से च्युत होकर स्थूलरूप में अभिव्यक्ति के कारण स्वयं बाह्यरूप में प्रकाशित हुआ । शक्तियों के अभिव्यक्ति की ओर उन्मुख होने पर भी उनका शक्तिरूपत्व च्युत नहीं होता क्योंकि तब तो स्वरूप का ही लोप होने लगेगा । ऐसा होने पर भी शरीर इन्द्रिय आदि अण्ड न होने लगें एतदर्थ दूसरा पद आवापवान् कहा गया । आवाप = दूसरी वस्तु का प्रक्षेप जिसमें हो वह, उस प्रकार का, क्योंकि चौदह प्रकार के प्राणिवर्ग का उन-उन योनियों में आवापन होता है । तनु आदि में यह नहीं है क्योंकि वे दूसरे पर आश्रित है, वैसा होने पर अन्याश्रयत्व नहीं होगा । प्रश्न-ऐसा होने पर भी तन आदि के अनेक होने से समुदायरूप होने के कारण कैसे एकरूप में निर्देश होता है ? इसलिए कहा गया—‘अनिर्भक्त’ । उसके विभाग का ज्ञान न होने से एकत्ववाले साजात्य को दिखला रहे हैं । जिससे इसकी (= अण्ड की) नगर आदि के ज्ञान के समान एकता ही समीचीन है ॥ १७१-१७४ ।। प्रश्न-यदि ऐसा है तो हर एक तत्त्व अण्ड होने लगेगा इसके निराकरण के लिए वस्तुपिण्ड पद भी दिया गया-यह कहते हैं अष्टममाह्निकम् गुणतन्मात्रभूतौघमये तत्त्वे प्रसृज्यते । उच्यते वस्तुशब्देन तन्वक्षभुवनात्मकम् ॥ १७६ ॥ रूपमुक्तं यतस्तेन तत्समूहोऽण्ड उच्यते । वस्तुशब्देन हि तन्वादिवत् तत्त्वान्यपि उच्यन्ते, तत्तेषामपि पिण्डोऽण्ड:-इति तत्कथं स्यात्; एवं तर्हि पृथ्वीतत्त्वस्यापि एककस्याण्डत्वमनभिधानीयम्, अभिधाने वा प्रत्येकमपि तथात्वम्-इति व्यर्थमेव वस्तुपिण्डपदोपादानम् । सत्यम् किन्तु पृथ्वीतत्त्वं स्थौल्यस्य परा कोटिः, इति तत्र तत्त्वान्तराण्यपि अन्तरवस्थितानि प्रत्यक्षमभिलक्ष्यन्ते—इत्येकत्वेऽपि अस्य अनेकतत्त्वमयत्वमिवास्ति इत्युक्तम् । यदाहुः–‘ब्रह्माण्डं च पञ्चभूतात्मकम्’ इति । एवं तर्हि सर्वत्र सर्वमस्ति-इति पृथ्वीतत्त्वस्यापि तत्त्वान्तरेषु सद्भाव:-इति पुनरपि तदवस्थ एव स दोषः । सत्यम्, तथापि पृथ्यादीनामूर्ध्वतत्त्वान्तरेषु सूक्ष्मेण रूपेणावस्थिति:, अत्र तु तेषां स्थूलेनेति शेषः । नन्वेवमपि अनेकानि वस्तूनि संभवन्ति–इति वस्तुशब्देन सत्त्वादयः शब्दादयो वा गुणा अपि उच्यन्ते-इति तत्पिण्डात्मनि प्रकृत्यादौ तत्त्वेऽपि अण्डत्वं स्यात्?–इत्याशङ्कां दर्शयति–‘नन्वेवमित्यादिना’ । गुणेति प्रकृतिः । इदमत्र प्रतिसमाधानं यद् वस्तुशब्दस्य विशेषेण धर्मरूपे प्रतिनियते ‘वस्तुपिण्ड’ पद के बिना भी तत्त्वों में अलग-अलग अण्डस्वभावता रहेगी । प्रश्न—तो ऐसा होने पर भी गुण (= प्रकृति) तन्मात्र भूतसमूह वाले तत्त्व में भी उस (= वस्तुपिण्ड) की प्राप्ति होगी ? उत्तर देते हैं चूँकि वस्तु शब्द से तनु अक्ष भुवन वाला रूप कहा गया है । इसलिए उसका समूह अण्ड कहलाता है ॥ १७५-१७७- ।। वस्तु शब्द से तनु आदि के समान तत्त्वों का भी कथन होता है । इसलिए उनका भी पिण्ड अण्ड होगा-पर यह कैसे होगा ? क्योंकि तब ऐसा होने पर एक-एक पृथ्वी तत्त्व को भी अण्ड नहीं कहना पड़ेगा । और यदि (इनको अन्ड) कह रहे हैं तो प्रत्येक को भी वैसे ही कहना होगा-इस प्रकार वस्तुपिण्ड पद का पाठ ही व्यर्थ है ? (आपका कथन) सत्य है । किन्तु पृथिवीत्व स्थूलता की अन्तिम सीमा है इसलिए उसमें दूसरे तत्त्व भी अन्दर रहते हये भी प्रत्यक्ष लक्षित होते हैं इस प्रकार एक होते हुए भी यह अनेकमय सदृश हैं—यह कहा गया है । और जो यह कहते हैं कि ब्रह्माण्ड पञ्चभूतात्मक है और इस प्रकार सब कुछ सब जगह है फलत: पृथ्वीतत्त्व की भी दूसरे तत्त्वों में सत्ता है इस प्रकार फिर वह दोष वैसा ही है ? यद्यपि यह कथन सत्य है, तो भी पृथिवी आदि की ऊर्ध्ववर्ती अन्य तत्त्वों में सक्ष्मरूप से स्थिति है और यहाँ (= पृथिवी तत्त्व में) उन (= अन्य तत्त्वों) की स्थूल रूप में स्थिति है । प्रश्न-इस प्रकार भी अनेक वस्तुयें सम्भव हैं—इसलिए वस्तु शब्द से सत्त्व आदि अथवा शब्द आदि गण भी कहे जाऐंगे इस प्रकार उनके पिण्डरूप प्रकृति आदि तत्त्व भी अण्ड होने लगेंगे? इस आशङ्का को ‘नन्वेवम्’ इत्यादि के द्वारा दिखलाते हैं । गुण = प्रकृति । यहाँ यह समाधान है HTRIAL श्रीतन्त्रालोकः तन्वादावेव वाचकत्वमत्र विवक्षितं न तु सामान्येन-इति तत्समुदाय एव न तु सत्त्वादिसमुदायोऽपि अण्ड उच्यते इति ॥ १७६ ॥ अत्र च यथासंभवमाशङ्का निराकृतैव-इत्याह भवेच्च तत्समूहत्वं पत्युर्विश्ववपुर्भृतः ॥ १७७ ॥ तदर्थं भेदकान्यन्यान्युपात्तानीति दर्शितम्। पत्युश्च तत्समूहत्वसद्भावे विश्ववपुर्धारित्वं हेतुः । ‘भेदकानि’ इति, व्यावर्तकानि ।। १७७ ।। अन्ये पुनरेतदन्यथा व्याचख्युः-इत्याह तावन्मात्रास्ववस्थासु मायाधीनेऽध्वमण्डले ॥ १७८ ॥ मा भूदण्डत्वमित्याहुरन्ये भेदकयोजनम् । ‘तावन्मात्रासु’ इति तन्वादिषु । द्वितीयस्तु सुगमत्वात् स्वयं न व्याकृत: इति व्याख्यायते-तस्य चाण्डस्य तमोलेशानविद्धस्य यदत्तरमपरितनं कपालं तद्रजोऽनविद्धं सत्त्वम. गणान्तरानवेधेऽपि तत्त्वाख्यगणशन्यं रजोऽनविद्धम, तमःसंभेदेऽपि तत्प्रधानमेवेत्यर्थः । मध्यं तु रजःप्रधानमित्यर्थसिद्धम् । यदाहुः कि यहाँ पर वस्तु शब्द का विशेषतः धर्मरूप, निश्चित होने पर तनु आदि ही सामान्यरूप में वाचक माने गए हैं न कि सत्त्व आदि का समुदाय भी ॥ १७६ ।। इस विषय में यथासम्भव आशङ्का का निराकरण हो ही गया-यह कहते हैं वह समूहता विश्वशरीरधारी विश्वपति की है। इसी के लिए दूसरे विशेषण दिये गये हैं—यह दिखलाया गया ।। - १७७-१७८- ।। पति के उस समूहरूप होने में विश्ववपुधारी होना कारण है । भेदक = व्यावर्त्तक ।। १७७ ॥ दूसरे लोग इसकी दूसरी प्रकार से व्याख्या करते हैं-यह कहते हैं उन अवस्थाओं में मायाधीन अध्वमण्डल में अण्डत्व न हों-इसलिए भेदक कहे गये—ऐसा दूसरे कहते हैं ।। -१७८-१७९- ।। ___तावन्मात्र में = तनु आदि में । दूसरे (श्लोकार्द्ध) की सुगम होने से स्वयं व्याख्या नहीं की गई—इसलिए व्याख्या की जाती है—तमोलेश से युक्त इस अण्ड का जो ऊपरी कपाल है वह रजोऽनुविद्ध सत्त्व है । दूसरे गुणों से अनुविद्ध होने पर भी वह (= सत्त्व) (वहाँ) प्रधान है । नीचे वाला कपाल ‘निर्मुष्ट सत्त्व’ = सत्त्वगुणों से शून्य रजोऽनुविद्ध है, अर्थात् तमः से युक्त होने पर भी उस (= रजः) की प्रधानता है । मध्य (भाग) तो रजःप्रधान है—यह अर्थात् सिद्ध है । जैसा कि कहते हैं अष्टममाह्निकम् ‘ऊर्ध्वं सत्त्वविशालस्तमोविशालस्तु मूलत: सर्गः । मध्ये रजोविशालो ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तः ॥’ (सां० ५५ का०) इति ॥ १७८ ।। एवं प्रकरणादण्डस्वरूपं व्याख्याय प्रकृतमेवानुसरति इत्थमुक्तविरिञ्चाण्डभृतो रुद्राः शतं हि यत् ॥ १७९ ॥ तेषां स्वे पतयो रुद्रा एकादश महार्चिषः । एकादशेति, प्रतिदिशमेक: सर्वेषां चैकः, इति । तदुक्तम् ‘स्थितो वै पूर्वतोऽण्डस्य श्वेतः……..।’ (स्व०१०।६४६) इति । ‘आग्नेय्यामग्निसङ्काशो वैद्युतः……….।’ (स्व०१०।६४८) इति । ‘याम्येऽण्डस्य महाकाल: …………..।’ (स्व०१०।६४९) इति । ‘नैऋते बिकटो नाम. .।’ (स्व०१०।६५०) इति । ‘पश्चिमेऽण्डस्य यो रुद्रो महावीर्य इति स्मृतः ।’ (स्व०१०।६५१) इति । ‘वायव्यां दिशि चाण्डस्य वायुवेगः…… ।’ (स्व०१०।६५२) इति । ‘सुभद्रनामोत्तरत:…………………….।’ (स्व०१०।६५३) इति । ‘विद्याधरो नाम रुद्र ऐशान्याम्……….’ (स्व० १०।६५४) इति । ब्रह्मा से लेकर स्तम्ब पर्यन्त यह ब्रह्माण्ड “ऊर्ध्व भाग सत्त्वप्रधान, मूल सर्ग तमःप्रधान और मध्य में रजोविशाल है । (सां०का० ५५) ॥ १७८ ॥ इस प्रकार प्रसङ्गवश अण्ड के स्वरूप की व्याख्या कर प्रस्तुत का अनुसरण करते हैं इस प्रकार उक्त ब्रह्माण्ड के जो सौ रुद्र हैं उनके अपने स्वामी महातेजस्वी ग्यारह रुद्र हैं | -१७९-१८०- ॥ ग्यारह-प्रति दिशा में एक और सब का एक । वही कहा गया है “अण्ड के पूर्व में श्वेत (रुद्र) स्थित हैं…’ (स्वतं० १०।६४६) “अरिन दिशा में अग्नि के समान वैद्युत…” (स्वतं० १०१६४८) “अण्ड के दक्षिण में महा काल…’ (स्व० तं० १०।६४९) “नैऋत में विकट…” (स्वतं० १०।६५०) “अण्ड के पश्चिम में जो रुद्र हैं वे महावीर्य है ।” (स्वतं० १०।६५१) “अण्ड की वायव्य दिशा वायुवेग…” (स्वतं० १०।६५२) “उत्तर में सुभद्र…” (स्वतं० १०।६५३) “ईशान में विद्याधर…” (स्वतं० १०।६५४) त.तृ. ११४ श्रीतन्त्रालोकः ‘अध: कालाग्निरुद्रोऽन्यः……………।’ (स्व०१०।६५६) इति । ‘एतैः समावृतो रुद्रो………………..।’ (स्व० १०।६५७) इति । ‘वीरभद्रो वृतो रुद्रैरुपर्यण्डस्य संस्थितः।’ ‘एकादशो महाकायैः……………।’ (स्व० १०।६५८) इति च । श्रीपूर्वशास्त्रे पुनरियान्विशेषो यत् तत्रैषां प्रतिदशकं तन्मध्यादेव एक एक: पतिः, इति । वीरभद्रस्तु उभयथाप्यविशिष्टः ॥ १७९ ॥ तदाह अनन्तोऽथ कपाल्यग्निर्यमनैऋतकौ बलः ॥ १८० ॥ शीघ्रो निधीशो विद्येशः शम्भुः सवीरभद्रकः । श्रीवीरभद्रस्य सत्त्वं सर्वाधिपत्यात् । तदुक्तं तत्र– ‘अनन्तः प्रथमस्तेषां कपालीशस्तथा परः । अग्निरुद्रो यमश्चैव नैर्ऋतो बल एव च ।। शीघ्रो निधीश्वरश्चैव सर्वविद्याधिपोऽपरः । शम्भुश्च वीरभद्रश्च विधूमज्वलनप्रभाः॥’ (मा० वि० ५।१४) इति ॥ १८० ॥ कथं चैषामत्रावस्थानम्?–इत्याह मधु मधुकृतः कदम्बं केसरजालानि यद्वदावृणुते ॥ १८१ ॥ तद्वत्ते शिवरुद्रा ब्रह्माण्डमसंख्यपरिवाराः । “नीचे अन्य कालाग्निरुद्र हैं…” (स्वतं० १०।६५६) “इनसे घिरे हुए रुद्र…” (स्वतं० १०६५७) “अण्ड के ऊपर भीमकाय रुद्रों से आवृत वीरभद्र नामक ग्यारहवें रुद्र स्थित हैं ।” (स्वतं० १०६५८) ___ श्रीपूर्वशास्त्र में इतना विशेष है कि वहाँ इनमें से दश-दश के ऊपर उन्हीं में से एक-एक पति हो जाता है । वीरभद्र तो दोनों रूपों में एक है ॥ १७९ ॥ अनन्त. कपालीश. अग्नि यम नैर्ऋतक. बल, शीघ्र. निधीश. विद्येश, शम्भु और वीरभद्रक ।। -१८०-१८१- ॥ वीरभद्र की सत्ता सब के अधिपति होने से है । वही वहाँ कहा है “उनमें अनन्त प्रथम है, कपालीश दूसरा, अग्निरुद्र, यम, नैर्ऋत, बल, शीघ्र निधीश्वर, सर्वविद्याधिप शम्भु, वीरभद्र ये सब निधूम अग्नि के समान कान्ति वाले हैं ॥ १८० ॥ (मा०वि० ५।१४) यहाँ इनकी स्थिति कैसी है—यह कहते हैं अष्टममाह्निकम् ११५ शराष्टनियुतं कोटिरित्येषां सन्निवेशनम् ॥ १८२ ॥ श्रीकण्ठाधिष्ठितास्ते च सृजन्ति संहरन्ति च । ईश्वरत्वं दिविषदामिति रौरववार्तिके ॥ १८३ ॥ तदुक्तम् ‘आवृत्याण्डं स्थिता ह्येते मधु यद्वन्मधुव्रताः। कदम्बकुसुमं यद्वत्केसरैः परिवारितम् ॥’ इति । ‘शरा:’ पञ्च, ‘नियुतम्’ दश लक्षाणि । तेन पञ्चाशीतिः सहस्त्राणि दश लक्षाणि कोटिश्चैका तद्भुवनानां प्रत्येकं प्रमाणमिति । अत्र च किं प्रमाणम् इत्युक्तम् ‘इति रौरववार्तिके’ इति । तदुक्तं तत्र– ‘पञ्चाशीतियोजनानां नियुतानां तथा परा । कोटिश्च तन्निवेशस्य विस्तार: परिकीर्तितः ॥’ इति । ‘श्रीकण्ठाधिष्ठितास्ते च देवानां मनसेप्सितम्। ऐश्वर्यं संप्रयच्छन्ति हरन्ति च महौजसः ।।’ इति च ।। १८३ ।। अत्र चेयानन्यत्र विशेष:- इत्याह सिद्धातन्त्रे तु हेमाण्डाच्छतकोटेर्बहिः शतम् । जिस प्रकार भ्रमर मधु को और केशरजालकदम्ब को आवृत करते हैं उसी प्रकार असंख्य परिवार वाले वे शिवरुद्र ब्रह्माण्ड को (घेरे रहते हैं)। इनका सन्निवेश (= प्रतिभुवन का परिमाण) एक करोड़ दशलाख पच्चासी (हजार) है। श्रीकण्ठ से अधिष्ठित होकर वे सृष्टि और संहार करते हैं । वे देवताओं के ईश्वर हैं—ऐसा रौरववार्त्तिक में (कहा गया है) ॥१८१-१८३।। वही कहा गया है “जिस प्रकार भ्रमर मधु को घेर कर स्थित रहते हैं अथवा कदम्बकुसुम केशरजाल से घिरा होता है उसी प्रकार ये ब्रह्माण्ड को घेर कर स्थित हैं।” शर = पाँच, नियुत = दशलाख । इससे पच्चासी हजार दश लाख और एक करोड़-यह प्रत्येक भुवन का परिमाण है। इसमें क्या प्रमाण है ? इसलिए कहा गया-रौरववार्त्तिक में | वही वहाँ कहा गया है “उसके निवेश का विस्तार एक करोड़ दशलाख पच्चासी हजार कहा गया श्रीकण्ठ के द्वारा अनुशासित वे महातेजस्वी (रुद्र) देवताओं को यथेष्ट ऐश्वर्य देते हैं और लेते हैं । १८३ ।। ___इस विषय में दूसरी जगह यह विशेष है-यह कहते हैं ११६ श्रीतन्त्रालोकः अण्डानां क्रमशो द्विद्विगुणं रूप्यादियोजितम् ॥ १८४ ॥ तेषु क्रमेण ब्रह्माणः संस्युर्द्विगुणजीविताः । क्षीयन्ते क्रमशस्ते च तदन्ते तत्त्वमम्मयम् ॥ १८५ ॥ शतमिति, संख्योपलक्षणपरमेषामसंख्यत्वात् । यदुक्तम् ‘पृथग्द्वयमसंख्यातमेकैकं च पृथग्द्वयम् ।’ (मा०वि० २।५०) इति । ‘द्विद्विगुणम्’ इति द्विशतकोटिचतु:शतकोट्यादि । ‘रूप्यादि’ इत्यादि शब्दात्ताम्रादियोजितत्वम् । द्विगुणजीविता इत्याद्यब्रह्मापेक्षया । तदुक्तं तत्र ऊर्ध्वं कालानलं नाम ब्रह्माण्डं द्विगुणं स्थितम् । तावद्यावच्छतं पूर्णमण्डानां ब्रह्मणां तथा ।। वृद्धिस्तेषु स्मृता देवि द्विगुणा वीरवन्दिते। द्विगुणं च भवेदायुः प्रथमात् पद्मजन्मनः ।। अधुना संप्रवक्ष्यामि अण्डानां नामगोचरम् । काञ्चनं कालसंज्ञं च वेतालं च महोदरम् ।।’ इत्यादि । सिद्धातन्त्र में (कहा गया है कि) सौ करोड़ योजन (विस्तृत) स्वर्णमय (ब्रह्मा) अण्ड से बाहर सौ अण्ड हैं। ये क्रमशः रजत आदि से जुड़े हुये दो-दो गुने (विस्तार वाले) हैं। उनमें क्रमश: दो गुनी आयुवाले ब्रह्मा लोग रहते हैं । वे क्रमश: नष्ट होते रहते हैं । उसके अन्त में जलमय तत्त्व है ॥ १८४-१८५ ॥ शतम्—यह संख्या लाक्षणिक है क्योंकि ये (= ब्रह्माण्ड) असंख्य है ।। जैसा कि कहा गया है “दो दो की अलग संख्या वाले असंख्य अण्ड हैं और एक-एक संख्या वाले अलग-अलग हैं ।” (मा०वि० २।५०) दो-दो गुना = दो सौ करोड़, चार सौ करोड़ इत्यादि । रूप्यादि-आदि शब्द से ताम्र आदि से जड़े हुए । दो गुनी आयु वाले–प्रथम ब्रह्मा की अपेक्षा । वही वहाँ कहा गया है “ऊपर कालानल नाम का दोगुने (विस्तार वाला) ब्रह्माण्ड स्थित है । हे देवि ! हे वीरवन्दिते ! जबतक सौ अण्ड और सौ ब्रह्मा पूर्ण नहीं होता तब तक उनमें दो गुनी वृद्धि कही गई है । प्रथम ब्रह्मा से लेकर उत्तरोत्तर ब्रह्माओं की (क्रमश:) दो गनी आय कही गई है । अब अण्डों का नाम कह रहा हूँ । काञ्चन, काल, वैताल, महोदर,” से लेकर । हैअष्टममाह्निकम् ‘गह्वरं शततमं विद्धि सर्वेषामुपरि स्थितम् । इत्यन्तम् । तथा ‘प्रथमं काञ्चनं प्रोक्तं रौक्मं चैव द्वितीयकम् । तानं च लोहजं चैव क्रमादेवं व्यवस्थिताः ।। महाकल्पे क्षयं यान्ति सदेवाः सपितामहाः । अन्तरक्षीयते ोकं महाकल्पशते शते॥ तावद्यावत्स्थितं शेषं गह्वरं तु महाण्डकम्। महाक्षये क्षयस्तस्य सामान्येनैव लुप्यते ॥’ इति ॥ १८५ ॥ एवं तत्त्वान्तराणामपि उत्तरोत्तरवृद्ध्या मानं समस्ति–इत्याह धरातोऽत्र जलादि स्यादुत्तरोत्तरतः क्रमात् । दशधाहकृतान्तं धीस्तस्याः स्याच्छतधा ततः ॥ १८६ ॥ सहस्रधा व्यक्तमतः पौंस्नं दशसहस्रधा । नियतिर्लक्षधा तस्मात्तस्यास्तु दशलक्षधा ॥ १८७ ॥ कलान्तं कोटिधा तस्मान्माया विद्दशकोटिधा । ईश्वरः शतकोटि: स्यात्तस्मात्कोटिसहस्रधा ॥ १८८ ॥ सादाख्यं व्यश्नुते तञ्च शक्तिर्वृन्देन संख्यया । व्यापिनी सर्वमध्वानं व्याप्य देवी व्यवस्थिता ॥ १८९ ॥ “सौवाँ गह्वर (नामक ब्रह्माण्ड) समझो जो सबके ऊपर स्थित है। यहाँ तक सौ ब्रह्माण्डों का वर्णन है। “पहला (ब्रह्माण्ड) काञ्चन, दूसरा रोक्म कहा गया है । ताम्र, लोह, इसी प्रकार क्रमश: व्यवस्थित हैं । (ये ब्रह्माण्ड) देवताओं और पितामहों के सहित महाकल्प में क्षय को प्राप्त होते हैं । सौ-सौ महाकल्प में एक-एक ब्रह्माण्ड बीच में तब तक क्षीण होता रहता है जब तक गह्वर नामक महा अण्ड शेष बच जाता है। महाक्षय होने पर उसका भी क्षय हो जाता है तब सामान्यत: (सब का) लोप हो जाता है ॥ १८५ ॥ इसी प्रकार दूसरे तत्त्वों का भी उत्तरोत्तर वृद्धिक्रम से परिमाण सम्भव है। यह कहते हैं पृथिवी से लेकर जल तत्त्व आदि उत्तरोत्तर क्रम से अहङ्कार तत्त्व तक दशगुना अधिक है । बुद्धि तत्त्व (अहङ्कार से) सौ गुना अधिक है। उससे हजार गुना अधिक प्रकृति है । पुरुष तत्त्व दश हजार गुना अधिक, नियति एक लाख, उससे दश लाख अधिक कला, कला से १ करोड़ गुना माया उससे दश करोड़ गुना विद्या, ईश्वर सौ करोड़ और उसकी अपेक्षा सदाशिव हजार करोड़ गुना व्याप्त हैं । उससे एक वृन्द संख्या बड़ी शक्ति श्रीतन्त्रालोकः __अप्रमेयं ततः शुद्धं शिवतत्त्वं परं विदुः । उत्तरोत्तरत इति, यथा धरातो जलं दशगुणम्, ततोऽपि तेजो यावदन्ते ऽहङ्कारः । ‘तस्या’ इति अहक्रियायाः । ‘वित्’ इति विद्या । ‘व्यश्नुते’ व्याप्नोतीत्यर्थः । समिति, शक्तयादिधरान्तम् । तदुक्तम् ‘अथोपरिष्टात्तत्त्वानि उदकादिशिवान्तकम् । उत्तरोत्तरयोगेन दशधा संस्थितानि तु ॥ अहङ्कारस्तदूर्ध्वं तु बुद्धिस्तु शतधा स्थिता । ऊर्ध्वं सहस्रधा ज्ञेयं प्रधानं वरवर्णिनि ।। पौरुषं दशसाहस्रं नियतिर्लक्षधा स्मृता । तदूर्ध्वं दश लक्षाणि कला यावत्तु सुव्रते ॥ माया तु कोटिधा व्याप्य स्थिता सर्वं चराचरम् । दशकोटिगुणा विद्या मायां व्याप्य व्यवस्थिता ।। शतकोटिगुणेनैव व्याप्तासावीश्वरेण तु । सादाख्यं कोटिसाहस्रं बिन्दुनादं तदूर्ध्वतः ।। योजनानां तु वृन्दं वै शक्तिर्व्याप्य व्यवस्थिता । व्यापिनी सर्वमध्वानं व्याप्य देवी व्यवस्थिता ।। अप्रमेयं ततो ज्ञेयं शिवतत्त्वं वरानने ।’ (स्व० १६७३) इति ।। १८६ ॥ है और व्यापिनी देवी समस्त अध्वाओं को व्याप्त करके स्थित है । उसके बाद परम, शुद्ध शिवतत्त्व अप्रमेय माना गया है ॥ १८६-१९०- ॥ _उत्तरोत्तर—जैसे पृथिवी से जल दश गुना अधिक है उससे भी तेज और अन्त में अहङ्कार (दश गुना है) । उससे = अहङ्कार से । वित् = विद्या । व्यश्नुते = व्याप्त है । सबको = शक्ति से लेकर धरातत्त्व तक । वही कहा गया है “इसके ऊपर जल से लेकर शिवतत्त्व तक के समस्त तत्त्व उत्तरोत्तर क्रम से दश गुना अधिक व्यापक हैं । अहङ्कार और उसके ऊपर बुद्धि सौ गुना अधिक व्यापकरूप में स्थित है । हे वरवर्णिनि ! प्रकृतितत्त्व को हजार गुना अधिक व्यापक समझना चाहिए। पुरुष तत्त्व दश हजार और नियति एक लाख (गुना अधिक) मानी गयी है। हे सुव्रते ! उसके ऊपर एक लाख कला, और माया एक करोड़ गुना सब चराचर को व्याप्त कर स्थित है । माया को व्याप्त करके दश करोड़ गुना विद्या स्थित है। और यह सौ करोड़ गुने ईश्वर के द्वारा व्याप्त है । सदाशिव दश करोड़, उसके ऊपर बिन्दु और नाद । शक्ति वृन्दयोजन व्याप्त करके स्थित अष्टममाह्निकम् ११९ एतच्चान्यत्र न क्वचिदपि दृष्टम्-इत्यतः परं मोक्षस्य न कारणम् इत्याह जलादेः शिवतत्त्वान्तं न दृष्टं केनचिच्छिवात् ॥ १९० ॥ ऋते ततः शिवज्ञानं परमं मोक्षकारणम् । किमत्र प्रमाणम् ?–इत्याशङ्कयाह तथा चाह महादेवः श्रीमत्स्वच्छन्दशासने ॥ १९१॥ तदेव अर्थद्वारेण पठति नान्यथा मोक्षमायाति पशुनिशतैरपि । शिवज्ञानं न भवति दीक्षामप्राप्य शाङ्करीम् ॥ १९२ ॥ प्राक्तनी पारमेशी सा पौरुषेयी च सा पुनः। दीक्षामप्राप्येति, यदुक्तम् ‘न चाधिकारिता दीक्षां विना योगेऽस्ति शाङ्करे।’ (मा०वि० ४।६) इति । प्राक्तनीति, तत्तज्जन्मान्तरीयाभ्यासबलाद् अनुपायरूपतामाप्तेत्यर्थः । है। व्यापिनी देवी समस्त अध्वा को व्याप्त करके स्थित है । हे वरानने ! उसके बाद शिव तत्त्व को अप्रमेय जानना चाहिए” ॥ १८९ ॥ (स्वतं० १०।६७३) यह कहीं अन्यत्र नहीं देखा गया- इसलिए इसके अतिरिक्त मोक्ष का कोई दूसरा कारण नहीं है—यह कहते हैं ___शिव के अतिरिक्त जल से लेकर शिवतत्त्व तक का दर्शन किसी ने नहीं किया है इसलिए शिवज्ञान मोक्ष का परम कारण है ।। - १९०-१९१- ॥ इसमें क्या प्रमाण है ? यह शङ्का कर कहते हैं यही बात महादेव ने स्वच्छन्द तन्त्र में कही है ।। -१९१ ॥ वही अर्थ के द्वारा कहते हैं अन्यथा सैकड़ों ज्ञान के द्वारा भी पशु मोक्ष को नहीं प्राप्त करता । शैवी दीक्षा को बिना प्राप्त किये शिवज्ञान नहीं होता । पूर्वजन्म की (दीक्षा) परमेश्वर द्वारा प्रदत्त होती है और फिर वह पौरुषेयी भी होती है ।। १९२-१९३- ॥ दीक्षा को न प्राप्त करके-जैसा कि कहा गया है “बिना दीक्षा के शाङ्कर योग में अधिकार नहीं है ।” (मा०वि० ४।६) प्राक्तनी = भिन्न-भिन्न जन्मान्तरीय अभ्यास के बल से अनुपायरूपता को १२० श्रीतन्त्रालोकः ‘पारमेशी’ इति विद्येश्वरादिवत् साक्षात्परमेश्वरकर्तृका । ‘पौरुषेयी’ इति शास्त्र क्रमणाचार्यकर्तृका । तदुक्तं तत्र ‘यत्र दृष्टं पशुज्ञानैः कुपथभ्रान्तदृष्टिभिः ।’ (स्व० १०।६७४) इत्याधुपक्रम्य ‘विना प्रसादादीशस्य ज्ञानमेतन्न लभ्यते । न चापि भावो भवति दीक्षामप्राप्य देहिनाम्।। यदा त कारणाच्छक्तिर्भवेन्निर्वाणकारिका । शिवेच्छया प्रपद्येत दीक्षां ज्ञानमयीं शुभाम् ।। मन्त्रयोगात्मिकां दिव्यां ततो मोक्षं व्रजेत्पशुः । नान्यथा मोक्षमाप्रोति पशुञ्जनशतैरपि । यस्य प्रकाशितं सर्वं शिवेनानन्तरूपिणा। स एव मोक्षं व्रजति शिव: साक्षान्महेश्वरः ।। तेनेदं ज्ञानमुख्यं तु पुरा प्रोक्तं मया तव ।’ (स्व० १०/७०६) इति ।। १९२ ।। इदानीमप्तत्त्वे भुवनानि वक्तुमुपक्रमते शतरुद्रो+तो भद्रकाल्या नीलप्रभं जयम् ॥ १९३ ॥ न यज्ञदानतपसा प्राप्यं काल्याः पुरं जयम्। प्राप्त । पारमेशी = विद्येश्वर आदि के समान साक्षात् परमेश्वरविहित । पौरुषेयी = शास्त्र के क्रम से आचार्य द्वारा विहित । वही वहाँ कहा गया है “कुपथ के कारण भ्रान्तदृष्टि वाले पशुज्ञान वालों के द्वारा जो दृष्ट नहीं है ।” इत्यादि से प्रारम्भ कर.. “ईश्वर के प्रसाद के बिना यह ज्ञान नहीं होता और दीक्षा को प्राप्त न कर जीवों के मन में शिव समावेश प्राप्ति का भाव भी नहीं होता । जब (समुचित) कारणवश निर्वाणप्रद शक्ति उपलब्ध होती है तब जीव शिव की इच्छा से शुभ ज्ञानमय मन्त्रयोगात्मक दिव्य दीक्षा को प्राप्त करता है और मोक्षलाभ करता है । अन्यथा पशु असंख्य प्रकार के ज्ञान से भी मोक्ष नहीं प्राप्त करता । अनन्तरूपी शिव के द्वारा जिसको समस्त ज्ञान प्रकाशित कर दिया गया वही मोक्षलाभ करता है। शिव साक्षात् महेश्वर है । उनके द्वारा पहले कहा गया यह मुख्य ज्ञान मैंने तुमस कहा’’ || १९२ ।। (स्वतं० १०७०६) अब जल तत्त्व में भुवनों का वर्णन प्रारम्भ करते हैं शतरुद्र के ऊपर भद्रकाली का नीलमणि की कान्ति वाला जय (नामक भुवन) है । काली का वह जय (नामक) पुर यज्ञ दान और तप से अष्टममाह्निकम् १२१ ___ तद्भक्तास्तत्र गच्छन्ति तन्मण्डलसुदीक्षिताः ॥ १९४ ॥ ‘नील’ इति इन्द्रनीलम् । तन्मण्डलसुदीक्षिता इति, ‘अतो भुवनभर्तरि’ इत्याद्युक्त्या तद्भुवनं प्राप्तुम्-इत्यर्थः ॥ १९४ ॥ ननु किं तत्प्राप्त्या?–इत्याशङ्कयाह निर्बीजदीक्षया मोक्षं ददाति परमेश्वरी।। नन्वप्तत्त्वावस्थिततद्भुवनमात्रप्राप्त्या कथमेवम्?–इत्याशङ्क्याह विद्येशावरणे दीक्षां यावतीं कुरुते नृणाम् ॥ १९५ ॥ तावती गतिमायान्ति भुवनेऽत्र निवेशिताः। इयं हि भगवती ‘सा देवी सर्वदेवीनां नामरूपैश्च तिष्ठति । योगमायाप्रतिच्छन्ना कुमारी लोकभावनी ।। अचिन्त्या चाप्रमेया च………………….।’ (स्व० १०१७२७) इत्युक्त्या सर्वोत्कृष्टा, येनैवमत्र माहात्म्यमुक्तम् ॥ १९५ ।। प्राप्य नहीं है । उस मण्डल में भलीप्रकार दीक्षित उस (= काली) के भक्त ही वहाँ जाते हैं । -१९३-१९४ ।। ___नील = इन्द्रनील । उस मण्डल में सुदीक्षित–‘अत: भुवनभर्त्ता में’ इत्यादि उक्ति के द्वारा उस भुवन को प्राप्त करने के लिये ॥ १९४ ॥ प्रश्न-उसको प्राप्त करने से क्या लाभ?—यह शङ्का कर कहते हैं परमेश्वरी निर्बीज दीक्षा के द्वारा उसे मोक्ष प्रदान करती है ॥१९५-।। प्रश्न-जल तत्त्व में स्थित इस भुवन को मात्र प्राप्त कर लेने से ऐसा कैसे होता है ? यह शङ्का कर कहते हैं विद्येश के मण्डल में मनुष्यों की जितनी दीक्षा (भद्रकाली) करती है, इस भुवन में प्रतिष्ठित (लोग) उतनी ही गति को प्राप्त करते हैं ।। -१९५-१९६- ।। क्योंकि यह भगवती “वह देवी सभी देवियों के नाम और रूपों के माध्यम से स्थित है । (वह) योगमाया के द्वारा आच्छन्न कुमारी लोकों को उत्पन्न करने वाली (या मोहित करने वाली) अचिन्त्य और अप्रमेय है ।” (स्वतं० १०।७२७) उस उक्ति के द्वारा सबसे बढ़ कर है जिससे यहाँ इस प्रकार महिमा कही गयी ॥ १९५ ॥ १२२ श्रीतन्त्रालोकः ततः कोट्या वीरभद्रो युगान्ताग्निसमप्रभः ॥ १९६ ॥ विजयाख्यं पुरं चास्य ये स्मरन्तो महेश्वरम् । जलेषु मरुषु चाग्नौ शिरश्छेदेन वा मृताः ॥ १९७ ॥ ते यान्ति बोधमैशानं वीरभद्रं महाद्युतिम् । वैरभद्रोर्ध्वतः कोटिर्विष्कम्भाद्विस्तृतं त्रिधा ॥ १९८ ॥ रुद्राण्डं सालिलं त्वण्डं शक्रचापाकृति स्थितम्। ‘मरुषु’ इति महापथे महेश्वरं स्मरन्तो मृता:- इति सर्वत्र संबन्धः । अन्यथा हि वैद्युतं यान्ति, -इति पूर्वमुक्तम् । ‘ऐश्वरं बोधम्’ रौद्रं तेजः, स हि रुद्रक्रोधा दद्भत:-इति भावः । ‘वैरभद्रोर्ध्वतः’ इति वीरभद्रसंबन्धिनो विजयाख्यात्पुरा दुर्ध्वम्-इत्यर्थः । ‘सालिलमण्डम्’ अम्मयमावरणम्, तत्प्रधानं भुवनमिति यावत् । अत एवाप्तत्त्वीयानां समस्तानां भुवनानामूर्ध्वं तेजस्तत्त्वस्य चाध:स्थितं तञ्चाण्डं ‘रुद्राण्डम् तच्छब्दव्यपदेश्यम् । अत्रापि च वीरभद्राख्य एवासी भगवान्महात्मा रुद्रः सूक्ष्मरूपेणास्ते-इत्यभिप्रायः । तच्च विष्कम्भात्कोटि:, ऊर्ध्वमेतन्मानम् इत्यर्थः । विस्तृतं त्रिधेति, तिर्यक्कोटित्रयपरीमाणमित्यर्थः । एतच्च निखिला प्तत्त्वापेक्षया न व्याख्येयम्, तन्मानस्य धरापेक्षया दशगुणत्वेन प्रागेवोक्तत्वात् । यदुक्तंम् उसके बाद एक करोड़ योजन ऊपर युगान्त अग्नि के समान कान्ति वाले वीरभद्र रहते हैं । इनका विजय नामक पर है। जो लोग महेश्वर का स्मरण करते हुए जल, मरुभूमि, अग्नि में अथवा शिरश्छेद के द्वारा मरते हैं वे ऐशान महाद्युति वीरभद्र को प्राप्त होते हैं । वीरभद्र के (पुर) से एक करोड़ योजन ऊपर विस्तृत रुद्राण्ड है । यह जलीय विष्कम्भ अण्ड इन्द्रधनुष की आकृति में स्थित है ।। -१९६-१९९- ॥
  • मरु में अर्थात् महापथ में, महेश्वर का स्मरण करते हुये मरने वाले-ऐसा सर्वत्र सम्बन्ध है । अन्यथा ‘विद्युत् लोक को प्राप्त करते है-यह पहले ही कहा गया है । ऐश्वर बोध = रौद्र तेज । वह (बोध) रुद्र के क्रोध से उत्पन्न हुआ है यह तात्पर्य है । वैरभद्र के ऊपर = वीरभद्रसम्बन्धी विजय नामक पुर के ऊपर । सलिलमण्डल = जलमय आवरण की प्रधानता वाला भुवन । इसीलिए जलतत्त्व वाले समस्त भुवनों के ऊपर और तेजस्तत्त्व के नीचे स्थित वह अण्ड रुद्र अण्ड है जो ‘तत्’ शब्द से कहा गया है । यहाँ भी वीरभद्र नामक ही ये भगवान् महात्मा रुद्र सूक्ष्मरूप से रहते हैं-यह अभिप्राय है । विष्कम्भ से कोटि (= एक करोड़) ऊपर इसका परिमाण है । तीन प्रकार से विस्तृत है अर्थात् तिर्यक् रूप से तीन करोड योजन परिमाण वाला है । यह समस्त जलतत्त्व की अपेक्षा से है-ऐसी व्याख्या नहीं करनी चाहिए क्योंकि उस (= जल) का परिमाण पृथ्वी की अपेक्षा दश गुना अधिक है-यह पहले ही कहा गया है । अष्टममाह्निकम् १२३ ‘भुवनस्यास्य देवेशि ह्युपर्यावरणं महत् । अम्मयं तु घनं चाति शक्रचापाकृति स्थितम् ।। वितानमिव तद्भद्रमन्तरे समवस्थितम् । तत्र चास्ते महात्मासावङ्गुष्ठाग्रप्रमाणकः । तत्र योजनकोटिर्वै विष्कम्भादूर्ध्वमुच्यते । तिर्यवित्रगुणविस्तारमाप्यमावरणं प्रिये ।’ (स्व० १०।७५८) इति । ‘रुद्राण्ड इति विख्यातं रुद्रलोक इति प्रिये ।’ (स्व० १०।७५९) इति च । एवमिति सिद्धम् – यदप्तत्त्वस्यारम्भ एव भद्रकाल्या भुवनम्, अत एव तत्र ‘शतरुद्रोर्ध्वत:’ इत्युक्तम्, प्रान्ते तु वीरभद्रस्य स्थूलसूक्ष्मतया पुरद्वय मिति ॥ १९८ ॥ तन्मध्ये तु भुवनान्तराणि किं स्थितानि न वा ?–इत्याशङ्कयाह आ वीरभद्रभुवनाद्भद्रकाल्यालयात्तथा॥ १९९ ॥ त्रयोदशभिरन्यैश्च भुवनैरूपशोभितम् । आशब्दो मर्यादायाम्, तेन भद्रकाल्यालयादारभ्य वीरभद्रभुवनं यावत् अर्थात् भद्रकाल्यालयेन सह त्रयोदश भुवनान्यवस्थितानि-इत्यर्थः । उपशोभित मिति, अर्थादप्तत्त्वम्, एवं-पाठ एव च आगम इति उद्द्योतकारव्याख्यया न जैसा कि कहा गया है “हे देवेशि ! इस भुवन के ऊपर अत्यन्त घना जलमय आवरण इन्द्रधनुष के आकार में स्थित है । वह कल्याणकृत (आवरण) वितान के समान बीच में स्थित है । हे प्रिये ! उसके बाद में अंगुष्ठ के अग्रभाग के परिमाण वाले महात्मा रहते हैं। वहाँ विष्कम्भ से एक करोड़ योजन ऊपर तिर्यक् रूप में तीन गुना (= तीन करोड़) विस्तार वाला जलीय आवरण है ।” (स्वतं० १०।७५८) “हे प्रिये वह रुद्राण्ड रुद्रलोक नाम से प्रसिद्ध है ।” (स्वतं० १०।७५९) इस प्रकार यह सिद्ध हुआ कि जल तत्त्व के आरम्भ में भद्रकाली का भुवन है । इसीलिए वहाँ ‘शतरुद्र के ऊपर’-ऐसा कहा गया है । अन्त में वीरभद्र के दो पुर स्थूल और सूक्ष्म रूप में स्थित हैं ॥ १९८ ॥ उसके बीच में दूसरे भुवन स्थित हैं या नहीं ? यह शङ्का कर कहते हैं भद्रकाली के पुर से लेकर वीरभद्र के पुर तक (स्थित) तेरह अन्य भुवनों के द्वारा (यह जलतत्व) शोभित है ।। -१९९-२००- ॥ . ‘आङ्’ उपसर्ग मर्यादा अर्थ में है । इससे भद्रकाली के पुर से लेकर वीरभद्र के भुवन तक । अर्थात् भद्रकाली के पुर के साथ तेरह भुवन स्थित हैं । उपशोभित १२४ श्रीतन्त्रालोकः भ्रमितव्यम् ॥ १९९ ॥ तान्येवाह ततो भुवः सहाद्रेः पूर्गन्धतन्मात्रधारणात् ॥ २०० ॥ मृता गच्छन्ति तां भूमिं धरित्र्याः परमां बुधाः । अब्धेः पुरं ततस्त्वाप्यं रसतन्मात्रधारणात् ॥ २०१ ॥ ततः श्रियः पुरं रुद्रक्रीडावतरणेष्वथ । प्रयागादौ श्रीगिरौ च विशेषान्मरणेन तत ॥ २०२ ॥ सारस्वतं पुरं तस्माच्छब्दब्रह्मविदां पदम् । रुद्रोचितास्ता मुख्यत्वाद्रुद्रेभ्योऽन्यास्तथा स्थिताः॥ २०३ ॥ पुरेषु बहुधा गङ्गा देवादौ श्रीः सरस्वती । लकुलायमरेशान्ता अष्टावप्स सुराधिपाः ॥ २०४ ॥ ‘सहाद्रेः’ इति मेर्वादिप्रागुक्तपर्वतयुक्तायाः-इत्यर्थः । ‘रसतन्मात्रधारणात्’ इति रसतन्मात्रधारणयेत्यर्थः । मृता गच्छन्ति—इति प्राच्येन संबन्धः । रुद्रस्य क्रीडयावतरणेषु न तु अनुजिघृक्षया, तत्र हि नैतावन्मात्रप्राप्तिर्भवेत्-इति भावः । एतच्चाग्रत एव व्यक्तीभविष्यति-इति नेहायस्तम् । ‘तत् श्रियः पुरम्, अर्थात् जल तत्त्व (उपशोभित है) । इसी प्रकार का पाठ आगम में भी है इसलिए उद्योतकार की व्याख्या से भ्रम में नहीं पड़ना चाहिए ॥ १९९ ॥ उन्हीं (भुवनों) का कथन करते हैं इसके बाद पर्वतों से युक्त, गन्धतन्मात्रा को धारण करने के कारण भूपुर है । विद्वान् लोग मरने के बाद भगवती धरित्री की उस परम भूमि को प्राप्त होते हैं । उसके बाद इस तन्मात्र को धारण करने के कारण जलमय अब्धिपुर है । इसके बाद रुद्र का क्रीड़ा के (लिए) अवतरण होने पर श्रीपुर है । प्रयाग आदि और श्रीपर्वत पर विशेष रूप से मरने से वह (पुर प्राप्त होता है) । उसके ऊपर सारस्वतपुर है जो शब्दब्रह्मज्ञानियों का स्थान है । ये भूमियां मुख्यरूप से रुद्रों के द्वारा सेवित हैं किन्तु रुद्रों से अन्य लोग भी उनमें रहते हैं इन पुरों में गङ्गा लक्ष्मी और सरस्वती तथा लकुल से लेकर अमरेश तक सुरों के आठ स्वामी जललोक में निवास करते हैं ।। -२००-२०४ ॥ सहाद्रेः = पूर्वोक्त मेरु आदि पर्वतों से युक्त । रसतन्मात्रधारणात् = रसतन्मात्रा को धारण करने के कारण । मर कर जाते हैं—यह पूर्व (श्लोक) से सम्बन्ध है । रुद्र का क्रीड़ा के लिए अवतार होने पर न कि अनुग्रह की इच्छा से । क्योंकि वैसा होने पर इतनी ही प्राप्ति नहीं होगी । यह आगे स्पष्ट होगा इसलिए यहाँ ‘हाहा अष्टममाह्निकम् १२५ गच्छन्तीति प्राच्येन संबन्धः । ‘शब्दब्रह्मविदाम्’ इति गीतज्ञानां वाक्तत्त्वधारणा निष्ठानां च । तदुक्तम् - हूहूश्चित्ररथस्तुम्बुरु रदस्तथा । विश्वावसुर्विश्वरथो दिव्यगीतविचक्षणाः ॥ संयोज्य मनसात्मानं त्यक्त्वा कर्मफलस्पृहाम् । ते वै सारस्वतं स्थान प्राप्ता वै सरपजिते ।। ये च वाग्धारणां ध्यात्वा प्राणान्मुञ्चन्ति देहिनः। ते वै सारस्वतं लोकं प्राप्नुवन्ति नरोत्तमाः ॥’ (स्व० १०।८४३) इति । ‘अप्सु’ इत्यनेन तत्त्वयोजनाख्यमपि प्रमेयमुट्टङ्कितम्, एवमुत्तरत्रापि ज्ञेयम् । अष्टावित्यनेन भद्रकाल्या भुवोऽब्धेः श्रियः सरस्वत्याश्च भुवनानां पञ्चकेन सह त्रयोदश भवन्ति इति प्रागुपक्रान्तायाः संख्याया अपि सङ्कलनं स्मारितम् । तदुक्तम् ‘लकुली भारभूतिश्च दिण्ड्याषाढी च पुष्करः। नैमिषश्च प्रभासश्च अमरेशस्तथाष्टमः ।। एतत्पत्यष्टकं प्रोक्तम्……………. …… । (मा० वि० ५।१७) इति । श्रीस्वच्छन्दशास्त्रे पुनरेषाम् विस्तार नहीं किया गया । तत् = श्रीपुर को जाते है-यह पूर्व श्लोक से सम्बन्ध है । शब्दब्रह्मवेत्ता का = गीत को जानने वाले तथा वाक्तत्त्व की धारणा में लगे हये लोगों का । वही कहा गया है हे सुरपूजिते ! हाहा, हूहू, चित्ररथ, तुम्बुरु, नारद, विश्वावसु और विश्वरथ दिव्यगीत में विचक्षण ये सब मन से आत्मा को युक्त कर और कर्मफल की इच्छा को छोड़कर सारस्वत पद को प्राप्त होते हैं । और जो प्राणी वाग्धारणा का ध्यान कर प्राणों का त्याग करते हैं वे उत्तम पुरुष सारस्वत लोक को प्राप्त करते हैं ।” (स्व० तं० १०१८४३) ___ ‘अप्सु’ इस पद से तत्त्वयोजन नामक प्रमेय भी कहा गया । इसी प्रकार आगे भी समझना चाहिए । ‘आठ’ इससे भद्रकाली, पृथ्वी, समुद्र लक्ष्मी और सरस्वती के पाँच भुवनों के साथ तेरह (भुवन) हो जाते हैं-इस प्रकार पूर्वोक्त संख्या का भी सङ्कलन स्मारित हुआ । वही कहा गया है “लकुल, भारभूति, दिण्ड्याषाढी, पुष्कर, नैमिष, प्रभास, और आठवाँ अमरेश ये आठ पति कहे गए हैं ।” (मा०वि० ५.१७) १२६ श्रीतन्त्रालोकः ‘अमरेशं प्रभासं च नैमिषं पुष्करं तथा । आषाढिं दिण्डिमुण्डं च भारभूतिं च लाकुलम् ॥ गुह्याष्टकमिति ख्यातं जलावरणगं प्रिये ।’ (स्व० १०८५४) इत्यादिनाऽन्यथा पाठः । इह श्रीस्वच्छन्दशास्त्रानुसारं प्रक्रमेऽपि सर्वत्र पूर्वशास्त्रप्रक्रिययैषां पाठेऽयमाशयो यदेतदेव भुवनेशाष्टकमप्तत्त्वे सर्वागमेषु प्रधान तयोक्तमित्यत एव प्रतिष्ठायामेतदाद्यष्टकसप्तकस्वीकारेणैव सर्वत्र भुवनानां सङ्कलनम् ॥ २०४ ।। ततस्तु तैजसं तत्त्वं शिवाग्नेरत्र संस्थितिः। ते चैनं वह्निमायान्ति वाह्नीं ये धारणां श्रिताः॥ २०५ ॥ भैरवादिहरीन्द्वन्तं तैजसे नायकाष्टकम् । प्राणस्य भवनं वायोर्दशधा दशधा त तत ॥२०६ ॥ ध्यात्वा त्यकत्वाऽथ वा प्राणान् कृत्वा तत्रैव धारणाम्। तं विशन्ति महात्मानो वायुभूताः खमूर्तयः ॥ २०७ ॥ भीमादिगयपर्यन्तमष्टकं वायुतत्त्वगम् । खतत्त्वे भुवनं व्योम्नः प्राप्यं तद्व्योमधारणात् ॥ २०८ ॥ वस्त्रापदान्तं स्थाण्वादि व्योमतत्त्वे सुराष्टकम् । स्वच्छन्दतन्त्र में पुन: इनका “हे प्रिये ! अमरेश, प्रभास, नैमिष, पुष्कर, आषाढी, दिण्डिमण्ड, भारभति, लाकुल ये गुह्यष्टक जलावरण में स्थित प्रसिद्ध है । (स्वतं० १०१८५४) ___ इत्यादि के द्वारा भिन्न पाठ है । यहाँ स्वच्छन्दशास्त्र के अनुसार प्रक्रम होने पर भी सर्वत्र पूर्वशास्त्र की प्रक्रिया के अनुसार पाठ होने में यह तात्पर्य है कि ये ही आठ भुवनेश जलतत्त्व के विषय में सभी आगमों में मुख्यरूप से कहे गए हैं । इसलिए प्रतिष्ठा में इन प्रथम सात को स्वीकार कर लेने से सर्वत्र भवनों का सङ्कलन हो जाता है । २०४ ॥ इसके बाद तैजस तत्त्व है । यहाँ शिवाग्नि की स्थिति है । जो अग्नि सम्बन्धी धारणा का आश्रय लेते हैं वे इस अग्निलोक को प्राप्त करते हैं । इस तैजस (तत्त्व) में भैरव से लेकर हरीन्दु तक आठ नायक हैं । (उसके ऊपर) प्राणवायु का भुवन है । वह दश-दश प्रकार का है । महात्मा लोग ध्यान कर, अथवा उसमें धारणा कर प्राण को त्याग देने के बाद वायवत आकाशरूप होकर उसमें प्रवेश करते हैं । भीम से लेकर गया पर्यन्त आठ वायुतत्त्वगामी पुर है । शून्यतत्त्व में व्योम का भुवन है । वह व्योम में धारणा के द्वारा प्राप्त होता है । व्योमतत्त्व में स्थाणु से लेकर वस्त्रापद तकअष्टममाह्निकम् ‘ततः’ इत्यप्तत्त्वात् । तदुक्तम् ‘तत्र भैरवकेदारमहाकाला: समध्यमाः । आम्रातकेशजल्पेशश्रीशैलाः सहरीन्दवः ।। (मा० वि० ५।१८) इति । श्रीस्वच्छन्दे तु ‘हरिश्चन्द्रं च श्रीशैलं जल्पमानातकेश्वरम् । महाकालं मध्यमं च केदारं भैरवं तथा ।। अतिगुह्यं समाख्यातम्………… (स्व० १०५८७३) इति । ‘वायौ’ इति वायुतत्त्वे । दशधेति, प्राणादिनागादिभेदात् । ध्याना द्यप्येवमिति पुनर्दशधेति । भीमादीति, तदुक्तम् ‘भीमेश्वरमहेन्द्राट्टहासाः सविमलेश्वराः । कनखलं नाखलं च कुरुक्षेत्रं गया तथा ॥’ (मा० वि० ५।१९) इति । श्रीस्वच्छन्दे तु ‘गयां चैव कुरुक्षेत्रं नाखलं कनखलं तथा । विमलं चाट्टहासं च माहेन्द्रं भीममष्टमम् ॥ गुहयाद्गुह्यतरं हयेतत् ……………….. (स्व० १०१८८४) इति । आठ देवता रहते हैं ।। २०५-२०९- || उसके बाद = जलतत्त्व के बाद । वही कहा गया “वहाँ भैरव, केदार, महाकाल, मध्यम, आम्रातकेश, जल्पेश श्रीशैल और हरीन्दु (आग्नेय भुवन में रहते) हैं ।” (मा०वि० ५।१८) स्वच्छन्द तंत्र में तो “हरिश्चन्द्र श्रीशैल जल्प, आम्रातकेश्वर महाकाल. मध्यम. केदार और भैरव ये उमा के द्वारा ख्यात अतिगुह्य (= श्रेष्ठ गुह्य) हैं ॥” (स्वतं० १०८७३) वायु में = वायु तत्त्व में । दश प्रकार—प्राण आदि (= प्राण अपान समान, उदान, व्यान) तथा नाग आदि (नाग, कूर्म, कृकर, देवदत्त धनञ्जय) के भेद से । इसी प्रकार ध्यान आदि भी दश प्रकार के है । भीम आदि, वही कहा गया है ___“भीम, ईश्वर, महेन्द्र, अट्टहास, विमलेश्वर, कनरवल, नारवल, कुरुक्षेत्र और गया ।” (मा०वि० ५।१९) स्वच्छन्दतन्त्र में तो ETHALATLATHEENETHEATERRHEURRHHATARNINTENT १२८ श्रीतन्त्रालोकः ‘व्योम्नः’ इत्याकाशस्य । तदुक्तम् ‘स्थाणुस्वर्णाक्षकावाद्यौ रुद्रगोकर्णको परौ । महालयाविमुक्तेशरुद्रकोट्यम्बरापदाः ॥ (मा० वि० ५।२०) इति । श्रीस्वच्छन्दे तु ‘वस्त्रापदं रुद्रकोटिमविमुक्तं महालयम् । गोकर्णं भद्रकर्णं च स्वर्णाक्षं स्थाणुमष्टमम् ।। पवित्राष्टकमेतत्…… (स्व० १०८८७) इति ॥ २०८ ॥ ‘न चाधिकारिता दीक्षां विना योगेऽस्ति शाङ्करे।’ (मा० वि० ४।६) इत्याधुक्तयुक्त्या दीक्षामन्तरेणाधिकार एव शाङ्करे योगे नास्ति-इति का कथा तदभ्यासादेर्वृत्तायां च दीक्षायां नियूंढे च योगाभ्यासे जीवत एव मुक्तिर्भवेत् - इति कस्तत्र शरीरान्ते सन्देहः । गन्धतन्मात्रधारणाद्यभ्यस्यन्तो योगिनः शरीरान्ते धरादिभुवनान्यासादयन्ति–इति कथमुक्तम् ?–इत्याशङ्क्याह __“गया, कुरुक्षेत्र, नारवल, कनरवल, विमल, अट्टहास, माहेन्द्र और आठवाँ भीम ये गुह्य से गुह्यतर हैं ।’’ (स्वतं० १०।८८४) व्योम्नः = आकाश का । वही कहा गया है स्थाणु और स्वर्णाक्षक प्रथम युग्म, रुद्र गोकर्ण दूसरे युग्म, महालय, अविमुक्तेश, रुद्रकोटि और वस्त्रापद ये ८ व्योमतत्त्व में रहते हैं ।” (मा०वि० ५।२०) स्वच्छन्द में तो “वस्त्रापद, रुद्रकोटि, अविमुक्त, महालय, गोकर्ण, भद्रकर्ण, स्वर्णाक्ष और आठवाँ स्थाणु ये आठ पवित्राष्टक हैं ।” (स्व० १०८८७) ॥ २०८ ॥ प्रश्न-दीक्षा के बिना शैवी साधना में अधिकार नहीं है ।” (मा०वि० ४।६) इत्यादि उक्तयक्ति के द्वारा दीक्षा के बिना शाङ्करयोग में अधिकार ही नहीं है तो उसके अभ्यास आदि की क्या बात । और दीक्षा हो जाने के बाद योगाभ्यास के दृढ़ होने पर जीते जी ही मुक्ति हो जाती है फिर उस शरीरान्त में क्या सन्देह । प्रश्न-गन्धतन्मात्र में धारणा आदि का अभ्यास करने वाले योगी देहान्त के बाद पृथ्वी आदि भुवनों को प्राप्त करते हैं—यह कैसे कहा गया-यह शङ्का कर कहते अष्टममाह्निकम् १२९ अदीक्षिता ये भूतेषु शिवतत्त्वाभिमानिनः ॥ २०९ ॥ ज्ञानहीना अपि प्रौढधारणास्तेऽण्डतो बहिः। धराब्धितेजोऽनिलखपुरगा दीक्षिताश्च वा ॥ २१० ॥ तावत्संस्कारयोगार्थं न परं पदमीहितुम् । तथाविधावतारेषु मृताश्चायतनेषु ये ॥ २११ ॥ तत्पदं ते समासाद्य क्रमाद्यान्ति शिवात्मताम् । भूतेष्विति, पृथिव्या एव प्राधान्याद् बहुवचनेन निर्देशः । यद्वा तन्मध्यात् ‘प्रौढधारणा’ इति पातञ्जलादिपाशवयोगाभ्यासात् । दीक्षिता इति, ‘यो यत्राभिलषेद्भोगान्स तत्रैव नियोजितः । सिद्धिभाक्.. इत्याधुक्तयुक्त्या धरादिपदाप्तये एव कृतलोकधर्मिसाधकदीक्षा:-इत्यर्थः । तदाह-‘तावत्संस्कारेत्यादि । तथाविधावतारेष्विति, भूमण्डलगतेष्वमरेशाद्याय तनेषु ॥ २११ ॥ किमत्र प्रमाणम् ?–इत्याशङ्क्याह ___पुनः पुनरिदं चोक्तं श्रीमद्देव्याख्ययामले ॥ २१२ ॥ दीक्षारहित जो लोग भूतों में शिवतत्त्व के अभिमानी हैं और ज्ञानहीन होते हुये भी (उन भूतों में से किसी एक में) प्रौढ़ धारणा वाले हैं वे (इस) अण्ड के बाहर पृथ्वी जल तेज वायु या आकाश पुर को प्राप्त होते हैं । अथवा जो दीक्षित भी हैं किन्तु (पृथिवी आदि को शिवतत्त्व मानने के) संस्कार से युक्त है और परमपद के इच्छुक नहीं है वे भी वहाँ भूतों के पुर में जाते हैं । उस प्रकार के अवतारों वाले आयतनों में जो मरते हैं वे उस पद को प्राप्त करके क्रमश: शिवात्मता को प्राप्त होते हैं ॥ -२०९-२१२- ॥ भूतों में-पृथिवी की ही प्रधानता के कारण बहुवचन के द्वारा निर्देश किया गया है । अथवा पातञ्जल आदि पाशव योग के अभ्यास से उसमें प्रौढ़ धारणा वाले । दीक्षित “जो जिस लोक में भोगों की इच्छा करता है वह वहीं नियोजित होकर सिद्धि को प्राप्त करता है।” इत्यादि उक्तयुक्ति के द्वारा धरा आदि पद की प्राप्ति के लिए ही लोकधर्मी साधक दीक्षा वाले । वही कहते हैं-तावत् संस्कार इत्यादि । उस प्रकार के अवतार वाले-भूमण्डलगत इन्द्र आदि के आयतनों में ॥ २११ ॥ इस विषय में क्या प्रमाण है—यह शङ्का कर कहते हैं ९ त.तृ. १३० श्रीतन्त्रालोकः पुन: पुनरिति, प्रत्यष्टकम् । तदुक्तं तत्र ‘ये मृता जन्तवस्तत्र ते व्रजन्तीह तत्पदम् ।’ इति । ‘एतेष्वपि मृता: सम्यग्घित्वा लोकानशेषतः । दीप्यमानास्तु गच्छन्ति स्थानेष्वेतेषु ते प्रिये ॥ इति ॥ २१२ ॥ न केवलमेतदवोक्तं यावदन्यत्रापि–इत्याह श्रीकामिकायां कश्मीरवर्णने चोक्तवान्विभुः। तद्ग्रन्थमेव पठति सुरेश्वरीमहाधाम्नि ये प्रियन्ते च तत्पुरे ॥ २१३ ॥ ब्राह्मणाद्याः सङ्करान्ताः पशवः स्थावरान्तगाः । रुद्रजातय एवैते इत्याह भगवाञ्छिवः ॥ २१४ ॥ आकाशावरणादूर्ध्वमहङ्कारादध. प्रिये । तन्मात्रादिमनोऽन्तानां पुराणि शिवशासने ॥ २१५ ॥ शिवशासने इति, उक्तानीति शेषः । तदुक्तम् आकाशावरणादूर्ध्वमहङ्कारादधः प्रिये । देवीयामल में यह बार-बार कहा गया है ।। -२१२ ॥ पुन: पुन: प्रत्येक अष्टक में । वही वहाँ कहा गया है “जो जन्तु यहाँ मरते हैं वे वहाँ. उस पद को प्राप्त होते हैं ।” “हे प्रिये ! इनमें भी मरे हुये लोग सम्पूर्ण लोकों को अच्छी प्रकार छोड़ कर देदीप्यमान होते हुये तुम्हारे इस स्थान को प्राप्त होते हैं” ॥ २१२ ॥ यह केवल यहीं नहीं अन्यत्र भी कहा गया है-यह कहते हैं परमेश्वर ने कामिकाशास्त्र में कश्मीरवर्णन के प्रसङ्ग में कहा है ॥ २१३- ॥ उस ग्रन्थ का ही पठन करते हैं सुरेश्वरी के महाधाम (= तेज) वाले उस पुर में ब्राह्मण से लेकर शङ्कर तक के जीव एवं स्थावर तक जो मरते हैं, वे रुद्र स्तर के होते हैं-ऐसा भगवान् शिव ने कहा है । हे प्रिये ! आकाशावरण से ऊपर और अहङ्कार से नीचे तन्मात्राओं से लेकर मन पर्यन्त पुर शैव शास्त्र में (कहे गए) हैं ।। -२१३-२१५ ॥ शिवशासन में, कहे गए हैं-यह शेष है । वही कहा गया है ‘हे प्रिये ! आकाशावरण से ऊपर और अहङ्कार से नीचे के भुवनों का वर्णन कर OFFICE अष्टममाह्निकम् भुवनानि प्रवक्ष्यामि….. ………… । (स्व० १०।८९५) इति ।। २१५ ।। तान्येवाह पञ्चवर्णयुतं गन्धतन्मात्रमण्डलं महत् । आच्छाद्य योजनानेककोटिभिः स्थितमन्तरा ॥ २१६ ॥ एवं रसादिमात्राणां मण्डलानि स्ववर्णतः । शर्वो भवः पशुपतिरीशो भीम इति क्रमात् ॥ २१७ ॥ तन्मात्रेशा यदिच्छात: शब्दाद्याः खादिकारिणः । ततः सूर्येन्दुवेदानां मण्डलानि विभुर्महान् ॥ २१८ ॥ उग्रश्चेत्येषु पतयस्तेभ्योऽर्केन्दू सयाजको । इत्यष्टौ तनवः शंभोर्याः पराः परिकीर्तिताः ॥ २१९ ॥ अपरा ब्रह्मणोऽण्डे ता व्याप्य सर्वं व्यवस्थिताः। कल्पे कल्पे प्रसूयन्ते धराद्यास्ताभ्य एव तु ॥ २२० ॥ ततो वागादिकर्माक्षयुक्तं करणमण्डलम् । अग्नीन्द्रविष्णुमित्राः सब्रह्माणस्तेषु नायकाः ॥ २२१ ॥ प्रकाशमण्डलं तस्माच्छुतं बुद्ध्यक्षपञ्चकम् । दिग्विद्युदर्कवरुणभुवः श्रोत्रादिदेवताः ॥ २२२ ॥ प्रकाशमण्डलादूर्ध्वं स्थितं पश्चार्थमण्डलम् । करूँगा…।’ (स्वतं० १०८९५) ॥ २१५ ॥ उन्हीं को कहते हैं ___ पाँच रङ्गों से युक्त महान् गन्धतन्मात्र मण्डल एक करोड़ योजन तक विस्तृत होकर बीच में स्थित है । इसी प्रकार रस आदि तन्मात्राओं के मण्डल अपने-अपने रङ्गों से (युक्त होकर स्थित हैं) । शर्व, भव, पशुपति, ईशान और भीम ये क्रमश: तन्मात्राओं के स्वामी है जिनकी इच्छा से आकाश आदि को उत्पन्न करने वाले शब्द आदि (प्रादुर्भूत होते हैं) । इसके बाद सूर्य चन्द्रमा और वेदों का मण्डल है । रुद्र, महादेव और उग्र ये इनके पति हैं । इनसे सूर्य सोम और यजमान (निकले) हैं । ये शङ्कर की आठ शरीर हैं जो परा कही गई हैं । अपरा शरीर ब्रह्माण्ड में हैं और वे सबको व्याप्त करके स्थित हैं । उनसे भिन्न-भिन्न कल्पों में पृथ्वी आदि उत्पन्न होती हैं । उसके ऊपर वाग् आदि कर्मेन्द्रियों से युक्त इन्द्रियमण्डल है । ब्रह्मा के सहित अग्नि, इन्द्र, विष्णु और सूर्य उनके नायक हैं । इसके बाद पाँच ज्ञानेन्द्रियों से युक्त प्रकाशमण्डल है । दिक्, विद्युत्, अर्क वरुण और पृथ्वी ये श्रोत्र आदि की देवतायें हैं । प्रकाश १३२ श्रीतन्त्रालोकः मनोमण्डलमेतस्मात् सोमेनाधिष्ठितं यतः ॥ २२३ ॥ बाह्यदेवेष्वधिष्ठाता साम्यैश्वर्यसुखात्मकः । मनोदेवस्ततो दिव्यः सोमो विभुरुदीरितः ॥ २२४ ॥ पञ्चवर्णयुतमिति, तदुक्तम् ‘शुक्लपीतसितरक्तहरितं स्फटिकप्रभम् । पञ्चवर्णसमायुक्तशक्रचापसमप्रभम् ॥ (स्व० १०।८९७) इति । ‘अन्तराच्छाद्य’ इति वितानवदाकाशादिसर्वमन्तर्गर्भीकृत्य-इत्यर्थः। तदुक्तम् ‘आदौ तु गन्धतन्मात्रं विस्तीर्ण मण्डलं महत् । स्थितं वितानवद् देवि योजनानेककोटयः ॥’ (स्व० १०८९६) इति । ‘शौं ह्यधिपतिस्तत्र एक एव वरानने । तस्मात्तु जायते पृथ्वी शर्वेशेन प्रचोदिता ॥’ (स्व० १०१८९८) इति । यदिच्छात इति, अन्यथा कथमेषां जडानां कारणता भवेत्-इति भावः । एवमिति, गन्धतन्मात्रमण्डलवत्-इति भावः । तदुक्तम् “तस्मात्तु मण्डलादूर्ध्वं रसतन्मात्रमण्डलम् । मण्डल के ऊपर (रूप रस आदि) पाँच विषयों का मण्डल है । इसके ऊपर चन्द्रमा से अधिष्ठित मनोमण्डल है । चूँकि (यह) मनोदेव बाह्य देवताओं (= इन्द्रियों) का अधिष्ठाता है साम्य ऐश्वर्य सुख वाला है इसलिए दिव्य सोम और विभु कहा गया है ॥ २१६-२२४ ॥ पाँच वर्ण से युक्त-वही कहा गया है “शुक्ल, पीत, श्वेत, रक्त और हरित, स्फटिक के समान कान्तिवाले, पाँच रङ्गों से युक्त इन्द्रधनुष के समान ।” (स्वतं० १०८९७) भीतर से ढंक कर = तम्बू के समान आकाश आदि सबको अपने भीतर रख कर । वही कहा गया है “हे देवि ! पहले महान् गन्धतन्मात्रमण्डल फैला हुआ है । यह वितान के समान एक करोड़ योजन तक स्थित है ।’ (स्व० १०।८९६) हे वरानने ! वहाँ शर्व ही एकमात्र अधिपति हैं । उस मण्डल से शर्वेश के द्वारा प्रेरित पृथिवी उत्पन्न होती है । (स्वतं० १०८९८) जिसकी इच्छा से अन्यथा ये जड़ कैसे कारण बनते । इस प्रकार = गन्धतन्मात्र मण्डल के समान । वही कहा गया है त अष्टममाह्निकम् हरितं मरकतश्यामं चाषपक्षनिभं प्रिये ।। भवो ह्यधिपतिस्तत्र एक एव वरानने । तस्मादापो विनिष्क्रान्ता भवेशेन प्रचोदिताः ।। तस्मात्तु मण्डलादूर्ध्वं रूपतन्मात्रमण्डलम् । स्फुरत्सूर्यांशुदीप्ताभं पद्मरागसमप्रभम् ।। रुद्रः पशुपतिस्तत्र एक एवावतिष्ठते । तस्मात्तेजो विनिष्क्रान्तं तद्वै पशुपतीच्छया।’ (स्व० १०।९०२) इति । तस्मात्तु मण्डलादूर्ध्वं स्पर्शतन्मात्रमण्डलम् । सन्ध्यारुणसमच्छायं. ………… || (स्व० १०१९०४) इति । ‘तत्रैव मण्डले देवि ईशानः संव्यवस्थितः। तस्माद्वायुर्विनिष्क्रान्त ईशेच्छाप्रेरितः प्रिये ॥ (स्व० १०१९०५) इति । ‘तस्मात्तु मण्डलादूर्ध्वं शब्दतन्मात्रमण्डलम् । नीलोत्पलदलश्यामं स्वच्छोदकसमप्रभम् ॥’ (स्व० १०१९०७) इति । ‘भीमस्तत्राधिपत्येन एक एवावतिष्ठते । तस्मान्नभो विनिष्क्रान्तं भीमेच्छाचोदितं महत् ।। (स्व० १०।९०९) इति । “हे प्रिये ! उस मण्डल के ऊपर हरित, मरकत के समान श्याम, चाष (पक्षी) के पक्ष के समान रसतन्मात्र मण्डल है । हे वरानने ! वहाँ एक भव ही अधिपति हैं । भवेश के द्वारा प्रेरित, उस मण्डल से जल निकला हुआ है । उस मण्डल से ऊपर रूपतन्मात्र मण्डल है । (यह) चमकते हुए सूर्य की किरणों की आभा वाला, पद्मराग के समान कान्तिमान् है । वहाँ एक मात्र रुद्र ही पशुपति है । पशुपति की इच्छा से उससे तेज निकला हुआ है ।” (स्वतं० १०१९०२) __ “उस मण्डल से ऊपर सन्ध्याकालिक अरुण के समान छाया वाला स्पर्शतमात्र मण्डल है ।” (स्व० १०१९०४) ___“हे देवि ! उस मण्डल में ईशान ही व्यवस्थित हैं । हे प्रिये ! ईश्वर की इच्छा से प्रेरित उससे वायु निकला है ।” (स्व० १०१९०५) उस मण्डल से ऊपर नीलकमलदल के समान श्याम, स्वच्छ जल के समान कान्तिवाला शब्दतन्मात्र मण्डल है ।” (स्व० १०।९०७) “वहाँ एक भीम ही अधिपति के रूप में वर्तमान है । भीम की इच्छा से चोदित उससे महान् आकाश निकला है ।” (स्व० १०।९०९) १३४ श्रीतन्त्रालोकः ‘ततः’ इति तत्तन्मात्रमण्डलमाश्रित्येत्यर्थः । तेन च शब्दतन्मात्रस्योपरितने भागे मण्डलत्रयमेतद्वर्तते, इति । ‘विभुः’ इति रुद्रः । ‘महान्’ इति महादेवः । ‘तेभ्य’ इति निजनिजरुद्राधिपतिचोदितेभ्यः सूर्यादिमण्डलेभ्यः । यदुक्तम् ‘तत् ऊर्ध्वं सूर्यसंज्ञं यत्र रुद्रो विभुः स्थितः । तत ऊर्ध्वं सोमसंज्ञं महादेवश्च तत्पतिः ॥ उग्रेशाधिष्ठितं तस्मादूर्ध्वं वै वेदमण्डलम् । एभ्यः सूर्यस्तथा सोमो यजमानो विनिर्गताः ।। कल्पे कल्पे ह्यसंख्याता:……………………. । इति । ‘परा’ इति तन्मात्रादीनां सूक्ष्मरूपत्वात् । ‘ताभ्यः’ इति पराभ्यस्तनुभ्यः । ‘तत’ इति तन्मात्रेभ्योऽनन्तरं ‘करणमण्डलम्’ इति, तत्तच्छब्दोदीरणादि व्यापारात्मकत्वात् करणप्रधानं पञ्चानां तत्त्वानां मण्डलं समूह–इत्यर्थः । तच्च वागादिभिः कर्मेन्द्रियैः सम्बद्धं न तु बुद्धीन्द्रियैरित्युक्तं- ‘वागादिकर्माक्षयुक्तम्’ इति । तदुक्तम् ‘एभ्यः परतरं चापि मण्डलं करणात्मकम् ।’ (स्व० १०।९१९) इत्युपक्रम्य ‘कर्मदेवाः प्रवर्तन्ते तस्माद्वै सर्वदेहिनाम् । उससे = उस तन्मात्रमण्डल को आधार मानकर । इससे शब्दतन्मात्र के ऊपरी भाग में ये तीन मण्डल है । विभु = रुद्र । महान् = महादेव ! उनसे = अपने-अपने रुद्राधिपति के द्वारा प्रेरित सूर्य आदि मण्डलों से । जैसा कि कहा गया “उसके ऊपर सूर्य नामक मण्डल है जहाँ विभु रुद्र है । उसके ऊपर सोम नामक मण्डल है । उसके पति महादेव हैं । उसके ऊपर उग्रेश से अधिष्ठित वेदमण्डल है । इनसे कल्प-कल्प में असंख्य सूर्य चन्द्रमा और यजमान निकलते ____परा’ तन्मात्रा आदि के सूक्ष्मरूप वाली होने के कारण । उनसे = परा शरीरों से । उसके बाद = तन्मात्राओं के बाद, करणमण्डल है । भिन्न-भिन्न शब्दों के कथन आदि व्यापार वाला होने के कारण पाँच तत्त्वों का कारण प्रधान मण्डल = समूह । वह वाक आदि कर्मेन्द्रियों से सम्बद्ध है न कि ज्ञानेन्द्रियों से, इसलिए कहा गया वाग् आदि कर्मेन्द्रियों से युक्त । वही कहा गया है “इनके बाद करणात्मक मण्डल है ।” (स्वतं० १०।९१९) ऐसा प्रारम्भ कर “उससे सभी शरीरियों के कर्मदेवता प्रवृत्त होते हैं । वाक्, पाणि, पाद, पायु, ना वहीं १३५ अष्टममाह्निकम् वाक्पाणिपादपायुश्च उपस्थश्चेति पञ्चमः ॥’ (स्व० १०।९२१) इति । ‘तेषु’ इति वागादिषु पञ्चसु तत्त्वेषु । तेन वाक्तत्त्वे वह्निर्नायको यावदुपस्थतत्त्वे ब्रह्मा । तदुक्तम् ‘कर्मेन्द्रियाणां पतयो वह्नीन्द्रहरिवेधसः । मित्रश्च… ………… ।।’ इति । तस्मात्करणमण्डलादूर्ध्वं तत्तच्छब्दाद्यर्थप्रकाशत्वात् प्रकाशप्रधानं तत्त्वानां मण्डलं बुद्ध्यक्षपञ्चकं ‘श्रुतम्’ तत्त्वेन विख्यातम्-इत्यर्थः । तदुक्तम् ‘तेभ्यः प्रकाशकं नाम परितः सूर्यसत्रिभम् । तस्माद्वै संप्रवर्तन्ते पञ्च बुद्धीन्द्रियाणि तु ।। श्रोत्रं त्वक्चक्षुषी जिह्वा नासिका च यथाक्रमम् ।’ (स्व० १०।९२३) इति । श्रोत्रादीति, तेन श्रोत्रे दिशां देवतात्वं यावद्माणे पृथिव्या इति । तदुक्तम् ‘घ्राणादिश्रोत्रपर्यन्ता पृथिवी च अपां पतिः । रविर्विद्युद्दिशो ह्येवं स्थिता बुद्धीन्द्रियेषु ते ॥’ इति । और पाँचवाँ उपस्थ ये कर्मेन्द्रियाँ हैं ।” उनमें = वाक् आदि पाँच तत्त्वों में । इस प्रकार वाक्तत्त्व में अग्नि नायक है जबकि उपस्थ तत्त्व में ब्रह्मा । वही कहा गया है “अग्नि इन्द्र, विष्णु, ब्रह्मा और मित्र, ये कर्मेन्द्रियों के स्वामी है ।” इस करणमण्डल के ऊपर उन-उन शब्द आदि तत्त्वों का प्रकाश होने के कारण तत्त्वों का प्रकाशप्रधान मण्डल पञ्च ज्ञानेन्द्रियों का श्रुत है = तत्त्व के रूप में प्रसिद्ध है । वही कहा गया है “उनसे ऊपर चारो ओर सूर्य के समान प्रकाशमण्डल है । उससे पाँच ज्ञानेन्द्रियों में (पाँच देवता) प्रवृत्त होते हैं । श्रोत्र, त्वक्, चक्षुष, जिह्वा, और नासिका क्रमश: (पाँच ज्ञानेन्द्रियाँ) हैं ।” (स्वतं० १०।९२३) श्रोत्र आदि-इस प्रकार श्रोत्र की देवता दिशायें हैं जबकि घ्राण की पृथिवी । वही कहा गया है “प्राण से लेकर श्रोत्रपर्यन्त बुद्धीन्द्रियों में पृथिवी, वरुण, रवि, विद्युत्, और दिशायें स्थित हैं।” श्रीतन्त्रालोकः प्रकाशमण्डलादूर्ध्वमिति, मनस्तत्त्वे तत्रैव पञ्चानामपि शब्दादीनामर्था नामवस्थानमुचितम्, यत्तद्विषयत्वेनैव मनस्तानि तानीन्द्रियाणि प्रवर्तयतीति । तदत्रैषां परेण रूपेणैतद्भुवनमिति भावः । यदुक्तम् ‘एभ्यः परतरं चास्ति चन्द्रमण्डलसन्निभम् । विस्तारात्परिणाहाच्च सर्वतो रश्मिमण्डलम् । तस्माद्वै संप्रवर्तन्ते पञ्चार्थाः सर्वदेहिनाम् ।।’ (स्व० १०॥९२५) इति । मनोमण्डलमिति, मनसः प्रधानं भुवनमित्यर्थः । एतस्मादिति प्रकाश मण्डलादप्यर्ध्वम । अत्र च सोमस्याधिष्ठातत्वे किं निमित्तम? इत्याशङ्याह ‘यतः’ इत्यादि । यतः साम्येनाविशेषेण सर्वेन्द्रियाणां तत्तद्विषयोन्मुख्येन प्रवर्तक त्वात्मकं यत् ‘ऐश्वर्यसुखम्’ स्वातन्त्र्यचमत्कारस्तदात्मक: संस्तत्तत्सङ्कल्पात्म व्यवहाररूपत्वात् मन एव देवो ‘बाह्यदेवेषु’ बहीरूपतया द्योतमानेषु बुद्धीन्द्रियादि ध्वधिष्ठाता. ततोऽस्य ‘दिव्यः’ सर्वदेवानामाप्यायकारितया दिवे हितः सोमो विभुरुक्त:-इत्यर्थः ।। २२४ । ना ततोऽपि सकलाक्षाणां योनेर्बुद्ध्यक्षजन्मनः । स्थूलादिच्छगलान्ताष्टयुक्तं चाहङ्कृतेः पुरम् ॥ २२५ ॥ प्रकाशमण्डल से ऊपर-मनस्तत्त्व में, वहीं पर पाँच शब्द आदि अर्थों की स्थिति उचित है क्योंकि उनके विषय के रूप में मन ही उन-उन इन्द्रियों को प्रवृत्त कराता है । इसलिए यहाँ पररूप में इनका यह भुवन है । जैसा कि कहा गया है ‘इनके ऊपर चन्द्रमण्डल के समान सब ओर से विस्तृत और व्यापक रश्मिमण्डल है । उससे सब शरीरियों के पाँच तत्त्व प्रवृत्त होते हैं ।” (स्वतं० १०।९२५) मनोमण्डल = मन की प्रधानता वाला भुवन । इससे = प्रकाशमण्डल से भी ऊपर । यहाँ सोम के अधिष्ठाता होने में क्या कारण हैं?—यह शङ्का कर कहते है क्योंकि इत्यादि । क्योंकि साम्येन = समान रूप से सब इन्द्रियों का उन-उन विषयों की ओर उन्मुखता के कारण प्रवर्तकतारूप जो ‘ऐश्वर्य सुख’ = स्वातन्त्र्यचमत्कार, तदात्मक होता हुआ, भिन्न-भिन्न सेङ्कल्पात्मक व्यवहाररूप होने से मन ही देव है अर्थात् बाह्यदेवों का = बाह्यरूप में द्योतमान ज्ञानेन्द्रिय आदि का, अधिष्ठाता है । इस कारण यह दिव्य-सब देवताओं का आपूरक होने के कारण दिव के लिए हित, सोम विभु कहा गया है ॥ २१६-२२४ ।। इसके ऊपर समस्त इन्द्रियों की योनि एवं बुद्धि रूपी इन्द्रिय से उत्पन्नअष्टममाह्निकम् १३७ बुद्धितत्त्वं ततो देवयोन्यष्टकपुराधिपम् ।। पैशाचप्रभृतिब्राह्मपर्यन्तं तच्च कीर्तितम् ॥ २२६ ॥ एतानि देवयोनीनां स्थानान्येव पुराण्यतः । अवतीर्यात्मजन्मानं ध्यायन्तः संभवन्ति ते ॥ २२७ ॥ उक्तम्—‘ततोऽपि’ इति मनसोऽप्यनन्तरम् । ‘अहङ्कृतेः’ इति अहङ्कारस्य । ननु किमिति नामास्य मनस ऊर्ध्वं बुद्धेश्चाधोऽवस्थानम्?–इत्याशङ्कयोक्तम् ‘सकलाक्षाणां योनेर्बुद्ध्यक्षजन्मनः’ इति । ‘स्थूल’ इति स्थूलेश्वरः । ‘छगल’ इति छगलाण्ड: । तदुक्तम् ‘स्थूलस्थलेश्वरौ शंकुकर्णकालञ्जरावपि । मण्डलेश्वरमाकोटदुरण्डच्छगलाण्डकाः ॥ (मा० वि० ५।२१) इति । श्रीस्वच्छन्दे च ‘छगलाण्डं दुरण्डं च माकोट मण्डलेश्वरम् । कालञ्जरं शंकुकर्णं स्थूलेश्वरस्थलेश्वरौ ॥ स्थाण्वष्टकं समाख्यातं………………… ।’ ___(स्व० १०।८८९) इति । देवयोन्यष्टकमेव ‘पुराधिपम्’ भुवनेश्वरं यत्र तत्तथा । ‘तत्’ इति तथा स्थूलेश्वर से लेकर छगलाण्ड तक आठ से युक्त अहङ्कार का पुर है । उसे बाद आठ देवयोनियों के पुरों का अधिपति बुद्धितत्त्व है । वह पैशाच से लेकर ब्राह्मपर्यन्त कहा गया है । वे ही पर देवयोनियों के स्थान हैं । इनसे नीचे उतर कर परमशिव का ध्यान करते हुये वे (देवतायें) उत्पन्न होती हैं ।। २२५-२२७ ।। उससे भी (ऊपर) = मन के भी बाद । अहङ्कृति का = अहङ्कार का । प्रश्न-इस (= अहङ्कार) की स्थिति मन से ऊपर और बुद्धि से नीचे क्यों हैं ? यह शङ्का कर कहा गया-यह समस्त इन्द्रियों की योनि और बुद्धि इन्द्रिय को उत्पन्न करने वाला है । स्थूल = स्थूलेश्वर । छगल = छगलाण्ड । वही कहा गया “स्थूल, स्थूलेश्वर, शकुकर्ण, कालञ्जर, मण्डलेश्वर, माकोट, दुरण्ड, छगलाण्ड ।” (मा०वि० ५।२१) और स्वच्छन्दतन्त्र में “छगलाण्ड, दुरण्ड, माकोट, मण्डलेश्वर, कालजर, शकुकर्ण, स्थूलेश्वर और स्थलेश्वर ये आठ स्थाणु कहे गए है ।” (स्वतं० १०।८८९) १३८ श्रीतन्त्रालोकः देवयोन्यष्टकम् । तदुक्तम् ‘पैशाचं राक्षसं याक्षं गान्धर्वं त्वैन्द्रमेव च। सौम्यं तथा च प्राजेशं ब्राह्ममष्टममुच्यते ॥ मन (मा० वि० ५।२३) इति । एतान्येव बुद्धिगतानि ककुभादीनि पुराणि आसां देवयोनीनां ‘स्थानानि’ मुख्यानि अवस्थितेर्धामानि-इत्यर्थः । अध: पञ्चाष्टकादिरूपतयाऽवस्थितानां पुनरासाममुख्यानि भुवनानीति भावः । ‘अवतीर्य’ इत्यर्थादधो ब्रह्माण्डादौ, ‘संभवन्ति’ इति पुनः-पुन: सृष्टिमासादयन्ति–इत्यर्थः ।। २२७ ।। अत्रैव निमित्तमाह परमेशनियोगाच्च चोद्यमानाश्च मायया । नियामिता नियत्या च ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः ॥ २२८ ॥ व्यज्यन्ते तेन सर्गादौ नामरूपैरनेकधा । ब्रह्मणः सर्गादौ ‘व्यज्यन्ते’ तथा तथा स्थूलेन रूपेण व्यक्तीभवन्ति इत्यर्थः । अनेकधेति, तारतम्यादिभेदात् ।। २२८ ।। न चैवमपि आसां बुद्धाववस्थितेभ्यो भुवनेभ्यः प्रच्याव:- इत्याह ___आठ देवयोनियाँ ही पुराधिप = भुवनेश्वर हैं जहाँ वह । तत् = आठ देवयोनियाँ हैं । वही कहा गया है “पैशाच, राक्षस, याक्ष, गान्धर्व, ऐन्द्र, सौम्य, प्राजेश और आठवाँ ब्राह्म ये आठ देव योनियाँ कही जाती हैं ।” (मा०वि० ५।२३) ये ही बुद्धिस्थ ककुभ आदि पुर इन देवयोनियों के स्थान = रहने के स्थल हैं । नीचे पाँच अष्टकों के रूपों में स्थित, इनके अमुख्य धाम हैं । अवतरण कर अर्थात् नीचे ब्रह्माण्ड आदि में । सम्भूत होते हैं = बार-बार सृष्टि को प्राप्त करते हैं ॥ २२५-२२७ ।।। इसमें कारण बतलाते हैं परमेश्वर के आदेश से, माया के द्वारा प्रेरित तथा नियति के द्वारा नियन्त्रित, अव्यक्तजन्मा ब्रह्मा की सृष्टि के प्रारम्भ में उन्हीं के द्वारा नामरूप के माध्यम से अनेक प्रकार से ये अभिव्यक्त होते हैं ॥ २२८-२२९- ॥ ब्रह्मा की सृष्टि के प्रारम्भ में व्यक्त होते हैं = भिन्न-भिन्न स्थूल रूप से प्रकट होते हैं । अनेकधा = तारतम्य आदि के भेद से ॥ २२८ ॥ ऐसा होने पर भी इन (देवयोनियों) का बुद्धिस्थ भुवनों से पतन नहीं होता यह कहते हैं अष्टममाह्निकम् स्वांशेनैव महात्मानो न त्यजन्ति स्वकेतनम् ॥ २२९ ॥ एतच्च बृहस्पतिपादैरेव स्वग्रन्थे व्याकृतम्-इत्याह उक्तं च शिवतनाविदमधिकारपदस्थितेन गुरुणा नः । अष्टानां देवानां शक्त्याविर्भावयोनयो ह्येताः ॥ २३० ॥ ‘देवानां’ पिशाचादीनाम् ‘आविर्भावोः’ व्यक्तिस्तेन शक्तिव्यक्तिरूपाद् विविधा योनय:-इत्यर्थः । तत्र बुद्धौ शक्त्यात्मना आसामवस्थितिरधस्तु व्यक्त्यात्म नेति ।। २३० ।। तदाह तनुभोगाः पुनरेषामधः प्रभूतात्मकाः प्रोक्ताः । ‘प्रभूतात्मका:’ स्थूलरूपाः ॥ तदेव दर्शयति चत्वारिंशत्तुल्योपभोगदेशाधिकानि भुवनानि ॥ २३१ ॥ चत्वारिंशदिति, लकुल्यादिभेदात् ॥ २३१ ॥ अपने अंश से—(अन्यत्र व्यक्त होने वाले ये) महात्मा लोग अपने स्थान को (अपने अंश से) नहीं छोड़ते ।। -२२९ ।। बृहस्पति ने इसे इस प्रकार अपने ग्रन्थ में स्पष्ट किया है—यह कहते हैं अधिकारपद पर स्थित, हमारे गुरु के द्वारा शिवतनु (= शास्त्र) में यह कहा गया है । ये (विविध देवयोनियाँ) आठ देवताओं की शक्ति से उत्पन्न होती हैं ॥ २३० ॥ देवताओं का = पिशाच आदि का । आविर्भाव = अभिव्यक्ति, इस प्रकार शक्ति की अभिव्यक्तिरूप से विविध योनियाँ है । इस स्थिति में वृद्धितत्त्व में इनकी अवस्थिति शक्तिरूप में और नीचे के तत्त्वों में अभिव्यक्त रूप में होती है ॥ २३० ॥ वही कहते हैं नीचे (के लोकों में) इनके शारीर भोग स्थूलरूप में कहे गए हैं ॥ २३१- ॥ प्रभूतात्मक = स्थूलरूप ॥ वही दिखलाते हैं समान उपभोग वाले भुवनों की संख्या चालिस है ।। -२३१ ।। १४० श्रीतन्त्रालोकः ननु यद्येषां तुल्योपभोगादित्वमस्ति तत्कथं गुह्याष्टकाद्यष्टकपञ्चकतया भेदः? -इत्याशङ्क्याह साधनभेदात्केवलमष्टकपञ्चकतयोक्तानि । साधनभेदमेवाह एतानि भक्तियोगप्राणत्यागादिगम्यानि ॥ २३२॥ तेषूमापतिरेव प्रभुः स्वतन्त्रेन्द्रियो विकरणात्मा । तरतमयोगेन ततोऽपि देवयोन्यष्टकं लक्ष्यं तु ॥ २३३ ॥ प्राणत्याग एतत्क्षेत्रादौ, आदिशब्दाल्लोकधर्मिसाधकदीक्षादि । एषां चैवं व्यक्तीभाव: किं स्वयमत कस्यापि अधिष्ठानेन?–इत्याशडक्याह‘तेष्वित्यादि पिशाचादिषु । स्वतन्त्रेन्द्रियत्वादेव ‘विकरणात्मा’ स्वेच्छाधीनेन्द्रियवृत्तिः–इत्यर्थः । यदुक्तं तत्रैव ‘इच्छाधीनानि पुनर्विकरणसंज्ञानि ।’ इति । नन्वासामविशेषेणैव किं सर्वत्रावस्थानं न वा ?–इत्याशङ्क्याह लकुली आदि के भेद से चालिस ॥ २३१ ॥ प्रश्न-यदि इनका उपभोग आदि समान है तो गुह्याष्टक आदि अष्टपञ्चक-इस प्रकार का भेद कैसे है-यह शङ्का कर कहते हैं साधनभेद के कारण ये आठ (भुवन) पाँच (भेद वाले) कहे गए हैं ।। २३२- ॥ साधनभेद को बतलाते हैं ये भक्ति, योग और प्राणत्याग के द्वारा प्राप्य हैं । उनमें उमापति (परमेश्वररूपी श्रीकण्ठ) ही अधिष्ठाता है (वे) स्वाधीन इन्द्रियवाले तथा स्वेच्छाधीन इन्द्रियवृत्तिवाले हैं । आगे देवयोनियों को तरतम भाव से उस (= बुद्धि) से उत्पन्न समझना चाहिए ।। -२३२-२३३ ॥ प्राणत्याग-इन क्षेत्र आदि में । आदि शब्द से लोकधर्मीसाधक दीक्षा आदि (जानना चाहिए) । इनकी इस प्रकार अभिव्यक्ति क्या स्वयं होती है या किसी के अधिष्ठान से ?-यह शङ्का कर कहते हैं उनमें = पिशाच आदि में । स्वतन्त्रेन्द्रिय घाला होने से ही (वह) विकरणात्मा = स्वेच्छाधीन इन्द्रियवृत्तियों वाला है । वही वहाँ कहा गया है “इच्छाधीन विकरण नाम वाले होते हैं ।” प्रश्न-इनकी समान रूप से सर्वत्र स्थिति रहती है या नहीं ? - यह शङ्का कर कहते हैं अष्टममाह्निकम् १४१ ‘तरतमेत्यादि’ । ‘तत:’ इति बुद्धेः । अपिभिन्नक्रमः, तेन अष्टावपीति योज्यम् ॥ २३३ ॥ न केवलमासामेव तरतमभावो यावदक्षाणामपि–इत्याह ____ लोकानामक्षाणि च विषयपरिच्छित्तिकरणानि । पिशाचादयो हि व्यवहितमपि चक्षुषा पश्यन्ति–इत्याशयः ।। न केवलमासां प्रतितत्त्वमेव तरतमभावो यावदन्योन्यमपि–इत्याह गन्धादेर्महदन्तादेकाधिक्येन जातमैश्वर्यम् ॥ २३४ ॥ अणिमाद्यात्मकमस्मिन्पैशाचाद्ये विरिञ्चान्ते । गन्धशब्देनात्र पृथ्व्या अभिधानम्, कार्यकारणयोरभेदोपचारात् । एकाधिक्येन इति, तत्पैशाचे यादृशमैश्वर्यं ततोऽपि द्विगुणं राक्षसे, यावद् ब्राह्मेऽष्टगुणम् इत्यर्थः ॥ २३४ ॥ अत एव च दीक्षायामेतच्छुद्धौ यतितव्यम्-इत्याह ज्ञात्वैवं शोधयेद् बुद्धिं सार्धं पुर्यष्टकेन्द्रियैः॥ २३५ ॥ तरतम योग से—उससे = बुद्धि से । अपि शब्द का क्रम भिन्न है । इसलिए आठ भी ऐसा अन्वय करना चाहिये ॥ इन्हीं का केवल तरतम भाव नहीं है इन्द्रियों का भी है-यह कहते हैं इन्द्रियाँ लोगों (= मनुष्यों) की विषय की सीमा करने वाली हैं” ।। २३४- ।। तात्पर्य यह है कि पिशाच आदि व्यवहित (वस्त) को भी आँख से देख लेते हैं किन्तु मनुष्य या पशु-पक्षी आदि अव्यवहित वस्तु का ही प्रत्यक्ष करते हैं । _इनका केवल प्रत्येक तत्त्व के साथ ही तरतम भाव नहीं है बल्कि एक का दूसरे के साथ भी है—यह कहते हैं इस पैशाच से लेकर ब्राह्म योनि में पृथिवी से लेकर महत् तत्त्व तक अणिमा आदि ऐश्वर्य एक-एक गुना अधिक है ।। -२३४-२३५- ।। गन्ध शब्द से पृथिवी का कथन है क्योंकि कार्य और कारण में अभेद मान लिया जाता है । एक अधिक-पैशाच योनि में जैसा ऐश्वर्य है उसका दो गुना राक्षस योनि में । इसी प्रकार ब्राह्म योनि में आठ गुना है ॥ २३४ ॥ इसीलिए दीक्षा के समय इसकी शुद्धि के लिए प्रयास करना चाहिए-यह कहते हैं ऐसा जानकर पुर्यष्टक इन्द्रियों के साथ बुद्धि का शोधन करना १४२ श्रीतन्त्रालोकः एवमिति, बुद्धरेवेदं निखिलं जगद्विजृम्भितम्-इत्यत एवोक्तं ‘पुर्यष्टकेन्द्रियः सार्धम्’ इति ।। २३५ ॥ न केवलमत्र देवयोन्यष्टकमेवास्ति यावदन्यदपि–इत्याह क्रोधेशाष्टकमानीलं संवर्ताद्यं ततो विदुः । तेजोष्टकं बलाध्यक्षप्रभृतिक्रोधनाष्टकात् ॥ २३६ ॥ अकृतादि ततो बुद्धौ योगाष्टकमुदाहृतम् । स्वच्छन्दशासने तत्तु मूले श्रीपूर्वशासने ॥ २३७ ॥ योगाष्टकपदे यत्तु सोमे भैकण्ठमेव च । ततो मायापुरं भूयः श्रीकण्ठस्य च कथ्यते ॥ २३८ ॥ तेन द्वितीयं भुवनं तयोः प्रत्येकमुच्यते । तत्र मायापुरं देव्या यया विश्वमधिष्ठितम् ॥ २३९ ॥ प्रतिकल्पं नामभेदैर्भण्यते सा महेश्वरी । उमापते पुरं पश्चान्मातृभिः परिवारितम् ॥ २४० ॥ श्रीकण्ठ एव परया मूोमापतिरुच्यते । ‘आनीलम्’ इति नीलोत्पलाभम् । तदुक्तम् चाहिए ।। -२३५ ॥ ऐसा-बुद्धि से ही यह समस्त संसार निकला हुआ है-इसीलिए कहा गया पुर्यष्टक इन्द्रियों के साथ ॥ २३५ ।। यहाँ केवल आठ देव योनियाँ ही नहीं है बल्कि और भी है—यह कहते हैं सम्पूर्ण रूप से नील आभावाले संवर्त्त आदि आठ क्रोधेश है । उसके बाद आठ क्रोधेश के ऊपर बलाध्यक्ष आदि आठ तेजोऽष्टक है । इसके बाद बुद्धि तत्त्व में वर्तमान अकृत आदि योगाष्टक कहे गए हैं । यह बात स्वच्छन्दतन्त्र एवं मालिनीविजय में स्पष्ट तथा उक्त है । योगाष्टकपद श्रीकण्ठ के उस रूप के साथ प्रयुक्त होता है जब वे रुद्रलोक में ज्योतिष्क शिखर पर उमा के साथ शर्व आदि से परिवृत रहते हैं। ___ इसके बाद पर रूप से श्रीकण्ठ से अधिष्ठित मायापुर कहा जाता है । यह उमापति तथा श्रीकण्ठ दोनों के अलग-अलग अधिकार से दो प्रकार से गृहीत है जहाँ पर (उस) देवी की मायापुरी है जिसके द्वारा विश्व नियन्त्रित है । वह महेश्वरी भिन्न-भिन्न कल्पों में भिन्न-भिन्न नामों से कही जाती है । उसके ऊपर माताओं से परिवारित उमापति का पुर है । श्रीकण्ठ ही परमूर्त्ति प्राप्त करने के कारण उमापति कहे जाते हैं ।। २३६-२४१- ॥ अष्टममाह्निकम् १४३ ‘संवर्तस्त्वेकवीरश्च कृतान्तो जननाशनः । मृत्युहर्ता च रक्ताक्षो महाक्रोधश्च दुर्जयः ।। नीलोत्पलदलाभानि तेषां वै भुवनानि तु ।’ (स्व० १०।९७६) इति । क्रोधनाष्टकादिति, तदूर्ध्वम्-इत्यर्थः । तदुक्तम् ‘क्रोधेश्वराष्टकादूर्ध्वं स्थितं तेजोऽष्टकं महत् । बलाध्यक्षो गणाध्यक्षस्त्रिदशस्त्रिपुरान्तकः ।। सर्वरूपश्च शान्तश्च निमेषोन्मेष एव च ।’ (स्व० १०।९७८) इति । ‘ततः’ इति तेजोष्टकादनन्तरम् । तदुक्तम् ‘अकृतं च कृतं चैव वैभवं ब्राह्ममेव च । वैष्णवं त्वथ कौमारमौमं त्रैकण्ठमेव च ॥’ (स्व० १०१९८१) इति । तुशब्दो व्यतिरेके ‘मूल’ इति प्रकृतौ । यदुक्तं तत्र ___ ‘योगाष्टकं प्रधानं च…………………… ।’ इति । ‘योगाष्टकपदे’ इत्यपरेण रूपेणोक्तम्, भूय इति परेण रूपेण, तयोरिति आनील = नील कमल के समान । वही कहा गया है “संवत एकवीर, कृतान्त, जननाशन, मृत्युहर्ता, रक्ताक्ष, महाक्रोध और दुर्जय ये आठ क्रोधेश्वर हैं । इनके भवन नीलकमल के दल के समान है।” (स्वतं० १०।९७६) क्रोधनाष्टक से-उसके ऊपर । वही कहा गया है “क्रोधनाष्टक से ऊपर महान् तेजोऽष्टक स्थित हैं उनके नाम है-बलाध्यक्ष, गणाध्यक्ष, त्रिदश, त्रिपुरान्तक, सर्वरूप, शान्त, निमेष और उन्मेष ॥ (स्वतं० १०।९७८) ततः = तेजोऽष्टक के बाद । वही कहा गया है “अकृत, कृत, वैभव, ब्राह्म, वैष्णव, कौमार, भौम और श्रीकण्ठ ये आठ योगाष्टक के नाम से जाने जाते हैं ।’’ (स्वतं० १०।९८१) ‘तु’ शब्द किसी दूसरे शब्द के साथ जुटता है । मूल में = प्रकृति में । जैसा कि वहाँ कहा गया है “योगाष्टक प्रधान (के अधीन) है ।’’ ‘योगाष्टकपदे’ यह अपररूप से कहा गया है । ‘भूय:’ यह पर रूप से । उन १४४ श्रीतन्त्रालोकः उमापतिश्रीकण्ठयोः, तत्रेति द्वयनिर्धारणे । पुरमिति, अर्थाद् द्वितीयम् । एवं विश्वाधिष्ठाने हेतुर्भण्यते ‘सा महेश्वरी’ इति । तदुक्तम् ‘तत: साक्षाद्भगवती जगन्माता व्यवस्थिता । उमा त्वमेया विश्वस्य विश्वयोनिः स्वयंभवा ।।’ (स्व० १०१९८३) इत्यादि । ‘कल्पे पूर्वे जगन्माता जगद्योनिर्द्वितीयके । तृतीये शाम्भवी नाम चतुर्थे विश्वरूपिणी ।।’ (स्व० १०।९९२) इत्यादि । मध्ये ‘कात्यायनीति दुर्गेति विविधैर्नामपर्यायैः । मानुषाणां तु भक्तानां वरदा भक्तवत्सला ।। पूर्वमेवावतीर्णासि विन्ध्यपर्वतमूर्धनि ।’ (स्व १०।१००३) इत्यन्तम् । ‘पश्चात्’ इत्युमापुरानन्तरम् । ननु श्रीकण्ठस्य ‘भूयः पुरं कथ्यते’ इत्युपक्रम्य कथमुमापतेरित्युक्तम्?–इत्याशङ्क्याह-‘श्रीकण्ठ एव’ इत्यादि ।। २४० ॥ कास्ता मातरः?–इत्याशङ्क्याह ब्राह्मयैशी स्कन्दजा हारी वाराहँन्द्री सविच्चिका (चर्चिका)॥ २४१ ॥ दोनों का = उमापति और श्रीकण्ठ का । उसमें = दो के निश्चय करने में पुर अर्थात् दूसरा (पुर) । -इस प्रकार विश्व के अधिष्ठान में हेतु कहा जाता है—‘वह महेश्वरी’ । वही कहा गया है __“उसके बाद साक्षात् भगवती जगन्माता उमा स्थित हैं जो कि विश्व के ज्ञान से परे, विश्व की कारणभूत और स्वयंभू हैं।” (स्व० १०।९८३) “यह प्रथम कल्प में जगन्माता, द्वितीय में जगद्योनि तृतीय में शाम्भवी और चतुर्थ कल्प में विश्वरूपिणी (नामवाली है) ।” (स्वतं० १०।९९२) इत्यादि । और मध्य में “कात्यायनी, दुर्गा इत्यादि अनेक पर्याय नामों से (कही जाती है) । भक्त मनुष्यों के लिए वरदायिनी, भक्तवत्सला (वह) विन्ध्यपर्वत के ऊपर पहले ही अवतीर्ण हैं ।” (स्वतं० १०१००३) इत्यादि अन्त तक उसका वर्णन है । बाद में = उमापुर के बाद । प्रश्न श्रीकण्ठ का ‘पुनः पुर कहा जाता है’-ऐसा प्रारम्भ कर पुनः ‘उमापति का’-ऐसा क्यों कहा गया ? यह शङ्का कर कहते हैं- ‘श्रीकण्ठ ही…..’ इत्यादि ॥ २४०- ॥ वे मातायें कौन सी हैं ? यह शङ्का कर कहते हैं अष्टममाह्निकम् पीता शुक्ला पीतनीले नीला शुक्लारुणा क्रमात् ॥ अग्नीशसौम्ययाम्याप्यपूर्वनैऋतगास्तु ताः ॥ २४२ ॥ अंशेन मानुषे लोके धात्रा ता ह्यवतारिताः । तदुक्तम् ‘ब्राह्मी कमलपत्राभा दिव्याभरणभूषिता । आग्नेय्यां दिशि.. (स्व० १०।१०१७) इति । ‘शङ्कगोक्षीरसङ्काशा त्वैशान्यां तु वरानने । माहेश्वरी… (स्व० १०।१०१८) इति । ‘कौमारी पद्मगर्भाभा हारकेयूरभूषिता । दिश्युत्तरस्यां… (स्व० १०।१०१९) इति । ‘स्निग्धनीलोत्पलनिभा हारकुण्डलमण्डिता । दक्षिणस्यां दिशि तु सा उपास्ते परमेश्वरम् ।। वैष्णवीति च विख्याता ………………… (स्व० १०।१०२०) इति । ‘नीलजीमूतसङ्काशा सर्वाभरणाभूषिता । ब्राह्मी, ऐशानी, स्कन्दजा, हारी (= वैष्णवी), वाराही, ऐन्द्री, चर्चिका (= चामुण्डा), (ये देवियाँ) क्रमश: पीता, शुक्ला, पीतनीला, नीला तथा शुक्ला रूपा हैं । वे अग्नि, ईशान, सौम्य, याम्य, आप्य, पूर्व, और नैर्ऋत दिशाओं में रहती हैं । ब्रह्मा के द्वारा वे मनुष्य लोक में आंशिक रूप में अवतारित की गयी हैं ।। -२४१-२४३- ।। वही कहा गया है “कमलपत्र के समान, दिव्य आभरण से अलंकृत ब्राह्मी अग्नि कोण में है।” (स्व० तं० १०।१०१७) “हे वरानने ! शङ्ख अथवा गाय के दूध के समान माहेश्वरी ईशान दिशा में (स्थित) है ।” (स्व० १०।१०१८) ___“उत्तर दिशा में पद्मगर्भ के समान कान्तिवाली, हार और केयर से अलंकृत कौमारी (स्थित) है ।” (स्व०। १०।१०१९) “स्निगन्ध नील कमल के समान, हार और कुण्डल से अलंकृत जो देवी दक्षिण दिशा में परमेश्वर की उपासना करती है वह वैष्णवी के नाम से विख्यात है।” (स्व० १०।१०२०) १० त.त. श्रीतन्त्रालोकः वारुण्यां दिशि वाराही. (स्व० १०।१०२१) इति । ‘शङ्खकुन्देन्दुधवला हारकुण्डलमण्डिता । ऐन्द्रयां दिशि तु चैन्द्राणी…………….. ।।’ (स्व० १०।१०२२) इति । करालवदना दीप्ता सर्वाभरणभूषिता । नैर्ऋत्यां दिशि चामुण्डा…………….. ।।’ (स्व० १०।१०२३) इति च । अंशेनेति, न तु सर्वसर्विकया । तदुक्तम् ‘न त्यजन्ति हि ता देवं सर्वभावसमन्वितम् । अंशेन मानुषं लोकं ब्रह्मणा चावतारिताः ।। असुराणां वधार्थाय मानुषाणां हिताय च ।’ (स्व० १०।१०२५) इति ॥ २४२ ।। न चेयदन्तमेवासां व्याप्ति:- इत्याह स्वच्छन्दास्ताः पराश्चान्याः परे व्योम्नि व्यवस्थिताः ॥ २४३ ॥ स्वच्छन्दं ता निषेवन्ते सप्तधेयमुमा यतः । “नील बादल के समान तथा सभी आभूषणों से युक्त वाराही पश्चिम दिशा में स्थित है ।” (स्व०१०११०२१) “शङ्ख, कुन्द पुष्प एवं चन्द्रमा के समान धवल तथा हार एवं कुण्डल से विभूषित इन्द्राणी पूर्व दिशा में विराजमान हैं ।” (स्व० १०।१०२२) ‘भयङ्कर मुख वाली, चमकती हुई, समस्त आभूषणों से युक्त चामुण्डा नैर्ऋत्य दिशा में वर्तमान है ।” (स्व० १०।१०२३) आंशिकरूप से न कि सम्पूर्णरूप में । वही कहा गया है (ये देवियाँ मृत्युलोक में जाने के लिए) प्रेरित हुई भी (अथवा हितकारिणी) समस्त भावों से युक्त परमेश्वर को छोड़ती नहीं हैं । असुरों के वध तथा मनुष्या के कल्याण के लिए ब्रह्मा के द्वारा मनुष्य लोक में ये सब आंशिक रूप में अवतारित की गयीं ।। २४२ ।। (१०।१०२५) यहीं तक इनकी व्याप्ति नहीं है—यह कहते हैं ___ स्वच्छन्द वे और दूसरी परा (आदि देवियाँ) परम व्योम में रहती है । वे स्वच्छन्द (= परमेश्वर) की सेवा करती हैं । क्योंकि उमा सात रूपों वाली है ।। -२४३-२४४- ।।अष्टममाह्निकम् शक्तिः । तदुक्तम् ‘स्वच्छन्दाश्च पराश्चान्याः परे व्योम्नि व्यवस्थिताः । स्वच्छन्दं पर्युपासीना: परापरविभागतः । उमा वै सप्तधा भूत्वा नामरूपविपर्ययैः ।’ (स्व० १०।१०२७) इति ॥ २४३ ॥ उमापतिपुरस्योर्ध्वं स्थितं मूर्त्यष्टकं परम् ॥ २४४ ॥ शर्वादिकं यस्य सृष्टिर्धराद्या याजकान्ततः । ताभ्य ईशानमूर्तिर्या सा मेरौ संप्रतिष्ठिता ॥ २४५ ॥ श्रीकण्ठः स्फटिकाद्रौ सा व्याप्ता तन्वष्टकैर्जगत् । ये योगं सगुणं शम्भोः संयताः पर्युपासते ॥ २४६ ॥ तन्मण्डलं वा दृष्ट्वैव मुक्तद्वैता हृतत्रयाः । मूर्त्यष्टकमिति, तदधिष्ठातृ परमिति, अपरस्य परापरस्य च पूर्वमुक्तत्वात् । ‘यस्य’ इति मूर्त्यष्टकाधिष्ठातुः शर्वादेः । ‘ताभ्यः’ इति अष्टाभ्यो मूर्तिभ्यो मध्यात् ‘सगुणम्’ इति सत्त्वादिवृत्तिप्रधानं न तु पराद्वयरूपम् । तन्मण्डलमिति, परम व्योम में = उन्मना स्तर पर । उमा = परम शिव से अभिन्न परमेश्वर की शक्ति । वही कहा गया है “स्वच्छन्द वे और दूसरी परा (आदि देवियाँ) पर व्योम में स्थित है । ये स्वच्छन्द (= परमेश्वर) की सेवा में रत है । उमा ही भिन्न-भिन्न नामरूपों में पर-अपर विभाग से सात रूपों में होकर (स्थित है)” ॥ २४३ ॥ (स्व० १०।१०२७) उमापतिपुर के ऊपर शर्व आदि (= शर्व, भव, रुद्र, पशुपति, ईशान, भीम, महादेव, उग्र) पर मूर्त्यष्टक (= परा आठ मूर्तियाँ) स्थित हैं । जिसकी सृष्टि पृथ्वी से लेकर यजमान तक है। उन (= आठ मूर्तियों) में से जो ईशान मूर्ति है वह मेरु (पर्वत) पर स्थित हैं । श्रीकण्ठ स्फटिक पर्वत पर (स्थित) हैं । वह (= श्रीकण्ठमूर्त्ति) अपनी आठ (पृथिवी जल आदि) शरीरों से संसार को व्याप्त किये हुये हैं । जो संयमशील (पुरुष) शिव के सगुण योग की उपासना करते हैं वे उस मण्डल को देख कर ही द्वैतरहित तथा त्रयशून्य (सत्त्व रजस् तमस् रूप तीन से शून्य) हो जाते हैं । -२४४-२४७- ।। आठ मूर्तियाँ—उस (पुर) की अधिष्ठातृ पर (देवता) । क्योंकि अपर और परापर पहले ही कह दिये गये हैं । जिसका = आठ मूर्तियों के अधिष्ठाता शर्व आदि का । उनसे = आठ मूर्तियों में से । सगुण = सत्त्व आदि वृत्ति की प्रधानता वाले, न कि पराद्वय रूप । उस मण्डल को = श्रीकण्ठ आदि के द्वारा उक्त १४८ श्रीतन्त्रालोकः श्रीश्रीकण्ठाद्युक्तम् । ‘मुक्तद्वैताः’ इति सांख्यादिक्रमेण लब्धकैवल्याः ॥ २४६ ।। ननु यदि नाम योगस्येयदन्तं प्राप्तौ सामर्थ्यमस्ति तत्कथगस्य अधराधरतत्त्वप्राप्तिरप्युक्ता ?–इत्याशङ्क्याह गुणानामाधरौत्तर्याच्छुद्धाशुद्धत्वसंस्थितेः ॥ २४७ ॥ तारतम्याच्च योगस्य भेदात्फलविचित्रता। ततो भोगफलावाप्तिभेदाढ़ेदोऽयमुच्यते ॥ २४८ ॥ ‘आधरौत्तर्यात्’ इति गुणप्रधानभावात् । शुद्धत्वम्, निर्बीजत्वात् । अशुद्धत्वम्, सबीजत्वात् । ‘तारतम्यात्’ इति मृदुमध्याधिमात्ररूपत्वात् । फल विचित्रतेति, तत्तत्त्वप्राप्तिरूपा येनायं भेदः । कस्यचिद्योगस्योोज़ तत्त्वेषु प्राप्तिनिमित्तत्वम्, अन्यस्य च अधराधरेष्विति ॥ २४८ ॥ मूर्त्यष्टकोपरिष्टात्तु सुशिवा द्वादशोदिताः। वामाघेकशिवान्तास्ते कुङ्कुमाभाः सुतेजसः॥ २४९ ॥ तदूर्ध्वं वीरभद्राख्यो मण्डलाधिपतिः स्थितिः। यत्त(स्त) त्सायुज्यमापन्नः स तेन सह मोदते ॥ २५० ॥ ततोऽप्यगुष्ठमात्रान्तं महादेवाष्टकं भवेत् । (मण्डल) को । द्वैतरहित = सांख्य आदि के क्रम से कैवल्य को प्राप्त ।। २४६ ।। प्रश्न-यदि यहाँ तक प्राप्ति के विषय में योग का सामर्थ्य है तो इसके नीचे-नीचे के तत्त्वों की प्राप्ति भी क्यों कहीं गयी ? यह शङ्का कर कहते हैं गुणों के गौणप्रधान भाव, शुद्ध अशुद्ध स्थिति और योग के तारतम्य के कारणे वेद (= ऋग आदि) से विचित्र फल (उपलब्ध होते) हैं । इस कारण भोगफल की प्राप्ति के भेद से यह भेद कहा जाता है ।। -२४७-२४८ ॥ ___ आधरौत्तर्य के कारण = गुणप्रधानभाव के कारण । शुद्धता–निबींज होने के कारण होती है अशुद्धता = सबीज होने के कारण होती है । तारतम्य के कारण = मृदु मध्य और अधिमात्र (= तीव्र) रूप होने के कारण । फलविचित्रता-उस तत्त्व की प्राप्तिरूपा, जिससे यह भेद है । कोई योग ऊर्ध्व तत्त्वों की प्राप्ति का कारण है दूसरा निम्न-निम्न (तत्त्वों) की ॥ २४८ ॥ मूर्त्यष्टक के ऊपर कुंकुम के समान कान्ति वाले तेजस्वी वाम से लेकर शिव पर्यन्त बारह सुशिव कहे गए हैं । उसके ऊपर वीरभद्र नामक मण्डलाधिपति स्थित हैं । जो (मनुष्य) उनके सायुज्य को प्राप्त कर लेता है वह उनके साथ आनन्द उठाता है । उसके बाद अङ्गष्ठमात्र तक महादेवाष्टक हैं ।। २४९-२५१- ।। अष्टममाह्निकम ‘सुतेजसः’ इति सूर्यकोटिसमप्रभाः । तदुक्तम् ‘वामो भीमस्तथोग्रश्च शिवः शर्वस्तथैव च। विद्यानामधिपश्चैव एकवीर: प्रचण्डधृत् ॥ ईशानश्चाप्यमाभर्ता अजेशोऽनन्त एव च । तथा एकशिवश्चैव सुशिवा द्वादश स्मृताः।। सर्वे कुडकुमसङ्काशा: सूर्यकोटिसमप्रभाः ।’ (स्व० १०।१०३८) इति । तदूर्ध्वमिति, तच्छब्देन सुशिवपरामर्शः । ततः’ इति वीरभद्रमण्डलादप्य नन्तरम् । तदुक्तम् ‘महादेवो महातेजा वामदेवभवोद्भवौ । एकपिङ्गेक्षणेशानभुवनेशपुर:सराः ॥ अङ्गुष्ठमात्रसहिता महादेवाष्टके शिवाः।’ (स्व० १०।१०४२) इति ॥ २५० ।। एतदेवोपसंहरति बुद्धितत्त्वमिदं प्रोक्तं देवयोन्यष्टकादितः ॥ २५१ ॥ महादेवाष्टकान्ते तद् योगाष्टकमिहोदितम् । तत्र त्रैकण्ठमुक्तं यत् तस्यैवोमापतिस्तथा ॥ २५२ ॥ मूर्तयः सुशिवा वीरो महादेवाष्टकं वपुः। सुतेज वाले = करोड़ों सूर्य के समान कान्ति वाले । वही कहा गया ‘वाम, भीम, उग्र, शिव, शर्व, विद्यापति, एकवीर, प्रचण्डधृत, ईशान उमाभर्ता, अजेश, अनन्त तथा एकशिव ये बारह सुशिव कहे गए है । (स्वतं० १०।१०३८) उसके ऊपर-यहाँ उस पद से सुशिव समझना चाहिए । उसके बाद = वीर भद्रमण्डल के बाद । वही कहा गया है “महादेव, महातेज, वामदेव, भवोद्भव, एकपिङ्गेक्षण, ईशान, भुवनेश और अङ्गष्टमात्र को लेकर ये शिवमहादेवाष्टक की गणना में आते है ॥ २५० ॥ (स्व० तं० १०।१०४२) इसी का उपसंहार करते है आठ देवयोनि से लेकर महादेवाष्टक तक बुद्धितत्त्व (-वासी मण्डल) कहा गया । वह यहाँ योगाष्टक कहा गया है। उसमे श्रीकण्ठ सम्बन्धी जो (भवन) कहा गया उमापति, सशिव मूर्तियाँ, वीरभद्र तथा महादेवाष्टक उसी का शरीर है ।। -२५१-२५३- ।। १५० श्रीतन्त्रालोकः एवंविधे च द्धितत्त्वे योगाष्टकमध्ये यदष्टमं भैकण्ठं भुवनमुक्तं तदधिष्ठाता च यः श्रीकण्ठनाथ उक्तः, तस्यैवायमुमापतेरारभ्य सर्व: प्रपञ्च:- इत्युक्तम् ‘तस्यैवेत्यादि’ । ‘वीरो’ वीरभद्रः । तदुक्तम् ‘सर्वेश्वरानधिष्ठाय श्रीकण्ठः कारणेच्छया । एक: स बहुभी रूपैरास्ते प्रतिनिकेतनम् ॥ इति ।। २५२ ।। उपरिष्टाद्धियोऽधश्च प्रकृतेर्गुणसंज्ञितम् ॥ २५३ ॥ तत्त्वं तत्र तु संक्षुब्धा गुणाः प्रसुवते धियम् । ‘गुणसंज्ञितं तत्त्वम्’ गुणतत्त्वम्-इत्यर्थः । ननु ‘प्रकृतेर्महान्’ (सांका० २२) इत्युक्तया प्रकृत्यनन्तरं तत्कार्यभूतं बुद्धितत्त्वमन्यैरुक्तम्-इति कथमिहान्तरा गणतत्त्वम्च्यते ?–इत्याशङ्क्याह–‘तत्र तु’ इत्यादि । तुशब्दो हतो । ‘संक्षुब्धाः’ इति परस्पराङ्गाङ्गिभावेन वैषम्यापत्त्या कार्यजननोन्मुखा:- इत्यर्थः । प्रकृतौ हि तेषामविशेषेणावस्थानम् । यदाहुः “सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः ।’ (सा० सू० १।६१) इति । न च वैषम्यमनापन्नं कारणं कार्यं जनयेत्, बीजं हि जलादिसंपर्कादुच्छून इस प्रकार के बुद्धितत्त्व में योगाष्टक में जो आठवाँ श्रीकण्ठ वाला भवन कहा गया है और उसके अधिष्ठाता जो श्रीकण्ठ नाथ कहे गए है उमापति से लेकर साग प्रपञ्च उन्हीं का है-यही कहा गया-उसी का इत्यादि । वीर = वीरभद्र । वहीं कहा गया है “कारण (= परम शिव) की इच्छा से श्रीकण्ठ सभी ईश्वरों को अधिष्ठित कर एक होते हुए भी प्रत्येक भुवन में अनेक रूपों में रहते हैं” ॥ २५२ ॥ बद्धितत्व के ऊपर और प्रकति के नीचे गण नामक तत्त्व है । वहाँ क्षोभ को प्राप्त गुण बुद्धितत्त्व को प्रकट करते हैं ।। -२५३-२५४- ।। ___ गुणसंज्ञित तत्त्व = गुणतत्त्व । प्रश्न-“प्रकृति से महत् तत्त्व…’ इस उक्ति से अन्य लोगों के द्वारा प्रकृति के बाद उसका कार्य बुद्धितत्त्व कहा गया है । फिर यहाँ बीच में गण तत्त्व कैसे कहा जा रहा है? यह शङ्का कर कहते है “वहाँ तो’ इत्यादि । तु शब्द हेतु अर्थ में प्रयुक्त है । संक्षुब्ध = परस्पर अङ्गअङ्गीसम्बन्ध से वैषम्य की प्राप्ति के द्वारा कार्य को उत्पन्न करने की ओर उन्मुख । प्रकृति की स्थिति में उनकी स्थिति सामान्य रूप से (= साम्यावस्था में) रहती है । जैसा कि कहा गया है “सत्त्व रजस् और तमस् की साम्यावस्था प्रकृति है ।’ वैषम्य को न प्राप्त होने वाला कारण कार्य को उत्पन्न नहीं कर सकता । बीज अष्टममाह्निकम् तामापन्नं सत् अङ्कुरादि उत्पादयेत् नान्यथा, तथात्वे हि मूलादपि तदुत्पाद: म्यात्, तदाह न वैषम्यमनापन्नं कारणं कार्यसूतये ॥ २५४ ॥ अत एव वैषम्यमनापन्ना प्रकृति कथं बुद्धिजन्मनि कारणं स्यात् ? इत्याह गुणसाम्यात्मिका तेन प्रकृतिः कारणं भवेत् । ‘तेन’ इति वैषम्यापत्तिभावेन । तदवश्यं प्रकृतिकार्य तत्क्षोभरूपं गुणतत्त्व मन्तराङ्गीकार्य येन द्धिजन्म स्यात् ।। ननु यद्येवं तद् गुणतत्त्वमपि प्रकृतिः किं क्षोभं विना जनयेन वा ? तत्राद्ये पक्षे बुद्धितत्त्वमेव तथा जनयत् किमन्तराकल्पितेन गुणतत्त्वेन । अथ सति क्षोभे तत् सोऽपि क्षोभः किं क्षोभान्तरे सत्यसति वा ? इत्यनवस्था स्यात्, येन न गणानां नापि बुद्धर्जन्म सिद्धयत् तदाह नन्वेवं सापि संक्षोभं विना तान्विषमान्गुणान् ॥ २५५ ॥ कथं सुवीत तत्राद्ये क्षोभे स्यादनवस्थितिः । जल आदि के सम्पर्क से उच्छृनता को प्राप्त होकर ही अङ्कर आदि को उत्पन्न करेगा अन्यथा नहीं । क्योंकि वैसा होने पर मूल से भी उसकी उत्पत्ति होने लगेगी। वही कहते है वैषम्य को अप्राप्त कारण कार्य की उत्पत्ति के लिए (समर्थ) नहीं है ।।-२५४ ।। इसीलिए वैषम्य को अप्राप्त प्रकृति बुद्धि की उत्पत्ति में कारण कैसे हो सकती है । यह कहते है इसलिए गुणों की साम्यरूपा प्रकृति कारण है ।। इसलिए = वैषम्य की प्राप्ति के कारण । इसलिए बीच में प्रकृति का कार्य उसका क्षोभरूप गुणतत्त्व अवश्य स्वीकार करना चाहिए जिससे बुद्धि का जन्म हो । प्रश्न- यदि ऐसा है तो प्रकृति गुणतत्त्व को बिना क्षोभ के उत्पन्न करेगी या नहीं ? प्रथम पक्ष में उस प्रकार प्रकृति बुद्धितत्त्व को ही उत्पन्न करे मध्य में कल्पित गुणतत्त्व का क्या प्रयोजन । और यदि क्षोभ होने पर (उत्पन्न करती है) तो वह क्षोभ भी दूसरे क्षोभ के होने पर होगा या न होने पर ? इस प्रकार अनवस्था होने लगेगी जिससे कि न तो गुणों का और न बुद्धि का जन्म सिद्ध होगा, वह कहते हैं प्रश्न है कि इस प्रकार वह क्षोभ के बिना उन विषम गणों को श्रीतन्त्रालोकः नन् भवेदयं दोष: किंतु सांख्यस्य न पुनरस्माकम्, न हि नाम जडं कारणं क्षोभं विना कार्यमेव जनयितुमलम् लोके बीजाङ्कुरादौ तथा दर्शनात्, तदाह सांख्यस्य दोष एवायं. एवकारो भिन्नक्रमः । तेन सांख्यस्यैवेति । यद्वा तस्यापि नायं दोषो यत्तेन स्वत एव क्षुब्धास्ते गुणा अव्यक्तस्य रूपमिष्टम्, अन्यथा कथं तत्कार्योत्पादः स्यात्; अत एव ‘प्रसवधर्मि’ (सां० का० ११) इत्युक्तम् ।। तदाह ……………..यदि वा तेन ते गुणाः ॥ २५६ ॥ अव्यक्तमिष्टाः ननु यद्येवं तत्तस्य ‘सत्त्वरजस्तमसां साम्यावस्था प्रकृतिः’ इति कथं सङ्गच्छेत् ?–इत्याशङ्क्याह साम्यं तु सङ्गमानं न चेतरत् । साम्यं पुनरत्र गुणानां सङ्गमात्रत्वम्, क्षुब्धत्वेऽपि समस्पर्धितया समुदितत्वमेव कवलं विवक्षितं न त्वितरत्, अक्षुब्धत्वात् अविशेषणावस्थानम्, तथात्व हि कैसे उत्पन्न करेगी । फलतः प्रथम क्षोभ के विषय में अनवस्था हो जाएगी ।। -२५५-२५६- ।। __यह दोष सांख्य के (पक्ष में) होगा हमारे (पक्ष में) नहीं । जड़ कारण क्षोभ के बिना कार्य को ही उत्पन्न करने में समर्थ नहीं होगा । क्योकि लोक में बीज अङ्कर आदि के विषय में वैसा देखा जाता है । वह कहते हैं यह सांख्य का ही दोष होगा ॥ २५६- ।। एवकार का क्रम भिन्न है । इस प्रकार सांख्य का ही-ऐसा (समझना चाहिए। अथवा उसके मत में भी यह दोष नहीं है क्योंकि उसने स्वत: क्षुब्ध उन गुणों को अव्यक्त का रूप माना है । अन्यथा उनके कार्यों की उत्पत्ति कैसे होगी ? इसीलिए “प्रसवधर्मी’’ ऐसा कहा गया है । वही कहते हैं अथवा उसके द्वारा वे (= क्षुब्ध) गुण अव्यक्त माने गए हैं ।। -२५६ ॥ प्रश्न- यदि ऐसा है तो उस (= सांख्यवादी) का “सत्त्व रजस् और तमस् की साम्यावस्या प्रकृति है’ यह (सिद्धान्त) कैसे सङ्गत होगा ? यह शङ्का कर कहते हे साम्य (का अर्थ) है—केवल सङ्गति, दूसरा कुछ नहीं ॥ २५७- ।। यहाँ साम्य का अर्थ है-केवल साथ-साथ रहना । क्षुब्ध होने पर भी समान स्पर्धा वाला होने के कारण केवल समुदित होना ही विवक्षित है न कि अन्य कुछ। क्षब्ध न होने के कारण सामान्य रूप में इनकी स्थिति रहती है । क्योंकि वैसा होने अष्टममाह्निकम् १५३ यथाक्तदाषावकाशात्मा बाध: स्यात् ।। तन्न सांख्यानां कश्चिद्दोष उक्त: किन्तु गुणतत्त्ववादिनामेव ? इत्याशङ्क्याह अस्माकं तु स्वतन्त्रेशतथेच्छाक्षोभसङ्गतम् ॥ २५७ ॥ अव्यक्तं बुद्धितत्त्वस्य कारणं क्षोभिता गुणाः। इह तावज्जडं कारणं क्षुब्धतामनापन्नं सत् कार्य जनयितुमेव नालमित्युक्तम्, न चास्य क्षब्धतापत्तावपि क्षोभान्तरमपेक्षणीयम ईश्वरेच्छातस्तथाभावात, न च तामन्तरेण कार्यकारणभाव एव स्यात्-इत्यग्रे भविष्यति- इति नेहायस्तम् । अतश्च अस्मद्दर्शने प्रकृतितत्त्वाधिष्ठातुः स्वतन्त्रस्येश्वरस्य तथा स्वतन्त्रैवेयमिच्छा, तया क्षुब्धमव्यक्त क्षोभिता गुणा गुणात्मतत्त्वात्मता यातं सत् बुद्धितत्त्वस्य ‘कारणम्’ तत्प्रसवसमर्थम्— इत्यर्थः ॥ २५७ ।। नन् यद्येवं तदीश्वरेच्छातः क्षुब्धं सदव्यक्तं बुद्धितत्त्वमेव जनयत् किमन्तरापरिकल्पितेन प्रतिपत्तिगौरवकारिणा गुणतत्त्वेन?— इत्याह ननु तत्त्वेश्वरेच्छातो यः क्षोभः प्रकृतेः पुरा ॥ २५८ ॥ पर उक्त (= अनवस्था) दोष के अवकाश वाला बाध हो जाएगा । ____ इसलिए सांख्यों के (मत में) कोई दोष नहीं कहा गया किन्तु गुणतत्त्ववादियों के (मत में) ? यह शङ्का कर कहते हैं हमारे (मत में) तो स्वतन्त्र ईश्वर की उस प्रकार की इच्छा से क्षोभ को प्राप्त अव्यक्त (अर्थात्) क्षोभित गुण बुद्धि तत्त्व का कारण है ।। -२५७-२५८- ।। जड़ कारण क्षोभ को प्राप्त न होकर कार्य को उत्पन्न करने में समर्थ नहीं है- यह कहा गया । इस (जड़ कारण) के क्षोभ को प्राप्त होने पर भी दूसरा क्षोभ आवश्यक नहीं है क्योंकि ईश्वर की इच्छा से वैसा हो जाता है । और उस (= ईश्वरेच्छा) के बिना कार्यकारण भाव ही नहीं होगा—यह आगे (स्पष्ट) होगा इसलिए यहाँ विस्तृत नहीं किया गया । इसलिए हमारे दर्शन में प्रकृति तत्त्व के अधिष्ठाता स्वतन्त्र ईश्वर की उस प्रकार की यह स्वतन्त्र इच्छा ही है । उसके द्वारा क्षुब्ध अव्यक्त (अर्थात्) क्षोभित गुण (अर्थात्) गुणात्मक तत्त्वरूप को प्राप्त हुआ (अव्यक्त) बुद्धितत्त्व का कारण = उसको उत्पन्न करने में समर्थ होता है ।। २५७।। प्रश्न- यदि ऐसा है तो ईश्वरेच्छा के कारण क्षुब्ध अव्यक्त (तत्त्व) ही बुद्धि तत्त्व को उत्पन्न करे ज्ञान का गौरव बढ़ाने वाले मध्य में परिकल्पित गुणतत्त्व से क्या लाभ ? यह कहते हैं प्रश्न है कि तत्त्वों के अधिष्ठाता ईश्वर की इच्छा से जो प्रथम प्रकृति १५४ श्रीतन्त्रालोकः तदेव बुद्धितत्त्वं स्यात् किमन्यैः कल्पितैर्गुणैः । एतदेव प्रतिविधत्ते नैतत्कारणतारूपपरामर्शावरोधि यत् ॥ २५९ ॥ क्षोभान्तरं ततः कार्यं बीजोच्छूनाङ्कुरादिवत्। तद्धि नाम कारणमच्यते यत्क्षोभापत्तावपि तद्पतापरामर्शमेव अवरुन्ध्यात, उच्छूनमपि हि बीजं बीजमेवोच्यते, तेन तत्क्षोभरूपमपि गुणतत्त्वं कारणत्वपरामर्शमवरोद्धमुत्सहते, तथात्वेऽपि कथंचित् प्रकृत्यैक्यानपायात्; अतश्च गुणतत्त्वं नाम न प्रकृतितत्त्वातिरिक्तं तत्त्वान्तरं किन्तु तस्यैव कार्यजननोन्मुखं क्षुब्धं रूपान्तरमिति । तस्य हि तत्त्वान्तरत्वे सप्तत्रिंशत्तत्त्वानि स्युरिति । ‘षट्त्रिंशत्तत्त्वमुख्यानि यथा शोध्यानि पार्वति । पृथिव्यादिशिवान्तानि. …………… || (स्व० ५।२) इत्यादि दुष्येत् । ‘चतुर्विंशतितत्त्वानि ब्रह्मा व्याप्य व्यवस्थितः । प्रधानान्तं. ………….. || का क्षोभ होता है वही बुद्धि तत्त्व हो जाए, अन्य कल्पित, गुणों से क्या (प्रयोजन)? ।। -२५८-२५९- ।। इसी का समाधान करते हैं ऐसा नहीं है क्योंकि जो कारणतारूप परामर्श का रोधक होता है उस क्षोभ के बाद कार्य होता है, जैसे कि बीज उसकी उच्छूनता और उसके बाद अङ्कुर ।। -२५९-२६०- ॥ कारण वही कहलाता है जो क्षोभ की प्राप्ति होने पर भी उस (= क्षोभ्) रूपता के परामर्श को ही रोक दे । उच्छन बीज भी बीज ही कहलाता है । इसलिए वह क्षोभरूप भी गुणतत्त्व कारण के परामर्श को रोक सकता है । वैसा होने पर भी किसी प्रकार (गुणों से) प्रकृति की एकता का नाश नहीं होता । इसलिए गुणतत्त्व प्रकृतितत्त्व से अतिरिक्त कोई दूसरा तत्त्व नहीं है किन्तु उसी का कार्यजनन की ओर उन्मुख रूपान्तर है । उस (गुण) के तत्त्वान्तर होने पर सैंतीस तत्त्व हो जाएंगे । फलत: । __“हे पार्वती ! पृथिवी से लेकर शिव तत्त्वपर्यन्त ३६ मुख्य तत्त्वों का जिस प्रकार शोधन करना चाहिए…।” (स्व० सं० ५।२) इत्यादि (वचन का) खण्डन हो जाएगा । “(पृथ्वी से लेकर) प्रकृतिपर्यन्त २४ तत्त्वों को व्याप्त करके ब्रह्मा स्थित अष्टममाह्निकम् (स्व० १११४६) इति । तथा …….पुरुषः पञ्चविंशकः ।। इत्याद्यपि विरुद्धयेत, एवं हि प्रधानं पञ्चविंशं स्यात् पुरुषश्च षड्विंशक: इति । तस्मात् यथा मायाया ग्रन्थितत्त्वात्मना द्वैविध्यं तथा प्रकृतेरपि क्षुब्धाक्षुब्ध रूपतया,—इत्यवगन्तव्यं येन सर्व समञ्जसं स्यात् । बुद्धितत्त्वं तु सर्वस्यैवो द्रेकादत्यन्तमेव ततो विलक्षणं बीजादिवाङ्कुरः,-इति तत्कार्यमेव न तु कारण मपि,—इत्यवश्यमन्तरा बुद्धिकारणं गुणतत्त्वमङ्गीकार्यम् । एवं ‘स्वत: क्षुब्धा एव गणा: प्रकृति:? -इत्यभिदधतोऽपि सांख्यस्य न दोषावकाश: - इति प्रकाशितम । तथात्वे हि गुणानामक्षुब्धमपि रूपं पूर्वं वक्तव्यम् अन्यथा क्षुब्धत्वं किमपेक्षं स्यात्; अत एवात्र ‘बीजोच्छूनाङ्कुरादिवत्’ इत्यवस्थात्रयमेव दर्शितम् ॥ २५९ ॥ एवं गुणतत्त्वं साधयित्वा तदन्तर्वर्ति भुवनजातमपि दर्शयति क्रमात्तमोरजःसत्त्वे गुरूणां पङ्क्तयः स्थिताः॥ २६० ॥ तिस्रो द्वात्रिंशदेकातस्त्रिंशदप्येकविंशतिः । स्वज्ञानयोगबलतः क्रीडन्तो दैशिकोत्तमाः ॥ २६१ ॥ हैं….. । (स्व० तं० १११४६) तथा “………….पुरुष पचीसवाँ तत्त्व है ।” इत्यादि (वचन) भी बाधित हो जाएंगे। क्योंकि ऐसा होने पर प्रकृति पचीसवाँ और पुरुष छब्बीसवाँ (तत्त्व) होने लगेगा । इसलिए जैसे ग्रन्थि और तत्त्व की दृष्टि से माया का दो प्रकार है उसी प्रकार प्रकृति का भी क्षुब्ध और अक्षुब्ध रूप से (दो प्रकार है)-ऐसा समझना चाहिए जिससे सब सङ्गत हो जाएगा । सबका उद्भूत रूप होने के कारण बद्धितत्त्व उस (प्रकति) से अत्यन्त विलक्षण है जैसे कि बीज से अङ्कर । इसलिए (यह) उसका कार्य ही है न कि कारण भी । इसलिए बीच में बुद्धि का कारणगुणत्त्व अवश्य मानना चाहिए । इस प्रकार–“स्वतः क्षुब्ध ही गुण प्रकृति है-ऐसा कहने वाले सांख्य के मत में दोष का स्थान नहीं है-यह स्पष्ट हो गया । वैसा होने पर गुणों के अक्षुब्ध भी रूप को पहले कहना चाहिए अन्यथा क्षोभ किसकी अपेक्षा से होगा ? इसीलिए “बीज, उच्छ्नता और अङ्कर आदि के समान’’ तीन अवस्थायें दिखाई गई ॥ २५९ ।। इस प्रकार गुणतत्त्व को सिद्ध कर उसके अन्दर वर्तमान भुवनों को भी दिखलाते हैं तमोगुण रजोगुण और सत्त्वगुण में गुरुओं की क्रमश: तीन पंक्तियाँ स्थित हैं । (उनमें क्रमश:) पहली बत्तीस, उसके बाद तीस, और इक्कीस, १५६ श्रीतन्त्रालोकः त्रिनेत्राः पाशनिर्मुक्तास्तेऽत्रानुग्रहकारिणः । ‘तमोरज:सत्त्वे’ इति समाहारः । तदुक्तम् ‘प्रथमा तमस: पङ्क्तिरुपरिष्टाद् व्यवस्थिता । तेषां नामानि कथ्यन्ते यथावदनुपूर्वश: ॥ शिवः प्रभुर्वामदेवश्चण्डश्चैव प्रतापवान् । प्रह्लादश्चोत्तमो भीमः कराल: पिङ्गलस्तथा ॥ महेन्द्रो दिनकृच्चैव प्रतोदो दश एव च । कडेवरश्च विख्यातस्तथैव च कटङ्कटः ।। अम्बहर्ता च नारीश: श्वेत ऋग्वेद एव च । यजुर्वेदः सामवेदस्त्वथर्वा सुशिवस्तथा ।। विरूपाक्षस्तथा ज्येष्ठो विप्रो नारायणस्तथा । गण्डोदरो यमो माली गहनेशश्च पीडनः ।। प्रथमा पङ्क्तिरुद्दिष्टा रुद्रैर्द्वात्रिंशता वृता । रजसश्चोपरिष्टात्तु द्वितीया पङ्क्तिरुच्यते ।। शुक्लो दासः सुदासश्च लोकाक्ष: सूर्य एव च । सुहोत्र एकपादश्च गृद्धश्चैव शिवेश्वरः ।। गौतमश्चैव योगीशो दधिबाहुस्तथापरः। ऋषभश्चैव गोकर्णो देवश्चैव गुहेश्वरः ॥ गुहेशान: शिखण्डी च जटी माली तथोग्रकः । भृगुः शिखी तथा शूली सुगतिश्च सुपालन: ।। तीन नेत्र वाले पाशमुक्त उत्तम गुरु क्रीड़ा करते हैं । वे यहाँ (= भूलोक में) अनुग्रह करने वाले हैं ।। -२६०-२६२- ।। “तमोरज:सत्त्वे’’ इस पद में समाहार द्वन्द है । वही कहा गया है ‘प्रथम तमस् की पंक्ति ऊपर व्यवस्थित है । उनके नाम यथावत् क्रमश: कहे जा रहे है प्रभु, शिव वामदेव, प्रतापवान् चण्ड, प्रह्लाद, उत्तम भीम, कराल, पिङ्गल, महेन्द्र, दिनकर, प्रतोद, दक्ष, कडेवर, विख्यात, कटङ्कट, अम्बुहर्ता, नारीश, श्वेत, ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद, अथर्वा, सुशिव, विरूपाक्ष, ज्येष्ठ, विप्र, नारायण, गण्डोदर, यम, माली, गहनेश, पीडन, (इन) बत्तीस रुद्रों से आवत यह प्रथम पंक्ति है। (उसके) ऊपर रजस् की दूसरी पंक्ति कहीं जाती है । शुक्ल, दास, सुदास, लोक के नेत्रभूत सूर्य, सुहोत्र, एकपाद, गृध्र, शिवेश्वर, योगीश, गौतम, दधिबाहु, ऋषभदेव, गोकर्ण, गुहेश्वर, गुहेशान, शिखण्डी, जटी, माली, उग्रक, भृगु, शिरवी,अष्टममाह्निकम् अट्टहासो दारुकश्च लागुलिश्च त्रिदण्डकः। भावनश्च तथा भाव्यो लकुलेशस्तथा परः ।। त्रिंशद्रुद्राः समाख्याता द्वितीया पङ्क्तिरुत्तमा । सत्त्वस्य चोपरिष्टात्तु तृतीया पङ्क्तिरुच्यते ।। देवारुणो दीर्घबाहुररिभूतिश्च स्थाणुकः । सद्योजातस्तथा शण्ठी षण्मुखश्चतुराननः ।। चक्रपाणिश्च कर्माक्षस्त्वर्धनारीश एव च । संवर्तकश्च भस्मीश: कामनाशन एव च ।। कपाली भूर्भुवश्चैव वषटकारस्तथैव च । वौषटकारस्तथा स्वाहा सुधा च परिकीर्तिता। एकविंशतिरुद्रास्तु पङ्क्तिरेषा तृतीयिका । (स्व० १०।१०५८) इति ।। २६१ ।। इयदन्तं भुवनानि सङ्कलयति बुद्धेश्च गुणपर्यन्तमुभे सप्ताधिके शते ॥ २६२ ॥ रुद्राणां भुवनानां च मुख्यतोऽन्ये तदन्तरे । बुद्धेरिति, कार्यप्रपञ्चरूपायाः । तेन पृथ्वीतत्त्वादारभ्य गुणतत्त्वपर्यन्तं मुख्यतो ऽन्यथा संख्याया आनन्त्यात् भुवनानां सप्ताधिकं शतद्वयं भवेत् । तथा हि पृथिव्यामधस्तादनन्तस्यैकं भुवनम्, अन्त: कालाग्निकूष्माण्डहाटकब्रह्मविष्णुरुद्राणां घट, बहिः शतरुद्राणां शतम्, तदधिष्ठातुर्वीरभद्रस्य चैकम्-इत्यष्टोत्तरं शतम् । अप्तत्त्वे तदधिष्ठातुर्वीरभद्रस्य गुह्याष्टकस्य च-इति नव भुवनानि । तेजस्तत्त्वे शूली, सुगति, सुपालन, अट्टहास, दारुक, लाङ्गलि, त्रिदण्डक, भावन, भाव्य, लकुलेश ये तीस रुद्र कहे गये (जो) दूसरी उत्तम पक्तिं (में) हैं। उसके ऊपर सत्त्व की तीसरी पंक्ति कही जाती है-देवारुण, दीर्घबाह, अरिभूति, स्थाणुक, सद्योजात, शण्ठी, षण्मुख, चतुरानन, चक्रपाणि, कूर्माक्ष, अर्धनारीश, संवर्तक, भस्मेश, कामनाशन, कपाली, भूः, भुवः, वषट्कार, वौषट्कार, स्वाहा, स्वधा, (ये) इक्कीस रुद्र कहे गए हैं । यह तीसरी पंक्ति है । (स्व० १०।१०५८) ॥ २६१ ॥ यहाँ तक भवनों की गणना करते हैं (विस्तारयुक्त) बुद्धि तत्त्व से लेकर गुण पर्यन्त रुद्रों और भुवनों की मुख्य संख्या २०७ है । दूसरे उनके बीच में (रहते) हैं ।।-२६२-२६३-।। बुद्धि के = कार्यप्रपञ्च रूप (बुद्धि) के । इस प्रकार पृथ्वी तत्त्व से लेकर गुणतत्त्व तक मुख्य रूप से भुवनों की संख्या दो सौ सात है अन्यथा अनन्त संख्या है । वह इस प्रकार-पृथिवी में नीचे अनन्त का एक भुवन है । पृथ्वी के १५८ श्रीतन्त्रालोकः शिवाग्नेरतिगृह्याष्टकस्य च-इति नव । आकाशतत्त्वे आकाशस्य पवित्राष्टकस्य चेति नव । तन्मात्रेषु मूर्तीनामष्टो, कर्मेन्द्रियाधिपानां पञ्च, ज्ञानेन्द्रियाधिपानां पञ्च, मनसि सोमस्यैकम्, अहङ्कारेऽहङ्कारेशस्य स्थाण्वष्टकस्य चेति नव, बुद्धौ देवयोनिक्रोधतेजोयोगाख्यानि चत्वार्यष्टकानि, इति द्वात्रिंशत्, गुणतत्त्वे च पङ्क्तित्रयमिति ॥ २६२ ॥ अन्यत्र पुनरियान्विशेष:- इत्याह योगाष्टकं गुणस्कन्थे प्रोक्तं शिवतनौ पुनः ॥ २६३ ॥ ‘गुणस्कन्धे’ गुणतत्त्वे ॥ २६३ ॥ तद्ग्रन्थमेव पठति योनीरतीत्य गौणे स्कन्धे स्युर्योगदातारः । अकृतकृतविभुविरिञ्चा हरिगुहः क्रमवशात्ततो देवी ॥ २६४ ॥ करणान्यणिमादिगुणाः कार्याणि प्रत्ययप्रपञ्चश्च । अव्यक्तादुत्पन्ना गुणाश्च सत्त्वादयोऽमीषाम् ॥ २६५ ॥ अन्दर कालाग्नि, कूष्माण्ड, हाटक, ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र के छ (भुवन है) । बाहर शतरुद्रों के सौ और उनके अधिष्ठाता वीरभद्र का एक-इस प्रकार १०८ (भवन हुये) । जलतत्त्व में आठ गुह्य देवता का और एक उनके अधिष्ठाता का इस प्रकार नव भुवन हैं । तेजस्तत्त्व में शिवाग्नि तथा आठ अतिगुह्य का इस प्रकार नव (भुवन); वायु तत्त्व में प्राण का और आठ गुह्य से भी गुह्य का-इस प्रकार नव (भवन) हैं । आकाशतत्त्व में आकाश का और आठ पवित्रों का इस प्रकार नव । तन्मात्राओं में मूर्तियों के आठ, कर्मेन्द्रियों के अधिष्ठाता के पाँच; मन में चन्द्रमा का एक, अहङ्कार में अहङ्कारेश का और आठ स्थाणुओं का इस प्रकार नवसंख्या हैं। बुद्धितत्त्व में देवयोनि, क्रोध, तेजस और योग के आठ-आठ इस प्रकार बत्तीस और गुणतत्त्व में तीन पंक्तियाँ हैं ॥ २६२ ॥ दूसरी जगह इतना वैशिष्ट्य है-यह कहते हैं गुण तत्त्व में आठ योगदाता रहते हैं और शिवतत्त्व में तो (पहले) ही कह दिया गया है ।। -२६३ ॥ गुणस्कन्ध में = गुणतत्त्व में ॥ २६३ ।। उस ग्रन्थ को ही पढ़ते हैं अकृत, कृत, विभु, विरिञ्च, हरि, ओम, गुह और देवी (= भगवती उमा) ये आठ योगदाता लोग योनियों का अतिक्रमण कर गौणतत्त्व में रहते हैं । इन्द्रियाँ, अणिमा आदि सिद्धियाँ, गुण, तथा बुद्धिसर्ग ये अष्टममाह्निकम् १५२ धर्मज्ञानविरागानैश्वर्यं तत्फलानि विविधानि । यच्छन्ति गुणेभ्योऽमी पुरुषेभ्यो योगदातारः ॥ २६६ ॥ तेभ्यः परतो भुवनं सत्त्वादिगुणासनस्य देवस्य । सकलजगदेकमातुर्भर्तुः श्रीकण्ठनाथस्य ॥ २६७ ॥ ‘प्रत्ययप्रपञ्चः’ इति विपर्ययादिः पञ्चाशदाद्यः । ‘अमीषाम्’ अकृतादीनां योगदातृणाम् । एतच्चैषां दातृत्वं यत्परेभ्योऽपि धर्मादि प्रयच्छन्तीति । ‘परतः’ इत्यूर्ध्वम् ।। २६७ ।। ननु एभ्योऽप्यूर्ध्वमवस्थानेन अस्य किं स्यात्? –इत्याशङ्कयाह येनोमागुहनीलब्रह्मऋभुक्षकृताकृतादिभुवनेषु । ग्रहरूपिण्या शक्तया प्राभ्व्याधिष्ठानि भूतानि ॥ २६८ ॥ ‘नीलो’ विष्णुः, ग्रहरूपिण्येति, अवष्टम्भात्मिकया-इत्यर्थः । ‘अधिष्ठानि’ अधिष्ठितानि ।। २६८ ॥ तत्तदधिष्ठानमेव व्याचष्टे उपसंजिहीर्षुरिह यश्चतुराननपङ्कजं समाविश्य । दग्ध्वा चतुरो लोकाञ्जनलोकान्निर्मिणोति पुनः॥ २६९ ॥ सब अव्यक्त से उत्पन्न सत्त्व आदि गुण के कार्य हैं । योग को देने वाले लोग धर्म, ज्ञान, विराग, ऐश्वर्य और उसके अनेक फल गुण (स्कन्ध में समाविष्ट) पुरुषों को देते हैं । इसके बाद सत्त्व आदि गुणों वाले, समस्त संसार के एक ज्ञाता तथा भर्त्ता देव श्रीकण्ठनाथ का भुवन है ।। २६४-२६७ ।। __ प्रत्यय प्रपञ्च = विपर्यय अशक्ति आदि पचास । इनका = अकृत आदि योगदाताओं का । ये जो दूसरों को धर्म आदि देते हैं यही इनका दातृत्व है । परतः = ऊपर ।। २६७ ॥ प्रश्न-इनके भी ऊपर स्थित होने से इन (श्रीकण्ठनाथ) का क्या (लाभ) है? यह शङ्का कर कहते हैं जिससे कि (इनके द्वारा) उमा, गुह, नील, ब्रह्मा, ऋभुक्ष, कृत, अकृत आदि के भुवनों में ग्रहरूपी प्राभ्वी शक्ति के द्वारा प्राणियों का नियन्त्रण किया जाता है ।। २६८ ॥ नील = विष्णु । गुहरूपिणी = अवष्टम्भक रूपा । अधिष्ठ = अधिष्ठिता ॥ २६८ ॥ उन-उन अधिष्ठिानों को कहते हैं श्रीतन्त्रालोकः यस्येच्छातः सत्त्वादिगुणशरीरा विसृजति रुद्राणी । अनुकल्पो रुद्राण्या वेदी तत्रेज्यतेऽनुकल्पेन ॥ २७० ॥ पशुपतिरिन्द्रोपेन्द्रविरिञ्चैरथ तदुपलम्भतो देवैः । गन्धर्वयक्षराक्षसपितृमुनिभिश्चित्रितास्तथा यागाः॥ २७१ ॥ ‘समाविश्य’ इति अधिष्ठाय ‘दग्ध्वा’ इति अर्थात्कालाग्निरूपतया । ‘रुद्राणी’ उमादेवी । ‘अनुकल्पो’ गौणी मूर्तिः, ‘वेदी’ क्रियाशक्तयात्मा पीठिका । तत्रेति वेद्याम् । पशुपतिरिति, अर्थाद् बाह्यलिङ्गरूपः ।। २७१ ।। गुणानां यत्परं साम्यं तदव्यक्त गुणोतः। क्रोधेशचण्डसंवर्ता ज्योतिःपिङ्गलसूरकौ ॥ २७२ ॥ पञ्चान्तकैकवीरौ च शिखोदश्चाष्ट तत्र ते । ‘परं साम्यम्’ इति अक्षुब्धतयावस्थानम्, अत एव ‘अव्यक्तम्’–इत्युक्तम् । इह सर्वत्र भुवनेश्वराणामादिग्रहणेनैव प्रक्रान्तेऽपि संग्रहे स्वकण्ठेनैव पाठेऽयमाशया यदत्र बहूनि शास्त्रान्तरेष्वसमञ्जसानि पाठान्तराणि संभवन्ति–इति श्रोतृणां मा भूत्संमोह:-इति । तदुक्तं श्रीरुरौ (सृष्टि का) उपसंहार करने की इच्छावाले जो ब्रह्मा के कमल में अधिष्ठित होकर (भूभुर्वः स्वर्ग एवं महः) चार लोकों को भस्मसात् करके जनलोकों का निर्माण करते हैं, जिसकी इच्छा से ज्ञत्त्व आदि गणों की शरीर वाली रुद्राणी सृष्टि करती है, रुद्राणी के द्वारा सृजित अनुकल्प (= मुख्यवस्तु के अभाव में कल्पित वस्तु) ही वेदी है । उस (वेदी) पर इन्द्र उपेन्द्र, ब्रह्मा और अन्य देवताओं तथा गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, पितृगण और मुनिगण के द्वारा भगवान् पशुपति पूजित होते हैं और उपयुक्त व इन्द्र आदि नाना प्रकार के यज्ञ करते रहते हैं ।। २६९-२७१ ।। समावेश करके = अधिष्ठित होकर, जलाकर–अर्थात् कालाग्नि के रूप से । रुद्राणी = उमादेवी । अनुकल्प = गौणीमूर्ति । वेदी = क्रियाशक्तिरूप पीठ । वहाँ = वेदी में । पशुपति = बाह्यलिङ्गरूप ॥ २७१ ॥ गुणों का जो परम साम्य है वह अव्यक्त (कहलाता) है । गुणों के ऊपर क्रोधेश, चण्ड, संवर्त, ज्योतिष, पिङ्गल, पञ्चान्तक, एकवीर और शिखोद आठ वहाँ रहते हैं ।। २७२-२७३- ।। पर साम्य = अक्षुब्ध रूप में स्थिति, इसीलिए ‘अव्यक्त’ ऐसा कहा गया । यहाँ सर्वत्र भवनेश्वरों की (गणना न कर) आदि ग्रहण के द्वारा ही प्रस्तुत (अन्य) का संग्रह (संभव) होने पर भी अपने ही मुख से (उन नाम का) पाठ करने में यह तात्पर्य है कि यहाँ बहुत से दूसरे शास्त्रों में भिन्न पाठ सम्भव है-अत: श्रोताओं १६१ अष्टममाह्निकम् ‘क्रोधेशचण्डसवंर्तज्योति:पिङ्गलसूरकाः । पञ्चान्तकैकवीरेशशिखोदाख्या महेश्वराः ॥’ इति । श्रीनन्दिशिखायामपि ‘अष्टौ भूवनपाला ये क्रोधेशश्चण्डसंज्ञकः । संवर्त: पिङ्गलो ज्योतिस्तथा पञ्चान्तको विभुः ॥ एकवीर: शिखोदश्च गुणानां परतः स्थिताः ।’ इति ॥ २७२ ।। अत्रापि शिवतनावुक्तं विशेष दर्शयति गहनं पुरुषनिधानं प्रकृतिर्मूलं प्रधानमव्यक्तम्॥ २७३ ॥ गुणकारणमित्येते मायाप्रभवस्य पर्यायाः। नन्वेवमभिधानानामत्र प्रवृत्तौ किं निमित्तम् ?–इत्याशङ्क्याह यावन्तः क्षेत्रज्ञाः सहजागन्तुकमलोपदिग्धचितः ॥ २७४ ॥ ते सर्वेऽत्र विनिहिता रुद्राश्च तदुत्थभोगभुजः । मूढविवृत्तविलीनैः करणैः केचित्तु विकरणकाः ॥ २७५ ॥ को भ्रम न हो । वही रुरु में कहा गया है “क्रोधेश, चण्ड, संवत, ज्योतिष, पिङ्गल, पञ्चान्तक, एकवीरेश और शिखोद नामक महेश्वर है।” नन्दिशिखा में भी “जो आठ भूवनपाल क्रोधेश, चण्ड, संवर्त्त, पिङ्गल, ज्योतिष तथा विभुपञ्चान्तक, एकवीर और शिरवोद है वे गुणों के ऊपर स्थित है” ॥ २७२ ।। यहाँ भी शिवतत्त्व में कथित विशेष को दिखलाते हैं गहन = पुरुषनिधान (= पुरुष), प्रकृति = मूल, प्रधान = अव्यक्त, गुणों से उत्पन्न ये माया से उत्पन्न (तत्त्व) के पर्याय हैं ।। -२७३-२७४-।। प्रश्न-इस प्रकार के नामों का यहाँ क्या प्रवृत्तिनिमित्त’ है ? यह शङ्का कर कहते हैं सहज और आगन्तुक अर्थात् आणव, और मायीय कार्म मलों से उपदिग्ध चित्तवाले जितने क्षेत्रज्ञ (= जीव) हैं और उनसे मिलने वाले भोगों को भोगने वाले जो रुद्र हैं वे सब के सब यहाँ निहित हैं । (उनमें से कुछ लोग) मूढ अथवा विवृत्त अथवा विलीन इन्द्रियों के द्वारा (भोग करते हैं) और कुछ इन्द्रियरहित होकर ।। -२७४-२७५ ।। १. वाच्यत्वे सति वाच्यवृत्तित्चे सति वाच्योपस्थितीयप्रकारताश्रयत्वं प्रवृत्तिनिमित्तत्वम् । ११ त.तृ. १६२ श्रीतन्त्रालोकः यतोऽत्र सर्व एव क्षेत्रज्ञा रुद्रा वा विनिहिताः सन्तः केचिन्मूढादिरूपैः करणैस्तदुत्थं भोगं भुज्जते, केचित्तु विकरणा एव-इति । ‘सहजः’ आणव: । ‘आगन्तुकौ’ कार्ममायीयौ ॥ २७५ ॥ मूढ़ादिरूपत्वमेव व्याचष्टे अकृताधिष्ठानतया कृत्याशक्तानि मूढानि । प्रतिनियतविषयभाञ्जि स्फुटानि शास्त्रे विवृत्तानि ॥ २७६ ॥ भग्नानि महाप्रलये सृष्टौ नोत्पादितानि लीनानि । इच्छाधीनानि पुनर्विकरणसंज्ञानि कार्यमप्येवम् ॥ २७७ ॥ ‘कृत्यम्’ शब्दाद्यालोचनम्; अत एव बाधिर्यादिविशिष्टवृत्तित्वे हेतुः ‘प्रति नियतविषयभाञ्जि’ इति । सृष्टावनुत्पाद एव लीनत्वे हेतुः । ‘इच्छाधीनानि’ इति स्वात्मायत्तानि-इत्यर्थः । अत एव श्रीकण्ठादीनां स्वतन्त्रेन्द्रियत्वम् । यदुक्तमत्रैव ‘तेषूमापतिरेव प्रभुः स्वतन्त्रेन्द्रियो विकरणात्मा ।’ (तं० ८।२२९) एवमिति, मूढादिभेदाच्चतुर्धा ॥ २७७ ।। पुंस्तत्त्वे तुष्टिनवकं सिद्धयोऽष्टौ च तत्पुरः । क्योंकि यहाँ सभी क्षेत्रज्ञ अथवा रुद्र विनिहित होकर कुछ तो मूढ आदि इन्द्रियों के द्वारा उससे उत्पन्न भोग को भोगते हैं और कुछ बिना इन्द्रियों के । सहज = आणव । आगन्तुक = कार्म और मायीय ॥ २७५ ॥ मूढ आदि के स्वरूप की व्याख्या करते हैं अकृत का अधिष्ठान होने के कारण कार्यों में असक्त (इन्द्रियाँ) मूढ (कहलाती) हैं । निश्चित विषयवाली स्पष्ट (इन्द्रियाँ) शास्त्र में विवृत्त (कही गयी) है । महाप्रलय में नष्ट और सृष्टि होने पर अनुत्पन्न (इन्द्रियाँ) लीन हैं तथा इच्छा के अधीन (वे) विकरण नाम वाली हैं। उनका कार्य भी ऐसा ही है ॥ २७६-२७७ ॥ कृत्य = शब्द आदि (विषयों) का आलोचन । इसीलिए बाधिर्य आदि विशिष्टवृत्ति में निश्चित विषय वाला होना हेतु है । सृष्टि में उत्पन्न न होना लीन होने में कारण है । इच्छाधीन = अपने अधीन । इसीलिए श्रीकण्ठ आदि स्वतन्त्र इन्द्रियवाले हैं । जैसा कि इसी (ग्रन्थ) में कहा गया है “उनमें उमापति ही स्वतन्त्र इन्द्रिय वाले विकरण रूपवाले प्रभु (= जितेन्द्रिय) इसी प्रकार का = मूढ आदि भेद से चार प्रकार का है ॥ २७७ ॥ (तं० आ० ८।२२९) अष्टममाह्निकम् १६३ तावत्य एवाणिमादिभुवनाष्टकमेव च ॥ २७८ ॥ तावत्योः, नवाष्टौ च । तदुक्तम् ‘अम्बा च सलिला ओघा वृष्टिः सार्धं च तारया। सुतारा च सुनेत्रा च कुमारी च ततः परम् । उत्तमाम्भसिका चैव तुष्टयो नव कीर्तिताः । तारा चैव सुतारा च तारयन्ती प्रमोदिका ॥ प्रमुदिता मोदमाना रम्यका च ततः परम् । सदाप्रमुदिका चैव सिद्ध्यष्टकमुदाहृतम् ।। अणिमा लघिमा चैव महिमा प्राप्तिरेव च । प्राकाम्यं च तथेशित्वं वशित्वं यदुदाहृतम् ।। यत्रकामावसायित्वमणिमाद्यष्टकं स्मृतम् ।’ (स्व० १०।१०७०) इति ।। २७८ ।। तुष्ट्यादीनां च किं रूपम् ?–इत्याशङ्क्याह अतत्त्वे तत्त्वबुद्ध्या यः सन्तोषस्तुष्टिरत्र सा । हेयेऽप्यादेयधी: सिद्धिः न चैतदस्मदुपज्ञमेवेत्याह तथा चोक्तं हि कापिलैः ॥ २७९ ॥ तदाह पुरुष तत्त्व में नव तुष्टियाँ और उसके पहले अणिमा आदि आठ सिद्धियाँ हैं । भुवन भी आठ हे ।। २७८ ॥ उतने = नव और आठ । वही कहा गया है “अम्बा सलिला, ओघा, वृष्टि, तारा, सुतारा, सुनेत्रा, कुमारी, और उत्तमाम्भसिका ये नव तुष्टियाँ कही गई हैं । तारा, सुतारा, तारयन्ती, प्रमोदिका, प्रमुदिता, मोदमाना, रम्यका और सदाप्रमुदिता ये आठ सिद्धियाँ कही गयी हैं । अणिमा, महिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, ईशित्व, वशित्व और यत्रकामावसायित्व ये आठ अणिमादि है ।” (स्वतं० १०॥१०७०) ।। २७८ ॥ तुष्टि आदि का क्या स्वरूप है ?-यह शङ्का कर कहते हैं अतत्त्व के विषय में तत्त्वबुद्धि, के द्वारा जो सन्तोष है वही यहाँ तुष्टि है । और हेय के विषय में उपादेय बुद्धि सिद्धि है ।। २७९- ।। यह हमने अपने मन से नहीं कहा है-यह कहते हैं सांख्य वालों ने ऐसा कहा है ।। -२७९ ॥ B श्रीतन्त्रालोकः REATRANEPARNEGIEBHATERFERRE माण आध्यात्मिक्यश्चतस्त्रः प्रकृत्युपादानकालभाग्याख्याः। पञ्च विषयोपरमतोऽर्जनरक्षासङ्गसंक्षयविघातैः ॥ २८० ॥ ऊहः शब्दोऽध्ययनं दुःखविघातास्त्रयः सुहृत्प्राप्तिः । दानं च सिद्धयोऽष्टौ सिद्धेः पूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविधः ॥ २८१ ॥ ‘आध्यात्मिक्यः’ इति अनात्मरूपे प्रकृत्यादौ भवन्ति–इत्यर्थः । तत्र प्रधान महदादिरूपतयाष्टविधा प्रकृतिरेव विश्वोत्पत्तिनिमित्तं नान्यत्-इति तत्रैव सङ्गद्वेषादि निवृत्तिनिमिनं भोक्तृत्वाद्यध्यवस्यतो योगिनः प्रकृत्याख्या तुष्टिः । एवं च प्रकृते विशेषात् सर्वदा सर्वस्माच्च सर्वस्योत्पत्ति: स्यात्-इति यथास्वोपादानं भावाना मुत्पादो न्याय्यः-इति । तदेव विश्वकारणम्-इति पृथिव्यादावुपादान एव भोक्तत्वाद्यध्यवस्यत उपादानाख्या । एवमपि कालमपेक्ष्य भावनामुत्पत्तिरिति स एव विश्वकारणम्-इति तत्रैव भोक्तत्वाद्यध्यवस्यतः कालाख्या । एवमपि भाग्य विशेषात्फलविशषः-इति तेषामेव विश्वकारणत्वमिति तत्रैव भोक्तत्वाद्यध्यवस्यतो भाग्याख्येति चतस्रः । पञ्चति, बाह्यविषयोपरमस्य पञ्चहेतृत्वात्, ते चार्जनादयः, सर्वस्य सुखार्थ विषयेषु प्रवृत्तिः न च तेभ्यः कदाचिदपि तद्भवेत् यद्विषयाणा वही कहते है प्रकृति, उपादान, काल और भाग्य नामक चार आध्यात्मिक तष्टियाँ है। अर्जन, रक्षा, आसक्ति, संक्षय और विघात के कारण (पाँचो) विषयों से विराग के कारण पाँच (इस प्रकार नव तुष्टियाँ) है । ऊह, शब्द, अध्ययन, त्रिविध दुःखों का नाश, मित्रलाभ, दान ये आठ सिद्धियाँ है । सिद्धि के पहले तीन प्रकार का अंकुश है ।। २८०-२८१ ॥ आध्यात्मिक-अनात्मरूप प्रकृति आदि के विषय में होती है। उनमें प्रकृति महत् आदि के रूप में आठ प्रकार की प्रकृति ही विश्व की उत्पत्ति का कारण है दुसरा कुछ नहीं-यह (समझ कर) उसी में आसक्ति द्वेष आदि की निवृत्ति का कारणभूत भोक्तृत्व आदि का निश्चय करने वाले योगी की प्रकृति नामक तुष्टि होती है। इसी प्रकार प्रकृति के समान होने के कारण सदा सब से सब की उत्पत्ति होने लगेगी-इसलिए अपने-अपने उपादान के अनुसार पदार्थों की उत्पत्ति उचित है। वही विश्व का कारण है यह सोच कर पृथ्वी आदि उपादान को हो भोक्ता मान लेना उपादान नामक (तुष्टि) है । इसी प्रकार काल की अपेक्षा करके पदार्थों की उत्पत्ति होती है इसलिए वही विश्व का कारण है-इस (विचार) से उसी को भोक्ता मान लेने वाले की काल नामक (तुष्टि) होती है। ऐसे ही भाग्यविशेष के कारण विशेष फल मिलता है इसलिए वे ही विश्व का कारण है-इस (धारणा) से उसी में भोक्तत्व का निश्चय करने वाले की भाग्य नामक तुष्टि होती है-इस प्रकार चार (तष्टियाँ) है । पाँच–बाह्य विषयों से उपरम पाँच का हेतु है और वे पाँच है अर्जन आदि (= अर्जन, रक्षण, आसक्ति, सक्षयं और परोपघात) । सबकी विषयों अष्टममाह्निकम् मर्जनादौ त्रितये यतमानस्य पुंसः परं कष्टमेव, एवमपि एषामाकस्मिकः स्वयमेव संक्षय:- इति महत्कष्टम्, न चैतत्परोपघातं विना सिद्धयेत्-इति कष्टात्कष्ट तरम् । तदेषामेवं दोषदर्शनान्माध्यस्थ्यमवलम्बमानस्य योगिनः पञ्चेति नवाम्बाद्या स्तष्टयः क्रमण उक्ताः । अनेन च पाठनेवमीश्वरकृष्णः शिक्षित: यदन्यथा नवानां तुष्टीनां स्वकण्ठेनैवोपादानं न स्यादिति । ऊहः प्रत्यक्षादिप्रमाणव्यतिरेकेण स्वयमेव तत्तदर्थविषयः प्रत्ययः, शब्दः स्वयमेवमप्रतिपत्तौ तद्विषयः सकृद्गुरू पदेशः, अध्ययनमेवमप्रतिपत्तौ तत्रैव पौन:पुन्येनाभ्यास:, एषां पञ्च प्रत्यनीका दुःखत्रयं सन्देहो दौर्भाग्यं चेति । तत्र दु:खत्रयस्य शास्त्रान्तरदृष्टरुपायैर्विघातं कृत्वा कल्याणमित्रपरिचयाच्च सन्देहं व्युदस्य, दानेन च दौर्भाग्यमपाकृत्य पूर्वेषां त्रयाणामन्यतमेन साधयन्ति—इत्यष्टौ सिद्धयस्ताराद्याः क्रमेण उक्ता: । नन् सर्वेषामविशेषेणैता: सिद्धयः किं न स्यु:?–इत्याशक्योक्तम् ‘सिद्धेः पूर्वोऽङ्कुशस्त्रिविधः’ इति । पूर्वो विपर्ययाशक्त्यतुष्टिलक्षणोऽङ्कुशो निरोधकारि त्वात्, तेनाविशेषेण सर्वप्राणिषु सिद्धीनामप्रवृत्तिरिति ।। २८१ ।। अणिमायूर्ध्वतस्तिस्रः पङ्क्तयो गुरुशिष्यगाः । तत्रापि त्रिगुणच्छायायोगात् त्रित्वमुदाहतम् ॥ २८२ ॥ में प्रवृत्ति सुख के लिए होती है किन्तु उन (= विषयों) से वह (= सुख) कभी भी नहीं होगा प्रत्युत विषयों के अर्जन आदि तीन के विषय में प्रयत्न करने वाले पुरुष को कष्ट ही मिलता है और भी इनका स्वयं आकस्मिक क्षय हो जाता है जो कि महाकष्ट है । यह (अर्जन आदि) दूसरे के उपघात के बिना नहीं सिद्ध होगा—इस प्रकार कष्ट से भी कष्टतर है । तो इस प्रकार इनके दोषों को समझ लेने से मध्य मार्ग का अवलम्बन करने वाले योगी की पाँच-इस प्रकार अम्बा आदि नव तुष्टियाँ क्रम से कही गई है । इस प्रकार इसपाठ से ईश्वरकृष्ण शिक्षित हुये । अन्यथा नव तुष्टियों का अपने मुख से कथन न करते । प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों को छोड़कर स्वयं भिन्न-भिन्न अर्थ वाला ज्ञान (ऊह है) । स्वयं ऐसा ज्ञान न होने पर उस विषय का एक बार गुरु के द्वारा उपदेश शब्द है । इस प्रकार भी ज्ञान न होने पर उसी में पुनः-पुन अभ्यास अध्ययन है । इनके पाँच विरोधी है—तीन दुःख, सन्देह और दुर्भाग्य । तीनों दु:खों का दूसरे शास्त्रों में वर्णित उपायों के द्वारा नाश करके कल्याणमित्र के परिचय से सन्देह का निराकरण कर, दान के द्वारा दुर्भाग्य को हटाकर प्रथम तीन में से किसी एक के द्वारा साधक लोग इष्ट को सिद्ध करते हैं—इस प्रकार तारा आदि आठ सिद्धियाँ क्रम से कही गयीं । प्रश्न—ये सिद्धियाँ सबको समान रूप से क्यों नहीं उपलब्ध होती ? यह शङ्का कर कहते हैं-सिद्धि के पूर्व तीन अंकुश है। पूर्व = पहले वर्तमान विपर्यय, अशक्ति, तुष्टि नामक अंकुश । क्योंकि ये ही (सिद्धियों को) रोकने वाले हैं । इस कारण सभी प्राणियों को समान रूप से सिद्धियाँ नहीं मिलती ॥ २८०-२८१ ॥ अणिमा आदि के ऊपर गुरु शिष्य की तीन पंक्तियाँ है । उनमें भी श्रीतन्त्रालोकः नाडीविद्याष्टकं चोर्ध्वं पङ्क्तीनां स्यादिडादिकम् । तत्रापीति, अपिशब्देन न केवलं गुणतत्त्वे गुरूणां गुणत्रययोगितया त्रित्वमुक्तं यावदिहापि–इत्यभिहितम् । तदुक्तम् ‘यथोर्ध्वं गुरुशिष्याणां पङ्क्तित्रयमतः शृणु । मस्करी पूरण: कृत्स्र: कपिल: काश एव च।। सनत्कुमारगौतमवसिष्ठाद्यांशकास्तथा । काश्यपो नासिकेतश्च गालवो भौतिकस्तथा ।। शाकल्यस्तु समाख्यातो दुर्वासाः परमो मुनिः । वाल्मीकिश्च गुरुश्रेष्ठः सपराशरगालवः ॥ पिप्पलादश्च सौमित्रो वायुपुत्रो भदन्तकः । मस्कर्यादिभदन्तान्ता दृष्टादृष्टस्य वादिनः ।। द्वाविंशतिगुरुवराः प्रथमा पङ्क्तिरिष्यते । जह्वश्च तृणबिन्दुश्च मुनिस्तार्क्ष्यस्तथैव च ।। ध्यानाश्रयोऽथ दीर्घश्च होताऽजगर एव च । अगस्त्यो वसभौमश्च उपाध्यायश्च कीर्तितः ।। शुक्रो भृग्वगिरा रामो जमदग्निसुतोवंगः । स्थूलशिरा बालखिल्यो मनुजश्चेति कीर्तितः ।। वज्रात्रेयो विशुद्धश्च शिवश्चारुरथानुगः । जवादिचारुपर्यन्ता द्वितीया पङ्क्तिरिष्यते ।। तीनों गुणों की छाया के कारण त्रित्व कहा गया है । पंक्तियों के ऊपर इडा आदि आठ नाड़ीविद्यायें हैं ।। २८२-२८३- ।। तत्रापि (= उसमें भी)-यहाँ अपि शब्द से केवल गुणतत्त्व में ही तीनों गुणों से युक्त होने के कारण त्रित्व कहा गया है बल्कि यहाँ भी यह कहा गया है । वही कहा गया है “(अणिमा आदि के) ऊपर जिस प्रकार गुरुशिष्यों की तीन पंक्तियाँ है उसे सुनो-मस्करी, पूरण, कृत्स्न, कपिल, काश, सनत्कुमार, गौतम, वशिष्ठ, आद्यांशक काश्यप, नासिकेतु, गालव ‘भौतिक’, शाकल्य, परममुनि दुर्वासा, गुरुश्रेष्ठ वाल्मीकि, पराशर, गालव, पिप्पलाद, सौमित्र, वायुपुत्र, भदन्तक, । मस्करी से लेकर भदन्त पर्यन्त (ये) बाईस गुरुवर दृष्ट और अदृष्ट के वक्ता हैं । यह पहली पंक्ति मानी जाती है । ____जह्व, तृणबिन्दु, मुनि, ताय, ध्यानाश्रय, दीर्घ, होता, अजगर, अगस्त्य, वसुभौम, उपाध्याय, शुक, भृगु, अङ्गिरा, ऊर्ध्वरेता, जमदग्निपुत्र (= परशुराम), राम, स्थूलशिरा: बालखिल्य, मनुज, वज्र, आत्रेय, विशुद्ध, शिव, चारु (चारुरथ) ।अष्टममाह्निकम् १६७ हरो जण्ठी प्रतोदश्च अमरेशश्चतुर्थकः । कृष्णपिङ्गेशरुद्रश्च इन्द्रजिद् वृषभः शिवः । यमः क्रूरश्च विख्यातो गङ्गाधर उमापतिः । भूतेश्वरः कपालीश: शङ्करश्च तथैव च ॥ अर्धनारीश्वरश्चैव पिङ्गलश्च तथा परः । महाकालश्च संवों मण्डली त्वेकवीरकः ।। तथा चान्यश्च विख्यातो भारभूतेश्वरो ध्रुवः । जन्वादिचारुपर्यन्ता ऋषयः पञ्चविंशतिः ॥ हरादयो ध्रुवान्ताश्च गुरवो विंशतिः स्मृताः ।’ (स्व० १०।१०८३) इति । अत्र च पङ्क्तिद्वये गुरुशब्दोपादानान्मध्यमायां पङ्क्तौ शिष्या एव–इत्यर्थ सिद्धम् । नाडीरूपाश्च ता विद्यास्तदधिष्ठातृदेवता:–इत्यर्थः । तदुक्तम् ‘इडा च चन्द्रिणी चैव शान्तिः शान्तिकरी तथा। माला च मालिनी चैव स्वाहा चैव सधा तथा ॥’ (स्व० १०।१०८५) इति ॥ २८२ ।। ननु नाङ्यधिष्ठातृदेवतानां पुंस्तत्त्वावस्थाने किं निमित्तम्?–इत्याशङ्क्याह ___ पुंसि नादमयी शक्तिः प्रसराख्या च यत्स्थिता ॥ २८३ ॥ चोऽवधारणे । यद्यस्मात्पुंस्तत्त्वाधिष्ठातरि संकुचितरूपत्वात् अणुशब्दादि जह्न से लेकर चारु पर्यन्त दूसरी पंक्ति मानी जाती है । ___हर, जण्ठी, प्रतोद, अमरेश, कृष्णपिङ्गेश, रुद्र, इन्द्रजित्, वृषभ, शिव, क्रूर यम, गङ्गाधर उमापति, भूतेश्वर कपालीश, शङ्कर, अर्धनारीश्वर, पिङ्गल, महाकाल, संवर्त्त, मण्डली एकवीर, भारभूतेश्वर, ध्रुव । जहु से लेकर चारुपर्यन्त पचीस ऋषि हैं । हर से लेकर ध्रुव तक बीस गुरु माने गए हैं।” (स्व० तं० १०।१०८३) यहाँ दो पंक्तियों में गुरु शब्द का प्रयोग करने से मध्यम पंक्ति में शिष्य ही हैं—यह अर्थात् सिद्ध है । नाड़ी रूप वे विद्यायें अर्थात् उनकी अधिष्ठात्री देवतायें । वही कहा गया है “इडा, चन्द्रिणी, शान्ति, शान्तिकरी, माला, मालिनी, स्वाहा और सुधा ।” (स्व० तं० १०।१०८५) ।। २८२ ।। प्रश्न-नाड़ियों की अधिष्ठात्री देवतायें पुरुषतत्त्व में किस कारण रहती हैं ? यह शङ्का कर कहते हैं क्योंकि पुरुषतत्त्व में प्रसरा नामक नादमयी शक्ति रहती है ।। -२८३ ।। ‘च’ शब्द का प्रयोग निश्चय अर्थ में है। जिस कारण पुरुष तत्त्व के १६८ श्रीतन्त्रालोकः व्यपदेश्ये पुंस्येव, नदति स्वात्माभेदेन विश्वं परामृशति इति ‘नादः’ स्वातन्त्र्यात्म परकर्तृत्वलक्षणो विमर्शः, तन्मयी शक्तिर्बहीरूपतया प्रसरणशीलत्वात् प्रसराख्या स्थिता, क्रियाशक्तिपर्यन्तेन स्थूलरूपेण स्फुरति—इत्यर्थः । इदमुक्तं भवति, चिच्छक्तिरेव हि स्वस्वातन्त्र्यात् संकुचितात्मरूपतामाभास्य देहाद्यात्मतामपि जिघृक्षः प्रथमं नाडीरूपतामियादिति । यदुक्तं प्राक् ‘चित्स्पन्दप्राणवृत्तीनामन्त्या या स्थूलता सुषिः । सा नाडीरूपतामेत्य देहं सन्तानयेदिदम् ॥ (तं० ७६६) इति ।। २८३ ॥ ननु भवेदेवं यदि पुंसः कर्तृत्वं सिद्धयेत्, तदेव पुनरतिदुर्लभं यत् तथात्वेऽस्य क्षीरादिवदचैतन्यं स्यात् ?–इत्याशङ्क्याह न ह्यकर्ता पुमान्कर्तुः कारणत्वं च संस्थितम् । एवं हि भुजिक्रियाकर्तृत्वायोगात् भोक्तृत्वमपि अस्य न स्यात् । ननु भवद्भिर्जगतां कार्यत्वं साधयितुं पुंस: कर्तृत्वमभ्युपेयते, तच्च अस्माकं प्रकृतिरेव उद्बोढुमुत्सहते-इति किं तेन अचैतन्याधायिना ?–इत्याशङ्क्योक्तम् अधिष्ठाता होने में अर्थात् संकुचित रूप होने के कारण अणुशब्द से व्यवहार किये जाने वाले पुरुष में ही नदन करती है अर्थात् अपने से अभिन्न रूप में विश्व का परामर्शन करती है अत: नाद = अर्थात् स्वातन्त्र्यरूप परकर्तृत्वलक्षण वाला विमर्श, तन्मयी शक्ति-बाह्यरूप में प्रसरण शील होने के कारण प्रसरा नामक, स्थित है = क्रियाशक्तिपर्यन्त वाले स्थूलरूप से स्फुरित होती है । ऐसा कहा जाता है कि चित् शक्ति ही अपने स्वातन्त्र्य से अपनी संकुचितरूपता को आभासित कर देह आदि रूप का भी ग्रहण करने की इच्छा वाली पहले नाड़ीरूपता को प्राप्त करती है। जैसा कि पहले कहा गया है “चित् स्पन्द प्राण की वृत्तियों की अन्तिम स्थूलता सुषि (स्पन्द चित्, स्पन्द, प्राण की कारण से कार्य की ओर उन्मुखता की अन्तिम स्थूलता) है वह नाड़ीरूपता को प्राप्त कर इस देह को बनाती है’’ ॥ २८३ ॥ (तं०आ० ७।६६) प्रश्न-ऐसा हो जाता यदि पुरुष का कर्तृत्व सिद्ध होता किन्तु वही (= कर्तृत्व ही) अत्यन्त दुर्लभ है क्योंकि वैसा होने पर यह दुग्ध आदि के समान जड़ हो जाएगा ?-यह शङ्का कर कहते हैं पुरुष अकर्ता नहीं है और कर्ता की कारणता सिद्ध है ॥ २८४- ।। ऐसा होने पर ‘भुजि’ क्रिया का कर्त्ता न होने से यह भोक्ता भी नहीं होगा । प्रश्न-आप संसार की कार्यता को सिद्ध करने के लिए पुरुष का कर्तृत्व मानते हैं, वह (= कर्तृत्व) तो हमारी प्रकृति ही वहन कर सकती है इसलिए उस अष्टममाह्निकम् __ ‘कर्तुः कारणत्वं च संस्थितम्’ इति । कर्तुरिति न तु जडस्य प्रकृत्यादेः । एतच्च समनन्तराह्निक एव साधयिष्यते तत एवावधार्यम् ।। ननु यद्यचैतन्यात्पुंसः कर्तृत्वं नाभ्युपेयेत तत्तथात्वेऽपि तन्नोपरमेत्-इत्याह अकर्तर्यपि वा पुंसि सहकारितया स्थिते ॥ २८४ ॥ शेषकार्यात्मतैष्टव्यान्यथा सत्कार्यहानितः । इह तावद्विश्वोत्पत्तौ प्रकृतिः कारणं सा च पुरुषमनपेक्ष्य न किञ्चिदाधातुं शक्नुयात् तत्संयोगेनैव विश्वोत्पादस्योक्तत्वात् । यदाहुः पुरुषस्य दर्शनार्थं कैवल्यार्थतथा प्रधानस्य। पब्वन्धवदुभयोरपि संसर्गस्तत्कृतः सर्गः ।। (सां० का० २१) इति । तदन्वयव्यतिरेकानुविधानात् पुमानपि विश्वोत्पत्तौ कारणम्, तच्च विश्वस्य तद्रूपानुवृत्त्यसंभवात् नोपादानरूपं किंतु सहकारिरूपम् तथात्वे च अस्योपादेया तिरिक्तसहकार्यात्मतावश्यमेषितव्याऽन्यथा सत्कार्यवादो हीयेत-इत्येवमपि अस्य चैतन्य के धारक को (मानने से) क्या लाभ ? यह शङ्का कर कहा गया—‘कर्ता की कारणता सिद्ध है ।’ कर्ता की न कि जड़ प्रकृति आदि की । यह बात अगले आह्निक में ही सिद्ध की जाएगी इसलिए वहीं से समझना चाहिए । __प्रश्न—यदि चैतन्याभाव के कारण पुरुष का कर्तृत्व नहीं माना जाएगा तो वैसा होने पर भी वह (कर्तृत्व से) उपरत नहीं होगा ? यह कहते हैं पुरुष के कर्त्ता न होने पर भी सहकारी के रूप में स्थित होने पर (उसकी) शेषकार्यरूपता माननी ही पड़ेगी अन्यथा सत्कार्यवाद की हानि हो। जाएगी ।। -२८४-२८५- ।। विश्व की उत्पत्ति में प्रकृति कारण है और पुरुष की उपेक्षा करके वह कुछ भी नहीं कर सकती क्योंकि उसके संयोग से ही विश्व की उत्पत्ति कही गई है। जैसा कि कहते हैं “पुरुष का (प्रकृति को) देखने के लिए और प्रकृति का (पुरुष के) कैवल्य के लिए लंगड़े और अन्धे के समान दोनों का संयोग होता है और उसके परिणाम स्वरूप सृष्टि होती है ।” (सां० का० २१) इस प्रकार अन्वय और व्यतिरेक के होने के कारण पुरुष भी विश्व की उत्पत्ति में कारण है। किन्तु विश्व की उस (= पुरुष) के रूप में अनुवृत्ति असंभव होने से वह (पुरुष) उपादान कारण नहीं है किन्तु सहकारी कारण है और ऐसा होने पर इसकी उपादेय से भिन्न सहकारिरूपता अवश्य माननी चाहिए अन्यथा सत्कार्यवाद १७० श्रीतन्त्रालोकः विश्वात्मतापरिणामादचैतन्यमेवापतेत् ॥ २८४ ॥ तदेवं विश्वोत्पत्तौ पुंस एव कर्तृत्वमेष्टव्यं येनास्य तत्तद्रूपोपग्रहेऽपि स्वस्वरूपा प्रच्युतेरचैतन्यं न स्यात्, तदाह तस्मात्तथाविधे कार्ये या शक्तिः पुरुषस्य सा॥ २८५ ॥ तावन्ति रूपाण्यादाय पूर्णतामधिगच्छति । ‘तथाविधे’ इति क्रियाशक्त्यात्मनि स्थूलरूपे । तावन्तीति, नाडीविद्यादि रूपाणि । पूर्णतामित्येवमपि स्वात्ममात्रविश्रान्तत्वात् ॥ २८५ ।। इदानी प्रकृतमेवानुसरति नाङ्यष्टकोइँ कथितं विग्रहाष्टकमुच्यते ॥ २८६ ॥ कथितमिति–सर्वशास्त्रे ॥ २८६ ॥ तदाह कार्य हेतुर्दुःखं सुखं च विज्ञानसाध्यकरणानि । साधनमिति विग्रहतायुगष्टकं भवति पुंस्तत्त्वे ॥ २८७ ॥ समाप्त हो जाएगा—इस प्रकार इस रूप में भी इसका विश्व के रूप में परिणाम होने से अचैतन्य ही आएगा ।। २८४ ॥ तो इस प्रकार विश्व की उत्पत्ति में पुरुष को ही कर्ता मानना चाहिए जिससे इसकी, भिन्न-भिन्न रूप धारण करने पर भी, अपने स्वरूप से च्युति न होने के कारण जड़ता न हो-वह कहते हैं इस कारण उस प्रकार के कार्य में पुरुष की जो शक्ति है वह उतने रूपों को लेकर पूर्णता को प्राप्त होती है ।। - २८५-२८६- ॥ उस प्रकार के = क्रियाशक्त्यात्मक स्थूल रूप के । उतने = नाड़ीविद्या आदि रूप । पूर्णता को-ऐसा होने पर भी स्वात्ममात्र में विश्रान्त होने से ।। २८५ ॥ अब प्रस्तुत का अनुसरण करते हैं ऊपर आठ नाड़ियों का कथन हुआ अब आठ शरीरों को कहते हैं || -२८६ ।। कहा गया-सभी शास्त्रों में ।। २८६ ॥ वह कहते हैं कार्य हेत. द:ख. सख, विज्ञान, साध्य करण तथा साधन ये आठ पुरुषतत्त्व में शरीरधारी होते हैं ।। २८७ ।। अष्टममाह्निकम् कार्यं तन्मात्रं हेतुरिति, वागादीन्द्रियदशकात्मकारणम् । ‘विज्ञानसाध्य’ इत्यनेन बुद्धिकर्मेन्द्रियाभिव्यङ्ग्यं ज्ञानमात्रं व्यापारमात्रं चोक्तम् । करणेति, अन्त: करणत्रयम् । साधनमिति, सर्वकारणं प्रधानमित्यर्थः । विग्रहतायुगिति, सूक्ष्म शरीरारम्भकत्वात्, भवति–इति सूक्ष्मेण रूपेण, स्थूलेन रूपेणैषामुक्तत्वात्, परेण च रूपेण मायाया वक्ष्यमाणत्वात् ।। २८७ ।। भुवनं देहधर्माणां दशानां विग्रहाष्टकात् । अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्माकल्काक्रुधो गुरोः ॥ २८८ ॥ शुश्रूषाशौचसन्तोषा ऋजुतेति दशोदिताः । पुंस्तत्त्व एव गन्धान्तं स्थितं षोडशकं पुनः ॥ २८९ ॥ आरभ्य देहपाशाख्यं पुरं बुद्धिगुणास्ततः । तत्रैवाष्टावहङ्कारस्त्रिधा कामादिकास्तथा ॥ २९० ॥ पाशा आगन्तुकगाणेशवैद्येश्वरभेदिताः । त्रिविधास्ते स्थिताः पुंसि मोक्षमार्गोपरोधकाः॥ २९१ ॥ विग्रहाष्टकादिति, ऊर्ध्वम् । पुंस्तत्त्व एवेत्यर्थात्, दशविधस्यापि धर्मस्योर्ध्वम् । देहपाशेत्याद्यावृत्यापि एतदनन्तरं देहपाशानां सूक्ष्मदेहारम्भिणां विषयशब्दवाच्यानां ____ कार्य (= सूक्ष्म शरीर), उसके हेतु हैं = तन्मात्र - वाग् आदि दश इन्द्रियों वे सूक्ष्मशरीर का कारण होती हैं । ‘विज्ञान साध्य–‘अंश के द्वारा ज्ञानेन्द्रिय और कर्मेन्द्रिय से व्यंग्य केवल ज्ञान और केवल व्यापार कहा गया है । करण = तीन अन्त:करण । साधन = सबका कारण-प्रकृति । विग्रहतायुक्-सूक्ष्मशरीर का आरम्भक होने के कारण । होता है-सूक्ष्मरूप से, क्योंकि स्थूलरूप से इनका कथन हो चुका है और पररूप (= कारणरूप) से माया का आगे कथन होगा ॥ २८७ ।। आठ विग्रह वालों के (ऊपर) दश देहधर्मों का भुवन है । अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य, अकल्कता (= धोरवा न देना), अक्षोभ, गुरु की सुश्रूषा, शौच, सन्तोष और सरलता ये दश (देह धर्म) कहे गए हैं । गन्धपर्यन्त सोलह तत्त्व (= ५ कर्मेन्द्रिय + ५ ज्ञानेन्द्रिय + तन्मात्रायें + १ मन) पुरुषतत्त्व में ही स्थित हैं । पुन: (देहपाशों = शब्दादि पाँच विषयों) के देहपाश नामक पुर (का संशोधन करना चाहिए)। उसके बाद वहीं पर बुद्धि के आठ गुण तथा तीन प्रकार का अहङ्कार है । उसके बाद आगन्तुक, गणेशसम्बन्धी तथा विद्येश्वर से सम्बद्ध, तीन प्रकार वाले काम आदि (= क्रोध, लोभ), जो कि मोक्षमार्ग के रोधक हैं, पुरुष तत्त्व में स्थित हैं ॥ २८८-२९१ ॥ आठ विग्रह से-ऊपर । पुरुषतत्त्व में ही अर्थात् दशों प्रकार के धर्मों के १७२ श्रीतन्त्रालोकः शब्दादीनां पञ्चानामपि पुरं व्याख्येयम् । तदुक्तम् ‘शब्दः स्पर्शश्च रूपं च रसो गन्धश्च पञ्चमः । विषयास्तु समाख्याता: शोधनीयाः प्रयत्नतः ।। (स्व० १०।१०९६) इति ।। एतच्च यद्यपि श्रीस्वच्छन्दे त्रिविधादहङ्कारादन्तरमुक्तं तथापि इह विकार षोडशकसाजात्येनैवं व्याख्यातम् । शब्दादीनामेव च सर्वतोमुखं परं बन्धकत्वं समस्ति-इति परसूक्ष्मस्थूलतयैषां तत्र तत्र पौन:पुन्येन शोध्यत्वेनाभिधानम्-इति न कश्चिद्दोषः । कामादिका: पाशास्त्रिविधा उदिता— इति संबन्धः । एषां चात्र अवस्थाने हेतुर्मोक्षमार्गोपरोधका इति । तदुक्तम् ‘काम: क्रोधश्च लोभश्च मोहः पैशुन्यमेव च । जन्ममृत्युजराव्याधिक्षुत्तृतृष्णास्तथैव च ॥ विषादश्च भयं चैव मदो हर्षणमेव च । रागो द्वेषश्च वैचित्त्यं कुपितानृतद्रोहिता ॥ माया मात्सर्यं धर्मश्च अधर्मश्चास्वतन्त्रता। आगन्तुकाश्च बोद्धव्या गणपाशान्निबोध मे ।। देवी नन्दिमहाकालौ गणेशो वृषभस्तथा । भृङ्गी चण्डेश्वरश्चैव कार्तिकेयोऽष्टमः स्मृतः ।। ELLENTERTAINMENT ऊपर । देहपाश शब्द की आवृत्ति के द्वारा-इसके बाद देहपाश जो कि सूक्ष्मदेह के आरम्भक है, विषयशब्द के वाच्य-शब्द आदि हैं उन पाँचों के पुर हैं—ऐसी व्याख्या करनी चाहिए (अथवा इनका शोधन करना चाहिए) । वही कहा गया है “शब्द, स्पर्श, रूप, रस और पाँचवाँ गन्ध ये विषय कहे गए हैं । (इनका) प्रयत्नपूर्वक शोधन करना चाहिए।” (स्व० तं० १०।१०९६) यद्यपि स्वच्छन्द तन्त्र में इसका कथन त्रिविध अहङ्कार के बाद किया गया है तथापि यहाँ सोलह विकारों के सजातीय होने के कारण ऐसा कहा गया । शब्द आदि ही की सर्वतोमुखी परमबन्धकता सम्भव है-इसलिए पर सूक्ष्म स्थूल रूप में इनका स्थान-स्थान पर बारम्बार शोध्य के रूप में कथन किया गया है-अत: कोई दोष नहीं है । काम आदि पाश तीन प्रकार के कहे गए हैं—ऐसा सम्बन्ध है । इनकी यहाँ अवस्थिति में कारण (कहा गया)-मोक्ष मार्ग के अवरोधक हैं । वही कहा गया है. “काम, क्रोध, लोभ, मोह, चुगली, जन्म, मृत्यु, वार्धक्य, रोग, भूख, प्यास, विषाद, भय, मद, हर्ष, राग, द्वेष, चित्त की अस्थिरता, कोप, असत्य, द्रोह, माया, मात्सर्य, धर्म, अधर्म, अस्वतन्त्रता, ये (२६) आगन्तुक (पाश) हैं । अब मुझसे गणपाशों को जानो-देवी, नन्दी, महाकाल, गणेश, वृषभ, भृङ्गी, चण्डेश्वर, या अष्टममाह्निकम् अनन्तस्त्रितनुः सूक्ष्मः श्रीकण्ठश्च शिवोत्तमः। शिखण्डी चैकनेत्रश्च एकरुद्रस्तथा परः ।। विद्येश्वराष्टकान्पाशान्दीक्षाकाले विशोधयेत् ।’ (स्व० १०।११०१) इति ।। २९१ ।। नन्विह त्रिविधाः पाशा:-आणवः कार्मो मायीयश्चेति । तत्र विकारषोडशकादेः पाशत्वं यद्य(द)भिधीयते तदास्ताम्, स हि मायीयस्यैव पाशस्य प्रपञ्चः; यत्पनरिदं गणानां विद्येशानां च पाशत्वमुच्यते तदपूर्वमिव न: प्रतिभासते?–इत्याशङ्क्याह- . यत्किञ्चित्परमाद्वैतसंवित्स्वातन्त्र्यसुन्दरात् । पराच्छिवादुक्तरूपादन्यत्तत्पाश उच्यते ॥ २९२ ॥ इह खलु पूर्वमुक्तस्वरूपात्प्रकाशैकमात्रवपुषः ‘परात्’ पूर्णाच्छिवात् यत्किञ्चित् न तु नियतमेव ‘अन्यत्’ अतिरिक्तं तन्निखिलमेव पाश उच्यते, बन्धकतयैव अभिमतम्-इत्यर्थः । ननु परस्मात्प्रकाशादन्यन्नाम न किञ्चिदेव सम्भवेत् तदतिरेकेणास्य भानायोगात्, तथात्वे वा तदेकमात्ररूपत्वात् तत्कस्य पाशत्वेन अभिधानम् ?–इत्याशङ्क्योक्तम्- ‘परमाद्वैतसंवित्स्वातन्त्र्यसुन्दरात्’ इति । स हि पर: शिवः परमाद्वैतसंविद्रूपत्वेऽपि स्वातन्त्र्यसुन्दरो येन स्वं (स्व) रूपं गोपयित्वा तेन तेन संकुचितेन रूपेण प्रस्फुरेत्, यतोऽयं भेदप्रथात्मा मायीय एव मल: प्रबलतामियात् ।। २९२ ।। आठवें कार्तिकेय, अनन्त, त्रितन, सूक्ष्म, श्रीकण्ठ, शिवोत्तम, शिखण्डी, एकनेत्र तथा अन्तिम एकरुद्र (१६) तथा आठ विद्येश्वरपाशों का दीक्षाकाल में शोधन करना चाहिए ।” (स्व० १०।११०१) ॥ २८८-२९१ ॥ प्रश्न-पाश तीन प्रकार के हैं—आणव, काम और मायीय । यहाँ जो सोलह विकारों को पाश कहा गया वह तो रहे क्योंकि वह मायीय पाश का ही विस्तार है । किन्तु यहाँ जो गणों को और विद्येश्वरों को पाश कहा गया वह हमें अपूर्व ही लग रहा है ? यह शङ्का कर कहते हैं उक्त परम अद्वैत संवित्स्वातन्त्र्यसुन्दर परम शिव रूप से अतिरिक्त जो कुछ है वह पाश कहा जाता है ॥ २९२ ॥ ___ पूर्वोक्त रूप वाले केवल प्रकाशशरीर पर = पूर्ण शिव से, जो कुछ, न कि निश्चित रूप से, भिन्न = अतिरिक्त है, वह सब पाश कहा जाता है अर्थात् बन्धन वाला माना गया है । प्रश्न-परप्रकाश से भिन्न कुछ भी सम्भव नहीं है क्योंकि उससे भिन्न इसका आभास ही नहीं होगा, अथवा वैसा होने पर वही एकमात्र होगा फिर किसका पाश के रूप में कथन है ? यह शङ्का कर कहा गया-‘परम अद्वैत संवित्स्वातन्त्र्यसुन्दर…………’ । वह परशिव परम अद्वैत संवित् रूप होने १७४ श्रीतन्त्रालोकः नन्वेवं वेदकैकस्वरूपात् पराच्छिवादन्ये वेद्यैकरूपास्तनुकरणादयो जडा यदि पाशत्वेनेष्यन्ते तदास्ताम्, कथं पुनः वेदकैकस्वभावा: पररूपाः प्रमातारोऽपि ? इत्याशङ्क्याह तदेवं पुंस्त्वमापन्ने पूर्णेऽपि परमेश्वरे । तत्स्वरूपापरिज्ञानं चित्रं हि पुरुषास्ततः ॥ २९३ ॥ इह खलु पारमेश्वराद्रूपात् भेदेन प्रथनं नाम बन्धो यदख्यातिरिति सर्वत्रोद्धोष्यते तच्च वेदकानां वेद्यानां चाविशिष्टम् इति सर्वेषामपि पाशरूपतायां समानः पन्थाः । एवमपि तत्स्वरूपापरिज्ञाने पुंसामन्योन्यमतिशयः संभवेत् येनैषा मपि वैचित्र्यम् । तथा हि-कस्यचिदेक एव मल: कस्यचित् द्वौ, कस्यचित्त्रयो ऽपीति । एवमपि पाशरूपतायामेषां न कश्चिद्विशेषः, पारमेश्वरस्य स्वरूपा परिज्ञानस्य तादवस्थ्यात् । एवं च विद्येशत्वं त्वपरा मुक्ति:- इत्यादि युक्तमेव । अत एव ‘समनान्तं वरारोहे पाशजालमनन्तकम् ।’ (स्व० ४।४२९) इत्याधुक्तम् ॥ २९३ ।। पर भी स्वातन्त्र्यसुन्दर है जिस कारण (वह) अपने रूप को छिपा कर भिन्न-भिन्न संकुचित रूप से प्रस्फुरित होता है । वह भेदप्रथारूप प्रबल मायीय मल हो जाता है ।। २९२ ।। ___ प्रश्न—ऐसा होने पर ज्ञातृरूप पर शिव से भिन्न वेद्यरूप शरीर इन्द्रियाँ आदि जड़ पदार्थ यदि पाश माने जाँय तो कोई हर्ज नहीं लेकिन ज्ञातृरूप स्वभाव वाले पररूप प्रमातृगण भी कैसे (पाश माने जाते हैं?)—यह शङ्का कर कहते हैं तो इस प्रकार पूर्ण परमेश्वर के पुरुषरूप प्राप्त होने के बाद अपने स्वरूप का परिज्ञान नहीं रहता । फलत: पुरुष विचित्र होते हैं (और ये भी पाश ही हैं) ।। २९३ ।। यहाँ पारमेश्वर रूप से भिन्न रूप में विस्तार ही बन्ध है जो सर्वत्र अख्याति के रूप में कहा जाता है वह वेदक और वेद्य के विषय में समान है-इस प्रकार सबका पाशरूप होने में एक समान ही मार्ग है । तो भी उस (= स्वात्म) रूप का ज्ञान न होने पर पुरुषों में परस्पर अतिशय सम्भव है जिस कारण इनमें भी भेद है। वह इस प्रकार-कोई एक मलवाला है कोई दो और कोई तीनों (मल) वाला । इस पर भी इनकी पाशरूपता में कोई अन्तर नहीं पड़ता क्योंकि अपने रूप का अज्ञान वैसा (= सबमें समान) ही है । इस प्रकार ‘विद्येश्वरत्व अपर मुक्ति है’ इत्यादि कथन ठीक ही है । इसीलिए “हे वरारोहे ! समना तक अनन्त पाशजाल है ।” (स्व० ४।४२९) इत्यादि कहा गया है ॥ २९३ ।। अष्टममाह्निकम् १७५ एवमिहापि अनुक्तं यत्किञ्चित्पराच्छिवादन्यत् तत्सर्वं पाशतयैव ज्ञेयमित्याह उक्तानुक्तास्तु ये पाशाः परतन्त्रोक्तलक्षणाः । ते पुसि सर्वे तांस्तत्र शोधयन्मुच्यते भवात् ॥ २९४ ॥ पुंस ऊर्ध्वं तु नियतिस्तत्रस्थाः शङ्करा दश । हेमाभाः सुसिताः कालतत्त्वे तु दश ते शिवाः ॥ २९५ ॥ कोटिः षोडशसाहस्रं प्रत्येक परिवारिणः । रागे वीरेशभुवनं गुर्वन्तेवासिनां पुरम् ॥ २९६ ॥ पुरं चाशुद्धविद्यायां स्याच्छक्तिनवकोज्ज्वलम्। मनोन्मन्यन्तगास्ताश्च वामाद्याः परिकीर्तिताः ॥ २९७ ॥ कलायां स्यान्महादेवत्रयस्य पुरमुत्तमम् । ‘शङ्कराः’ इत्येतत्संज्ञा: । ‘वामदेवस्तथा शर्वस्तथा चैव भवोद्भवौं । वज्रदेहः प्रभुश्चैव दाता च क्रमविक्रमौ ।। सुप्रभेदश्च दशमो नियत्यां शङ्कराः स्मृताः ।’ (स्व० १०।११०४) इति । हेमाभा इति, शङ्कराः । सुसिता इति, शिवाः । तदुक्तम् इस प्रकार यहाँ भी जो कुछ उक्त नहीं है तथा परमशिव से भिन्न है उस सबको पाश के रूप में ही जानना चाहिए-यह कहते हैं उक्त अथवा अनुक्त जो पाश, जिनका लक्षण अन्य तन्त्रों के द्वारा (अथवा अन्य तन्त्रों में) कहा गया है, वे सब पुरुष तत्त्व में (स्थित हैं)। उनका वहाँ शोधन करने वाला संसार (या जन्म) से मुक्त हो जाता है । पुरुष तत्त्व के ऊपर नियति तत्त्व है । वहाँ स्वर्ण की सी कान्ति वाले दश शङ्कर हैं । काल तत्त्व में दश अत्यन्त श्वेत शिव हैं । प्रत्येक के परिवार एक करोड़ सोलह हजार हैं । राग तत्त्व में वीरेश का भुवन है जो गुरु के अन्तेवासियों का पुर है । अशुद्ध विद्यातत्त्व में नव शक्तियों से उज्ज्वल दूसरा (पुर) है । वे (शक्तियाँ) वामा से लेकर उन्मना तक कही गई है । कला तत्त्व में तीन महादेवों का उत्तम पुर है ।। २९४-२९८- ।। शङ्कर-इस नाम वाले ।। ‘वामदेव, शर्व, भव, उद्भव, वज्रदेह, प्रभु, दाता, क्रम, विक्रम और दशवें सुप्रभेद ये दश शङ्कर नियति (तत्त्व) में (स्थित) माने गए हैं । (स्व० १०।११०४) हेमाभ-शङ्कर । अत्यन्त स्वच्छ-शिव । वही कहा गया है श्रीतन्त्रालोकः ‘हेमाभा: शङ्करा: प्रोक्ता: शिवा: स्फटिकसंनिभाः ।’ (स्व० १०।११०८) इति । ‘शुद्धो बुद्धः प्रबुद्धश्च प्रशान्तः परमाक्षरः । शिवश्च सुशिवश्चैव ध्रुवश्चाक्षरशंभुराट् ।। दशैते कालतत्त्वे तु शिवा ज्ञेया वरानने ।’ (स्व० १०।११०७) इति च । वीरेशभुवनमिति, अर्थादष्टसंख्यावच्छिन्नम् । ‘परम्’ इति अन्यत् दशसंख्या वच्छिन्नम् । तदुक्तम् ‘अत ऊर्ध्व हरिहरौ रागतत्त्वे निबोध मे । संहष्ट: सुप्रहृष्टश्च सुरूपो रूपवर्धनः । गत मनोन्मनो महावीरो वीरेशाः परिकीर्तिताः ।’
  • (स्व० १०।१११२) इति । ‘कल्याण: पिङ्गलो बभ्रुर्वीरश्च प्रभवस्तथा । मेघातिथिश्छेदकश्च : दाहक: शास्त्रकारिणः ।। पञ्च शिष्यास्तथाचार्या दशैते संव्यवस्थिताः ।। (स्व० १०।१११४) इति च । ‘ताः’ इति शक्तयः । तदुक्तम् = ‘वामा ज्येष्ठा च रौद्री च काली विकरणी तथा । “शङ्करों को स्वर्णाभ तथा शिवों को स्फटिकसमान कहा गया है ।” (१०।११०८) हे वरानने ! “कालतत्त्व में शुद्ध, बुद्ध, प्रबुद्ध, प्रशान्त, परमाक्षर, शिव, सुशिव, ध्रुव, अक्षर एवं शम्भुराट्-इन दश शिवों को जानना चाहिए ।” (स्व० १०।११०७) वीरेश का भुवन-अर्थात् आठ संख्या वाला । पर- अर्थात् दूसरा दश संख्या वाला । वही कहा गया है ‘‘इसके बाद राग तत्त्व में (स्थित वीरेशों को) मुझसे जानो । हरि, हर, संहृष्ट, सुप्रहृष्ट, सरूप, रूपवर्द्धन, मनोन्मन और महावीर ये ८ वीरेश कहे गए हैं ।’ (स्व० १०।१११२) “कल्याण, पिङ्गल, बभ्रु, वीर, प्रभव ये पाँच शिष्य तथा मेधा, अतिथि, छेदक, दाहक एवं शास्त्रकारी ये पाँच आचार्य, इस प्रकार दश स्थित हैं ।” (स्व० १०।१११४) वे = शक्तियाँ । वही कहा गया है “वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, विकरणी, बलविकरणी, बलप्रमथनी, सर्वभूतदमनीअष्टममाह्निकम बलविकरणी चैव बलप्रमथनी तथा ।। सर्वभूतदमनी च तथा चैव मनोन्मनी ।’ (स्व०१०।१११४) इति च । अत्र च स्त्रीपाठ एव साधुर्महाजनैः परिगृहीतत्वात् । उत्तममिति, विश्वस्य परायां काष्ठायामधिरोहात् । तदुक्तम् ‘महादेवो महातेजा महाज्योति……………।’ इति ॥ २९७ ॥ इदानी ग्रन्थितत्त्वशक्त्यात्मना त्रिप्रकारं मायाया: स्वरूपं निरूपयति ततो माया त्रिपुटिका मुख्यतोऽनन्तकोटिभिः ॥ २९८ ॥ आक्रान्ता सा भगबिलैः प्रोक्तं शैव्यां तनौ पुनः। अगुष्ठमात्रपर्यन्तं महादेवाष्टकं निशि ॥ २९९ ॥ चक्राष्टकाधिपत्येन तथा श्रीमालिनीमते । मुख्यत इति, अन्यथा हि अस्या वक्ष्यमाणदृशा पुटानामानैक्यम् । ‘महादेवाष्टकं निशि’ इत्यत्रापि ‘शैव्यां तनौ’ इति योज्यम् । तदुक्तं तत्र ‘भगबिलसहस्रकलितं गुहाशिरो यत्प्रपञ्चसर्वगतम् ।’ इति । ‘तत्रानघप्रभावः प्रथमश्चक्राधिपो महातेजाः । वामो नाम्ना बलवान् द्वितीयचक्राधिपो रुद्रः ।। तथा मनोन्मनी (ये दश शक्तियाँ हैं)।” (स्व० १०।११४४) यहाँ स्त्रीलिङ्ग वाला पाठ ही उचित है क्योंकि श्रेष्ठ पुरुषों ने (उसे) माना है । उत्तम-क्योंकि विश्व का पराकाष्ठा में अधिरोहण है । वही कहा गया है “महादेव, महातेजा, महाज्योति…………….’’ ॥ २९८- ।। अब ग्रन्थि, तत्त्व एवं शक्ति के रूप में माया के तीन प्रकार के स्वरूप को बतलाते हैं इसके ऊपर माया मुख्यतया तीन प्रकार की है । वह अनन्त कोटि भगबिलों (= ऐश्वर्यात्मक आकर्षक कामत्रिकोण कण्डों) से आक्रांत (= परिवेष्टित) है ऐसा शिवतनु शास्त्र में कहा गया है । पुन: चक्रों के अधिपति के रूप में अंगुष्ठमात्र तक आठ महादेव निशाटन शास्त्र में (कहे गए हैं) । ऐसा मालिनीविजय तन्त्र में भी कहा गया है । -२९८-३००-।। मुख्यरूप से-अन्यथा वक्ष्यमाण रीति से पुरों की अनेकता है । निशा में आठ महादेव-यहाँ भी ‘शैवी तनु में’ ऐसा जोड़ना चाहिए । वही वहाँ कहा गया है “गुहाशिर जो कि प्रपञ्च का सर्वस्व है हजारों भगबिलों से युक्त है।” “वहाँ निष्कलुष प्रभाव वाले महातेज वाम(देव) नामक प्रथम चक्रेश (रहते) हैं । १२ त.तृ. १७८ श्रीतन्त्रालोकः चक्रं भवोद्भवाख्यस्तृतीयमधितिष्ठति स्ववीर्येण । प्रभुरेकपिङ्गचक्षुश्चक्रस्य पतिश्चतुर्थस्य ।। ईशान इति प्रथितो यच्चक्रं पञ्चमं प्रवर्तयति। षष्ठस्याधिष्ठाता भुवनेशो भुवनचक्रस्य ॥ प्रथित: पुर:सराख्यो यः सप्तमचक्रनायको देवः । अङ्गुष्ठमात्रनामा पतिरष्टमभुवनचक्रस्य ॥ इति च । न केवलमत्रैवैतदुक्तं यावदन्यत्रापि–इत्याह-‘तथा श्रीमालिनीमते’ इति । यदुक्तं तत्र ‘महातेज:प्रभृतयो मण्डलेशानसंज्ञकाः । मायातत्त्वे स्थितास्तत्र वामदेवभवोद्भवौ ॥ एकपिङ्गेक्षणेशानभुवनेशपुर:सरा: । अङ्गुष्ठमात्रसहिताः कालानलसमत्विषः।’ (मा० वि० ५।२९) इति ॥ २९९ ॥ अत्र च श्रीपूर्वशास्त्रादपि विशेषान्तरमस्ति–इत्याह वामाद्याः पुरुषादौ ये प्रोक्ताः श्रीपूर्वशासने॥ ३०० ॥ ते मायातत्त्व एवोक्तास्तनौ शैव्यामनन्ततः। पुरुषादाविति, आदिशब्दाद्रागतत्त्वम् । यदुक्तं तत्र रुद्र दूसरे चक्राधिप हैं । अपने पराक्रम से तीसरे चक्र के स्वामी भवोद्भव है । चतुर्थ चक्र के अधिपति एकपिङ्गाक्ष है । पञ्चम चक्र का प्रवर्तन करने वाले ईशाननाम से विख्यात हैं । छठे भुवनचक्र के अधिष्ठाता भुवनेश है । जो पुर:सर नाम से प्रसिद्ध हैं वे देव सप्तम चक्र के नायक है । अष्टम भुवन चक्र के अधिपति का नाम अंगुष्ठमात्र है ।” यह (बात) केवल यहीं नहीं कही गई है बल्कि अन्यत्र भी यह कहते हैं तथा श्रीमालिनीमत में । जैसा कि वहाँ कहा गया है “महाकालानल के समान कान्ति वाले तेजस्वी आदि मण्डलेशान संज्ञावाले वामदेव, भवोद्भव, एकपिङ्गाक्ष, ईशान, भुवनेश आदि अङ्गष्ठमात्र के सहित वहाँ मायातत्त्व में स्थित हैं । (मा०वि० ५।२९) ॥ २९९ ॥ इस विषय में श्रीपूर्वशास्त्र से भी भेद है-यह कहते हैं श्रीपूर्वशास्त्र में जो वामदेव आदि पुरुष आदि (तत्त्वों) में कहे गए हैं वे शिवतनु शास्त्र में अनन्त पर्यन्त मायातत्त्व में ही (स्थित) कहे गए हैं ॥ -३००-३०१- ।। पुरुष आदि में-आदि शब्द से राग तत्त्व (समझना चाहिए) जैसा कि वहाँ अष्टममाह्निकम् ‘पुरुषे वामभीमोग्रभवेशानैकवीरकाः । प्रचण्डो माधवाऽजश्च अनन्तेकशिवावथ ।।’ (मा० वि० ५।२६) इति । ‘अनन्ततः’ इति अनन्तपर्यन्तम्-इत्यर्थः । यदुक्तं तत्र ‘वामस्य ततो भुवनं तस्माद्भमं ततोऽपि चोग्रस्य। तस्माद्भवस्य भुवनं तदुपरि सर्वस्य देवस्य ।। इति । तस्माद्गुणैर्विचित्र वनवरं चक्रवीरस्य ।’ इति । ‘अपरिमितगुणनिधानं भुवनवरं तदुपरि प्रचण्डस्य । यत्र प्रचण्डनामा स्थितोऽनुशास्त्येकवीरादीन् ।। इति च।३०० ॥ अत्र चैषामुपदेशेन कोऽर्थः ? — इत्याशङ्क्याह कपालवतिनः स्वाङ्गहोतार: कष्टतापसाः ॥ ३०१॥ सर्वाभयाः खङ्गधारावतास्तत्तत्त्ववेदिनः । ‘तत्तत्त्ववेदिन:’ इति वामादिसायुज्यभाज:- इत्यर्थः । तदुक्तम् कहा गया है “वामदेव, भीम, उग्र, भव, ईशान, एकवीर, प्रचण्ड, माधव, अज, अनन्त और एक शिव (ये) पुरुष (तत्त्व) में (रहते) है ।” (मा०वि० त० ५।२६) अनन्तत: = अनन्तपर्यन्त । जैसा कि वहाँ कहा गया है “इसके बाद वामदेव का भुवन, उसके पश्चात् भीम का, फिर उग्र का, तत्पश्चात् भव का भुवन उसके ऊपर शर्व देव का ।” “उसके बाद विचित्रगुणों से (युक्त) चक्रवीर का श्रेष्ठ भुवन है ।’’ “उसके ऊपर प्रचण्ड का असीम गुणों का आकारश्रेष्ठ भुवन है जहाँ कि प्रचण्ड नामक (महादेव) एकवीर आदि का अनुशासन करते हैं’’ ॥ ३०० ॥ किन्तु यहाँ इनके उपदेश से क्या तात्पर्य है ? - यह शङ्का कर कहते हैं (जो) कपालवती, अपने अङ्ग का हवन करने वाले, कष्ट तापस (= कठिन तपस्या करने वाले), सबको अभय देने वाले अथवा खड्गधाराव्रत करने वाले होते हैं वे (यथायोग्य) उन-उन तत्त्वों के ज्ञाता होते हैं । -३०१-३०२- ॥ उन तत्त्वों को जानने वाले = वामदेव आदि के साथ सायुज्य के भागी । वही कहा गया है १८० SELINTERESTINITNEETIRIHARANPURNIRNEHA श्रीतन्त्रालोकः ‘ज्ञातज्ञेया विप्राः कापालव्रतभृतो विगतसङ्गाः। भस्मोपलेपनिष्ठा व्रजन्ति वामस्य सायुज्यम् ।। उपलब्धवेदनीया अतिभीमपदेप्सवो निजशिरोभिः । स्वयमुल्लूनैरिष्ट्वा भौमं गच्छन्ति तद्धाम ।। विहितोग्रयोगविधयो ये धीरा दुष्करे तपस्युगे । ध्यायन्त्युग्रमजस्रं तेऽपि लभन्ते गुणानौग्रान् ।। विज्ञाय भवं देवं भीतानामभयदानसंसिद्धाः । भवपदमारोहन्तो ध्यानाहितचेतसो विप्राः ॥ स्त्रग्वस्त्रालङ्कारैरभिरामं रूपमात्मनः कृत्वा । असिधाराव्रतनिष्ठा: पूर्वपदं ध्यायिनो यान्ति ।।’ इति ॥ ३०१ ।। नन्वेषामपि सृष्ट्यादिकारी प्रभुरनन्तोऽस्ति-इति किमेतावत्पदप्राप्त्या इत्याशझ्याह क्रमात्तत्तत्त्वमायान्ति यत्रेशोऽनन्त उच्यते ॥ ३०२ ॥ ‘तत्तत्त्वम्’ इति मायीयं प्रधानं भुवनम् इत्यर्थः । ईश इति, अर्थादिय दन्तस्याध्वनः ॥ ३०२ ॥ किमत्र प्रमाणम् ?–इत्याशङ्क्याह “वे ब्राह्मण जो ज्ञेय को जानने वाले, कपालव्रत धारण करने वाले, आसक्तिरहित एवं भस्मोपलेप में निष्ठा रखने वाले है वामदेव के सायुज्य को प्राप्त करते हैं । ज्ञातव्य को जानने वाले, अतिभीम पद के इच्छुक, अपने शिरों से स्वयं नोचे गए (बालों) से यज्ञ करके इस भौम धाम को जाते हैं । उग्र योग का विधान करने वाले जो घोर (साधक) दुष्कर एवं उग्र तपस्या के द्वारा निरन्तर उग्र का ध्यान करते हैं, उग्र के गुणों को प्राप्त करते हैं । भवदेव को जान कर भयभीत लोगों को अभय देने में सिद्ध भवपद पर आरुढ़ होने वाले, ध्यान में चित्त को लगाने वाले विप्र माला वस्त्र एवं अलङ्कारों से अपने रूप को सुन्दर बना कर असिधारा व्रत में लगे हुये ध्यानी पूर्व पद को प्राप्त होते हैं” ॥ ३०१ ॥ प्रश्न-इनकी भी सृष्टि आदि के कर्ता भगवान् अनन्त हैं तो इन पदों की प्राप्ति से क्या लाभ ?–यह शङ्का कर कहते हैं (ये लोग) क्रमश: उस तत्त्व को प्राप्त होते हैं जहाँ के स्वामी अनन्त कहे जाते हैं । -३०२ ॥ _उस तत्त्व को = मायीयप्रधान भुवन को । ईश्वर = यहाँ तक के अध्वा के ॥ ३०२ ॥ इस विषय में क्या प्रमाण है ? यह शङ्का कर कहते हैं अष्टममाह्निकम् १८१ उक्तं च तस्य परतः स्थानमनन्ताधिपस्य देवस्य। स्थितिविलयसर्गकर्तुर्गुहाभगद्वारपालस्य ॥ ३०३ ॥ उक्तमिति, शिवतनावेव । ‘परतः’ इत्यूर्ध्वम् । ‘गुहा’ इति माया ॥ ३०३।। स्थित्यादिकारित्वमेवास्य दर्शयति धर्मानणिमादिगुणाज्ञानानि तपःसुखानि योगांश्च । मायाबिलात्प्रदत्ते पुंसां निष्कृष्य निष्कृष्य ॥ ३०४ ॥ तच्छक्तीद्धस्वबला गुहाधिकारान्धकारगुणदीपाः । सर्वेऽनन्तप्रमुखा दीप्यन्ते शतभवप्रमुखान्ताः ॥ ३०५ ॥ सोऽव्यक्तमधिष्ठाय प्रकरोति जगन्नियोगतः शम्भोः । शुद्धाशुद्धस्रोतोऽधिकारहेतुः शिवो यस्मात् ॥ ३०६ ॥ तच्छक्तीति, तच्छब्देन अनन्तपरामर्शः । अनेन च न केवलमयं क्षेत्रज्ञानामेव स्थितिं विधत्ते यावद्रुद्राणामपि–इत्युक्तम् । ‘गुणा:’ सर्वज्ञत्वादयः । अनन्तप्रमुखा इति, अनन्तस्वामिका:-इत्यर्थः । जगदिति, कार्यकारणात्मनियोगत: शम्भोरिति, न तु स्वेच्छामात्रात् । अत्र हेतु: ‘शुद्धेत्यादिना’ । तदुक्तं तत्र ___उसके ऊपर स्थिति प्रलय और सृष्टि के कर्ता, गुहाभग (= मायाबिल) के द्वारपाल, अनन्तनाथ देव का स्थान कहा गया है ।। ३०३ ॥ कहा गया है-शिवतनु (शास्त्र) में । बाद में = ऊपर । गुहा = माया ।। ३०३ ।। इनकी स्थिति आदि की कर्तृता को दिखलाते हैं वे (= अनन्तनाथ) मायाबिल से निकाल-निकाल कर पुरुषों को धर्म, अणिमा आदि गुण, ज्ञान, तपस्, सुख और योग प्रदान करते हैं । उन (अनन्तनाथ) की शक्ति से अपने बल को उद्वलित पाकर माया के अधिकार रूपी अन्धकार के लिए गुण रूपी दीप वाले अनन्तनाथ के अधीन वर्तमान शतरुद्र आदि प्रकाशित होते हैं । चूँकि शिव शुद्धाशुद्ध स्रोत के अधिकार के कारणभूत हैं (इसलिए) वे अव्यक्त में अधिष्ठित होकर शम्भु के नियोग से संसार का निर्माण करते हैं ॥ ३०४-३०६ ॥ उसकी शक्ति-यहाँ ‘उस’ शब्द से अनन्त को समझना चाहिए । उससे ये केवल क्षेत्रज्ञों की ही स्थिति का विधान नहीं करते बल्कि गुणों की भी यह कहा गया । गुण-सर्वज्ञत्व आदि । अनन्तप्रमुख = अनन्त जिनके स्वामी हैं वे लोग । जगत्-कार्यकारणरूप । शम्भु के नियोग (= आदेश) से-न कि केवल अपनी इच्छा से । इसमें हेतु (दिखलाते हैं) शुद्ध इत्यादि के द्वारा, वही वहाँ कहा गया है १८२ श्रीतन्त्रालोकः ‘अव्यक्तमधिष्ठाय प्रकरोति जगद्यतः स देवेशः । संसारमहाविवरे पर्यस्तांस्त्रायते च यतः ।। शिवयोगबलोपेतस्तस्मात्पत्युर्नियोग आसीनः । शुद्धाशुद्धस्रोतोऽधिकारहेतुः शिवो ज्ञेयः ।। इति ॥३०६॥ ननु को नाम शुद्धाशुद्धयोः स्रोतसोरधिकार ?–इत्याशङ्क्याह शिवगुणयोगे तस्मिन् महति पदे ये प्रतिष्ठिताः प्रथमम्। तेऽनन्तादेर्जगतः सर्गस्थितिविलयकर्तारः ॥ ३०७ ॥ मायाबिलमिदमुक्तं परतस्तु गुहा जगद्योनिः । ‘महति पदे’ इति शुद्धे स्रोतसि । तस्य विशेषणं ‘शिवगुणयोगे’ इति, सर्वज्ञत्वादिसंभवात् । अनन्तादेरिति ‘अनन्तोः’ मायातत्त्वाधिष्ठाता । मायाबिल मिति, ग्रन्थिरूपा माया, गुहेति, तत्त्वरूपा । ‘परत:’ इति अशुद्ध स्रोतसि इत्यर्थः । तेन ग्रन्थितत्त्वरूपतया द्विविधापि माया जगद्योनिरिति संबन्धः । उक्तं ‘परतो गुहा भगवती जगतामुत्पत्तिकारणं माया। यस्यां स्थितिमनुभूय प्रविलीयन्ते पुनर्लोकाः ॥’ इति ॥ ३०७।। अत्र च भगसंज्ञायां प्रवृत्तौ किं निमित्तम् ?–इत्याशङ्क्याह “वे देवेश, चूँकि, अव्यक्त में अधिष्ठित होकर संसार का निर्माण करते हैं और संसाररूपी महाबिल में गिरे हये लोगों की रक्षा करते हैं इस कारण शिवयोग के बल से युक्त, पति के नियोग में स्थित शुद्धाशुद्ध स्रोत के अधिकार के कारणभूत उनको शिव समझना चाहिए” ॥ ३०६ ॥ शुद्धाशुद्ध स्रोत का अधिकार क्या है ? यह शङ्का कर कहते हैं जो लोग उस शिवगणयोग वाले महापद पर पहले प्रतिष्ठित हो गये वे अनन्त से लेकर जगत् की सृष्टि स्थिति और प्रलय के कर्ता हैं । यह (= शुद्ध स्त्रोत ग्रन्थि) मायाबिल कहा गया है । उसके बाद की गुहा संसार का कारण है ।। ३०७-३०८- || महा पद पर-शुद्ध स्रोत में । उसका विशेषण है-शिवगुणयोग वाले क्योंकि (उसमें) सर्वज्ञत्व आदि सम्भव हैं । अनन्त आदि का-अनन्त = माया तत्त्व के अधिष्ठाता । मायाबिल = ग्रन्थिरूपा माया । गुहा = तत्त्वरूपा । उसके बाद-अशुद्ध स्रोत में । इस कारण ग्रन्थि एवं तत्त्व के रूप से दो प्रकार की माया संसार का कारण है । वहाँ कहा भी गया है “उसके बाद भगवती गुहा (अर्थात्) संसार की उत्पत्ति का कारण माया है जिसमें लोक (= जीव) स्थिति का अनुभव कर (उसी में) विलीन होते हैं ॥३०७॥ अष्टममाह्निकम् १८३ उत्पत्त्या तेष्वस्याः पतिशक्तिक्षोभमनुविधीयमानेषु ॥ ३०८ ॥ योनिविवरेषु नानाकामसमृद्धेषु भगसंज्ञा । कामयते पतिरेनामिच्छानुविधायिनीं यदा देवीम् ॥ ३०९ ॥ प्रतिभगमव्यक्ताद्याः प्रजास्तदास्याः प्रजायन्ते । ‘तेषु’ इति सृष्ट्यादिलाभरूपेष्वित्यर्थः । ‘अस्याः’ इति ग्रन्थिरूपाया मायायाः । ‘एनाम्’ इति ग्रन्थिरूपामेव मायाम् । ‘प्रतिभगम्’ इति भगे भगे इत्यर्थः । अत एव प्रकृत्यण्डादेरसंख्यातत्वम् । एतत्साम्यनिमित्त एव चात्र लौकिक: स्त्रीपुंसवृत्तान्तोऽपि कटाक्षित: ।। ३०९ ॥ एते चानवच्छिन्ना-इत्याह तेषामतिसूक्ष्माणामेतावत्त्वं न वर्ण्यते विधिषु ॥ ३१० ॥ ‘विधिषु’ शास्त्रेषु ॥ ३१० ॥ एतदेव दृष्टान्तोपदर्शनेन द्रढयति अववरकाण्येकस्मिन्यद्वत्साले बहूनि बद्धानि । यहाँ भगसंज्ञा का प्रवृत्तिनिमित्त (= वाच्यार्थ) क्या है ?- यह शङ्का कर कहते इस (माया) की उत्पत्ति के कारण पतिशक्ति के क्षोभ का विधान करने वाले वे योनिविवर जब अनेक प्रकार की काम भावना से समृद्ध हो जाते हैं तब (वे) भगनाम वाले होते हैं । और जब पति इच्छानुकूल कार्य करने वाली इस (माया) की कामना करता है तो एक-एक भग में इसकी अव्यक्त आदि प्रजायें उत्पन्न होती हैं ।। -३०८-३१०- ।। उनमें = सृष्टि आदि लाभ रूप (उन) में । उसका = ग्रन्थिरूपा माया का । इसको = ग्रन्थिरूपा माया को । प्रतिभगम् = प्रत्येक भग में, इसीलिए प्रकृत्यण्ड से लेकर (= अण्डों की) असंख्यता है । इस साम्य के आधार पर यहाँ लौकिक स्त्रीपुरुष व्यवहार के ऊपर कटाक्ष हुआ (अर्थात् जैसे स्त्री के भग के प्रति आकृष्ट होने पर पति के द्वारा सृष्टि होती है उसी प्रकार परमेश्वर अपनी शक्ति के प्रति आकृष्ट होकर अनन्त अण्डों की रचना करता है ।) ॥ ३०९ ।। ये अनवच्छिन्न है-यह कहते हैं अत्यन्त सूक्ष्म उनकी इयत्ता (= निश्चित संख्या) शास्त्रों में वर्णित नहीं है। -३१० ॥ विधि में = शास्त्रों में ॥ ३१० ॥ इसी को दृष्टान्त के द्वारा पुष्ट करते हैं १८४ श्रीतन्त्रालोकः योनिबिलान्येकस्मिंस्तद्वन्मायाशिरःसाले ॥३११ ॥ मायापटलैः सूक्ष्मैः कुड्यैः पिहिताः परस्परमदृश्याः। निवसन्ति तत्र रुद्राः सुखिनः प्रतिबिलमसंख्याताः ॥ ३१२ ॥ स्थाने सायुज्यगताः सामीप्यगताः परे सलोकस्थाः । ‘तत्र स्थाने’ इति ग्रन्थिरूपायां मायायाम् । असंख्यातत्वे निमित्तमाह ‘सायुज्य’ इत्यादि । ३१२ ।। एतदेवान्यत्रापि अतिदिशति प्रतिभुवनमेवमयं निवासिनां गुरुभिरुद्दिष्टः ॥ ३१३ ॥ एषां चाधिष्ठातृभिः सममियत्ताकलने निमित्ताभावं दर्शयति अपि सर्वसिद्धवाचः क्षीयेरन्दीर्घकालमुद्गीर्णाः। न पुनर्योन्यानन्त्यादुच्यन्ते स्रोतसां संख्याः ॥ ३१४ ॥ नन्वस्मात्स्रोतसः किं स्रोतोन्तराणि विलक्षणानि न वा ? इत्याशङ्क्याह HTANIN जिस प्रकार एक मकान में बहुत से छिद्र किये जाँय उसी प्रकार एक मायाशिररूपी भवन में (असंख्य) योनिरूपी बिल हैं । उस परस्थान में प्रत्येक बिल में सायुज्य, सामीप्य और सालोक्य (मुक्ति) को प्राप्त हुये असंख्य रुद्र जो कि सूक्ष्म मायापटल रूपी दीवार से व्यवहित होने के कारण परस्पर अदृश्य रहते हैं, सुखपूर्वक निवास करते हैं ।। ३११-३१३- ।। उस स्थान में— ग्रन्थिरूपा माया में । असंख्यता में कारण बतलाते हैं-सायुज्य इत्यादि । ३१२ ॥ इसी का अन्यत्र भी वर्णन करते हैं प्रत्येक भुवन में रहने वालों के विषय में ऐसा ही यह (सिद्धान्त) गुरुओं के द्वारा उपदिष्ट है ।। -३१३ ।। अधिष्ठाताओं के समान इनकी इयत्ता के निर्धारण में कारण के अभाव को दिखलाते है सर्वसिद्धवाक लोग दीर्घकाल तक वर्णन करते हए भले ही थक जॉय किन्तु योनियों के आनन्त्य के कारणभूत स्रोतसों की संख्या नहीं कही जा सकती ।। ३१४ ।। प्रश्न-इस (ग्रथिरूपा माया) स्रोत से क्या दूसरे स्रोत विलक्षण हैं—या अष्टममाह्निकम् १८५ तस्मान्निरयाद्येकं यत्प्रोक्तं द्वारपालपर्यन्तम् । स्रोतस्तेनान्यान्यपि तुल्यविधानानि वेद्यानि ॥ ३१५ ॥ अव्यक्तकले गुहया प्रकृतिकलाभ्यां विकार आत्मीयः। ओतः प्रोतो व्याप्तः कलितः पूर्णः परिक्षिप्तः ॥ ३१६ ॥ गुहाया हि अव्यक्तं कला च विकारः, अतश्च तयाव्यक्तकलयोरोतत्वादि न्याय्यम् । कारणेन हि स्वकार्यापूरकेण भाव्यम् । यदाहुः ‘कारणमापूरकं च तस्यैव ।’ इति । आपूरणमेव च ‘ओत: प्रोतः’ इत्यादिना विभक्तम् । ‘आत्मीयः’ इति महदादिरविद्यादिश्च ।। ३१६ ।। एवमस्या: शास्त्रान्तरेभ्यो विशेष दर्शयित्वा प्रकृतमेवाह मध्ये पुटत्रयं तस्या रुद्राः षडधरेऽन्तरे । एक ऊर्ध्वं च पञ्चेति द्वादशैते निरूपिताः ॥ ३१७ ॥ ‘अधरे’ इति पुटे । एवमन्यत्र ॥ ३१७ ।। तान्येव पठति नहीं ? यह शङ्का कर कहते हैं ___ इस कारण निरय (= अशुद्धस्रोत) से लेकर द्वारपाल तक जो एक स्रोत कहा गया उसके आधार पर अन्य स्रोतों को भी तुल्यविधान वाले समझने चाहिए । गुहा (= माया) के द्वारा अव्यक्त और कला, आत्मा का विकार (= महत् से लेकर जीव जगत् तक का विकार) प्रकृति और कला से, व्याप्त ओतप्रोत कलित, पूर्ण और परिक्षिप्त है ।। ३१५-३१६ ॥ अव्यक्त और कला गुहा का विकार है । इसलिए अव्यक्त और कला का उसके द्वारा ओतप्रोत आदि होना समीचीन है । कारण को अपने कार्य का आपूरक होना चाहिए । जैसा कि कहते हैं और कारण उसी (= कार्य) का आपूरक होता है ।” आपूरण ही ओत:प्रोत (शब्द) इत्यादि के द्वारा विभक्त है । आत्मा का (विकार) महत् आदि और अविद्या आदि है ।। ३१६ ॥ इस प्रकार दूसरे शास्त्रों से इसका भेद दिखाकर प्रस्तुत का कथन करते हैं उसके मध्य में तीन पुट हैं—नीचे छ रुद्र हैं बीच में एक और ऊपर पाँच । इस प्रकार ये १२ बतलाये गये ।। ३१७. ।। अधर में—पुट में । इसी प्रकार अन्यत्र (समझना चाहिए) ॥ ३१७- ।। १८६ श्रीतन्त्रालोकः गहनासाध्यौ हरिहरदशेश्वरौ त्रिकलगोपती षडिमे। मध्येऽनन्तः । क्षेमो द्विजेशविद्येशविश्वशिवाः ॥ ३१८ ॥ इति पञ्च तेषु पञ्चसु षट्सु च पुटगेषु तत्परावृत्त्या । परिवर्त्तते स्थितिः किल देवोऽनन्तस्तु सर्वथा मध्ये ॥ ३१९ ॥ ‘गहनश्च असाध्यश्च तथा हरिहरः प्रभुः । दशेशानश्च देवेशि विकलो गोपतिस्तथा ।। अध:पुटे तु विज्ञेया मायातत्त्वे वरानने । क्षेमेशो ब्राह्मणस्वामी विद्येशानस्तथैव च ।। विश्वेशश्च शिवश्चैव अनन्तः षष्ठ उच्यते । ऊर्ध्वं मायापुटस्थास्तु रुद्रा एते प्रकीर्तिताः ।। एषां मध्ये तु भगवाननन्तेशो जगत्पतिः (स्व० १०।११२५) इति । अत्र चैषां परेण रूपेणान्यथावस्थानेऽपि अनन्तस्य न कश्चिद्विशेष: इत्याह ‘तेषु’ इत्यादि । पुटगेष्विति, अर्थादूधिः । तत्परावृत्त्येति, तच्छब्देन रुद्राणां परामर्शः, तेन अध:पुटे ऊर्ध्वपुट एव च उपर्युपरिभावस्य व्यत्ययादेषां स्थिति: परिवर्तते-इति यावत् । तदुक्तम् उन्हीं (= १२ रुद्रों) को कहते हैं गहन, असाध्य, हरिहर, दशेश्वर, त्रिकल और गोपति ये (अधपुट में है) मध्य में अनन्त हैं ऊपर वाले पुट में क्षेमेश, द्विजेश, विद्येश, विश्वेश और शिव ये पाँच है । उन पुटवर्ती पाँच और छ रुद्रों में उनके स्थानपरिवर्तन के द्वारा स्थिति बदलती रहती है। किन्तु अनन्त देव सर्वथा मध्य में रहते हैं ।। ३१८-३१९ ।। वही कहा गया है “हे देवेशि ! गहन, असाध्य, प्रभु, हरिहर, दशेशान, त्रिकल और गोपति मायातत्त्व में अध:पुर में जानना चाहिए । क्षेमेश, ब्राह्मणस्वामी, विद्येश, विश्वेश, शिव और अनन्त छठें कहे जाते हैं। ये रुद्र ऊर्ध्व मायापुरवासी कहे गए हैं । इनके मध्य में भगवान् जगत्पति अनन्तेश रहते हैं ।” (स्वतं० १०।११२५) यहाँ इनकी दूसरे रूप में स्थिति होने पर भी अनन्त की (स्थिति में) कोई अन्तर नहीं पड़ता इसलिए कहा-उनमें-इत्यादि । पुटवर्तियों में-अर्थात् ऊपर नीचे । उनके परिवर्तन से—यहाँ ‘उन’ शब्द से रुद्रों को जानना चाहिए । इसलिये अध:पुट और ऊर्ध्वपुट में ही व्यत्यय से उनकी (= रूद्रों की) स्थिति परिवर्तित होती है । वही कहा गया हैअष्टममाह्निकम् १८७ प्रथमेन तु भेदेन रुद्रा द्वादश कीर्तिताः । अस्मिंस्तु ये महारुद्रा मायातत्त्वे व्यवस्थिताः।। तानहं संप्रवक्ष्यामि भेदत्रयविभागशः । गोपत्तिश्च ततो देवि अधोग्रन्थौ व्यवस्थितः ।। ग्रन्थ्यूज़ संस्थितो विश्वस्त्रिकल: क्षेम एव च । ब्रह्मणोऽधिपतिश्चैव शिवश्चैव स पञ्चमः ।। अध ऊर्ध्वमनन्तस्तु……………………….(स्व० १०.११३०) इति । एवमत्र अध:पुटे परापररूपतया सप्त भुवनानि, ऊर्ध्वपुटे च दश, मध्यपुटे च पुनरेकमेव—इत्यष्टादश ।। ३१९ ।। अन्यत्र पुनरियान्विशेष:- इत्याह ऊर्ध्वाधरगकपालकपुटषट्कयुगेन तत्परावृत्त्या । मध्यतोऽष्टाभिर्दिकस्यैव्याप्तो प्रन्थिर्मतङ्गशास्त्रोक्तः ॥ ३२० ॥ षटकयुगेनेति, रुद्राणां, तेनोधकपालेऽवस्थितैः षभिरनन्तायै रुद्र्रधश्च गोपत्यादिभिर्मध्ये च विग्रहेशारिष्टभिः, - इति विंशत्या रुद्राणां मायाग्रन्थिर धिष्ठित:-इत्यर्थः । तदुक्तं तत्र ‘ग्रन्थेरूज़ कपालानि षटसंख्यातानि सुव्रत । तावन्त्यधस्तादम्याणि रचितानीह धातुभिः ।। (मतं० ८।६७) ___“प्रथम भेद से बारह रुद्र कहे गये । इस मायातत्त्व में जो महारुद्र व्यवस्थित हैं उनको तीन भेद के विभाग से मैं कहता हूँ । हे देवि ! गोपति अधोग्रन्थि में व्यवस्थित है । ग्रन्थि के ऊपर विश्व, त्रिकल, क्षेम, ब्रह्मणस्पति और पांचवें शिव है । इसके ऊपर अनन्त हैं । (स्व० सं०१०।११३०) इसी प्रकार यहाँ अध:पुर में पर-अपर रूप से सात भुवन हैं । ऊर्ध्वपुर में दश और मध्यपुर में एक-इस प्रकार अठारह ॥ ३१९ ।। दूसरी जगह इतना अन्तर है-यह कहते हैं ऊपर नीचे वर्तमान दो पुरों में उन (रुद्रों) के परिवर्तन के साथ बारह और मध्य में आठ दिग्वासी (रुद्रों) के द्वारा मतङ्गशास्त्र में कथित (माया) ग्रन्थि व्याप्त है ।। ३२० ।। रुद्रों के दो षट्कों (६ + ६ = १२) के द्वारा-इससे ऊर्ध्व कपाल में स्थित अनन्त आदि रुद्रों, नीचे (स्थित) गोपति आदि और मध्य में स्थित विग्रहेश ( अनन्त) आदि आठ-इस प्रकार बीस रुद्रों के द्वारा माया ग्रन्थि अधिष्ठित है । वही वहाँ कहा गया है “हे सुव्रते ! ग्रन्थि के ऊपर छ कपाल और उतने ही कपाल नीचे हैं, ये १८८ श्रीतन्त्रालोकः इत्याधुपक्रम्य ‘अनन्तोऽनन्तवीर्यात्मा सर्वेषां मूर्ध्नि संस्थितः । ततोऽधस्ताच्छिवो नाम रुद्रो भुवनकृत् प्रभुः ॥ विश्वेशश्च महातेजा विद्येशान: परस्ततः । ततोऽन्यो ब्राह्मणस्वामी क्षेमेशश्चाप्यनन्तरम् ।। एते षट् भुवनेशाना:……………………….. ।’ (मतं० ८।८२) इति । ‘एभ्योऽधः संस्थितो ग्रन्थिर्भेद्यश्चातिविस्तृतः । यत्रासौ विग्रहेशानः.. ___(मतङ्ग।८।८४) इति । ‘यत्र शवों भवश्चैव उग्रो भीमश्च वीर्यवान् । भस्मान्तको दुन्दुभिश्च श्रीवत्सश्च महाबलः ।। तस्माद् ग्रन्थेरधश्चक्रं षट्कपालमयं महत् ।’ (मतङ्ग० ८८६) इति । ‘गोपतेर्भुवनं दिव्यं त्रिकलस्याप्यनन्तरम् । तदधस्ताद्दशेशस्य भुवनं चारु निर्मलम् ।। हरेर्हरस्य देवस्य तथा हरिहरस्य च ।’ (मतङ्ग० ८८८) इति च ।। ३२० अन्यत्र पुनर्विशेषान्तरमप्यस्ति-इत्याह धातुओं के द्वारा सुन्दर रूप में रचे गए हैं ।” (मतं० ८।६७) यहाँ से प्रारम्भ कर “अनन्तवीर्य वाले अनन्त सबके ऊपर स्थित हैं । उनके नीचे भूवन के कर्ता शिव नामक रुद्र हैं । उसके बाद महातेजस्वी विश्वेश तत्पश्चात् विद्येशान, उसके बाद ब्राह्मणस्वामी, अनन्तर क्षेमेशान ये छ भुवनेश हैं ।” (मतं० ८1८२) “इनके नीचे अत्यन्त विस्तृत और दुर्भेद्य ग्रन्थि स्थित हैं । जहाँ ये विग्रहेशान (रहते हैं)।” (मत० ८८४) “जहाँ शर्व, भव, उग्र, वीर्यवान् भीम, भस्मान्तक, दुन्दुभि महाबली श्रीवत्स (रहते है) । उस ग्रन्थि के नीचे छ कपालों वाला महान् चक्र है ।” (मतं० ८८६) “गोपति का दिव्य भुवन, उसके बाद त्रिकल का, उसके नीचे दशेश देव, हरि, हर तथा हरिहर का सुन्दर निर्मल भुवन है–यह कहते हैं” ॥ ३२० ॥ (मतं० ८।८८) अन्यत्र भेदान्तर भी है-यह कहते हैं १८२ अष्टममाह्निकम् श्रीसारशासने पुनरेषा षट्पुटतया विनिर्दिष्टा । यदुक्तं तत्र ‘तस्याधस्तान्महामाया षट्पुटा संव्यवस्थिता ।’ इति ।। एवं मायाया ग्रन्थिरूपतामुपसंहरंस्तत्त्वरूपतां वक्तुमुपक्रमते ग्रन्थ्याख्यमिदं तत्त्वं मायाकार्यं ततो माया ॥ ३२१ ॥ ___ मायाकार्यमिति, जननौन्मुख्यात् मायातत्त्वमेव वैषम्यमापन्नम्—इत्यर्थः । तस्य पुनरक्षुब्धमेव रूपम् ॥ ३२१ ॥ अत आह– मायातत्त्वं विभु किल गहनगरूपं समस्तविलयपदम्। ‘विभु’ व्यापकम्, अत एव गहनम् । अरूपमिति, सूक्ष्मत्वात् । समस्त विलयपदमिति, सूक्ष्मेण क्रमेणात्र विश्वस्यावस्थानात् ।। अत एव न चात्र कश्चिद्भौवनविभाग:-इत्याह– ___तत्र न भुवनविभागो युक्तो ग्रन्थावसौ तस्मात् ॥ ३२२ ॥ सारशास्त्र में यह (ग्रन्थि) छ पुरों के रूप में वर्णित है ।। ३२१- ।। जैसा कि वहाँ कहा गया है “उसके नीचे छ पुरों वाली महामाया व्यवस्थित है” ।। ३२०- ॥ इस प्रकार माया की ग्रन्थिरूपता का उपसंहार करते हुये उसकी तत्त्वरूपता का वर्णन प्रारम्भ करते हैं यह ग्रन्थिनामक तत्त्व माया का कार्य है उसके बाद माया है।-३२१॥ माया का कार्य-सृष्टि की उन्मुखता के कारण माया तत्त्व ही वैषम्य को प्राप्त हो गया । उस (= मायातत्त्व) का रूप तो अक्षुब्ध है ।। ३२१ ।। इसलिए कहते हैं मायातत्त्व व्यापक, गहन, नीरूप तथा समस्त विलय का स्थान है ।। ३२२- || विभु = व्यापक, क्योंकि सूक्ष्म क्रम से यहाँ विश्व स्थित रहता है ॥ ३२२ ॥ इसलिए यहाँ कोई भुवनात्मक विभाग नहीं है-यह कहते हैं इसी कारण इस ग्रन्थि में यहाँ कोई भुवनात्मक विभाग नहीं है ।। -३२२ ।। श्रीतन्त्रालोकः ग्रन्थाविति, तस्यैव स्थूले रूपे इत्यर्थः ।। ३२२ ।। नन्वेवमपि अस्या जाड्यात् कथमेवं कार्याविर्भावने सामर्थ्यम् - इत्याशङ्क्याह मायातत्त्वाधिपतिः सोऽनन्तः समुदितान्विचार्याणून् । युगपत्क्षोभयति निशा सा सूते संपुटैरनन्तैः स्वैः ॥ ३२३ ।। क्षोभयतीति, कार्यप्रसवयोग्यां करोति-इत्यर्थः । संपुटैरिति, भगाकारैः । एषां चानन्त्यं शिवतनुग्रन्थेनैव उक्तम् ।। ३२३ ॥ अत एव कार्यस्यापि आनन्त्यमित्याह तेन कलादिधरान्तं यदुक्तमावरणजालमखिलं तत् । नि:संख्यं च विचित्रं मायैवैका त्वभिन्नेयम् ॥ ३२४ ॥ ननु कारणस्यैक्येऽपि कार्यमनन्तमित्यत्र किं प्रमाणम् ?–इत्याशङ्क्याह उक्तं श्रीपूर्वशास्त्रे च धराव्यक्तात्मक द्वयम् । असंख्यातं निशाशक्तिसंज्ञं त्वेकस्वरूपकम् ॥ ३२५ ॥ ग्रन्थि में = उसी के स्थूल रूप में ॥ ३२२ ॥ प्रश्न-ऐसा होने पर भी इसके जड़ होने के कारण कार्य को प्रकट करने में ऐसा सामर्थ्य कैसे है? – यहाँ शङ्का कर कहते हैं मायातत्त्व के अधिपति अनन्त, विचार करके समस्त अणुओं तथा निशा (= माया) को एक साथ क्षब्ध करते हैं और वह अपने अनन्त संपुटों से प्रसव करती है ॥ ३२३ ।। क्षुब्ध करते हैं = कार्यप्रसव के योग्य करते हैं । संपुट के द्वारा = भगाकार संपुट के द्वारा । इनकी अनन्तता शिवतनु ग्रन्थ के ही द्वारा कही गई है ॥३२३ ॥ इसीलिए कार्य की भी अनन्तता है-यह कहते हैं इसलिए कला से लेकर पृथ्वी (तत्त्व) तक जो आवरणजाल कहा गया है वह समस्त (जाल) असंख्य और विचित्र है। केवल यह माया एक और अभिन्न है ।। ३२४ ।। प्रश्न- कारण के एक होने पर भी कार्य अनन्त हैं-उसमे क्या प्रमाण है यह शङ्का कर कहते हैं श्रीपूर्व शास्त्र (= मालिनीविजयतन्त्र) में धरा और अव्यक्त रूप दो तत्त्व असंख्य कहा गया है । निशाशक्ति नामक (तत्त्व) एक रूप वाला है ।। ३२५ ॥ अष्टममाह्निकम् 909 तदुक्तं तत्र ‘पृथग्द्वयमसंख्यातमेकैकं च पृथग्द्वयम् ।’ (मा० वि० २।५०) इति ॥ ३२५ ।। एवमेतत्प्रसङ्गादभिधाय प्रकृतमेवावतारयति पाशाः पुरोक्ताः प्रणवाः पञ्च मानाष्टकं मुनेः । कुलं योनिश्च वागीशी यस्यां जातो न जायते ॥ ३२६ ॥ पुरेति पुंस्तत्त्वप्रकरणे । मुनेः कुलमिति गुरुशिष्यादिरूपतया प्रागेव उक्तम् । योनिरिति, _ ‘वागेव विश्वा भुवनानि जज्ञे’ इति स्थित्या विश्वकारणम् । जात इति मन्त्रादिबलेन । न जायते इति, परशिवे योजितत्वात् ।। ३२६ ॥ किं बहुना यत्किञ्चित्कलादावधराध्वन्युक्तं तत्सर्वमत्रैव स्थितम्-इत्याह दीक्षाकालेऽधराध्वस्थशुद्धौ यच्चाधराध्वगम् । अनन्तस्य समीपे तु तत्सर्वं परिनिष्ठितम् ॥ ३२७ ॥ वही वहाँ कहा गया है “दोनों अलग-अलग असंख्य हैं और एक-एक करके दो अलग-अलग है ।” (मा०वि०तं० २।५०) ।। ३२५ ॥ प्रसङ्गवश इसका कथन कर प्रकृत की अवतारणा करते हैं पाश, पाँच प्रणव, आठ प्रमाण, मुनि का कुल और जिसमें उत्पन्न हआ भी (जीव) उत्पन्न नहीं होता (वह) वागीश्वरी योनि (= शुद्ध विद्या, ये सब) पहले कह दिये गए ।। ३२६ ॥ ___पहले-पुंस्तत्त्व प्रकरण में । मुनि का कुल-गुरु शिष्य आदि के रूप में पहले ही कहा गया । योनि “वाणी ने ही समस्त भुवनों को उत्पन्न किया’’ इस स्थिति से (वाणी ही) विश्व का कारण है । उत्पन्न हआ-मन्त्र आदि के बल से । नहीं उत्पन्न होता क्योंकि परशिव में जोड़ दिया जाता है ।। ३२६ ।। यहाँ तक कि जो कुछ कला आदि अशुद्ध अध्वा में कहा गया है वह सब यही स्थित है-यह कहते हैं दीक्षा के समय अशुद्ध अध्वा में स्थित (तत्त्वों) की शुद्धि होने पर जो कुछ अशुद्ध अध्वा में है वह सब अनन्त के समीप में स्थित हो जाता १९२ श्रीतन्त्रालोकः कारणे हि कार्यस्य सूक्ष्मेण रूपेणावस्थानमुचितम्-इति भावः ॥ ३२७ ॥ ननु भवतु नामैतत्, प्रणवादि पुनः किमुच्यते ?–इत्याशङ्क्याह साध्यो दाता दमनो ध्यानो भस्मेति बिन्दवः पञ्च । पञ्चार्थगुह्यरुद्राङ्कुशहृदयलक्षणं च सव्यूहम् ॥ ३२८ ॥ आकर्षादी चेत्यष्टकमेतत्प्रमाणानाम् । ‘बिन्दवः’ प्रणवा: ।। ३२८ ॥ एषां च सर्वेषामेव यथासंभवं स्वरूपमभिधातुमाह अलुप्तविभवाः सर्वे मायातत्त्वाधिकारिणः ॥ ३२९ ॥ मायामयशरीरास्ते भोगं स्वं परिभुञ्जते । स्वमिति, स्वाधिकारोचितम्-इत्यर्थः ॥ ३२९ ।। मायामयशरीरत्वमेव व्याचष्टे प्रलयान्ते ह्यनन्तेन संहृतास्ते त्वहर्मुखे ॥ ३३० ॥ अन्न्यानन्तप्रसादेन विबुधा अपि तं परम् । है ॥ ३२७ ॥ ____ क्योंकि कार्य का कारण में सूक्ष्म रूप से अवस्थान उचित ही है—यह भाव ____प्रश्न-ऐसा है तो हो, प्रणव आदि क्या कहलाता है ?—यह शङ्का कर कहते है? साध्य, दाता, दमन, ध्यान, भस्म ये पाँच बिन्दु (= प्रणव) हैं । पञ्चार्थ, गुह्य, रुद्राङ्कश, हृदय, लक्षण, व्यूह, आकर्ष और आदर्श ये आठ प्रमाण हैं । बिन्दु = प्रणव ।। ३२८ ॥ इन सबका यथासम्भव स्वरूप बतलाने के लिए कहते हैं जिनका वैभव लुप्त नहीं है तथा (जो) मायातत्त्व के अधिकारी हैं वे सब मायामय शरीर वाले होकर अपने भोग को भोगते हैं ।। -३२९-३३०- ।। अपना = अपने अधिकार के योग्य ॥ ३२९ ।। मायामयशरीरत्व की व्याख्या करते हैं प्रलय के अन्त में अनन्त के द्वारा संहार किये जाने पर वे (ब्रह्मा के) दिन के प्रारम्भ में दूसरे अनन्त की कृपा से उस परमेश्वर के विषय में भी अष्टममाह्निकम् सुप्तबुद्ध मन्यमानाः स्वतन्त्रम्मन्यताजडा: ॥ ३३१ ।। स्वात्मानमेव जानन्ति हेतु मायान्तरालगाः। ‘अहर्मुखे पुन:सृष्टौ । अन्यानन्तेति, अन्यशब्दो मायाधिकार्यपेक्षया । तं परमनन्तं हेतुं न जानन्ति, अपि तु स्वात्मानमेव-इति संबन्धः । अत्र च एवकारसामथ्यान्निषेधावगमः, तदपरिज्ञान च हतद्वय सुप्तबद्ध मन्यमानाः स्वतन्त्रमन्यताजडाश्चति । स्वात्मनि च तथापरिज्ञाने हेतुः ‘मायान्तरालगा’ इति । इदमुक्तं भवति–यद्यपि एषां ‘शुद्धेऽध्वनि शिव: कर्ता प्रोक्तोऽनन्तोऽसिते प्रभुः।’ इत्याद्यतया अनन्तादीनामेव सृष्टिसंहाराः, तथाप्येते मायामोहितत्वात् ऐश्वर्यम देनेतन्न जानते, प्रत्युत वयमेव जगतां सृष्टिसंहारकारिणो न पुनरस्मदप्यधिक: कश्चिदस्ति-इति; यत एते स्वात्मनि पारतन्त्र्येऽपि स्वातन्त्र्याभिनिवेशात् सुप्तप्रबुद्धन्यायेन सृष्टिं प्रलयं च स्वात्माधीनमेव मन्यन्ते इति । तदुक्तम् ‘ऐश्वर्यमदमाविश्य मन्यमाना महोदयाः । मत्तः श्रेष्ठतरं नान्यत्कारणं जगतां परम् ।। विबुध (= अज्ञानी) होते हुये अपने को ही सुप्त प्रबुद्ध तथा स्वतन्त्र मानने के कारण जड़ वे माया के अन्तराल में वर्तमान अपने को ही (सृष्टि और संहार का) हेतु मानते हैं ।। -३३०-३३२- ।। ___ अहर्मुख में = पुन: सृष्टि होने पर । अन्य अनन्त-(यहाँ) अन्य शब्द का प्रयोग माया के अधिकारी की अपेक्षा से किया गया है । उस परम अनन्त हेतु को नहीं जानते बल्कि अपने को ही (हेतु मानते है)—यह सम्बन्ध है । यहाँ पर ‘एव’ के सामर्थ्य से निषेध का ज्ञान होता है । उस (परम तत्त्व) के अपरिज्ञान में दो हेतु है-(अपने को) सुप्तप्रबुद्ध मानने वाले तथा स्वतन्त्र मानने के कारण जड़ । अपने को वैसा जानने में हेत् है-माया के अन्तराल में रहना । यह कहा जाता है यद्यपि इनका “शुद्ध अध्या में शिव कर्त्ता कहे गए हैं और अशुद्ध अध्वा में भगवान् अनन्त । इत्यादि उक्ति के द्वारा अनन्त आदि ही सष्टिसंहार करते हैं तथापि माया से मोहित होने से ऐश्वर्यमद के कारण वे यह नहीं जानते बल्कि ‘हम ही संसार के सृष्टिसंहारकारी हैं हमसे बढ़कर कोई नहीं है—(ऐसा समझते है) । क्योंकि ये स्वयं परतन्त्र होते हुये भी स्वातन्त्र्य के प्रेम के कारण सुप्तप्रबुद्धन्याय से सृष्टि और प्रलय को अपने अधीन मानते हैं । वही कहा गया है “ऐश्वर्यमद से आविष्ट होकर (अपने को) महान् उदय वाला मानते हुए (वे समझते हैं कि) मुझसे बढ़कर संसार का दूसरा कारण नहीं है, मैं ही इस समस्त श्रीतन्त्रालोकः अहमेव समस्तस्य जगतोऽस्य जगत्पतिः । (मतङ्ग ८७३) इति । यतोऽधोदृष्टयः सवें स्वसृष्टिमदमोहिताः । तस्मिन्नभिरताः सन्तः क्रीडाभोगेष्वनिन्दिताः ।। स्वकार्यकरणैः सम्यक्संहारे स्वापमागताः । ततः क्षोभिकयाविष्टाः संप्रबुद्धाः परस्परम् ।। तद्विधामेव पश्यन्ति स्वां सृष्टिं रचनोज्ज्वलाम् । सुप्तोत्थिता वयं किं नु स्वनिद्रावशवर्तिनः ।। क्रीडामो विगतक्लेशाः स्वार्जितेष बभूक्षवः । सूक्ष्मपाशावृताः सवें न च स्थूलैस्तिरस्कृताः ।। (मतङ्ग० ८1८०) इति ॥ ३३२ ॥ एवं मायाया ग्रन्थितत्त्वरूपतया द्वैविध्यं निरूप्य शक्तिरूपतामपि आख्यातमाह - अतः परं स्थिता माया देवी जन्तुविमोहिनी ॥ ३३२ ॥ देवदेवस्य सा शक्तिरतिदुर्घटकारिता । निर्वैरपरिपन्थिन्या तया श्रमितबुद्धयः ॥ ३३३ ॥ इदं तत्त्वमिदं नेति विवदन्तीह वादिनः । गुरुदेवाग्निशास्त्रेषु ये न भक्ता नराधमाः ॥ ३३४ ॥ संसार का स्वामी हूँ ।” (मतङ्ग ८७३) __“जिससे सभी निम्न दृष्टिवाले अपने सृष्टि के मद से मूढ़ होकर उसमें अभिरक्त होते हुए, क्रीडाभोग में उच्च धारणा रखते हुए अपने कार्य एवं इन्द्रियों के साथ पूर्ण प्रलयकाल में सुषुप्ति को प्राप्त हो जाते है । इसके बाद क्षोभिका के द्वारा आविष्ट एवं प्रबुद्ध होकर परस्पर उसी प्रकार की अपनी रचनाज्ज्वला सृष्टि को देखते है । (वे सोचते है कि) क्या हम लोग अपनी निद्रा के वश में हो कर सो कर उठे है । (हम लोग) क्लेशरहित होकर क्रीड़ा करेंगे, अपने द्वारा अर्जित का भोग करना चाहेंगे । (ऐसे वे) सब सूक्ष्म पाश से आवृत होते हैं और स्थूल (पाशों) से रहित नहीं होते । (मततं०८1८०) ।। ३३२ ॥ इस प्रकार ग्रन्थि एवं तत्त्व के रूप में माया के दो प्रकारों का निरूपण कर (उसकी) शक्तिरूपता को भी कहते हैं इसके पश्चात् जीवों को मोह में डालने वाली देवी माया स्थित है। वह देवाधिदेव की अत्यन्त दुर्घटकारिणी शक्ति है । समभाव की विरोधिनी उस (माया) के द्वारा भ्रान्तमति वाले (जो) वादी लोग ‘यह तत्त्व है और यह नहीं’ ऐसा विवाद करते हैं, गुरु, देवता, अग्नि और शास्त्र के अष्टममाह्निकम् १९५ सत्पथं तान्परित्याज्य सोत्पथं नयति ध्रुवम्। असद्युक्तिविचारज्ञाञ्छुष्कतर्कावलम्बिनः ॥३३५ ॥ भ्रमयत्येव तान्माया दमोक्षे मोक्षलिप्सया । देवीति, देवाभिन्नत्वात् । अतिदुर्घटकारितेति, स्वातन्त्र्यरूपत्वात् ‘विवदन्ति, इति विमतिं कुर्वन्तीत्यर्थः । शुष्केति, वस्तुशून्यत्वात् ॥ ३३५ ।। नन्वेवंविधाया अस्याः कथं समुच्छेदः स्यात् ?–इत्याशङ्क्याह शिवदीक्षासिना च्छिन्ना शिवज्ञानासिना तथा ॥ ३३६ ॥ न प्ररोहेत्पुनर्नान्यो हेतुस्तच्छेदनं प्रति । दीक्षेति, क्रिया । नान्यो हेतुरिति, शास्त्रान्तरोदितः ॥ ३३६ ॥ महामायोर्ध्वतः शद्धा महाविद्याथ मातका ॥३३७ ॥ वागीश्वरी च तत्रस्थं वामादिनवसत्पुरम् । शुद्धत्वादेव च अस्या महत्त्वमित्युक्तं ‘महाविद्या’ इति ।। ३३७ ।। विषय में जो नराधम भक्ति नहीं रखते वह उनको सन्मार्ग से हटाकर निश्चित रूप से उन्मार्ग (असन्मार्ग) पर ले जाती है । (जो) असद यक्ति (असद्) विचार और (असद्) ज्ञान वाले तथा शुष्क तर्क का अवलम्बन करते हैं उनको अमोक्ष में मोक्ष की लिप्सा से माया भ्रमित करती रहती है ।। -३३२-३३६- ।। देवी-देव से अभिन्न होने के कारण । अतिदुर्घटकारिता-क्योंकि यह स्वातन्त्र्य रूप है । विवाद करते हैं-विपरीत विचार करते हैं । शुष्क-वस्तुशून्य होने के कारण ।। ३३५ ॥ प्रश्न-इस प्रकार की इस (माया) का उच्छेद कैसे होगा-यह शङ्का कर कहते हैं शिवदीक्षा रूपी खड्ग तथा शिवज्ञान रूपी तलवार से कटी हुई यह (= माया) पुन: अंकुरित नहीं होती । उसको काटने के लिए दूसरा हेतु नहीं है ।। -३३६-३३७- ।। दीक्षा = क्रिया । दूसरा हेतु नहीं है-अन्यशास्त्रों में उक्त ॥ ३३६ ॥ महामाया के ऊपर शुद्ध महाविद्या है इसके बाद मातृका और वागीश्वरी है । वहाँ पर वामा आदि नव (देवताओं) का सुन्दर पुर है ।। -३३७-३३८- ।। ___ शुद्ध होने के कारण ही इसका महत्त्व है इसलिए कहा गया महाविद्या ॥ ३३७ ।। RTAITREATPATANERSITE श्रीतन्त्रालोकः E HERANTHEATHEATRERRARIANTHRAINRIT वामाद्या एव पठति वामा ज्येष्ठा रौद्री काली कलविकरणीबलविकारिके तथा ॥ ३३८ ॥ मथनी दमनी मनोन्मनी च त्रिदृशः पीता: समस्तास्ताः। सप्तकोट्यो मुख्यमन्त्रा विद्यातत्त्वेऽत्र संस्थिताः॥ ३३९ ॥ एकैकार्बुदलक्षांशाः पद्याकारपुरा इह । विद्याराज्ञयस्त्रिगुण्याद्याः सप्त सप्ताबुंदेश्वराः ॥ ३४० ॥ ‘अंशा’ इति परिवारा: ‘सप्तार्बुदेश्वरा’ इति, अर्बुदशब्देनात्र कोटिर्लक्ष्यते, तेन सप्तकोटिसंख्याकानां मन्त्राणामीश्वर्य-इत्यर्थः । तदुक्तम् ‘त्रिगुणी ब्रह्मवेताली स्थाणुमत्यम्बिका परा । रूपिणी मर्दिनी ज्वाला सप्तसंख्यास्तदीश्वराः ॥ विद्याराज्ञयस्तथा ख्याता:
  • (स्व० १०।११४९) इति ॥ ३४० ॥ विद्यातत्त्वोर्ध्वमैशं तु तत्त्वं तत्र क्रमोर्ध्वगम् । शिखण्ड्याद्यमनन्तान्तं पुराष्टकयुतं पुरम् ॥ ३४१ ॥ शिखण्डी श्रीगलो मूर्तिरकनेत्रैकरुद्रको। शिवोत्तमः सूक्ष्मरुद्रोऽनन्तो विद्येश्वराष्टकम् ॥ ३४२ ॥ क्रमादूयोर्ध्वसंस्थानं सप्तानां नायको विभुः। वामा आदि को कहते हैं वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, काली, कलविकरिणी, बलविकारिका, मथनी, दमनी एवं मनोन्मनी ये सभी देवतायें पीत रङ्ग की हैं । इस विद्यातत्त्व में सात करोड़ मुख्य मन्त्र स्थित हैं । यहाँ एक-एक करोड़ लाख अंश (= परिवार) वाले कमल के आकार वाले पुर है । त्रिगुणी आदि सात विद्यारानियाँ तथा सात अर्बुदेश्वर हैं ।। -३३८-३४० ॥ ____अंश = परिवार । सात अर्बुदेश्वर-यहाँ अर्बुद शब्द से करोड़ समझना चाहिए । इस प्रकार सात करोड़ मन्त्रों की ईश्वरी लोग हैं । वही कहा गया है “त्रिगुणी, ब्रह्मवैताली, स्थाणुमती, अम्बिका, रूपिणी, मर्दिनी और ज्वाला ये सात संख्या वाली विद्यारानियाँ और उनके ईश्वर कहे गए हैं ।” (स्व० १०।११४९) ॥ ३४० ॥ विद्यातत्त्व के ऊपर ईश्वर तत्त्व है। वहाँ क्रमश: ऊपर-ऊपर वर्तमान शिखण्डी से लेकर अनन्त तक आठ पुरों से युक्त पुर है । शिखण्डी, श्रीगल (= श्रीकण्ठ) त्रिमूर्ति, एकनेत्र, एकरुद्र, शिवोत्तम, सूक्ष्मरुद्र, अनन्त (ये) आठ विद्येश्वर क्रमश: ऊपर-ऊपर संस्थान वाले हैं। इन सातोंअष्टममाह्निकम् १९७ अनन्त एव ध्येयश्च पूज्यश्चाप्युत्तरोत्तरः ॥ ३४३ ॥ ‘ऐशं तत्त्वम्’ ईश्वरतत्त्वम्, तत्र पुरमप्यैशमित्यर्थाद्योज्यम्, यत्र भगवानीश्वरः साक्षादस्ति । तदुक्तम् ‘बाये तस्यैश्वरं तत्त्वं भुवनान्यत्र मे शृणु।’ (स्व० १०।११४९) इत्याधुपक्रम्य ‘तत्रस्थ ईश्वरो देवो वरदः सर्वतोमुखः ।’ (स्व० १०।११५२) इति । पुराष्टकस्य च वृतिच्छन्नत्वेऽपि विशेषणं ‘शिखण्ड्याद्यमनन्तान्तम्’ इति, तथा ‘क्रमोर्ध्वगम्’ इति । तत्त्वं चैषां यथायथं गणाधिक्यात् । शिखण्डिनो हि सष्ट्यादिकारित्वे श्रीकण्ठोऽधिकस्तस्माच्च त्रिमूर्त्यादिरपीति । यदाह: __‘ततश्चानन्तात्सूक्ष्मस्य कलया न्यूनं कर्तृत्वं ततः शिवोत्तमस्य’ इत्यादि सर्वेषामत्र सिद्धमिति दोषतः पुनरेतन्न व्याख्येयम् । एषां पूर्वादिदिगष्टकक्रमेण संस्थानस्य श्रूयमाणत्वात् । यदुक्तम् ‘विद्येश्वरानतो वक्ष्ये पूर्वादीशान्तगान्क्रमात् ।’ (स्व० १०।११५९) इति । के नायक विभु अनन्त ही ध्येय और उत्तरोत्तर पूज्य हैं ।। ३४१-३४३ ।। ऐशतत्त्व = ईश्वर तत्त्व । वहाँ ईश्वर का पुर भी है-यह अर्थात् समझ लेना चाहिए जहाँ भगवान् ईश्वर ही साक्षात् वर्तमान हैं । वही कहा गया है “उसके बाहर ईश्वर तत्त्व है अब मुझसे भुवनों का श्रवण करो ।” (स्व० १०।११४९) यहाँ से लेकर “वहाँ सर्वतोमुख, वर देने वाले देव ईश्वर रहते हैं ।” (स्व तं० १०।११५२) आठ पुरों की वृति से ढंके होने पर भी ‘शिखण्डी से लेकर अनन्त तक’ यह तथा ‘क्रमशः ऊर्ध्वगामी’ विशेषण है । उनका ऐसा होना क्रमश: गुणों की अधिकता के कारण है । सृष्टि आदि की रचना में शिखण्डी से अधिक श्रीकण्ठ है और उससे भी (अधिक) त्रिमूर्ति आदि । जैसा कि कहते हैं “इस कारण अनन्त की अपेक्षा सूक्ष्म रुद्र का कर्तृत्व एक कला कम है। उनकी अपेक्षा शिवोत्तम का ।” इत्यादि सबके (मत में) स्वीकृत है अतः (पुनरुक्ति) दोष के कारण पुनः इसकी व्याख्या नहीं करनी चाहिए । क्योंकि इनकी स्थिति पूर्व दिशा से लेकर क्रमश: आठ दिशाओं में सुनी जाती है । जैसा कि कहा गया है श्रीतन्त्रालाक एवं क्रमावोर्ध्वसंस्थानमित्यपि व्याख्येयम् ॥ ३४३ ॥ एषां च विद्येश्वरत्वाभिधाने किं निमित्तम् ?–इत्याशङ्क्याह मुख्यमन्त्रेश्वराणां यत् साधू कोटित्रयं स्थितम् । तन्नायका इमे तेन विद्येशाश्चक्रवर्तिनः ॥ ३४४ ॥ सार्ध कोटित्रयमित्यन्यस्य सार्धस्य कोटित्रयस्य तत्कालमेव अपवृक्तत्वात् । तदुतम् ‘ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्ते जातमात्रे जगत्यलम् । मन्त्राणां कोटयस्तिस्रः सार्धाः शिवनियोजिताः ।। अनुगृह्याणुसङ्घातं याता: पदमनामयम् । (मा० वि० ११४०) इति ॥ ३४४ ॥ नन्वनन्तस्यैव प्राधान्य किं प्रमाणम् ?–इत्याशङ्क्याह उक्त च गुरुभिरित्थं शिवतन्वाद्येषु शासनेष्वेतत्। आदिशब्दादरुरुवार्तिकादि । N EERIA “अब पूर्व से लेकर ईशान्त तक वर्तमान विद्येश्वरों का वर्णन करूँगा ।” (स्व० नया इस प्रकार क्रमश: ऊपर-ऊपर संस्थान है—ऐसी भी व्याख्या करनी चाहिाः ॥ ३४३ ।। इनके विद्येश्वर कहे जाने में क्या कारण है ? यह शङ्का कर कहते हैं जो साढ़े तीन करोड़ मुख्यमन्त्रेश्वर स्थित हैं, ये उनके नायक हैं इसलिए विद्येश चक्रवर्ती कहे जाते हैं ।। ३४४ ।। ‘साढ़े तीन करोड़’ दूसरे साढ़े तीन करोड़ मन्त्रों के अपवृक्त (= पूर्ण) होन के कारण कहा गया-साढ़े तीन करोड़ । ____ कहा भी है-ब्रह्मा से लेकर स्तम्बपर्यन्त इस उत्पन्न जगत् में माढ़े तीन करोड़ मन्त्र शिव के दाग नियाजित होने के बाद अणुसमूह के ऊपर कृपा कर परम पद को प्राप्त होते है ।” (मा०वि० १।४०) ॥ ३४४ ॥ प्रश्न- अनन्त की ही प्रधानता में क्या प्रमाण है? – यह शङ्का कर कहते ‘‘गुरुओं के द्वारा शिवतन् आदि शास्त्रों में यह कहा गया आदिशब्द से रुरुवार्तिक आदि (समझना चाहिए) ।। अष्टममाह्निकम् १९९ तदेवाह भगबिलशतकलितगुहामूर्धासनगोऽष्टशक्तियुग्देवः ॥ ३४५ ॥ गहनाद्यं निरयान्तं सृजति च रुद्रांश्च विनियुङ्क्ते । उद्धरति मनोन्मन्या पुंसस्तेष्वेव भवति मध्यस्थः ॥ ३४६ ॥ ते तेनोदस्तचितः परतत्त्वालोचनेऽभिनिविशन्ते । स पुनरधः पथवर्तिष्वधिकृत एवाणुषु शिवेन ॥ ३४७ ॥ अवसितपतिविनियोगः सार्धमनेकात्ममन्त्रकोटीभिः । निर्वात्यनन्तनाथस्तद्धामाविशति सूक्ष्मरुद्रस्तु ॥ ३४८ ॥ अनुगृह्याणुमपूर्वं स्थापयति पतिः शिखण्डिनः स्थाने। इत्यष्टौ परिपाट्या यावद्धामानि याति गुरुरेकः ॥ ३४९ ॥ तावदसंख्यातानां जन्तूनां निर्वृतिं कुरुते । तेऽष्टावपि शक्तयष्टकयोगामलजलरुहासनासीनाः ॥ ३५० ॥ आलोकयन्ति देवं हृदयस्थं कारणं परमम् । तं भगवन्तमनन्तं ध्यायन्तः स्वहृदि कारणं शान्तम् ॥ ३५१ ॥ सप्तानुध्यायन्त्यपि मन्त्राणां कोटयः शुद्धाः । गुहामूर्धेति, मायोपरिवर्तिनी शुद्धविद्या । अष्टौ शक्तयो वामाद्याः । वही कहते है सैकड़ों भगबिलों (= ग्रन्थियों) से युक्त गुहा (= माया के) मूर्धा के आसन पर वर्त्तमान, आठ शक्तियों से युक्त देव (= अनन्त) गहन से लेकर नरक तक की सृष्टि करते हैं और (सूक्ष्म आदि) रुद्रों को लगाते है। मनोन्मना के द्वारा पुरुषों का उद्धार करते हैं। उनके (= रुद्रों के) विषय में वे तटस्थ रहते हैं । उनके द्वारा उत्तेजित बुद्धि वाले वे परतत्त्व के आलोचन में लग जाते हैं । और वे (= अनन्तनाथ) अधोपथवर्ती अणुओं के अधिकारी बना दिये जाते हैं । स्वामियों का विनियोग करने के बाद अनन्तनाथ अनेक करोड़ मन्त्रों के साथ निर्वाण को प्राप्त हो जाते हैं और उस स्थान में सूक्ष्म रुद्र प्रवेश कर जाते हैं । वे स्वामी अनुग्रह कर शिखण्डी के स्थान पर अपूर्व अणु को स्थापित करते हैं । इस प्रकार पारम्परिक रूप से एक ही गुरु जब तक आठो स्थानों को प्राप्त होते हैं तब तक असंख्य जन्तुओं को मोक्ष प्रदान करते हैं । वे आठों (पति) आठ शक्ति से युक्त निर्मल कमल पर आसीन होकर हृदयस्थ परम कारण शिव का दर्शन करते रहते हैं । वे आठो करोड़ शुद्ध मन्त्र अपने हृदय में कारणस्वरूप शान्त भगवान् अनन्त का ध्यान करते रहते हैं ।। -३४५-३५२- ॥ श्रीतन्त्रालोकः देवाऽनन्तः, रुद्रान्सूक्ष्मादीन, विनियुङ्क्ते इति, सृष्ट्यादौ । मनोन्मन्येति, नवम्या। आसां हि नवानामपि शक्तीनां भिन्न एव नियोगः, -इत्यभिप्राय: । तदुक्तम् ‘नयते परमं स्थानमुन्मन्या परमेश्वरः ।’ इति । ‘मध्यस्थः’ इति तटस्थः, अत एव सर्वेषामेषां यथोचितमेव सृष्ट्यादि विदध्यात् । उदस्तेति उत्तेजिताः । एवकारो भिन्नक्रमः, तेन अध:पथवर्तिष्वेवेति । यदुक्तम् ‘……………………प्रोक्तोऽनन्तोऽसिते प्रभुः ।’ इति । अनेकात्मेति मन्त्रकोटीनां विशेषणम् । तदुक्तं तत्रैव ‘तस्मिन्नूदितमदारं शाङ्करमारोहति प्रभो धाम । निर्वान्ति मन्त्रकोट्योऽनेकाः परिहार्य कार्यत्वम् ।।’ इति । निर्वातीति, कृतकृत्यत्वाद् अधिकारेच्छाया अप्युपरमात् निर्वाणमेति—इत्यर्थः । न हि भगवाननिच्छोर्बलादधिकारं विधत्ते-इत्याशयः। ‘तद्धाम’ इत्यनन्तस्थानम् । सूक्ष्मरुद्रो द्वितीयः । ‘अणुम्’ विज्ञानाकलम् । शिखण्डिन इति, अष्टमस्य । स हि तदानीं कण्ठं पदमधितिष्ठतीति भावः । तदुक्तं तत्रैव ___ ‘तत्रोपरतेऽनन्ते परिपाट्या नायकास्तदधिकारम् । गुहामूर्धा = माया के ऊपर रहने वाली शुद्धविद्या । आठ शक्तियाँ-वामा आदि । देव = अनन्त । रुद्रों को-सूक्ष्म आदि को । लगाते है-सृष्टि आदि में । मनोन्मना (= उन्मना) के द्वारा = नवी (शक्ति देवी) के द्वारा । इन नवों शक्तियों का भिन्न-भिन्न विनियोग है-यह अभिप्राय है । वही कहा गया है “परमेश्वर उन्मना (शक्ति) के द्वारा परम स्थान को ले जाते हैं ।” मध्यस्थ = तटस्थ । इसलिए इन सबकी यथोचित सृष्टि आदि करते हैं । उदस्त = उत्तेजित । एवकार का क्रम भिन्न है अतः अध:पथवर्ती में ही-ऐसा (समझना चाहिए)। “अशुद्ध अध्वा में स्वामी अनन्त कहे गए है।” अनेकात्म—यह मन्त्र कोटि का विशेषण है । वहीं वहाँ कहा गया है “जब वे प्रभु उदित उदार शाङ्करधाम पर आरुढ़ हो जाते हैं तो अनेक करोड़ मन्त्र कार्यता को छोड़कर निर्वाण को प्राप्त हो जाते हैं ।” निर्वात हो जाते हैं = कृतकृत्य होने तथा अधिकार की इच्छा समाप्त हो जाने के कारण निर्वाण को प्राप्त हो जाते हैं । भगवान् इच्छा-रहित को बलात् अधिकार नहीं देते—यह तात्पर्य है । उस धाम को = अनन्त स्थान को । सूक्ष्म रुद्र द्वितीय । अणु को = विज्ञानाकल को । शिखण्डी के-आठवें रुद्र के । उस समय वे श्रीकण्ठ के पद पर अधिष्ठित होते हैं । वही वहाँ कहा गया है अष्टममाह्निकम् कुर्वन्ति सञ्चरन्तः पदात्पदं शासनात्पत्यः ।। उपरमति पतिरनन्तस्तत्पदमधितिष्ठति प्रभुः सूक्ष्मः । सूक्ष्मपदमपि शिवोत्तम एष विधि: सर्वमन्त्राणाम् ।। वामाद्यान्नव विभवान्भगवान्निजतेजसः समुद्दयोत्य । अनुगृह्याणुमपूर्वं स्थापयति पति: शिखण्डिन: स्थाने ।’ इति । श्रीमतङ्गेऽपि ‘निर्वाति कृतकृत्यत्वादनन्तोऽनन्तवीर्यवान् । ततस्तस्मिन्समारूढ़े पञ्चमन्त्रतनुः शिवः ।। ददात्यनुज्ञां सूक्ष्मस्य विद्येशस्य महात्मनः । स च प्राप्तवरः श्रीमान्भर्तुराज्ञानुवर्तकः ।। तत्तन्त्रः पदमानन्तमधिष्ठाय महायशाः । निर्वर्तयत्यधश्चक्रं यत्तन्मायात्मकं महत् ।। एवं शिवोत्तमस्यापि सूक्ष्मस्योपरमे शिव: । प्रददातीशसङ्घस्य कारणत्वमनिन्दितम् ।। पदात्पदं विचरतो हककस्य महात्मनः । यावत्सा परमा काष्ठा तावच्चक्रस्य कारणम् ॥ अव्युच्छेदाय रुद्राणुं कृत्वा शक्तिबलान्वितम्। उस (स्थिति) में अनन्त के निर्वात होने पर पति (अनन्त) के आदेश के कारण नायक लोग एक पद से दूसरे पद पर सञ्चरण करते हो उस (अनन्त) के अधिकार का प्रयोग करते हैं । अनन्त स्वामी उपरत होते हैं तो उनके पद पर सूक्ष्म (रुद्र) अधिष्ठित होते है । सूक्ष्म के भी पद को शिवोत्तम (संभालते हैं । यह सभी मन्त्रों की विधि है) भगवान् वाम आदि नव विभवों को अपने तेज से प्रकाशित कर अनुग्रह कर शिखण्डी के स्थान में अपूर्व अणु को स्थापित करते मतङ्गतन्त्र में भी “अनन्त वीर्यवान् अनन्त भगवान् कृतकृत्य होने के कारण निर्वाण को प्राप्त हो जाते है । उसके बाद उनके समारुढ़ (= निर्वात) होने के बाद पाँच मन्त्रों की शरीर वाले शिव महात्मा विद्येश्वर सूक्ष्म को आज्ञा देते हैं । वर को प्राप्त करने वाले वे श्रीमान् स्वामी की आज्ञा का अनुवर्तन करते हुए उनके अधीन रहकर महायशस्वी अनन्त के पद पर अधिष्ठित होकर, जो मायात्मक महत् चक्र है, उसे नियन्त्रित करते हैं । इसी प्रकार सूक्ष्म शिवोत्तम रुद्र के भी शान्त हो जाने पर शिव अनिन्दित कारणता को एक पद से दूसरे पद को विचरण करने वाले महात्मा ईश्वरसङ्घ को दे देते हैं । जब तक वह परम काष्ठा (उपलब्ध नहीं होती) तब तक अधश्चक्र की कारणता रहती है । नैरन्तर्य के लिए (शिव) रुद्र अण को शक्ति और श्रीतन्त्रालोकः नियुक्ति पदे तस्मिन्यवीयसि शिखण्डिनम् ।।’ (मतङ्ग० ५।६२) इति । यत्पुनः ‘अनन्तोपरमे तेषां महतां चक्रवर्तिनाम् । विहितं सर्वकर्तृत्वकारणं परमं पदम् ॥’ (रौरवे) इत्याद्युक्तं तन्महाप्रलयविषयत्वेन योज्यम् । तत्र हि युगपदेव सर्वेषामुपरम: इत्युक्तं प्राक् । श्रीमतङ्गेऽपि ‘शुद्धाध्वपतयो देवा महान्तश्चक्रवर्तिनः । समाप्य स्वाधिकारं ते प्रयान्ति पदमुत्तमम् ।।’ इति । ‘एक’ इति एक एक:-इत्यर्थः । ‘परमं देवम्’ परमशिवम् । अपिशब्दो भिन्नक्रमः, तेन सप्तापि मन्त्राणां कोटय इति ॥ ३५१ ॥ नन्वधर एवाध्वन्यनन्तोऽधिकृत:-इत्युक्तम्, तत्कोऽसावधरोऽन्यो वाध्वा ? इत्याशङ्क्याह मायादिरवीच्यन्तो भवस्त्वनन्तादिरुच्यतेऽप्यभवः ॥ ३५२ ॥ शिवशुद्धगुणाधीकारान्तः सोऽप्येष हेयश्च । बल से युक्त करके उस यवीयान् पद पर शिखण्डी की नियुक्ति करते है ।” (मत० ५।६२) और जो (रुरुतन्त्र में) “अनन्त के शान्त हो जाने पर उन महाचक्रवर्त्तियों (= विद्येश्वर रुद्रों) के कर्तृत्व का कारण परमपद को माना गया है ।’ इत्यादि कहा गया है उसे महाप्रलयविषयक समझना चाहिए । वहाँ सबका एक साथ उपरम होता है यह पहले ही कहा गया है । मतङ्ग में भी “वे महान् चक्रवर्ती शुद्ध अध्वा के स्वामी देवतागण अपने अधिकार को समाप्त कर उत्तम पद को प्राप्त हो जाते हैं।” एक = एक-एक । परमदेव = परमशिव । अपि शब्द का क्रम भिन्न है। अतः मन्त्रों की सातों कोटियाँ-ऐसा अन्वय समझना चाहिए ॥ ३५१ ॥ प्रश्न-नीचे के अध्वा में अनन्त अधिकृत हैं-ऐसा कहा गया । तो यह दूसरा नीचे का अध्वा क्या है ? यह शङ्का कर कहते हैं _माया (तत्त्व) से लेकर अवीचि (नरक) तक भव (= संसार) है। अनन्त से लेकर शिव शुद्ध गुण (= अनाश्रित अनन्त) के अधिकार पर्यन्त अभव कहा जाता है । यह भी हेय है ॥ -३५२-३५३- ।। अष्टममाह्निकम् २०३ अनाश्रितानन्ताद्यधिकारपर्यन्त:-इत्यर्थ: ।। ३५२ ।। हेयत्वे चात्र किं निमित्तम् ?–इत्याशङ्क्याह अत्रापि यतो दृष्टानुग्राह्याणां नियोज्यता शैवी ॥ ३५३ ॥ इष्टा च तन्निवृत्ति भवस्त्वधरे न भूयते यस्मात् । ननु यद्येवं तत्कथमत्राभवशब्दस्य प्रवृत्तिः ? –इत्याशङ्क्योक्तम् ‘ह्यभवस्त्वधरे न भूयते यस्मात्’ इति ॥ ३५३ ॥ तन्निवृत्तिमेव व्याचष्टे पत्युरपसर्पति यतः कारणता कार्यता च सिद्धेभ्यः ॥ ३५४ ॥ कञ्चुकवच्छिवसिद्धौ तावति भवसंज्ञयातिमध्यस्थौ । ‘कारणता’ नियोक्तृत्वम्, ‘कार्यता’ नियोज्यत्वम्, ‘सिद्धेभ्यः’ इति मुक्ताणुभ्यः, ‘कञ्चुकवत्’ इति मायीयावरणवत् । तदपि हि तथा निवर्तत एव इति भावः । यतस्तौ शिवसिद्धौ अतिभवरूपत्वात् ‘अतिमध्यस्थौ’ अत्युदासीनौ नियोज्यनियोक्तृतादिक्षोभशून्यौ भवतः-इत्यर्थः ॥ ३५४ ॥ इदानी प्रकृतमेवाह अनाश्रित अनन्त आदि के अधिकार तक-यह अर्थ है ॥ ३५२ ॥ इसके हेय होने में क्या कारण है? यह शङ्का कर कहते हैं चूँकि यहाँ भी दृष्टानुग्राह्य लोग शिव के द्वारा नियुक्त हैं और उनकी निवृत्ति इष्ट है । चूँकि अधर अध्वा में ऐसा नहीं है अतः अभव (कहा गया) || -३५३-३५४- ॥ प्रश्न- यदि ऐसा है तो यहाँ अभव शब्द की प्रवृत्ति क्यों है? यह शङ्का कर कहते हैं- क्योंकि अधर अध्वा में अभव नहीं है ॥ ३५३ ॥ ‘उसकी निवृत्ति’ की व्याख्या करते हैं चूँकि पति (= शिव) की कारणता और सिद्धों की कार्यता समाप्त हो जाती है इसलिए वे दोनों शिव और सिद्ध कञ्चुक के समान अतिभव संज्ञा के द्वारा अति मध्यस्थ हैं ।। -३५४-३५५- ॥ _कारणता = नियोक्तृता, कार्यता = नियोज्यता । सिद्ध = मुक्त जीव । कञ्चुक के समान = मायीय आवरण के समान । वह (कञ्चुक) भी उस प्रकार निवृत्त ही हो जाता है । जिस कारण वे दोनों शिव और सिद्ध अतिभव रूप होने के कारण अतिमध्यस्थ = अत्यन्त उदासीन = नियोज्यता नियोक्तृता आदि क्षोभ से शून्य हो जाते हैं || ३५४ ॥ २०४ श्रीतन्त्रालोकः धर्मज्ञानविरागैश्यचतुष्टयपुरं तु यत् ॥ ३५५ ॥ रूपावरणसंज्ञं तत्तत्त्वेऽस्मिन्नैश्वरे विदुः । वामा ज्येष्ठा च रौद्रीति भुवनत्रयशोभितम्॥ ३५६ ॥ सूक्ष्मावरणमाख्यातमीशतत्त्वे गुरूत्तमैः । ‘तत्त्वेऽस्मिन्नैश्वर’ इति, तथा ‘ईशतत्त्वे’ इत्यनेनेदमुक्तं यदियदेव भुवनजात मीश्वरतत्त्वे शोधनीयमिति । तदुक्तम् ‘दश पञ्च च शोध्यानि भुवनान्यैश्वरे क्रमात् ।’ इति । तत्र विद्येशानामष्टौ भुवनानि, रूपावरणे चत्वारि, सूक्ष्मावरणे त्रीणीति पञ्चदश। अत एवेयतैवोपसंहारगर्भीकारेण श्रीस्वच्छन्दशास्त्रे ‘व्रतं पाशुपतं दिव्यं ये चरन्ति जितेन्द्रियाः । भस्मनिष्ठाजपध्यानात्ते व्रजन्त्यैश्वरं पदम् ।। तत्रेश्वरस्तु भगवान् देवदेवो निरञ्जनः । अधिकारं प्रकुरुते शिवेच्छाविधिचोदितः ।।(स्व०१०।११६९) इत्याद्युक्तम् । श्रीनन्दिशिखायामपि अब प्रस्तुत का वर्णन करते हैं धर्म, ज्ञान, वैराग्य और ऐश्वर्य ये जो रूपआवरण नाम वाले चार पुर हैं वे इस ईश्वरतत्त्व में (शोधनीय) हैं— ऐसा माना गया है । वामा ज्येष्ठा रौद्री इन तीनों भुवनों से शोभित सूक्ष्म आवरण उत्तम गुरुओं के द्वारा ईश्वर तत्त्व में (शोधनीय) कहा गया है । -३५५-३५७- ।। “इस ईश्वर तत्त्व में’ तथा ‘ईश तत्त्व में’ इन दोनों पदों के द्वारा यह कहा गया कि इतना ही भुवनसमूह ईश्वरतत्त्व में शोधनीय है । वही कहा गया है “ईश्वर तत्त्व में क्रमश: दश और पाँच भुवन शोधनीय है।” उनमें विद्येश्वरों के आठ भूवन, रूपावरण में चार, सूक्ष्मावरण में तीन-इस प्रकार पन्द्रह भुवनशोध्य होते हैं । इसलिए इतने से ही उपसंहार को गर्भीकृत कर स्वच्छन्दशास्त्र में कहा गया “जो जितेन्द्रिय दिव्य पाशुपत व्रत क, आचरण करते हैं, भस्म, निष्ठा, जप और ध्यान के द्वारा वे ऐश्वरपद को प्राप्त करते हैं । वहाँ भगवान् देवदेव, निरञ्जन ईश्वर शिव की इच्छाविधि से प्रेरित होकर अधिकार करते हैं ।” (स्वतं० १०।११६९) अष्टममाह्निकम् ‘अत्राधिकारवानेवमीश्वरः शिवचोदितः । तज्जपध्याननिष्ठा ये ते व्रजन्त्यैश्वरं पदम् ॥’ इति ॥ ३५६ ॥ ऐशात्सादाशिवं ज्ञानक्रियायुगलमण्डितम् ॥ ३५७ ॥ शुद्धावरणमित्याहुरुक्ता शुद्धावृतेः परम् । विद्यावृतिस्ततो भावाभावशक्तिद्वयोज्ज्वला ॥ ३५८ ॥ शक्तयावृतिः प्रमाणाख्या ततः शास्त्रे निरूपिता। शक्त्त्यावृतेस्तु तेजस्विध्रुवेशाभ्यामलङ्कृतम् ॥ ३५९ ॥ तेजस्व्यावरणं वेदपुरा मानावृतिस्ततः । मानावृतेः सुशुद्धावृत्पुरत्रितयशोभिता ॥ ३६० ॥ सुशुद्धावरणादूर्ध्वं शैवमेकपुरं भवेत् । शिवावृतेरूव॑माहुर्मोक्षावरणसंज्ञितम् ॥३६१ ॥ अस्यां मोक्षावृतौ रुद्रा एकादश निरूपिताः। मोक्षावरणतस्त्वेकपुरमावरणं ध्रुवम् ॥ ३६२ ॥ ऊर्श्वे ध्रुवावृतेरिच्छावरणं तत्र ते शिवाः । ईश्वरेच्छागृहान्तस्थास्तत्पुरं चैकमुच्यते ॥ ३६३ ॥ इच्छावृतेः प्रबुद्धाख्यं दिग्रुद्राष्टकचर्चितम् । प्रबुद्धावरणादूर्ध्वं समयावरणं महत् ॥ ३६४ ॥ भुवनैः पञ्चभिर्गीकतानन्तसमावति । इत्यादि कहा गया है । नन्दिशिखा में भी “यहाँ शिव के द्वारा प्रेरित (= नियोजित) ईश्वर अधिकारी हैं । जो लोग उसके जप ध्यान एवं निष्ठा वाले हैं वे ऐश्वर पद को प्राप्त करते हैं” || ३५६ ॥ __ईश्वरपुर के ऊपर ज्ञान एवं क्रिया दोनों से मण्डित सदाशिव का पुर है। इसे (लोग) शुद्धावरण कहते हैं । शुद्धावरण के ऊपर विद्यावरण है । उसके ऊपर भाव अभाव दोनों (प्रकार की) शक्तियों से उज्ज्वल शक्त्यावरण है । उसके बाद शास्त्रों में निरूपित प्रमाण नामक (वृति) है। शक्त्यावृति के अन्दर तेजस्वी और ध्रवेश, दोनों से अलंकृत तेजस्वी आवरण है । इसके बाद चार भुवनों का आवरण है। प्रमाणावृति के ऊपर तीन पुरों से अलंकृत सुशुद्धावृति है। सुशुद्धा वृति के ऊपर शिव का एक पुर (= शिवावृति) है । शिवावरण के ऊपर मोक्षावरण है । इस मोक्षावरण के ग्यारह रुद्र कहे गए हैं । मोक्षावरण के ऊपर ध्रुवावरण है । ध्रुवावरण के ऊपर इच्छावरण है। वहाँ वे शिव ईश्वरेच्छारूपी गृह के अन्दर रहते हैं। वह एक पुर कहा जाता है । इच्छावरण के ऊपर आठ दिQद्रों से अलंकृत प्रबुद्ध नामक पुर है । प्रबुद्धावरण के ऊपर महान् समयावरण है। २०६ श्रीतन्त्रालोकः सामयात्सौशिवं तत्र सादाख्यं भुवनं महत् ॥ ३६५ ॥ तस्मिन्सदाशिवो देवस्तस्य सव्यापसव्ययोः । ज्ञाननिये परेच्छा तु शक्तिरुत्सङ्गगामिनी ॥ ३६६ ॥ सृष्ट्यादिपञ्चकृत्यानि कुरुते स तयेच्छया। पञ्च ब्रह्माण्यङ्गषट्कं सकलाद्यष्टकं शिवाः ॥ ३६७ ॥ दशाष्टादश रुद्राश्च तैरेव सुशिवो वृतः। सादाशिवमिति तत्त्वम्, अर्थात्तत्र शुद्धावरणमाहुः-इति संबन्धः । ‘शुद्धावृतेः परम्’ इति शुद्धावरणादूर्ध्वम्-इत्यर्थः । विद्यावृतिः’ विद्यावरणमित्यर्थः तदुक्तम् ‘भावसंज्ञा त्वभावाख्या तस्मिञ्छक्तिद्वयं स्थितम्।’ इति । ‘ततः’ इति विद्यावरणात्, तेन तदूर्ध्वं शक्त्यावृतिस्तदूर्ध्वमपि प्रमाणावृति रिति । शास्त्र इति, विशेषानुपादानात् सर्वत्र । तत्र शक्तयावृतौ रुद्रद्वयम् । तदुक्तम् ‘तेजस्वीशो ध्रुवेशश्च प्रमाणानां परं पदम् ।’ ____(स्व० १०।११७२) इति । शक्त्यावरणमूर्ध्वं चेति प्रमाणावरणं चोर्ध्वमित्युझ्योतकारदृष्टः पाठः जिसके भीतर पाँच भुवनों के साथ अनन्त का समावेश (= पुर या आवरण) हे । समयावरण के ऊपर सुशिव अर्थात् सदाशिव का महान भुवन है । उसमें सदाशिव देव रहते हैं । उनके बायीं और दायीं और ज्ञान एवं क्रिया रहती हैं । परा इच्छा शक्ति तो उनकी गोद में रहती है । उस इच्छा शक्ति के द्वारा वे सृष्टि आदि पाँच कृत्यों को करते रहते हैं । पाँच ब्रह्मा, छ अङ्ग, सकल आदि आठ, शिव दश और अठारह रुद्र उनसे ये सुशिव घिरे रहते हैं ।। -३५७-३६८- ॥ सादाशिव-यह तत्त्व है । अर्थात् वहाँ शुद्ध आवरण कहते हैं—ऐसा सम्बन्ध है । शुद्धावृति के परे = शुद्धावरण के ऊपर । विद्यावृति = विद्यावरण । वही कहा गया है “उसमें भाव और अभाव नामक दो शक्तियाँ स्थित हैं।” उसके पश्चात् = विद्यावरण के पश्चात् । इसलिए उसके ऊपर शक्ति का आवरण और उसके ऊपर प्रमाण का आवरण है। शास्त्र में विशेष का उल्लेख न होने से सब शास्त्रों में । शक्ति-आवरण में दो रुद्र है ।-वही कहा गया है “तेजस्वीश और ध्रुवेश प्रमाणों के परम पद हैं।” (स्व०१०।११७२) शक्त्यावरण ऊर्ध्व और प्रमाणावरण ऊर्ध्व-ऐसा उद्योतकार का पाठ असङ्गत२०७ अष्टममाह्निकम् पुनरसाधु:,महाजनैरपरिगृहीतत्वात् । श्रीनन्दिशिखायामपि ‘तेजेश्वरो ध्रुवेशश्च शक्तयावरणसंस्थितौ ।’ इत्यादिरास्माक एव पाठः । प्रमाणावरणशब्दस्य चात्र प्रवृत्तौ किं निमित्तम् ? -इत्याशङ्क्योक्तम्-‘तेजस्व्यावरणम्’ इति । तेजेशध्रुवेशी हि मायातत्त्वा वस्थितस्य प्रमाणाष्टकस्य परं पदम्, तयोरपीदं द्वितीयं परमावरणमिति । ‘वेदपुरा’ इति चतुर्भुवना । तदुक्तम्– ‘ब्रह्मा रुद्र: प्रतोदश्च अनन्तश्च चतुर्थकः ।’ (स्व० १०।११७३) इति । श्रीनन्दिशिखायामपि ‘ब्रह्मा रुद्र: प्रमाणाख्यः प्रतोदोऽनन्तसंज्ञकः । प्रमाणावरणे ह्येते चत्वारः परिकीर्तिताः ॥’ इति । ‘सुशुद्धावृत्’ इति सुशुद्धावरणम्-इत्यर्थः । तदुक्तम् ‘सुशुद्धावरणं चोर्ध्वं तत्र रुद्रत्रयं विदुः । एकाक्ष: पिङ्गलो हंस: कथितं तु समासतः।।’ (स्व०१०।११७४) इति । ‘शैवं पुरम्’ शिवावरणम्-इत्यर्थः । तदुक्तम् है क्योंकि श्रेष्ठ पुरुषों ने उसका ग्रहण नहीं किया है । नन्दिशिखा में भी “तेजेश्वर और ध्रुवेश शाक्तावरण में स्थित है ।” यह हमारा ही पाठ है । प्रमाणावरण शब्द का क्या तात्पर्य है ? यह शङ्का कर कहते हैं-तेजेश और ध्रुवेश ये मायातत्त्व में अवस्थित आठ प्रमाणों के परम पद हैं । उन दोनों का भी यह दूसरा परमावरण है । वेद पुर = चार भुवन । वही कहा गया है “ब्रह्मा, रुद्र, प्रतोद और चौथे अनन्त (ये चार भुवन हैं)।” (स्व० १०।११७३) नन्दिशिखा में भी “ब्रह्मा, रुद्र, प्रतोद एवं अनन्त ये चार प्रमाण के आवरण में कहे गए हैं।” सुशुद्धावृत् = सुशुद्धावरण । वही कहा गया है “ऊपर सुशुद्धावरण है वहाँ तीन रुद्र माने गए है एकाक्ष, पिङ्गल, और हंस, यह संक्षेप में कहा गया । (स्व० १०।११७४) २०८ श्रीतन्त्रालोकः ‘शिवावरणमूर्ध्वं तु तत्रैको ध्रुवसंज्ञक: ।’ (स्व० १०१११७४) इति । एकादशेति, ब्रह्मादयः । तदुक्तम् ‘ब्रह्मदन्किदिण्डिमुण्डा: सौरभश्च तथैव च । जन्ममृत्युहरश्चैव प्रणीत: सुखदु:खदः ॥ विजृम्भित: समाख्याता:………………… ।’ (स्व० १०।११७७) इति । ‘आवरणं ध्रुवम्’ ध्रुवावरणम्-इत्यर्थः । ‘ते’ इति इत: प्रभृति पृथिवीपर्यन्तमुक्ताः सर्व एव-इत्यर्थः । ईश्वरेच्छागृहान्त:स्था इति, तदेकरूपा इति यावत् । यदभिप्रायेणैव ‘स्वामिनश्चात्मसंस्थस्य भावजातस्य भासनम् । अस्त्येव न विना तस्मादिच्छामर्श: प्रवर्तते । (ई०प्र०१।५।१०) इत्याद्यन्यत्रोक्तम् । एकमिति, इच्छाशक्तयैवाधिष्ठेयत्वात् । प्रबुद्धाख्यमित्या वरणम् । तदुक्तम् ‘प्रबद्धावरणं चोचे कथयामि समासतः । प्रीतः प्रमुदितश्चैव प्रमोदश्च प्रलम्बनः । शैवपुर = शिवावरण । वहीं कहा गया है “शिवावरण के ऊपर एक ध्रुव संज्ञक (भुवन) है।” (स्व०१०।११७४) ग्यारह = ब्रह्मा आदि । वही कहा गया है “ब्रह्म, दर्क (दन्कि) दिण्डि, मुण्ड, सौरभ, जन्महर, मृत्युहर, प्रणीत, सुखद, दुःखद और विजृम्भित ये ग्यारह ब्रह्मादि कहे गए हैं…” (स्व०१०।११७७) ____ आवरण = ध्रुवावरण । वे = यहाँ से लेकर पृथिवी तक मुक्त सब के सब । ईश्वरेच्छागृह के भीतर अर्थात् उससे एक रूप । जिस अभिप्राय से ही– ___“स्वामी को अपने स्वयं में स्थित भावसमूह का आभास उसके बिना नहीं होता इसलिए इच्छा का आमर्श होता है ।” (ई०प्र० १।५।१०) इत्यादि अन्यत्र कहा गया है । एक-इच्छा शक्ति के ही द्वारा अधिष्ठेय होने से । प्रबुद्ध नामक-आवरण । वही कहा गया है “ऊपर वर्तमान प्रबुद्धावरण को संक्षेप में कहता हूँ । प्रीत, प्रमुदित प्रमोद, अष्टममाह्निकम् विष्णुर्मदन एवाथ गहनः प्रथितस्तथा । रुद्राष्टकं समाख्यातं विज्ञयं प्राग्दिश: क्रमात् ।। (स्व० १०।११८०) इति । पञ्चभिर्भुवनैर्युक्तमिति शेषः । तदुक्तम् ‘प्रभवः समयः क्षुद्रो विमलश्च शिवस्तथा । ततो घन: समाख्यातो निरञ्जन इतः परम् ।। रुद्रोङ्कारास्तु पञ्चैते’. (स्व० १०।११८२) इति । गर्भीकृतानन्तसमावृतीति, सर्वशेषत्वेनोक्तं यन्नाम हि किंचिदुपरिवर्ति तत्सर्व मधस्तनं गर्भीकृत्य वर्तत इति । ‘सौशिवम्’ इति सुशिवावरणम् । ‘सादाख्यं भुवनम्’ इति सदाशिवभट्टारकस्य साक्षादधिष्ठानस्थानम्-इत्यर्थः । अत एव महदित्युक्तम् । उद्द्योतकृता पुनः ___‘ईश्वरस्य तथोचे तु अधश्चैव सदाशिवात् ।’ (स्व० १०।११८६) इत्यर्धं परिकल्प्य इतः प्रभृति सादाशिवं तत्त्वमिति यदुक्तं तदयुक्तम्, अस्यार्धस्य महाजनैरगृहीतत्वात् । अत एव च एवमपि ‘ऊर्ध्वम्’ इति पुनरुक्तम्, ‘अधश्चैव सदाशिवात्’ इत्यप्यसङ्गतम्, तत्रैव तस्योक्तत्वात्; अपरिकल्पितत्वेऽपि एतदित्थं यथाकथञ्चिदव्याख्येयं यदीश्वरस्येति रुद्रोङ्कारस्य, सदाशिवादिति प्रलम्बन, विष्णु, मदन, गहन और प्रथित ये आठ रुद्र कहे गये हैं । इनको पूरब दिशा से क्रमश: जानना चाहिए ।” (स्व० १०।११८०) पाँच भुवनों से युक्त जोड़ना चाहिये यह है । वही कहा गया है क्षुद्र पर्याय वाले प्रभव समय, विमल नामक शिव, इसके बाद घन, तत्पश्चात् निरञ्जन तथा रुद्रोङ्कार ए पाँच… (स्व० सं० १०।११८२) गर्भीकृत अनन्त समावरण-सर्वशेष के रूप में कथित जो कुछ ऊपर वर्तमान है उस सबको नीचे गर्भ में करके वर्तमान हैं । सौशिव = सुशिवावरण । सादाख्य भुवन = सदाशिव भट्टारक का साक्षात् अधिष्ठान । इसीलिए ‘महत्’ ऐसा कहा गया उद्योतकार ने तो… “ईश्वर के ऊपर तथा सदाशिव के नीचे’ (स्व० १०।११८६) इतना आधा मानकर यहाँ से लेकर सदाशिव तत्त्व है-ऐसा जो कहा वह अयुक्त है क्योंकि यह अर्थ महाजनों (= श्रेष्ठ आचार्यों) के द्वारा स्वीकृत नहीं है । और इसीलिए ऐसा होने पर भी ‘ऊर्ध्व’ ऐसा पुनः कहा गया । ‘सदाशिव से नीचे’ यह कथन भी असङ्गत है क्योंकि यह तो वहीं कह दिया गया है । परिकल्पित न होने पर भी इसकी इस प्रकार जैसे-तैसे भी व्याख्या नहीं की जानी चाहिए कि १४ त.तृ. २१० श्रीतन्त्रालोकः अधिष्ठातुः, अधिष्ठेयं हि अधिष्ठातुरध एव भवेदिति । यत्तु श्रीनन्दिशिखायाम् ‘कथितं त्वैश्वरं तत्त्वमत ऊर्ध्वं सदाशिवः ।’ इत्युक्तं तदप्येवमवगन्तव्यं यदैश्वरमिति सादाशिवम्, सदाशिव इति तत्र साक्षात्स्थित इति । अन्यथा हि उभयत्रापि ईश्वरतत्त्वोपसंहारग्रन्थस्य व्याघात: स्यात्; तन्महाजनक्षुण्ण एव मार्गोऽनुगन्तव्यः-इति उद्द्योतकारव्याख्यया न भ्रमितव्यमित्यलं बहुना । ‘तस्मिन्’ इति सदाख्ये भुवने । ‘सुशिवः’ सदाशिवः । वृतश्चतुर्धावरणक्रमेण ॥ ३६७ ॥ एतदेव क्रमेण पठति सद्यो वामाघोरौ पुरुषेशौ ब्रह्मपञ्चकं हृदयम् ॥ ३६८ ॥ मूर्धशिखावर्मदृगस्त्रमङ्गानि षट् प्राहुः । सकलाकलशून्यैः सह कलाढ्यखमलङ्कृते क्षपणमन्त्यम्॥ ३६९ ॥ कण्ठ्यौष्ठ्यमष्टमं किल सकलाष्टकमेतदाम्नातम् । ओङ्कारशिवौ दीप्तो हेत्वीशदशेशकौ सुशिवकालौ ॥ ३७० ॥ सूक्ष्मसुतेजःशर्वाः शिवाः दशैतेऽत्र पूर्वादः । विजयो नि:श्वासश्च स्वायम्भुवो वह्निवीररौरवकाः॥ ३७१ ॥ मुकुटविसरेन्दुविन्दुप्रोद्गीता ललितसिद्धरुद्रौ च । ईश्वर का = रुद्रोंकार का । सदाशिव से = अधिष्ठाता से, क्योंकि अधिष्ठेय अधिष्ठाता का ही होता है । और जो नन्दिशिखा में कहा गया ‘ईश्वर सम्बन्धी तत्त्व का कथन हो गया इसके ऊपर सदाशिव है।” उसे भी ऐसा समझना चाहिए कि ऐश्वर का अर्थ है-सदाशिव से सम्बद्ध । सदाशिव वहाँ साक्षात् स्थित हैं । अन्यथा दोनों ही जगह ईश्वर तत्त्व के उपसंहारग्रन्थ का व्याघात हो जाएगा । इसलिए बड़े लोगों के द्वारा चले हुये मार्ग का ही अनुसरण करना चाहिए । इस प्रकार उद्योतकार की व्याख्या (को सही मानने का) भ्रम नहीं करना चाहिए । इतना (कथन) सादाख्य भुवन के विषय में पर्याप्त है । सुशिव = सदाशिव । आवृत है—चार आवरण के क्रम से ॥ ३६७ ॥ उसी को क्रम से पढ़ते हैं सद्योजात, वामदेव, अघोर, तत्पुरुष तथा ईश्वर (= ईशान) ये पाँच ब्रह्मा हैं । हृदय, मूर्धा, शिखा, वर्म, दृक् और अस्त्र ये छ अङ्ग कहे गए हैं । सकल, अकल और शून्य के साथ कलाढ्य, खमलङ्कत (= ख), क्षपण, क्षयान्त:स्थ तथा आठवाँ कण्ठोष्ठ्य यह सकलाष्टक कहा गया है । ओङ्कार, शिव, दीप्त, कारणेश, दशेश, शिवेश, कालश, सूक्ष्म, सतेजः, शर्व ये दश शिव है । विजय, नि:श्वास, स्वायम्भव, वह्नि, वीर, अष्टममाह्निकम् २११ सन्तानशिवौ परकिरणापारमेशा इति स्मृता रुद्राः॥ ३७२ ॥ सर्वेषामेतेषां ज्ञानानि विदुः स्वतुल्यनामानि । ‘अकल:’ इति निष्कल: । अन्त्यमन्ते भवं क्षयान्तम्, हेवीश: कारणेश्वर: सूक्ष्मः सूक्ष्मरूपः, सर्वेषामिति शिवानां रुद्राणां च, अत एव दशाष्टादशभेदभिन्नं शैवमुच्यते ।। ३७२ ॥ मन्त्रमुनिकोटिपरिवृतमथ विभुवामादिरुद्रतच्छक्तियुतम् ॥ ३७३ ॥ तारादिशक्तिजुष्टं सुशिवासनमतिसितकजमसंख्यदलम् । यः शक्तिरुद्रवर्गः परिवारे विष्टरे च सुशिवस्य ॥ ३७४ ॥ प्रत्येकमस्य निजनिजपरिवारे परार्धकोटयोऽ संख्याः । मायामलनिर्मुक्ताः केवलमधिकारमात्रसंरूढाः ॥ ३७५ ॥ सुशिवावरणे रुद्राः सर्वज्ञाः सर्वशक्तिसम्पूर्णाः । अधिकारबन्धविलये शान्ता: शिवरूपिणो पुनर्भविनः ॥ ३७६ ॥ मुनीति सप्त । रुद्रा इति, आवरणादिगताः ॥ ३७६ ॥ ऊर्ध्व बिन्द्वावृतिर्दीप्ता तत्र तत्र पद्मं शशिप्रभम् । शान्त्यतीतः शिवस्तत्र तच्छक्तयुत्सङ्गभूषितः ॥ ३७७ ॥ रौरव, मुकुट, विसर, इन्दु, विन्दु, प्रोद्गीत, ललित, सिद्धरुद्र, सन्तान, शिव. पर, किरण, पारमेश, ये रुद्र कहे गए हैं। इन सबके ज्ञान इनके तुल्य नाम वाले माने गए हैं ।। -३६८-३७३- ।। ____ अकल = निष्कल । अन्त्य = अन्त में होनेवाला = क्षयान्त । हेवीश = कारणेश्वर । सूक्ष्म = सूक्ष्मरूप । सबका = शिवों और रुद्रों का । इसीलिए शैव दश एवं अठारह भेद से भिन्न कहा जाता है ॥ ३७२ ॥ सदाशिव का आसन सात करोड़ मन्त्रों से वेष्टित, विभु वाम आदि रुद्रों और उनकी शक्तियों से युक्त, तारा आदि शक्तियों से सेवित, अत्यन्त श्वेत एवं असंख्य दलों वाला है । सदाशिव के परिवार और आसन पर जो शक्तिरुद्रसमूह है उसके अपने-अपने प्रत्येक परिवार में, सदाशिव के आवरण में जो रुद्र हैं वे परार्ध कोटि वाले, असंख्य, मायीय मल से रहित, केवल अधिकार मात्र के भागी, सर्वज्ञ, सर्वशक्ति समन्वित, अधिकार बन्धन के नष्ट होने पर शान्त, शिवस्वरूप और पुनर्जन्म वाले हैं ।। -३७३-३७६ ॥ मुनि = सात । रुद्र = आवरण आदि में वर्तमान ॥ ३७६ ॥ उसके ऊपर बिन्दु का दीप्त आवरण है । वहाँ चन्द्रमा के समान प्रकाशयुक्त कमल है उस पर अपनी शक्ति के उत्सङ्ग के साथ अलंकृत श्रीतन्त्रालोकः निवृत्त्यादिकलावर्गपरिवारसमावृतः । असंख्यरुद्रतच्छक्तिपुरकोटिभिरावृतः ॥ ३७८ ॥ ऊचे इति, सुशिवावरणात् । ‘तच्छक्ति’ इति शान्त्यतीता । तदुक्तम् ‘निवृत्तिश्च प्रतिष्ठा च विद्या शान्तिस्तथैव च । परिवारः स्मृतस्तस्य शान्त्यतीतस्य सुव्रते ॥ तस्य वामे तु दिग्भागे शान्त्यतीता व्यवस्थिता ।। मी (स्व० १०।१६२१) इति ।। ३७८ ॥ एतच्च भङ्ग्यन्तरेणोक्तम्- इत्याह श्रीमन्मतङ्गशास्त्रे च लयाख्यं तत्त्वमुत्तमम् । पारिभाषिकमित्येतन्नाम्ना बिन्दुरिहोच्यते ॥ ३७९ ॥ . यन्नाम सर्वकर्तृत्वादिगुणयोगादुत्तमं लयाख्यं तत्त्वं तदेवैतद्वहिरभिव्यक्तं सदिह स्वशास्त्रपरिभाषया बिन्दुरुच्यते, श्रीमतङ्गपारमेश्वरेऽस्य तथा समयः कृतः इत्यर्थः । यदुक्तं तत्र ‘तस्मादेव परं तत्त्वमचलं सर्वतोमुखम् । शान्त्यतीत शिव विराजमान है । वे निवृत्ति आदि कलासमूह के परिवार से आवृत तथा असंख्य रुद्र और उनकी शक्तियों वाले करोड़ों पुर से अलङ्कृत हैं ॥ ३७७-३७८ ।। ___ऊपर-सदाशिव आवरण के ऊपर । अपनी शक्ति-शान्त्यतीता । वही कहा “हे सुव्रते ! निवृत्ति, प्रतिष्ठा, विद्या और शान्ता ये उस शान्त्यतीता का परिवार कहा गया है । उसकी (= रुद्र की) बायीं दिशा में शान्त्यतीता कला स्थित है ।” (स्वतं० १०।१६२१) ॥ ३७७-३७८ ॥ इसे दूसरे प्रकार से कहा गया है-यह कहते हैं मतङ्ग शास्त्र में जो लयनामक उत्तम तत्त्व (कहा गया है) यहाँ पारिभाषिक रूप में उसका नाम बिन्दु कहा जाता है ।। ३७९ ।। जो सर्वकर्तृत्व आदि गुणों से युक्त उत्तम लय नामक तत्त्व है वही बाहर अभिव्यक्त होता हआ अपनी शास्त्रीय परिभाषा में बिन्दु कहा जाता है । मतङ्ग शास्त्र में इसका वैसा सङ्केत किया गया है । जैसा कि वहाँ कहा गया है “उसके बाद सर्वतोमुखी परम अचल तत्त्व है जहाँ पहुँचने वाले का इस संसार अष्टममाह्निकम् यस्मिन्प्राप्तस्य न पुनर्जन्मेहास्ति कदाचन ॥ इति । ‘इत्थं गुणवतस्तस्मात्तत्त्वात्तत्त्वमनिन्दितम् । स्फुरद्रश्मिसहस्राढ्यमधस्ताद्व्यापकं महत् । पारिभाषिकमित्येतन्नाम्ना बिन्दुरिहोच्यते । चतुर्धावस्थितं चेदं प्रेरकं सर्वतोऽव्ययम् ।।’ इति ॥ ३७९ ।। ननु इह पत्युः ‘लयभोगाधिकारातत्रितत्त्वोक्तिनिदर्शनात् ।। पदार्थः पतिनामासौ प्रथमः परिकीर्तितः ॥’ (मतङ्ग०) ……………(?) तदत्रास्य यद्येवं तद्रोगादिरूपत्वं पुन: कुत्र ? इत्याशङ्क्याह चतुर्मूर्तिमयं शुभ्रं यत्तत्सकलनिष्कलम् । तस्मिन्भोगः समुद्दिष्ट इत्यत्रेदं च वर्णितम् ॥ ३८० ॥ यदेतन्निवृत्त्याद्यात्मना चतूरूपं तत्त्वेऽपि तदुत्तीर्णत्वात् निर्मलम्, अत एव सकलत्वेऽपि परस्मिन्नेव तत्त्वे लीनत्वान्निष्कलं पदम्, तस्मिन्भोगः समुद्दिष्टः सादाशिवं तत्त्वमस्य भोगस्थानमित्यत्र श्रीमतङ्गशास्त्र एवेदमुक्तम् । तदुक्तं तत्र ‘सदाशिवस्य देवस्य लयस्तत्त्वेऽतिनिष्कले। में कभी पुनर्जन्म नहीं होता ।” | “इस प्रकार उस गुणवान् तत्त्व से (जो) तत्त्व (निकलता) है वह अनिन्दित, हजारों स्फुरत् रश्मियों से शोभित, ऊपर से नीचे तक महाव्यापक पारिभासिक तत्त्व है उसे बिन्दु नाम से कहा जाता है । यह चार प्रकार से स्थित, प्रेरक और सब प्रकार से अव्यय है” || ३७९ ॥ प्रश्न- यहाँ पति का “लय भोग और अधिकार नामक तीन तत्त्वों की उक्ति के निदर्शन के कारण यह पति नामक पहला पदार्थ कहा गया ।” (मतं० तं०) यदि यहाँ इसके विषय में ऐसा है तो भोगआदिरूपता कहाँ है?– यह शङ्का कर कहते हैं चार मूर्तियों वाला शुभ्र जो वह सकल निष्कल (तत्त्व) है उसमें भोग कहा गया है और यहाँ यह वर्णित है ॥ ३८० ॥ जो यहाँ निवृत्ति आदि के रूप में चार रूप, तत्त्व होने पर भी उस (तत्त्व) से परे होने के कारण निर्मल है और इसी लिए सकल होने पर भी पर तत्त्व में लीन होने के कारण निष्कल पद है उसमें भोग कहा गया है । सदाशिवतत्त्व इसका भोगस्थान है-ऐसा मतङ्गशास्त्र में कहा गया है। वही वहाँ कहा गया है । RAERBAHNOLELIATERTALUKATHMANDUTORITERATUTATIONS श्रीतन्त्रालोकः चतर्मर्तिमयं शभ्रं यत्तत्सकलनिष्कलम ॥ तस्मिन्भोगः समुद्दिष्टः पत्युर्विश्वस्य सर्वदा।’ (मतङ्ग० १।३।२३) इति । अधिकारस्थानं पुरस्य विद्यादि-इत्यर्थसिद्धम् । यदुक्तं तत्रैव ‘लय च शिवतत्त्वाख्यं व्यक्तौ बिन्द्वाह्वयं पदम्। भोग: सदाशिवस्थाने ईश्वराख्ये च शासनम् ।। विद्यातत्त्वेऽधिकारोऽस्य योनेज्ञेयः सदैव हि। (मतङ्ग० १।७।३३) इति ।। ३८० ।। नन् सकलत्वं नाम कलादिक्षित्यन्तदेहयोग्यत्वमुच्यते, तच्चेत् सदाशिव भट्टारकस्य संभवति तत्कथमस्यापि अस्मदादिवत् क्षित्यादिरूपत्वं न लक्ष्यते ? इत्याशङ्क्याह निवृत्त्यादेः सुसूक्ष्मत्वाद्धराद्यारब्धदेहता । मातुः स्फूर्जन्महाज्ञानलीनत्वान्न विभाव्यते ॥ ३८१ ॥ ‘मातुः’ सदाशिवभट्टारकस्य । निवृत्त्यादेः सूक्ष्मत्वे हेतु:-स्फूर्जन्महाज्ञान लीनत्वादिति ॥ ३८१ ।। TITA “सदाशिव देव का लय अत्यन्त निष्कल तत्त्व में होता है । चार मूर्तियों वाला जो सकल निष्कल (तत्त्व) है उसमें विश्व के पति का सर्वदा भोग कहा गया है ।” (म०तं० १।३।२३) इसका अधिकारस्थान विद्या आदि है-यह अर्थात् सिद्ध है । जैसा कि वहीं कहा गया है ‘इस योनि को लय की स्थिति में शिवतत्त्व, अभिव्यक्ति की स्थिति में बिन्द नामक पद (जानना चाहिए) । इसका सदाशिव स्थान में भोग, ईश्वर में शासन तथा विद्या तत्त्व में अधिकार समझना चाहिए ।” (मतं० तं० १७।३३) ॥ ३८० ॥ ___ प्रश्न-सकल का अर्थ है-कला से लेकर पृथिवी पर्यन्त शरीरधारण की योग्यता । यदि यह शिवभट्टारक के विषय में सम्भव है तो हम लोगों की भांति इसकी भी पृथिवी आदि की रूपता क्यों नहीं दिखाई पड़ती ?-यह शङ्का कर कहते है निवृत्ति आदि के सूक्ष्म होने के कारण स्फुरित होने वाले महाज्ञान में लीन होने से प्रमाता का पृथिवी आदि तत्त्व से आरब्ध शरीर लक्षित नहीं होता ।। ३८१ ।। प्रमाता का = शिवभट्टारक का । निवृनि आदि की सूक्ष्मता में हेतु है स्फूर्जित होने वाले महाज्ञान में लीन होना ॥ ३८१ ॥ अष्टममाह्निकम् (नन्वत्र) स्थिता च धरादिरूपता न विभाव्यते-इत्येतद्विप्रतिषिद्धम् ? इत्याशङ्क्याह उद्रिक्ततैजसत्वेन हेम्नो भूपरमाणवः । यथा पृथङ्न भान्त्येवमूर्ध्वाधोरुद्रदेहगाः ॥ ३८२ ॥ यथा सुवर्णस्य तेज:परमाणूनामुद्रिक्तत्वात्काठिन्याद्यन्यथानुपपत्त्या स्थिता अपि भूपरमाणवः पृथङ्न भासन्ते तथात्मज्ञानतिरस्कृतत्वात् शुद्धाशुद्धात्मनि सर्गे तत्तद्भुवनेश्वरदेहगा अपि-इति वाक्यार्थः ।। ३८२ ॥ इदानीं प्रकृतमेवाह बिन्दूर्वेऽर्धेन्दुरेतस्य कला ज्योत्स्ना च तद्वती । कान्तिः प्रभा च विमला पञ्चैता रोधिकास्ततः ॥ ३८३ ॥ रुन्धनी रोधनी रोधी ज्ञानबोधा तमोपहा । एताः पञ्च कलाः प्राहुर्निरोधिन्यां गुरूत्तमाः ॥ ३८४ ॥ ‘तद्वती’ ज्योत्स्नावती, ‘तत’ इति अर्धेन्दोरप्यूर्ध्वम् ॥ ३८४ ।। अर्धचन्द्रादेश्च मन्त्रप्रमेयरूपत्वात् तदुचितमेव यथोत्तरं सूक्ष्मसूक्ष्मतरादिरूपत्वं दर्शयति प्रश्न-(यहाँ = शिवभट्टारक में) स्थित भी पृथिवी आदि रूपता प्रतीत नहीं होती यह तो परस्पर विरुद्ध है? यह शङ्का कर कहते हैं जैसे तैजस परमाणु के उद्रिक्त होने के कारण सुवर्णस्थित पृथिवीपरमाणु अलग नहीं दिखाई देते उसी प्रकार ऊर्ध्व और अध: वर्ती रुद्र के शरीरस्थ (पर्थिव तत्त्व भी नहीं दिखाई पड़ते) ।। ३८२ ।। ___ जिस प्रकार स्वर्ण के तेज: परमाणु उद्रिक्त होने के कारण काठिन्य आदि की अन्यथा सिद्धि न होने से पृथिवीपरमाणु अलग भासित नहीं होते उसी प्रकार आत्मज्ञान से तिरोहित होने के कारण शुद्धाशुद्धसृष्टि में उन-उन भुवनेश्वरों के शरीर में वर्तमान (पार्थिव तत्त्व) भी नहीं दिखाई पड़ते-यह वाक्यार्थ है ॥ ३८२ ॥ अब प्रस्तुत को कहते हैं बिन्दु के ऊपर अर्धचन्द्र है । इसकी ज्योत्स्ना, ज्योत्स्नावती, कान्ति प्रभा और विमला ये पाँच कलायें हैं । उसके ऊपर रोधिका है । गुरुओं ने रोधिनी में-रुन्धनी, रोधनी, रोधी, ज्ञानबोधा और तमोपहा- इन पाँच कलाओं को कहा है ।। ३८३-३८४ ।। तद्वती = ज्योत्स्नावती । उसके बाद = अर्धचन्द्र के ऊपर ॥ ३८३-३८४ ॥ मन्त्रप्रमेय रूप होने के कारण अर्धचन्द्र आदि का यथोचित क्रमश: उत्तरोत्तरवर्ती श्रीतन्त्रालोकः अर्धमात्रः स्मृतो बिन्दुयॊमरूपी चतुष्कलः। तदर्धमर्धचन्द्रस्तदष्टांशेन निरोधिका ॥ ३८५ ॥ ‘तदर्ध’ मात्राचतुर्भाग: ‘तदष्टांशेन’ मात्राष्टांशेन ।। ३८५ ।। निरोधिकामेव निर्वक्ति हेतून्ब्रह्मादिकान् रुद्धे-रोधिकां तां त्यजेत्ततः । निरोधिकामिमां भित्वा सादाख्यं भुवनं परम्॥ ३८६ ॥ पररूपेण यत्रास्ते पञ्चमन्त्रमहातनुः । ‘हेतून’ इति कारणानि । पररूपेणेति, सुशिवावरणे हि अस्याः रूपमित्युक्तम् ।। ३८६ ॥ अस्यैव स्थानं रूपं च निरूपयति इत्यर्धेन्दुनिरोध्यन्तबिन्द्वावृत्यूर्ध्वतो महान् ॥ ३८७ ॥ नादः किञ्जल्कसदृशो महद्भिः पुरुषैर्वृतः । चत्वारि भुवनान्यत्र दिक्षु मध्ये च पञ्चमम् ॥ ३८८ ॥ परं सूक्ष्म सूक्ष्मतर रूप दिखाते हैं बिन्दु अर्धमात्रा वाला कहा गया है । (वह) आकाश के समान (तथा) चार कला वाला है । उसका आधा अर्धचन्द्र है और उसका आठवाँ अंश निरोधिका ।। ३८५ ।। उसका आधा = मात्रा का चतुर्थ भाग । उसके आठवें अंश से मात्रा के । आठवें अंश से ।। ३८५ ।। निरोधिका का ही वर्णन करते हैं (यह, सृष्टि आदि के) कारणभूत ब्रह्मा आदि को (ऊपर जाने से) रोकती हैं । इसलिए उस रोधिका को पार करना चाहिए । इस रोधिका को पार करने के बाद सदाशिव का उत्कृष्ट भवन है जहाँ पाँच मन्त्रों के महातनु पररूप से रहते हैं ॥ ३८६-३८७- ॥ ___ हेतुओं को = कारणों को । पर रूप से-सदाशिव आवरण में इसका पर रूप कहा गया है ।। ३८६ ॥ इसी का स्थान और रूप बतलाते है इस प्रकार अर्धचन्द्र से लेकर रोधिनी पर्यन्त बिन्दु का ही आवरण है। उसके ऊपर पराग के समान महान् नाद है । (यह) महापुरुषों से घिरा हुआ है । यहाँ चारों दिशाओं में चार भुवन और मध्य में पाँचवा (भुवन)अष्टममाह्निकम् इन्धिका दीपिका चैव रोधिका मोचिकोर्ध्वगा।। मध्येऽत्र पद्मं तत्रोर्ध्वगामी तच्छक्तिभिर्वृतः ॥ ३८९ ॥ नादोर्ध्वतस्तु सौषुम्नं तत्र तच्छक्तिभृत्प्रभुः । तदीशः पिङ्गलेलाभ्यां वृतः सव्यापसव्ययोः ॥ ३९० ॥ या प्रभोरङ्कगा देवी सुषुम्ना शशिसप्रभा । ग्रथितोऽध्वा तया सर्व ऊर्ध्वश्चाधस्तनस्तथा ॥ ३९१ ॥ नादः सुषुम्नाधारस्तु भित्त्वा विश्वमिदं जगत् । अधःशक्तया विर्निगच्छेदूर्ध्वशक्तया च मूर्धतः ॥ ३९२ ॥ नाड्या ब्रह्मबिले लीनः सोऽव्यक्तध्वनिरक्षरः। नदन्सर्वेषु भूतेषु शिवशक्त्या ह्यधिष्ठितः ॥ ३९३ ॥ एवमधेन्दुर्निरोधिनी च बिन्दोरेव प्रसर:- इत्युक्तं स्यात् । ‘महद्भिः पुरुषैः’ इति मन्त्रमहेश्वररूपैः । तच्छक्तिः’ ऊर्ध्वगामिनी । तदुक्तम् ‘तस्मिन्पमं सुविस्तीर्णमूर्ध्वगेश; स्थितः प्रभुः।’ (स्व० १०।१२२४) इति । ‘ऊर्ध्वगा तु कला तस्य नित्यमुत्सङ्गगामिनी।’ (स्व० १०।१२२६) इति च । है । इन्धिका, दीपिका, रोधिका, मोचिका और ऊर्ध्वगा (ये पाँच मन्त्रमहेश्वरों की नायिकायें हैं) । इनके बीच में पद्म है । उसमें ऊर्ध्वगामी और उस (= ऊर्ध्वगामी) की ऊर्ध्वगामिनी शक्ति से युक्त (नाद) है । नाद के ऊपर सौषुम्न (भुवन) है । वहाँ सुषुम्ना शक्ति को धारण करने वाले प्रभु है । उस (= सुषुम्ना) के स्वामी दायीं और बायीं ओर पिङ्गला तथा इड़ा से युक्त है । और जो चन्द्रमा के समान सुषुम्ना देवी है वह परमेश्वर की गोद में विराजमान है । ऊपर और नीचे का समस्त अध्वा उसके द्वारा ग्रथित है । सुषुम्ना जिसका आधार है वह नाद इस समस्त संसार का भेदन कर अधः शक्ति तथा ऊर्ध्व शक्ति के नाड़ी के द्वारा मूर्धा से निकलता है । ब्रह्मविल में लीन वह अव्यक्त अक्षर ध्वनि सभी प्राणियों में नाद करती हुई शिवशक्ति के द्वारा अधिष्ठित है ।। -३८७-३९३ ।। इस प्रकार अर्धचन्द्र और रोधिनी (ये दोनों) बिन्दु का ही प्रसरण है-यह कहा गया । महापुरुषों के द्वारा—मन्त्रमहेश्वर रूप (महापुरुषों के द्वारा) । वह शक्ति = ऊर्ध्वगामिनी । वही कहा गया “उस (= ऊर्ध्वग शक्तिधाम) में विस्तृत पद्म है । उसमें ऊर्ध्वगेश्वर प्रभु स्थित है ।” (स्व० १०।१२२४) “ऊर्ध्वगा उसकी कला है जो नित्य (उसकी) गोद में रहती है ।” श्रीतन्त्रालोकः सौषुम्नमिति भुवनम् । ‘तच्छक्तिः’ सुषुम्ना । ‘तदीश:’ सुषुम्नेश: । ‘ग्रथितः’ इति ओतप्रोतत्वेन व्याप्तः । ‘ऊर्ध्वः’ शक्तिशिवात्मकः ‘अधस्तनो’ नादान्तादिः । अस्याश्चोर्ध्वाधरयोरेव व्यापकत्वं दर्शयति ‘नाद: सुषुम्नाधारः’ इत्यादिना । इह खल नादः सुषम्नाख्यां मध्यनाडीमधितिष्ठन्नध:शक्तयोत्थाय मूलाधारात प्रबोध मासाद्य प्राणात्मिकयोर्ध्वशक्तया निखिलमिदं जगत् तत्तत्कारणोल्लङ्घनक्रमेण भित्त्वा तस्या एव सुषुम्नाख्याया नाड्या ‘मूर्धत:’ उपरिष्टान्निर्गच्छेत् येनासौ ब्रह्मबिले विश्रान्तः सन् सर्वेषु भूतेषु । ‘नास्योञ्चारयिता कश्चित्प्रतिहन्ता न विद्यते । स्वयमुच्चरते देव: प्राणिनामुरसि स्थितः ॥’ (स्व० ७।५८) इत्याधुक्तया नदन्, अत एव घोषादिस्वभावान्तरानुदयात् अव्यक्तध्वनिः, अत एवाविचलद्रूपत्वाद् अक्षरो यत: शिवशक्तया त्वधिष्ठितः परसंविन्मात्रात्मक: इत्यर्थः । तदुक्तम् ‘नाड्याधारस्त नादो वै भित्त्वा सर्वमिदं जगत । अध:शक्त्या विनिर्गत्य यावद्ब्रह्माणमूर्ध्वत: ॥ नाड्या ब्रह्मबिले लीनस्त्वव्यक्तध्वनिरक्षरः । (१०।१२२६) सौषुम्न- भुवन । वह शक्ति = सुषुम्ना । तदीश = सुषुम्नेश । ग्रथित = ओत प्रोत करके व्याप्त । ऊर्ध्वः = शक्तिशिवात्मक । अधस्तन = नादान्त आदि । जिसकी ऊर्ध्वाधरता की व्यापकता दिखलाते है-नाद जिसका कि सुषुम्ना आधार है— इत्यादि के द्वारा । नाद सुषुम्ना नामक मध्यनाड़ी में अधिष्ठित होकर अध:शक्ति के द्वारा उठकर मूलाधार से प्रबोध को प्राप्त कर प्राणात्मिका ऊर्ध्वशक्ति के द्वारा इस समस्त संसार का, भिन्न-भिन्न कारण के उल्लङ्घन के क्रम से, भेदन कर उसी सुषुम्ना नामक नाड़ी से मूर्धा से ऊपर की ओर जाता है जिससे यह ब्रह्मबिल में विश्रान्त होकर सभी प्राणियों में “इसका न तो कोई उच्चारण करने वाला और न कोई प्रतिरोध करने वाला है । प्राणियों के हृदय में स्थित यह देव (= नाद) स्वयं उच्चरित होता है । (स्वतं० ७।५८)
  • इत्यादि उक्ति के द्वारा नाद करता हुआ, इसीलिए घोष आदि दूसरे स्वभावों का उदय न होने से अव्यक्त ध्वनि वाला, इसीलिए अविचल रूप होने से अक्षर है । क्योंकि शिवशक्ति के द्वारा अधिष्ठित (यह) परसंविद् रूप है । वही कहा गया या Lc “(सुषुम्ना) नाड़ी जिसका आधार है वह नाद इस समस्त संसार का भेदन कर अध:शक्ति के द्वारा ब्रह्मरन्ध्र तक निकल कर नाड़ी के द्वारा ब्रह्मबिल में लीन हो अष्टममाह्निकम् नदते सर्वभूतेषु शिवशक्त्या त्वधिष्ठितः ।। (स्व० १०।१२३३) इति ॥ ३९३ ॥ सुषुम्नोधै ब्रह्मबिलसंज्ञयावरणं त्रिदृक् । तत्र ब्रह्मा सितः शूली पञ्चास्यः शशिशेखरः ॥ ३९४ ॥ तस्योत्सङ्गे परा देवी ब्रह्माणी मोक्षमार्गगा। रोधी दात्री च मोक्षस्य…………… ‘तत्र’ इति ब्रह्मबिलावरणे । ‘मोक्षमार्गगा’ इति तन्मार्गावस्थिता—इत्यर्थः । अत एवास्यास्तद्रोधने तद्दाने च सामर्थ्यमित्युक्तं ‘रोधी दात्री च मोक्षस्य’ इति ।। ३९४।। ….तां भित्त्वा चोर्ध्वकुण्डली ॥ ३९५ ॥ शक्तिः सुप्ताहिसदृशी सा विश्वाधार उच्यते । तस्यां सूक्ष्मा सुसूक्ष्मा च तथान्ये अमृतामिते ॥ ३९६ ॥ मध्यतो व्यापिनी तस्यां व्यापीशो व्यापिनीधरः । तां भित्त्वति, तत ऊर्ध्वम्-इत्यर्थः । ऊर्ध्वकुण्डलीति, निखिलस्यास्य विश्वस्यानुन्मिषितत्वेनान्तर्गर्भीकारात्, अत एव ‘सुप्ताहिसदृशी’ इत्युक्तम्, अत एव स्वभित्तावेव विश्वोल्लासनात् ‘विश्वाधार उच्यते’- इत्युक्तम् । शक्तिरित्यनेन इत: जाता है । शिवशक्ति के द्वारा अधिष्ठित वह अव्यक्त अक्षर ध्वनि समस्त प्राणियों में नदन करता है’’ ॥ ३९३ ।। (स्वतं० १०।१२३३) सुषुम्ना के ऊपर तीन नेत्रों वाला ब्रह्मबिल नामक आवरण है। उसमें श्वेतवर्ण वाले त्रिशूलधारी पाँच मुख वाले, मस्तक पर चन्द्र धारण कये हुए ब्रह्मा विराजमान हैं । उनकी गोद में मोक्षप्रदा परा देवी ब्रह्माणी विराजमान है ।। ३९४-३९५- ।। वहाँ = ब्रह्मबिल में । मोक्षमार्गगा = मोक्षमार्ग में स्थित । इसीलिए इसका उस (मोक्ष) के रोकने और देने में सामर्थ्य है—यही कहा गया है-मोक्षकी रोधिका और दायिका ॥ ३९४ ।। (वह ब्रह्माणी) मोक्ष की रोधिका और दायिका है । उसका भेदन कर ऊर्ध्व कुण्डली शक्ति स्थित है । वह सोये हुये सर्प के समान है तथा विश्व का आधार कही जाती है । उसमें (चारो दिशाओं में) सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा तथा अन्य दो अमृता और अमिता है । मध्य में व्यापिनी है । उसमें व्यापिनीधर व्यापीश्वर हैं ।। -३९५-३९७- ।। उसका भेदन कर = उसके ऊपर । ऊर्ध्व कुण्डल-इस समस्त विश्व के उन्मिषित न होने से अन्तर्गर्भीकृत होने के कारण । इसीलिए-सुप्तसर्प के समान २२० श्रीतन्त्रालोकः प्रभृति शक्तितत्त्वम्-इत्यासूत्रितम् । तदुक्तं श्रीनन्दिशिखायाम् ‘तत ऊचे शक्तितत्त्वं कथ्यमानं निबोध मे । प्रसुप्तभुजगाकारा ऊर्णातन्तुसमप्रभा ।। आधारः सर्वतत्त्वानां भुवनानां च सुव्रते।’ इति । ‘तस्याम्’ इति शक्तौ । तदुक्तम् ‘सूक्ष्मा चैव सुसूक्ष्मा च तथा चैवामृतामिता । व्यापिनी मध्यतो ज्ञेया शेषाः पूर्वादित: क्रमात् ॥ (स्व० १०।१२९०) इति । ‘तस्याम्’ इति व्यापिन्याम् । व्यापीश इति, यस्यानाश्रितभैरवापेक्षया पूर्वस्यां दिशि व्यवस्थानम् ।। ३९६ ॥ ननु व्यापिनी शक्तेः पृथगिति तावदविवादः, तत्किं तस्याः शक्तितत्त्वे एवावस्थानम् उत न ?–इत्याशङ्क्याह शक्तितत्त्वमिदं यस्य प्रपञ्चोऽयं धरान्तकः ॥ ३९७॥ शिवतत्त्वं ततस्तत्र चतुर्दिक्कं व्यवस्थिताः । व्यापी व्योमात्मकोऽनन्तोऽनाथस्तच्छक्तिभागिनः ॥ ३९८ ॥ ‘ऐसा कहा गया’ । ‘शक्ति’- इससे यहाँ से लेकर शक्ति तत्त्व है-ऐसा सङ्केत किया गया । वही नन्दिशिखा में कहा गया है “उसके ऊपर कथ्यमान शक्तितत्त्व को मुझसे जानो । हे सुव्रते ! वह सोये हुए सर्प के आकार वाली, ऊन के तन्तु के समान कान्ति वाली एवं सभी तत्त्वों और भुवनों का आधार है ।” उसमें = शक्ति में । वही कहा गया है “सूक्ष्मा, सुसूक्ष्मा, अमृता और अमिता (ये शक्तियाँ हैं, इनके) मध्य में व्यापिनी को जानना चाहिए, शेष क्रमश: पूर्व आदि के हिसाब से समझना चाहिये।’’ (स्वतं० १०।१२९०) उसमें = व्यापिनी में । व्यापीश—जिनका अनाश्रित भैरव की अपेक्षा पूर्व दिशा में स्थान है ॥ ३९६ ॥ ____ प्रश्न-व्यापिनी, शक्ति से पृथक् है—यह निर्विवाद है तो क्या वह शक्तितत्त्व में ही स्थित है या नहीं ? यह शङ्का कर कहते हैं यह शक्तितत्त्व (में स्थित) है जिसका यह पृथ्वी पर्यन्त प्रपञ्च है । उसके ऊपर शिव तत्त्व है । उसमें चारो दिशाओं में उस-उस शक्ति के भागी व्योमात्मक, व्यापी, अनन्त, अनाथ व्यवस्थित हैं । मध्य में अनाश्रित अष्टममाह्निकम् मध्ये त्वनाश्रितं तत्र देवदेवो ह्यनाश्रितः । तच्छक्तत्युत्सङ्गभृत्सूर्यशतकोटिसमप्रभः ॥ ३९९ ॥ ‘शक्तितत्त्वम्’ इति अनाश्रितभुवनम् । ‘तत:’ इति तच्छक्तितत्त्वमेवाश्रित्य इत्यर्थः । तद्धि शक्तितत्त्वे एव व्यापिन्यामवस्थितम्-इति भावः । ‘तत्र’ इति अनाश्रितभुवने । ‘तच्छक्तयो’ व्यापिन्याद्याः । अनाश्रितमिति, भुवनम् । ‘तच्छक्तिः’ अनाश्रिता । तदुक्तम् ‘व्यापिनी व्योमरूपा चानन्तानाथा त्वनाश्रिता । (स्व० १०।१२५०) इति । शिवतत्त्वमिति पुन: स्वार्थवृत्त्या यदि व्याख्यायेत तत्सर्वं व्याहन्येत । यत: ‘एवं वै शिवतत्त्वं तु कथितं तव सुव्रते । शोधयित्वा ततश्चोर्ध्वं शक्तिश्चैव परा स्मृता ।। समना नाम सा ज्ञेया……… …….. || (स्व० १०।१२५४) इत्याधुक्तया शिवतत्त्वादपि ऊर्ध्वं समना व्याप्नोतीति । तत्रापि ‘समनान्तं वरारोहे पाशजालमनन्तकम् ।’ (स्व० ४।४२९) (भवन) है वहाँ करोड़ों सूर्य के समान कान्ति वाले उस शक्ति की गोद को धारण करने वाले अनाश्रित देव विराजमान हैं ।। -३९७-३९९ ।। शक्ति तत्त्व = अनाश्रित भुवन । उसके बाद = उस शक्तितत्त्व का आश्रय करके । वह व्यापिनी शक्तितत्त्व में भी स्थित है । वहाँ = अनाश्रित भवन में । वे शक्तियाँ = व्यापिनी आदि । अनाश्रित-भुवन । वह शक्ति = अनाश्रित शक्ति । वही कहा गया है ____“व्यापिनी, व्योमरूपा, अनन्ता और अनाथा (ये) अनाश्रित (शक्तियाँ) है ।” (स्व० १०।१२५०) __ यदि ‘शिव तत्त्व’ पद की स्वार्थपरक व्याख्या की जाएगी तो सब गड़बड़ हो जाएगा । क्योंकि “हे सुव्रते । इस प्रकार तुमसे शिवतत्त्व का कथन किया । (उसका) शोधन कर उसके ऊपर पराशक्ति मानी गयी है । उसे ‘समना’ (नाम से) समझना चाहिए।” (स्वतं० १०।१२५४) इत्यादि उक्ति के द्वारा शिवतत्त्व से भी ऊपर समना (सबको) व्याप्त (कर स्थित) है । उसमें भी “हे वरारोहे ! समना तक अनन्त पाशजाल है ।” (स्व० ४।४२९) २२२ श्रीतन्त्रालोकः इत्याद्युक्तेरनन्तं पाशजालं प्रसक्तं स्यात् । एवम् ‘हेयाध्वानमधः कुर्वन् रेचयेत्तं वरानने । यावत्सा समना शक्तिस्तदूर्ध्वं चोन्मना स्मृता ।’ (स्व० १०।१२७१) इत्यादि व्याहतं स्यात् । ……उन्मन्यन्ते पर: शिवः ।’ इत्याद्यपि दुष्येत् समनाधस्तस्योक्तत्वात्, तस्यापि तत्त्वान्तरत्वे षट्त्रिंश तत्त्वानि-इति प्रतिज्ञाहानिः । नास्य शिवतत्त्वस्य ऊर्ध्वमन्तर्वा समनापि त्वधस्तस्याः शक्तितत्त्व एवाम्नानात् । तदुक्तम् ‘प्रणवेन ततः शक्तिसितव्या वरानने। व्यापिनी समनां चोर्ध्वं तत्रैव तु विशोधयेत्।’ इति । अनाश्रितादीनां च शिवतत्त्वावस्थाने तस्यापि कालकलितत्वमापतेत् ते हि । क्षयिणः । यदुक्तम् प्राक् ‘शक्तिः स्वकालविलये व्यापिन्यां लीयते पुनः । व्यापिन्यां तद्दिवारानं लीयते साप्यनाश्रिते ।। इत्यादि उक्ति से अनन्त पाशजाल प्रसक्त है । तथा— “हेय अध्वा को नीचे करते हुये, हे वरानने ! उसका त्याग (तब तक) करना चाहिए जब तक समना शक्ति (उपलब्ध न हो जाए) । उसके ऊपर उन्मना कही गई है ।” (स्वतं० १०।१२७१) इत्यादि का व्याधात हो जाएगा । तथा “उन्मना के अन्त में परम शिव है ।’’ इत्यादि कथन भी दूषित हो जाएगा क्योंकि उसे समना के नीचे कहा गया है। यदि उसे एक अतिरिक्त तत्त्व मान लें तो ‘तत्त्व छत्तीस हैं इस प्रतिज्ञा की हानि हो जायेगी । समना न तो इस शिव तत्त्व के ऊपर है औन न भीतर बल्कि नीचे है क्योंकि उसे शक्ति तत्त्व में कहा गया है । वही कहा है ___“हे वरानने ! उसके बाद प्रणव के द्वारा शक्ति का त्याग करना चाहिए और वहीं ऊपर व्यापिनी और समना का शोधन करना चाहिए।” ____अनाश्रित आदि की शिवतत्त्व में स्थिति मानने पर क्षयशील वे भी कालकलित हो जाएंगे । जैसा कि पहले कहा गया है अपना काल समाप्त होने पर शक्ति व्यापिनी में लीन हो जाती है । फिर वह दिन-रात भी व्यापिनी में लीन हो जाता है । अष्टममाह्निकम् २२३ परार्धकोट्या हत्वा तु शक्तिकालमनाश्रिते । दिनं रात्रिश्च तत्काले परार्धगुणितेऽपि च । सोऽपि याति लयं साम्यसंज्ञे सामनसे पदे ।’ (तं० ६१६६) इति । ततश्च ‘ऊर्ध्वमुन्मनसो यश्च तत्र कालो न विद्यते । न कल्पः कल्पते कश्चिनिष्कल: कालवर्जितः ।। य: शाङ्कयुन्मनातीतः स नित्यो व्यापकोऽव्ययः ।’ इत्याद्याः श्रुतयो विरुद्धाः स्युः । न च अनाश्रितादीनां शिवतत्त्वेऽवस्थान मस्ति, अपि तु शक्तितत्त्वे एव व्यापिन्याम् । तदुक्तम् ‘अधो ब्रह्मबिलं देवि शक्तितत्त्वं ततः परम् । पञ्चकारणसंयुक्ता व्यापिनी तु तथा परा ।। समना उन्मना चैव प्रक्रियाण्डैर्युता प्रिये ।’ इति । तस्मादस्मदुक्तमेव व्याख्यानं युक्तमित्यन्यदुपेक्ष्यम् ॥ ३९९ ॥ शिवतत्त्वोर्ध्वतः शक्तिः परा सा समनाह्वया । सर्वेषां कारणानां सा कर्तृभूता व्यवस्थिता ॥ ४०० ॥ वह भी अनाश्रित में लीन हो जाती है परार्ध कोटि से गुणा करने पर शक्ति का काल अर्थात् उसका एक दिन और रात्रि होता है । उसे भी परार्ध से गुणा करने पर व्यापिनी का काल होता है । वह काल भी साम्य नामक समना तत्त्व में लीन होता है । (तं० आ० ६।१६६) और उसके बाद “जो उन्मना के ऊपर है वहाँ काल नहीं है न किसी कल्प की कल्पना है । निष्कल कालरहित जो शाङ्करी उन्मनातीत (तत्त्व है) वह नित्य व्यापक और अव्यय -इत्यादि तियाँ विरुद्ध हो जायेंगी । अनाश्रित आदि की शिव तत्त्व में नहीं बल्कि व्यापिनी शक्ति तत्त्व में स्थिति है । वही कहा गया है “हे देवि ! ब्रह्मबिल के नीचे परशक्ति तत्त्व है । व्यापिनी पाँच कारणों से युक्त है । हे प्रिये ! उसके बाद समना और उन्मना है । यही अण्डों से युक्त (साधन-) प्रक्रिया है । इस कारण हमारे द्वारा किया गया व्याख्यान ही युक्त है दूसरा (व्याख्यान) उपेक्षणीय है ॥ ३९९ ।। शिवतत्त्व के ऊपर समना नामक पराशक्ति है । वह सभी कारणों की २२४ श्रीतन्त्रालोकः बिभर्त्यण्डान्यनेकानि शिवेन समधिष्ठिता । ‘शिवतत्त्वोर्ध्वतः’ इति व्यापिनीपदावस्थितानाश्रितभवनादप्यूर्ध्वम्-इत्यर्थः । न चात्रैव अपूर्वतया तत्त्वशब्दस्य भुवनवाचित्वम् ‘बिन्दुतत्त्वं समाख्यातं ……………….।’ (स्व० १०।१२१७) इत्यादावपि तथा प्रयोगदर्शनात् । कर्तृभूतेति, क्रियाशक्तिरूपत्वात् ।। ४००॥ तदधिष्ठानमेव स्फुटयति तदारूढः शिवः कृत्यपञ्चकं कुरुते प्रभुः ॥ ४०१ ॥ शिव इति, य: सर्वत्र षट्त्रिंशत्तत्त्वतयोद्धोष्यते ।। ४०१ ॥ नन्वयमेतदारूढः सन् कस्मात् सृष्ट्यादि विदध्यात् ?–इत्याशङ्क्याह समना करणं तस्य हेतुकर्तुर्महेशितुः । करणमिति, सृष्ट्यादिक्रियायाम् ।। ननु सर्वत्र क्रियायां कन्तरापेक्षित्वे कर्तुहेतुत्वं भवेत् इति महेशितुरपि कर्वभूता मानी गयी है । शिव के साथ मिलकर वह अनेक अण्डों का भरण करती है ।। ४००-४०१- ।। शिवतत्त्व के ऊपर अर्थात् व्यापिनी पद में स्थित अनाश्रित भुवन के भी ऊपर । तत्त्व शब्द यहीं पर पहलेपहल भुवन का वाची है—ऐसा नहीं है । क्योंकि “बिन्दुतत्त्व कहा गया है ।’’ (स्व० तं० १०।१२१७) इत्यादि स्थलों में भी वैसा (प्रयोग अर्थात् भुवनवाची) देखा जाता है । कर्तृभूता-क्योंकि क्रिया शक्ति रूप है ॥ ४००- ॥ उस अधिष्ठान को ही स्पष्ट करते हैं भगवान् शिव उस पर आरुढ़ होकर पञ्चकृत्य करते हैं ।। -४०१ ।। शिव-जो कि सर्वत्र ३६ तत्त्व के रूप में घोषित होते हैं ॥ ४०१ ।। प्रश्न-इस पर आरूढ़ होकर क्यों सृष्टि आदि करते हैं? यह शङ्का कर कहते समना, उस कारणों के कर्ता महेश्वर का करण है ।। ४०२- ।। करण है-सृष्टि आदि के करने में । प्रश्न- सर्वत्र क्रिया में अतिरिक्त कर्ता की अपेक्षा होने पर कर्ता हेत होता है है अष्टममाह्निकम् तथात्वे परत्वोन्मुखतया स्वातन्त्र्यं खण्ड्येत,—इति किमेतदुक्तम् ? इत्याशङ्क्याह अनाश्रितं तु व्यापारे निमित्तं हेतुरुच्यते ॥ ४०२ ॥ ‘व्यापारे’ इति सृष्ट्यादिक्रियायाम् । इह हि स एव परः परमेश्वर: स्वस्वातन्त्र्यात् प्रथमं शून्यात्मतामवभासयन् अनाश्रितादिरूपतया प्रथितः इत्यपेक्षणीयस्यैवाभावात् अस्यैव तावत् पारमार्थिक शुद्धं कर्तृत्वम्, अनाश्रितादीनां त् तदधिष्ठानवशाद्भिन्नकार्यविषयमशद्धमपचरितप्रायं कर्तृत्वम्, अतश्चानाश्रितादि स्तदिच्छयैव सृष्ट्यादि करोति, इति तस्य साक्षात् तदावेशायोगात् तत्र निमित्तमात्रत्वं यथा विद्यया यशः, -इत्यादावित्युक्तं ‘निमित्तं हेतुः’ इति । यदाहुः ‘अनाश्रितं तु व्यापारे निमित्तं हेतुरिष्यते ।’ इति ॥ ४०२ ।। तदधिष्ठानेऽपि अस्य समनैव करणम्-इत्याह तयाधितिष्ठति विभुः कारणानां तु पञ्चकम् । अधितिष्ठतीति, स्वस्वातन्त्र्यच्छायानुवेधेन सृष्ट्यादिकारित्वे योग्यं कुर्यादि त्यर्थः ।। इस प्रकार परमेश्वर के भी वैसा (= शिवतत्त्वारुढ़) होने पर परोन्मुख होने के कारण उनका स्वातन्त्र्य खण्डित हो जाएगा तो यह कैसे कहा गया ?-यह शङ्का कर कहते हैं व्यापार में अनाश्रित निमित्त कारण कहा जाता है ।। -४०२ ।। व्यापार में = सृष्टि आदि कार्यों में । परम परमेश्वर अपने स्वातन्त्र्य वश पहले शून्यता को अवभासित करते हए अनाश्रित आदि रूपों में व्याप्त होते हैं । इस प्रकार अपेक्षणीय के अभाव में इन्हीं की पारमार्थिक शुद्धकता है । अनाश्रित आदि की कर्तृता तो उन (= परमशिव) के अधिष्ठान के कारण भिन्नकार्यविषयक अशुद्ध और उपचरितप्राय (= लाक्षणिक) है। इसलिए अनाश्रित आदि भी उन्हीं की इच्छा से सृष्टि आदि करते हैं । इस प्रकार उनका साक्षात् शिवावेश होने के कारण उसमें निमित्तता है जैसे कि विद्या के द्वारा यश इत्यादि के विषय में । इसलिए कहा गया—निमित्त हेतु । जैसा कि कहते है “व्यापार में अनाश्रित (शिव) निमित्त कारण कहा जाता है’’ ॥ ४०२ ॥ इनके उस अधिष्ठान में भी समना ही कारण है-यह कहते हैं “उसके द्वारा परमेश्वर पाँच कारणों को अधिष्ठित करते हैं’’ ॥ ४०३- ।। अधिष्ठित करते हैं-अपने स्वातन्त्र्य की छाया के अनुवेध से सृष्टि आदि के । १५ त.तृ. श्रीतन्त्रालोकः एतच्च कथम् ?–इत्याशङ्क्याह अनाश्रितोऽनाथमयमनन्तं खवपुः सदा ॥ ४०३ ॥ स व्यापिनं प्रेरयति स्वशक्तया करणेन तु। कर्मरूपा स्थिता माया यदधः शक्तिकुण्डली ॥ ४०४ ॥ नादबिन्द्वादिकं कार्यमित्यादिजगदुद्भवः । ‘खवपुः’ व्योमात्मा, स्वशक्तयेति । तथा हि शिवस्य सृष्ट्यादौ समना करणं तथैषामपि अनाश्रिताद्या: स्वाः शक्तय इति । कर्मरूपेति, सृष्ट्यादिक्रिया विशेषकत्वात्, मायाशक्तिरेव हि पारमेश्वरी तत्तन्नादबिन्द्वात्मविश्वरूपतया प्रस्फुरति—इत्यभिप्रायः । शक्तिकुण्डलीति, अशेषस्य विश्वस्य स्वतादात्म्येन गीकारात् ।। ४०४ ।। इयच्च विश्वं हेयमेव-इत्याह यत्सदाशिवपर्यन्तं पार्थिवाद्यं च शासने ॥ ४०५ ॥ तत्सर्वं प्राकृतं प्रोक्तं विनाशोत्पत्तिसंयुतम् ।। सदाशिवोऽत्रानाश्रितः, प्रकृतिश्च समना, तस्या एव मूलप्रकृतित्वात् ।।४०५।। कर्ता होने में योग्य बनाते हैं । यह कैसे होता है ? यह शङ्का कर कहते हैं वह आकाशरूप अनाश्रित (देव) अपनी (अनाश्रित) शक्ति रूपी करण के द्वारा अनाथमय अनन्त व्यापिनी शक्ति को प्रेरित करते हैं । कर्मरूपा माया स्थित है । जिसके नीचे शक्ति कुण्डली नाद बिन्दु आदि कार्य हैं और (इस प्रकार) प्रथम-प्रथम संसार की उत्पत्ति होती है ।। -४०३-४०५- ।। खवपः = आकाशात्मा । अपनी शक्ति के द्वारा-जैसे सृष्टि आदि के विषय में समना शिव की शक्ति है उसी प्रकार इनकी भी अनाश्रित आदि अपनी शक्तियाँ हैं। कर्मरूप–सृष्टि आदि क्रियाविशेष वाली होने से, पारमेश्वरी माया शक्ति ही भिन्न-भिन्न नाद बिन्दु रूप विश्व के रूप में स्फुरित होती है । शक्तिकुण्डली—क्योंकि समस्त विश्व को अपने रूप में गर्भीकृत किये रहती है ।। ४०४ ॥ इतना बड़ा विश्व त्याज्य है-यह कहते है पृथिवी से लेकर सदाशिव पर्यन्त जो (परमेश्वर के) शासन में है (या) शास्त्र में (वर्णित है) विनाश और उत्पत्ति से युक्त वह सब प्राकृत कहा गया है ।। -४०५-४०६- ॥ यहाँ अनाश्रित (का तात्पर्य) है–सदाशिव । प्रकृति (का तात्पर्य) है-समनाअष्टममाह्निकम् एवं पुरमानतत्त्वयोजनात्म प्रमेयद्वयमभिधाय पुरसंग्रहाख्यं प्रमेयमासूत्रयित् मुपक्रमते अथ सकलभुवनमानं यन्मह्यं निगदितं निजैर्गुरुभिः ॥ ४०६ ॥ तद्वक्ष्यते समासाद् बुद्धौ येनाशु सङ्क्रामेत् । येनेति, समासाभिधानेन, अत एवैतन्निष्प्रयोजनं न—इत्याशयः ॥ ४०६ ।। तदेवाह अण्डस्यान्तरनन्तः कालः कूष्माण्डहाटकौ ब्रह्महरी ॥ ४०७ ॥ रुद्राः शतं सवीरं बहिर्निवृत्तिस्तु साष्टशतभुवना स्यात् । जलतेज:समीरनभोऽहंकृद्धीमूलसप्तके प्रत्येकम् ॥ ४०८ ॥ अष्टौ षट्पञ्चाशद्भुवना तेन प्रतिष्ठेति कला कथिता। अत्र प्राहुः शोध्यानष्टौ केचिन्निजाष्टकाधिपतीन् ॥४०९ ॥ अन्ये तु समस्तानां शोध्यत्वं वर्णयन्ति भुवनानाम् । श्रीभूतिराजमिश्रा गुरवः प्राहुः पुनर्बही रुद्रशतम् ॥ ४१० ॥ अष्टावन्तः साकं सर्वेणेतीदृशी निवृत्तिरियं स्यात् । क्योंकि वही मूलप्रकृति है ॥ ४०५ ॥ इस प्रकार पुर का परिमाण एवं तत्त्वयोजना रूप दो प्रमेयों का कथन कर पुरसंग्रह नामक प्रमेय का वर्णन करने के लिए प्रारम्भ करते हैं अब जो अपने गुरुओं के द्वारा मुझे बतलाया गया वह समस्त भुवनों का परिमाण संक्षेप में कहूँगा जिससे कि वह बुद्धि में शीघ्र प्रवेश कर जाए ।। -४०६-४०७- ।। जिससे = संक्षिप्त कथन से । इसलिए यह (कथन) निष्प्रयोजन नहीं है-यह अभिप्राय है ॥ ४०६ ॥ वही कहते हैं (पार्थिव) अण्ड के भीतर अनन्तकाल, कूष्माण्ड, हाटक, ब्रह्मा और हरि तथा वीरों के साथ शतरुद्र हैं । बाहर की ओर एक सौ आठ भुवन वाली निवृत्ति कला है । जल तेज वायु आकाश अहङ्कार बुद्धि और मूल (प्रकृति इन) सात में प्रत्येक के अन्दर आठ इस प्रकार छप्पन (८४७ = ५६) भुवन हैं । इससे यह प्रतिष्ठा कला कही गई है । यहाँ पर आठ को शोधनीय बतलाते हैं। कुछ लोग अपने आठ अधिपतियों को (शोध्य बतलाते हैं) । दूसरे लोग समस्त भुवनों को शोध्य मानते हैं । श्री भूतिराज मिश्र गुरु का कथन है कि बाहर एक सौरुद्र और भीतर शर्व के २२८ श्रीतन्त्रालोकः रुद्राः काली वीरो धराब्धिलक्ष्यः सरस्वती गुह्यम् ॥ ४११ ॥ इत्यष्टकं जलेऽग्नौ वन्यतिगुह्यद्वयं मरुति वायोः । स्वपुरं गयादि खे च व्योम पवित्राष्टकं च भुवनयुगम् ॥ ४१२ । अभिमानेऽ हङ्कारच्छगलाद्यष्टकमथान्तरा नभोऽहंकृत् । तन्मात्रार्केन्दुश्रुतिपुराष्टकं बुद्धिकर्मदेवानाम् ॥ ४१३ ॥ दश तन्मात्रसमूहे भुवनं पुनरक्षवर्गविनिपतिते । मनसश्चेत्यभिमाने द्वाविंशतिरेव भुवनानाम् ॥ ४१४ ॥ धियि दैवीनामष्टौ क्रुत्तेजो योगसंज्ञकं त्रयं तदुमा । तत्पतिरथ मूर्त्यष्टकसुशिवद्वादशकवीरभद्राः स्युः ॥ ४१५ ॥ तदथ महादेवाष्टकमिति बुद्धौ सप्तदश संख्या । गुणतत्त्वे पङ्क्तित्रयमिति षट्पञ्चाशतं पुराणि विदुः ॥ ४१६ ॥ अण्डस्यान्तर्बहि: साष्टशतभुवना निवृत्तिः स्यादिति संबन्धः । यद्वा- अन्त: शब्द: प्रागेव व्याख्यातः । तदुक्तम् ‘निवृत्त्यभ्यन्तरे पृथ्वी शतकोटिप्रविस्तरा । तस्यां च भुवनानां तु शतमष्टोत्तरावधि ।’ ___(स्व० ४।१०३) इति । साथ आठ-ऐसी यह निवृत्ति कला है । (ग्यारह) रुद्र, काली, वीर, धरा, अब्धि, लक्ष्मी, सरस्वती, गुह्य (अष्ठका) ये आठ जल तत्त्व में है । अग्नितत्त्व में वह्नि और अतिगुह्य दो, मरुत् में वायु का अपना पुर गया आदि, आकाश में व्योम तथा पवित्राष्टक ये दो भवन, अभिमान में अहङ्कार और छगल आदि आठ, नभ एवं अहङ्कार के बीच (पाँच) तन्मात्रायें, सूर्य, चन्द्र, श्रुति, आठ पुर तथा इन्द्रियसमूह के हट जाने पर बुद्धि एवं कर्म इन्द्रियों के देवों का दश भुवन, तन्मात्रसमूह में रहते हैं। अभिमान में मन के २२ भुवन हैं । बुद्धि तत्त्व में देवी के आठ भुवन हैं । क्रोधाष्टक तेजोऽष्टक योगाष्टक उमा और उनके पति, मर्त्यष्टक, सुशिव, द्वादश वीरभद्र और महादेवाष्टक ये १७ बुद्धितत्त्व के भुवनेश हैं । गुण तत्त्व में (गुरु शिष्य की) तीन पंक्तियाँ है । इस प्रकार ५६ पुर माने गए हैं ॥ -४०७-४१६ ॥ अण्ड के भीतर और बाहर १०८ भवनों वाली निवत्ति कला है । ऐसा सम्बन्ध है । अथवा अन्तः शब्द की पहले ही व्याख्या की गई । वही कहा गया ___“निवृत्ति कला के भीतर पृथिवी सौ करोड़ योजन विस्तृत है । उसमें एक सौ आठ भुवन है ।’’ (स्व० तं० ४।१०३) अष्टममाह्निकम् २२९ अष्टाविति, गुह्याष्टकादीनि योगाष्टकान्तानि सप्ताष्टकानि–इत्यर्थः । तेनेति सप्तकस्याष्टभिर्गुणनात् । तदुक्तम् ‘प्रतिष्ठाया भवेद्व्याप्तिश्चतुर्विंशतितत्त्विका । षट्पञ्चाशद्भवनिका (स्व० ४।१४९) इति । अत्रेति प्रतिष्ठायाम् । अष्टाविति, क्रोधाष्टकेन सह । समस्तानामिति षट्पञ्चाशतोऽपि, मिश्रा: प्रधानाः । शर्वेणेति, भूलोकाधिपतिना, तेन वीरभद्र स्थानेऽयमिति गणनासाम्यम् । ‘रुद्राः’ एकादश । गुह्यमिति, गुह्याष्टकभुवनम् । अन्तरा नभोऽहळूदिति, अहङ्कारनभसोरन्तः–इत्यर्थः । तन्मात्रेति पञ्च, बुद्धिकर्मदेवानामिति बुद्धिकर्मेन्द्रियदशकस्य–इत्यर्थः । तन्मात्रसमूहे भुवनमिति पञ्चार्थमण्डलाख्यम्-इत्यर्थः । नन्वेषामुक्तेऽपि भुवनपञ्चके कस्मात्पुनरेतदुच्यते ? -इत्याशयोक्तम्- ‘अक्षवर्गनिपतित:’ इति । एतद्धि एषां मनोऽधिष्ठानेनैव भवेदिति अत्र पुनः परेणापि रूपेणावस्थानमिति भावः । क्रुत्तेजोयोगसंज्ञकपिति अर्थात्क्रोधाद्यष्टकत्रयाधिष्ठेयं भुवनत्रयम्, पङ्क्तित्रयमिति गुरुशिष्यविषयम् । षट् पञ्चाशतं पुराणीति, जलतत्त्वेऽष्टौ भुवनानि, तेज:प्रभृतौ तत्त्वत्रये प्रत्येक द्वयमिति षट्, अहङ्कारे द्वाविंशतिः, बुद्धौ सप्तदश, गुणेषु च त्रीणीति ॥ ४१६ ॥ आठ-गुह्याष्टक से लेकर योगाष्टक तक सात अष्टक । इस प्रकार–सात का आठ से गुणन करने पर । वही कहा गया है “प्रतिष्ठा की व्याप्ति चौबीस तत्त्वों और छप्पन भवनों वाली है ।” (स्व० तं० ४।१४९) यहाँ = प्रतिष्ठा में । आठ-क्रोधाष्टक के साथ । सबका = छप्पनों का । मिश्र = प्रधान । शर्व के द्वारा = भूर्लोक के अधिपति के द्वारा । इससे वीरभद्र के स्थान में यह है-इस प्रकार गणना समान हो जाती है। रुद्र = ग्यारह । गुह्य = गुह्याष्टक भुवन । अन्तरा नभोऽहङ्कृत् = अहङ्कार और आकाश के भीतर । तन्मात्र—पाँच तन्मात्रायें । बुद्धि कर्मदेवों का = दश ज्ञान एवं कर्म इन्द्रियों का । तन्मात्र समूह में भुवन = पञ्चार्थ मण्डल नामक । प्रश्न-इनके पाँच भुवनों के कहे जाने पर भी फिर यह क्यों कहते हैं ?-यह शङ्का कर कहते हैं-अक्षवर्ग निपतित । यह इनके मनोऽधिष्ठान से ही होता है इसलिए यहाँ पर रूप से भी स्थिति रहती है। क्रततेजोयोगसंज्ञा वाले = क्रोध आदि अष्टकत्रय के द्वारा अधिष्ठेय तीन भुवन । तीन पंक्ति = यह गुरु और शिष्य का विषय है । ५६ पुर = जल तत्त्व में ८ भुवन, तेज: आदि तीन तत्त्वों में प्रत्येक में दो इस प्रकार ६, अहङ्कार में २२, बुद्धि में १७ और गुणों में ३, इस प्रकार ८ + ६ + २२ + १७ + ३ = ५६ भुवन हैं ।। ४१६ ॥ श्रीतन्त्रालोकः नन्वत्र जलादौ सवेषु तत्त्वेषु भुवनानि शोध्यतयोक्तानि प्रकृतौ पुन कस्मान्न-इत्याशङ्क्याह यद्यपि गुणसाम्यात्मनि मूले क्रोधेश्वराष्टकं तथापि धियि। तच्छोधितमिति गणनां न पुनः प्राप्तं प्रतिष्ठायाम् ॥ ४१७ ॥ इति जलतत्त्वान्मूलं तत्त्वचतुर्विंशतिः प्रतिष्ठायाम् । अम्बादितुष्टिवर्गस्ताराद्याः सिद्धयोऽणिमादिगणः ॥ ४१८ ॥ गुरवो गुरुशिष्या ऋषिवर्ग इडादिश्च विग्रहाष्टकयुक्। गन्धादिविकारपुरं बुद्धिगुणाष्टकमहंक्रिया विषयगुणाः ॥ ४१९ ॥ कामादिसप्तविंशकमागन्तु तथा गणेशविद्येशमयौ । इति पाशेषु पुरत्रयमित्थं पुरुषेऽत्र भुवनषोडशकम् ॥ ४२० ॥ नियतौ शङ्करदशकं काले शिवदशकमिति पुरद्वितयम् । रागे सुहृष्टभुवनं गुरुशिष्यपुरं च वित्कलायुगले ॥ ४२१ ॥ भुवनं भुवनं निशि पुटपुरत्रयं वाक्पुरं प्रमाणपुरम् । इति सप्तविंशतिपुरा विद्या पुरुषादितत्त्वसप्तकयुक् ॥ ४२२ ॥ वामेशरूपसूक्ष्म शुद्धं विद्यार्थ शक्तितेजस्विमितिः । सुविशुद्धिशिवौ मोक्ष ध्रुवेषिसंबुद्धसमयसौशिवसंज्ञाः॥ ४२३ ॥ प्रश्न-जल आदि सभी तत्त्वों में भुवनों को शोध्य रूप में कहा गया है प्रकृति में क्यों नहीं कहा गया ?—यह शङ्का कर कहते है यद्यपि गणों की साम्यावस्थारूप मूल प्रकृति में आठ क्रोधेश्वर हैं तो भी बुद्धि तत्त्व में उनका शोधन कर दिया गया है । इसलिए प्रतिष्ठा में (वे) गणना को प्राप्त नहीं हये । इस प्रकार जल तत्त्व से लेकर मूल प्रकृति तक चोबास तत्त्व प्रतिष्ठा कला में हैं । अम्बा आदि तुष्टिसमूह, तार आदि सिद्धियाँ, अणिमादिसमूह, गुरु, गुरुशिष्य, ऋषिवर्ग, आठ विग्रह से युक्त इडा आदि नाड़ियाँ, गन्ध आदि विकारभुवन, आठ बुद्धिगुण, अहङ्कार, विषय में रहने वाले गुण, काम आदि सत्ताईस आगन्तुक विषय, तथा गणेश एवं विद्येश वाले ये पाशों में तीन पुर है। इस प्रकार इस पुरुष तत्त्व में सोलह भुवन हैं । नियति तत्त्व में दश शङ्कर, काल में दश शिव इस प्रकार दो पुर हैं । राग तत्त्व में सुहृष्ट भुवन और गुरुशिष्यपुर है । विद्या एवं कला इन दो तत्त्वों में एक-एक भुवन हैं । निशा (= माया) में तीन भुवनों का पुर है । वाक् पुर एवं प्रमाण पुर इस प्रकार विद्या सत्ताईस पुरों वाली है । यह पुरुष आदि सात तत्त्वों से युक्त है। वामा आदि शक्तियाँ उनके तत्त्व ईश रूप सक्ष्म शद्धविद्यावरण, शक्त्यावरण, तेजस्वी आवरण भग्नावरण, सुशिव और शुद्ध शिव का अष्टममाह्निकम् २३१ सप्तदशपुरा शान्ता विद्येशसदाशिवपुरत्रितययुक्ता । बिन्दूर्धेन्दुनिरोध्यः परसौशिवमिन्धिकादिपुरसौषुम्ने ॥ ४२४ ॥ परनादो ब्रह्मबिलं सूक्ष्मादियुतोर्ध्वकुण्डली शक्तिः । व्यापिव्योमानन्तानाथानाश्रितपुराणि पञ्च ततः ॥ ४२५ ॥ षष्ठं च परममनाश्रितमथ समनाभुवनषोडशी यदि वा । बिन्द्वावरणं परसौशिवं च पञ्चेन्धिकादिभुवनानि ॥ ४२६ ॥ सौषुम्नं ब्रह्मबिलं कुण्डलिनी व्यापिपञ्चकं समना । इति षोडशभुवनेयं तत्त्वयुगं शान्त्यतीता स्यात् ॥ ४२७ ॥ तत्त्वचतुर्विंशतिरिति प्रकृतितत्त्वस्य क्षुब्धाक्षुब्धतया द्वैविध्यात् । गुरव इति, तत्रापि गुरुशिष्यविषयं पङ्क्तित्रयमुक्तम् । विषयेति, विकारषोडशकानन्तर्येण व्याख्याताः शब्दादयः पञ्च, गुणा देहधर्मत्वेन प्रागुक्ता अहिंसादयः । च: समुच्चये, तेन रागतत्त्वे वीरेशभुवनं गुरुशिष्यभुवनं च, इति भुवनद्वयम् । भुवनं भुवनमिति वामादिशक्तिनवकस्य महादेवत्रयस्य च । पुटपुरत्रयमिति त्रिपुटत्व मस्याः । वाक्पुरं योन्याख्याया वागीश्या भुवनम् । सप्तविंशतिपुरेति, तदुक्तम् ‘पुंस्तत्त्वाद्यावन्मायान्तं विद्याया व्याप्तिरिष्यते । आवरण, मोक्ष, ध्रुव, इच्छा रूपी आवरण, प्रबुद्ध, समय और सौशिव नाम के सत्रह पुरों वाली शान्ता कला है । (यह) विद्येश्वर सदाशिव और तीन पुरों से युक्त है। विन्दु, अर्धचन्द्र, निरोधिनी, पर सदाशिव, इन्धिका आदि पुर सुषुम्ना में हैं । पर नाद ब्रह्मबिल सूक्ष्म आदि से युक्त ऊर्ध्व कुण्डली, शक्ति, व्यापि व्योम, अनन्त, अनाथ, अनाश्रित ये पाँच पुर हैं । इसके बाद छठाँ पुर अनाश्रित पुर है । इस के बाद समना सोलह भुवनों वाली है । अथवा बिन्दु आवरण और पर सदाशिव पाँच इन्धिका आदि भुवन, सुषुम्ना वाला ब्रह्मबिल, कुण्डलिनी, पाँच व्यापी, समना इस प्रकार शान्त्यतीता सोलह भुवनों वाली है ।। ४१७-४२७ ॥ इसके बाद चौबीस (तत्त्व)-क्योंकि प्रकृति तत्त्व क्षुब्ध अक्षुब्ध रूप से दो प्रकार का है । गुरुजन-वहाँ भी तीन पंक्तियाँ गुरुशिष्यविषयक हैं । विषय-सोलह विकार के बाद बतलाये गए शब्द आदि पाँच विषय, गुण = देह धर्म के रूप में पूर्व कथित अहिंसा आदि । ‘च’ का प्रयोग समुच्चय अर्थ में है । इसलिए एक तत्त्व में वीरेश भुवन और गुरु शिष्य भुवन इस प्रकार दो भुवन हैं । भुवन-भुवन = वामा आदि नव शक्तियों तथा तीन महादेव का भुवन । पुटपुरत्रय = इसका तीन पुर है । वाक्पुर योनि नामक वागीश्वरी का भुवन है । सत्ताईस पुरों वाली—वही कहा गया है “पुस्तत्त्व से मायातत्त्व तक विद्या की व्याप्ति मानी जाती है इसमें सात तत्त्व २३२ श्रीतन्त्रालोकः सप्त तत्त्वानि भुवनसप्तविंशतिरेव च ।।’ (स्व० ४।१७३) इति । वामेति, वामाद्या नव शक्तयः । ‘ईश:’ ईश्वरः । रूपेत्यादि सर्वमावरणान्तं प्रागुक्तम् । तेजस्विप्रधाना चासौ मितिर्मानावरणम्-इत्यर्थः । ‘इषिः’ इच्छा । सप्तदशपुरेति, तदुक्तम् …….. विद्यातत्त्वात्सदाशिवम् । तत्त्वानां त्रितये व्याप्तिर्वर्णानां त्रय एव च ।। पदैकादशिका ज्ञेया पुराणि दश सप्त च । (स्व० ४।१८५) इति । परसौशिवमिति, यत्र परेण रूपेण सदाशिवः । अनाश्रितमिति सर्वाश्रयत्वात् । ‘यदि वां’ इति पक्षान्तरे, षोडशभुवनेति, तदुक्तम् पदमेकं मन्त्र एको वर्णाः षोडश कीर्तिताः । भुवनानि सुसूक्ष्माणि शान्त्यतीते विभावयेत् ॥ (स्व० ४।१९७) इति ॥ ४२७ ॥ एवं श्रीस्वच्छन्दप्रक्रियया विभागमभिधाय शास्त्रान्तरप्रक्रमेणाप्याह श्रीमन्मतङ्गशास्त्रे च क्रमोऽयं पुरपूगगः । और सत्ताईस भुवन है ।” (स्वतं० ४।१७३) वामा–वामा आदि नव शक्तियाँ । ईश = ईश्वर । रूप इत्यादि सब आवरणपर्यन्त पहले कहा गया है । (तेजस्विमिति: की व्याख्या करते है-) तेजस्विप्रधानामिति: = मानावरण | इषि = इच्छा । सत्रह पुरों वाली-वही कहा गया है ____“विद्या तत्त्व से लेकर सदाशिव तक तीनों तत्त्वों तथा (क, ख, ग) तीन वर्षों में (शान्ता की) व्याप्ति है । ग्यारह पदों को जानना चाहिए (सदाशिव तत्त्व में) सत्रह पुरों का शोधन करना चाहिये ।” (स्व० तं० ४।१८५) परसौशिव-जहाँ पर रूप से सदाशिव हैं । अनाश्रित-क्योंकि वे सबके आश्रय हैं (और उनका कोई आश्रय नहीं है)। ‘यदि वा’ यह पक्षान्तर अर्थ में कहा गया है । सोलह भुवनों वाली—वही कहा गया है “एक पद, एक मन्त्र और सोलह वर्ण कहे गए हैं । सूक्ष्म भुवनों को शान्त्यतीता में समझना चाहिए” ।। ४१७-४२७ ।। (स्वतं० ४।१९७) इस प्रकार स्वच्छन्द तंत्र की रीति से विभाग का कथन कर दुसरे शास्त्र के क्रम से भी कहते हैं मतङ्गशास्त्र में पुरसमूहगामी क्रम यह है ।। ४२८- ।। अष्टममाह्निकम अयमिति वक्ष्यमाणः । तदाह कालाग्निर्नरकाः खाब्धियुतं मुख्यतया शतम् ॥ ४२८ ॥ कूष्माण्डः सप्तपाताली सप्तलोकी महेश्वरः । इत्यण्डमध्यं तद्बाह्ये शतं रुद्रा इति स्थिताः ॥ ४२९ ॥ स्थानानां द्विशती भूमिः सप्तपञ्चाशता युता । पञ्चाष्टकस्य मध्याद् द्वात्रिंशद्भूतचतुष्टये ॥ ४३० ॥ तन्मात्रेषु च पञ्च स्युर्विश्वेदेवास्ततोऽष्टकम् । पञ्चमं सेन्द्रिये गर्वे बुद्धौ देवाष्टकं गुणे ॥ ४३१ ॥ योगाष्टकं क्रोधसंज्ञं मूले काले सनैयते । पतद्रुगाद्याश्चागुष्ठमात्राद्या रागतत्त्वगाः ॥ ४३२ ॥ द्वादशैकशिवाद्याः स्युर्विद्यायां कलने दश । वामाद्यास्त्रिशती सेयं त्रिपर्वण्यब्धिरस्ययुक् ॥ ४३३ ॥ खाब्धीति चत्वारिंशत् । महेश्वरो रुद्रः । पञ्चममष्टकमिति स्थाण्वाख्यम् । पतद्रुगाद्या अष्टौ । अङ्गुष्ठमात्राद्या अपि अष्टौ । कलने कलायाम् । त्रिपर्वणीति, त्रिभिर्भूतभावतत्त्वाख्यैः पर्वभिर्युक्ते कलादिक्षितिपर्यन्ते पत्यादिपदार्थापेक्षया तृतीय स्मिन्पदाथैः । यदुक्तं तत्रैव यह = वक्ष्यमाण । वही कहते हैं कालाग्नि नरक मुख्यतया १४० हैं । कूष्माण्ड, सप्तपाताली, सप्तलोकी, महेश्वर ये अण्ड के मध्य में हैं । उसके बाहर १ सौ रुद्र स्थित हैं । भूमि २५७ भुवनों की है । ४० में से ३२ चार भूतों में से है। तन्मात्राओं में पाँच (भवन) इसके बाद आठ विश्वेदेव के भवन हैं। इसके बाद इन्द्रियों से युक्त अभिमान में पाँचवा अष्टक है । बुद्धि में देवाष्टक और गण में योगाष्टक, मूल प्रकृति में क्रोधसंज्ञक, नियति युक्त काल में पतद्रुक् आदि, राग तत्त्व में अंगुष्ठमात्र आदि, विद्या में बारह एकशिव आदि कला में दश, वामा आदि (शक्तियाँ) तीन सौ है । तीन पर्वो वाली वह यह (कला) है इसमें अब्धि = ४ रस ही रस्य है = ६ इस प्रकार ६४ भुवनेश हैं ।। -४२८-४३३ ।। खाब्धि = ४० । महेश्वर = रुद्र । पाँचवा अष्टक = स्थाण नामक पतद्रुक आदि आठ । अंगुष्ठमात्र आदि भी आठ । कलन में = कला में । त्रिपर्वणी = भूत भाव और तत्त्व नामक तीन पर्वो से युक्त कला से लेकर पृथिवी पर्यन्त पति २३४ श्रीतन्त्रालोकः ‘ये भूतभावतत्त्वाख्या मायातः क्षरिताः सदा । स पदार्थस्त्रिपर्वायं तृतीयः शिवशासने ।’ ____(मतङ्ग० १ प०) इति । अब्धिरस्ययुगिति, रसनीया ‘रस्या’ रसाः षट् तेन चतुःषष्टिरित्यर्थः ॥४३३॥ भुवनेश्वराश्चात्र विचित्रा:- इत्याह शैवाः केचिदिहानन्ताः भैकण्ठा इति संग्रहः। एषां च शिवादिदीक्षितत्वादेवमभिधानम् । यदाहुः ‘कलाग्निर्नरकाणां तु चत्वारिंशच्छतं ततः । कूष्माण्डः सह पाताल: सप्तभिलोकसप्तकम् ॥ रुद्रश्चेत्यण्डमध्येऽयं ततो रुद्रशतं बहिः । स्थानाना द्वशते मेव सप्तपञ्चाशता युता ।। पञ्चाष्टकानां द्वात्रिंशत्ततो भूतचतुष्टये । तन्मात्रेषु ततः पञ्च विश्वेदेवास्ततोऽष्टकम् ॥ पञ्चाष्टकानां षष्ठं यत् सेन्द्रिये गर्व एव तत् । स्थितं बुद्धौ ततो देवा अष्टावष्टौ च योगिनः ।। आदि पदार्थों की अपेक्षा तीसरे पदार्थ में । जैसा कि वहीं कहा गया “जो भूत भाव और तत्त्व नामक (पदार्थ) माया से सदा क्षरित होते रहते हैं शिव शास्त्र में यह तीसरा त्रिपर्वा पदार्थ है । (मह० १ प० ) अब्धिरस्ययुक्-जो रसनीय है वही रस्य है = रस = छ । इस प्रकार चौसठ (६४) ॥ ४३३ ॥ यहाँ भुवनेश्वर विचित्र हैं—यह कहते हैं कुछ लोग मानते हैं कि यहाँ आनन्त कण्ठ से उद्भूत शैव हैं- यह संक्षेप (में कथन) है ।। ४३४- ।। शिव आदि से दीक्षित होने के कारण इनके विषय में ऐसा कथन है । जैसा कि कहते है ___“कालाग्नि १४० नरकों के स्वामी हैं। कुष्माण्ड पातालों के साथ ७ लोक (के भुवनेश्वर) हैं और रुद्र अण्ड के बीच में है । इसके बाद बाहर १०० रुद्र हैं। इस प्रकार पृथिवी के २५७ भुवन हैं (= १४० + ७ + १००) इसके बाद पञ्चाष्टक = ४० में से ३२ चारों भूतों के लिए हैं। इसके बाद तन्मात्राओं के पाँच (भुवन) है इसके बाद अष्ट विश्वेदेव हैं । जो पञ्चाष्टकों में छठाँ अष्टक है वह इन्द्रियों से युक्त अहङ्कार में स्थित है । इसके बाद बुद्धि में आठ देव हैं । गुणों में अष्टममाह्निकम् गुणेष्वष्टौ तथाऽव्यक्त क्रोधाद्या: परतस्ततः । काले नियतिसंयुक्त पतद्रुक्प्रमुखास्ततः ।। अङ्गुष्ठाद्यास्तु रागेऽष्टो द्वादशैकशिवादयः । विद्यायां तु कलातत्त्वे वामाद्याः परतो दश ।। एवं त्रिपर्वणि प्रोक्तं भवनानां शतत्रयम् । चतुःषष्ट्यधिकं तेषु विचित्रा भुवनेश्वराः ।। शैवाः केचित्तथानन्ताः कण्ठा: केचिदेव तु । (म०त वृ०) इति । अत्र च साक्षादागमे संवादिते ग्रन्थविस्तर: स्यात्- इति तद्वत्तिकदुक्तं संवादितम् ।। ४३३ ।। नन्वेवं भुवनविभागप्रदर्शनेन कोऽर्थः ? -इत्याशङ्क्याह यत्र यदा परभोगान् बुभुक्षते तत्र योजनं कार्यम् ॥ ४३४ ॥ शोधनमथ तद्धानौ शेषं त्वन्तर्गत कार्यम् । इत्यागमं प्रथयितुं दर्शितमेतद्विकल्पितं तेन ॥ ४३५ ॥ यदुक्तम् ‘यो यत्राभिलषेशोगान् स तत्रैव नियोजितः । सिद्धिभाङ् मन्त्रसामर्थ्यात्…………………. ।।’ इति । आठ योगी है । अव्यक्त में क्रोध आदि आठ है । उसके परे नियतियुक्त काल में पतद्रुक आदि हैं । उसके बाद राग तत्त्व में अंगुष्ठ आदि आठ है । विद्या में बारह एक शिव आदि है । कला तत्त्व में वामा आदि दश हैं । इस प्रकार त्रिपर्व में तीन सो चौसठ भुवन कहे गए हैं उनमें विचित्र भुवनेश्वर हैं जिनमें कुछ शैव कुछ आनन्त और कुछ श्रीकण्ठ से प्रसूत है।’’ (म० त०वृ०) यहाँ साक्षात् आगम के कथन पर ग्रन्थ विस्तृत हो जाता इसलिए वृत्तिकार का वचन कहा गया ॥ ४३३ ।। प्रश्न- इस प्रकार भुवनों के विभाग के प्रदर्शन से क्या तात्पर्य है ?-यह शङ्का कर कहते हैं जो जब जहाँ पर भोगों को भोगना चाहते हैं उनका वहाँ योजन करना चाहिए । अथवा उसकी हानि होने पर शोधन करना चाहिए । शेष को बीच में कर लेना चाहिए । इसलिए उसके द्वारा इस आगम को व्यापक बनाने के लिए यह विकल्प दिखाया गया ।। -४३४-४३५ ॥ जैसा कि कहा गया है “जो जहाँ (= जिस भुवन में) भोगों की अभिलाषा करता है वह वहीं HRENESTEETHARASTRIEFEREITHE २३६ श्रीतन्त्रालोकः अथेति पक्षान्तरे । ‘तद्धानौ’ इति भोगेच्छात्यागे-इत्यर्थः । अन्तर्गतमिति, प्रधानशद्धयैव तच्छद्धम । दर्शितमिति, अन्यथा हि कथमेवं परिज्ञानं भवेत-इति भावः । तेनेति-तेन तेन गुरुणा-इत्यर्थः ।। ४३५ ॥ नन्वत्र किमियन्त एव विकल्पा: संभवन्ति न वा ?-इत्याशङ्क्याह अन्येऽपि बहुविकल्पाः स्वधियाचार्यैः समभ्यूह्याः । ननु यद्येवमनेके विकल्पा: संभवन्ति तदिह पुन: किं ग्राह्यम् ? इत्याशङ्क्याह श्रीपूर्वशासने पुनरष्टादशाधिकं शतं कथितम् ॥ ४३६ ॥ तदिह प्रधानमधिकं संक्षेपेणोच्यते शोध्यम् । शतमिति भुवनानाम् । तदुक्तं तत्र ‘एवं तु सर्वतत्त्वेषु शतमष्टादशोत्तरम् । भुवनानां परिज्ञेयं संक्षेपान्न तु विस्तरात् ॥’ (मा०वि० ५।३३) प्रधानमिति, तदधिकारेणैवास्य ग्रन्थस्य प्रवृत्तेः ।। ४३६ ॥ नियोजित होता है (और) मन्त्र के सामर्थ्य से सिद्धि को प्राप्त करता है ।’’ __ ‘अथ’ शब्द का प्रयोग पक्षान्तर अर्थ में है । उसकी हानि होने पर = भोगेच्छा का त्याग होने पर । अन्तर्गत = प्रधान की शुद्धि से ही वह शुद्ध हो जाता है । दिखलाया गया— अन्यथा ऐसा ज्ञान कैसे होता । उसके द्वारा = उस-उस गुरु के द्वारा ।। ४३५ ।। प्रश्न—क्या यहाँ इतने ही विकल्प संभव है या नहीं ? यह शङ्का कर कहते ___ अन्य भी अनेक विकल्प आचार्यों के द्वारा अपनी बुद्धि से समझ लेने चाहिए ।। ४३६- ॥ प्रश्न- यदि इस प्रकार अनेक विकल्प सम्भव हैं तो यहाँ किसका ग्रहण किया जाए ? यह शङ्का कर कहते है श्रीपूर्वशास्त्र में ११८ (विकल्प) कहे गए हैं । तो यहाँ प्रधान रूप से अधिक शोधनीय को संक्षेप में कहते हैं ।। -४३६-४३७- ।। एक सौ-भुवन । वही वहाँ कहा गया “इस प्रकार सभी तत्त्वों में संक्षेप में न कि विस्तार से ११८ भुवनों को जानना चाहिए ।’ (मा०वि० ५।३३) प्रधान—क्योंकि उसके अधिकार से ही इस ग्रन्थ की प्रवृत्ति है ॥ ४३६ ॥अष्टममाह्निकम् तदेवाह कालाग्नि: कूष्माण्डो नरकेशो हाटकोऽथ भूतलपः ॥ ४३७ ॥ ब्रह्मा मुनिलोकेशो रुद्राः पञ्चान्तरालस्थाः । अधरेऽनन्तः प्राच्याः कपालिवह्नयन्तनिऋतिबलाख्याः ॥ ४३८ ॥ लघुनिधिपतिविद्याधिपशम्भूर्ध्वान्तं सवीरभद्रपति । एकादशभिर्बाह्ये ब्रह्माण्डं पञ्चभिस्तथान्तरिकैः ॥ ४३९ ॥ इति षोडशपुरमेतन्निवृत्तिकलयेह कलनीयम् । लकुलीशभारभूती दिण्ड्याषाढी च पुष्करनिमेषौ ॥ ४४० ॥ प्रभाससुरेशाविति सलिले प्रत्यात्मकं सपरिवारे । भैरवकेदारमहाकाला मध्याम्रजल्पाख्याः ॥ ४४१ ॥ श्रीशैलहरिश्चन्द्राविति गुह्याष्टकमिदं महसि । भीमेन्द्राट्टहासविमलकनखलनाखलकुरुस्थितिगयाख्याः ॥ ४४२॥ अतिगुह्याष्टकमेतन्मरुति च सतन्मात्रके च साक्षे च । स्थाणुसुवर्णाख्यौ किल भद्रो गोकर्णको महालयकः ॥ ४४३ ॥ अविमुक्तरुद्रकोटी वस्त्रापद इत्यदः पवित्रं खे । स्थूलस्थूलेशशङ्कुश्रुतिकालझराश्च मण्डलभृत् ॥ ४४४ ॥ माकोटाण्डद्वितयच्छगलाण्डा अष्टकं ह्यहङ्कारे । वही कहते हैं कालाग्नि, नरकेश कूष्माण्ड, पातालेश, हाटक, भूतलप (= भूतलेश) ब्रह्मा, अन्तराल में स्थित सप्तलोकेश विष्णु, ये पाँच रुद्रभुवन हैं । नीचे अनन्त, प्राच्य, कपालीश, अग्नि, यम, निति, बल नाम वाले, शीघ्र, निधिपति, विद्याधिप, शम्भु ये दश भवन हैं वीरभद्रपति । ये भवन से युक्त हैं । ऊपर तक इन ग्यारह से बाहर की ओर तथा आन्तरिक पाँच से भीतर की ओर युक्त हैं इस प्रकार निवृत्ति कला के द्वारा षोडश भुवन समझना चाहिए । लकुलीश, भारभूति, दिण्डि, आषाढी, पुष्कर, निमेष, प्रभास, सुरेश, ये पत्यष्टक सपरिवार जल तत्त्व में हैं । भैरव, केदार, महाकाल, मध्य, आप्रेश, जलेश, जल्पेश, श्रीशैल, हरिश्चन्द्र ये गह्याष्टक तेजस् तत्त्व में हैं । भीम, इन्द्र, अट्टहास, विमल, कनखल, नाखल, कुरुक्षेत्र, गया, ये आठ भुवन अति गुह्याष्टक मरुत् तत्त्व में है । तन्मात्राओं और इन्द्रियों से युक्त आकाश में स्थाणु, सुवर्ण, भद्र, गोकर्ण, महालयक, अविमुक्त, रुद्रकोटि, वस्त्रापद ये है । स्थूल, स्थूलेश, शङ्कश्रुति, कालञ्जर, मण्डलभृत्, दो माकोट अण्ड, छागलाण्ड ये आठ अहङ्कार में है ।। ४३७-४४५- || श्रीतन्त्रालोकः मुनीति सप्त । एवमीशत्वविशेषणेषां तदन्त:कार: प्रकाशितः । प्राच्या इत्यारभ्य । ‘अन्तः’ इति अन्तकारित्वात् यमः । ‘लघु’ इति शीघ्रकारित्वा च्छीघ्रः । यदुक्तम् ___ ‘आदौ कालाग्निभुवनं शोधितव्यं प्रयत्नतः । (मा० वि० ५।१) इत्युपक्रम्य ‘कालाग्निपूर्वकैरेभिर्भुवनैः पञ्चभिः प्रिये । शुद्धैः शुद्धमिदं सर्वं ब्रह्माण्डान्तर्व्यवस्थितम्।। तबहिः शतरुद्राणां भुवनानि पृथक् पृथक् । दशमं शोधयेत्पश्चादेकं तन्नायकावृतम् ॥ अनन्तः प्रथमस्तेषां कपालीशस्तथापरः । अग्निरुद्रो यमश्चैव नैर्ऋतो बल एव च ।। शीघ्रो निधीश्वर श्चति सर्वविद्याधिपोऽपरः । शम्भश्च वीरभद्रश्च विधमज्वलनप्रभाः ।। एभिर्दशैकसंख्यातैः शुद्धैः शुद्धं शतं मतम्।’ (मा० वि० ५।१५) इति । प्रत्यात्मकमिति नामान्तरेण गुह्याष्टकमेव अत्रोक्तम् । ‘सतन्मात्रके च साक्षे च’ इति खस्य विशेषणम् । एतदन्तं हि अनेनैवाष्टकेन व्याप्तमिति केषाञ्चिन्मतम् । अन्येषां पुन: कार्यस्य कारणान्तरवस्थानौचित्यात् इयदहङ्कारेण व्याप्त मुनि = सात । इस प्रकार ईशत्व के विशेषण से इनका तदन्त:कार (= अन्दर क्रिया करना) प्रकाशित होता है । प्राची से-आरम्भ कर के । ‘अन्त’ अन्तकारी होने से यम । लघु = शीघ्रकारी होने से शीघ्र । जैसा कि कहा गया “पहले प्रयत्नपूर्वक कालाग्निभुवन का शोधन करना चाहिए ।” (मा०वि० ५।१) ऐसा प्रारम्भ कर “हे प्रिये ! कालाग्निपूर्वक इन पाँच शुद्ध भुवनों के द्वारा शुद्ध यह सब ब्रह्माण्ड के भीतर स्थित है । उसके बाहर शतरुद्रों के अलग-अलग भुवन हैं । उसके नायक से आवृत दशवें को बाद से शोधना चाहिए । उनमें प्रथम है अनन्त, दूसरा कपालीश, अग्निरुद्र, यम, नैर्ऋत, बल, शीघ्र, निधीश्वर, सर्वविद्याधिप, शम्भु, वीरभ्रद, विधूम, ज्वलनप्रभा इन शुद्ध ग्यारह संख्या वालों से सौ भुवनों की शुद्धि मानी गयी हैं ॥ (मा० वि० ५।१५) प्रत्यात्मक = दूसरे नाम से गुह्याष्टक ही यहाँ कहा गया । तन्मात्राओं के सहित और इन्द्रियों के सहित—यह आकाश का विशेषण है । यहाँ तक इसी अष्टक से व्याप्त है-ऐसा कुछ लोगों का मत है । दूसरों के मत में अष्टममाह्निकम् २३२ मिति ॥ ४४४ ॥ अत एवाह अन्येऽहङ्कारान्तस्तन्मात्राणीन्द्रियाणि चाप्याहुः ॥ ४४५ ॥ धियि योन्यष्टकमुक्तं प्रकृतौ योगाष्टकं किलाकृतप्रभृति। इति सप्ताष्टकभुवना प्रतिष्ठितिः सलिलतो हि मूलान्ता ॥ ४४६ ॥ नरि वामो भीमोग्रौ भवेशवीराः प्रचण्डगौरीशौ । अजसानन्तैकशिवौ विद्यायां क्रोधचण्डयुग्मं स्यात् ॥ ४४७ ॥ संवों ज्योतिरथो कलानियत्यां च सूरपञ्चान्तौ । वीरशिखीशश्रीकण्ठसंज्ञमेतत्त्रयं च काले स्यात् ॥ ४४८ ॥ समहातेजा वामो भवोद्भवश्चैकपिङ्गलेशानौ । भुवनेशपुरःसरकावगुष्ठ इमे निशि स्थिता ह्यष्टौ ॥ ४४९ ॥ अष्टाविंशतिभुवना विद्या पुरुषान्निशान्तमियम् । हालाहलरुद्रक्रुदम्बिकाघोरिकाः सवामाः स्युः ॥ ४५० ॥ विद्यायां विद्येशास्त्वष्टावीशे सदाशिवे पञ्च । वामा ज्येष्ठा रौद्री शक्तिः सकला च शान्तेयम् ॥ ४५१ ॥ अष्टादश भुवना स्यात्.. कार्य की कारण के भीतर स्थिति के औचित्य के कारण यहाँ तक अहङ्कार से व्याप्त है ॥ ४३७-४४४ ।। इसीलिए कहते हैं दूसरे लोग अहङ्कार के भीतर तन्मात्राओं और इन्द्रियों को कहते हैं । बुद्धि तत्त्व में आठ योनियों को कहा गया है, प्रकृति में किलाकृत आदि योगाष्टक (को कहा गया है) । इस प्रकार जल तत्त्व से लेकर मूल प्रकृति तक सप्ताष्टक (७४ ८ = ५६) भुवनों की प्रतिष्ठा है । नृ (= पुरुष) तत्त्व में वाम, भीम, उग्र, भव, ईश तथा वीर हैं । विद्या में प्रचण्ड, गौरीश, अज, अनन्त के सहित एकशिव, तथा क्रोधचण्डयुगल है । संवत और ज्योतिरथ कला में तथा सूर और पञ्चान्त नियति तत्त्व में हैं । काल तत्त्व में वीर शिखीश और श्रीकण्ठ ये तीन हैं । माया तत्त्व में महातेजा, वाम, भवोद्भवन एकपिङ्गल, ईशान; इन दोनों के भुवनेश तथा अंगुष्ठ ये आठहैं । पुरुष से लेकर निशा (= माया) तक यह विद्या अट्ठाईस भवनों वाली है । विद्या में हालाहल, रुद्र, क्रुध, अम्बिका, घोरिका और वामा है। ईश्वर तत्त्व में आठ विद्येश, सदाशिव में पाँच वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, शक्ति और सकला है । शान्ता अठारह भुवनों वाली है ॥ -४४५-४५२- ।। २४० श्रीतन्त्रालोकः अत्र च केषाञ्चित् स्वकण्ठेन अन्येषां पर्यायेण अन्येषां च पदैकदेशेना भिधानम्, इति स्वयमेवाभ्यूह्यम् । एतच्च प्रागेव संवादितम् । नरीत्यर्थादन्त र्भावितरागतत्त्वे, तेन पुंस्तत्त्वे वामादयः षट्, रागे च प्रचण्डादयः पञ्च । तदुक्तम् ‘ततोऽप्यर्धागुलव्याप्त्या पुरषट्कमनुक्रमात् । चतुष्कं तु द्वयेऽन्यस्मिन्नेकमेकत्र चिन्तयेत् ॥ (मा० वि० ६।१४) इति । सानन्तेति, अनन्तसहित एकशिव:-इत्यर्थः । निशीति मायायाम् । ‘ईशे’ इति ईश्वरतत्त्वे । एवं निवृत्तौ षोडश, प्रतिष्ठायां षट्पञ्चाशत्, विद्यायामष्टा विंशतिः, शान्तायामष्टादश–इति भुवनानामष्टादशोत्तरं शतम् ॥ ४५१ ।। ननु शान्त्यतीतायामप्यन्यत्र भुवनविभाग उक्तस्तत्पुनरिह कस्मात् न ? इत्याशङ्क्याह …शान्त्यतीता त्वभुवनैव । न हि अत्र देशादिकलना काचिद्भवेदिति भावः ॥ एतच्चार्याया: प्रथमार्धेनोपसंहरिति यहाँ (= मूल ग्रन्थ में) कुछ का अपने कण्ठ से, कुछ का पर्यायवाची के द्वारा और दूसरों का पदांश के द्वारा कथन है—ऐसा स्वयं समझ लेना चाहिए । यह पहले ही कह दिया गया है । नरि = अन्तर्भावित राग तत्त्व में— इससे पुरुष तत्त्व में वामा आदि छ, और राग में प्रचण्ड आदि पाँच भुवन है । वही कहा गया “इसके बाद भी आधे अङ्गल की व्याप्ति से छ पुरों का क्रम से, चार को दो में और एक का अन्य एक में चिन्तन करना चाहिए ।” (मा०वि० ६।१४) सानन्त-अनन्त के सहित एक शिव । निशा में = माया में । ईश में = ईश्वर तत्त्व में । इस प्रकार निवृत्ति में सोलह, प्रतिष्ठा में छप्पन, विद्या में अट्ठाईस और शान्ता में अठारह इस प्रकार ११८ भुवन है (जिनका शोधन करने के बाद शाम्भव समावेश का पात्रता प्राप्त होती है) ।। ४५१ ।। प्रश्न–अन्य ग्रन्थों में शान्त्यतीता में भी भुवनों का विभाग कहा गया है यहाँ क्यों नहीं ? यह शङ्का कर कहते हैं शान्त्यतीता बिना भुवन के हैं ।। -४५२- ।। यहाँ देश आदि की कोई गणना (= कल्पना) नहीं है ॥ इस (आह्निक) को आर्या के पूर्वार्द्ध से समाप्त करते हैं अष्टममाह्निकम् २४१ इति देशाध्वविभाग: कथितः श्रीशम्भुना समादिष्टः॥ ४५२ ॥ ॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तपादविरचिते श्रीतन्त्रालोके देशाध्वप्रकाशनं नामाष्टममाह्निकम् ॥ ८ ॥ श्रीशम्भनेति परमेश्वरेण गुरुणेति शिवम् ।। ‘जम्बुद्वीपे भारतवर्षं तत्राहितस्थितिर्विदधे । जयरथनामा कश्चिद्विवृतिमिमामष्टमाह्निके स्पष्टाम् ॥’ ॥ इति श्रीमदाचार्याभिनवगुप्तपादविरचिते, श्रीजयरथाचार्यकृत विवेकाख्यव्याख्योपेते श्रीतन्त्रालोके देशाध्वप्रकाशनं नाम अष्टममाह्निकम् ॥ ८ ॥ इस प्रकार श्री शम्भु के द्वारा उपदिष्ट देशाध्वा का विभाग कहा गया ।। -४५२ ।। श्री शम्भु के द्वारा = परमेश्वर गुरु के द्वारा ॥ ॥ इस प्रकार श्रीमदाचार्यअभिनवगुप्तपादविरचित श्रीतन्त्रालोक के अष्टम आह्निक की डॉ० राधेश्याम चतुर्वेदी कृत ‘ज्ञानवती’ हिन्दी टीका सम्पूर्ण हुई ॥ ८ ॥ जम्बूद्वीप में भारतवर्ष है । उसमें स्थित किसी जयरथ नामक आचार्य ने अष्टमआह्निक की स्पष्ट व्याख्या की । ॥ इस प्रकार आचार्यश्रीजयरथकृत श्रीतन्त्रालोक के अष्टम आह्निक की ‘विवेक’ नामक व्याख्या की डॉ० राधेश्याम चतुर्वेदी कृत ‘ज्ञानवती’ हिन्दी टीका सम्पूर्ण हुई ॥ ८ ॥